NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-संघ को वैचारिक चुनौती दे पाएंगे केजरीवाल?
संकेत मिल रहा है कि अब केजरीवाल दिल्ली, पंजाब, हरियाणा व गोवा जैसे राज्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में पूरे जोरशोर के साथ कूदने को तैयार हैं। निकट भविष्य में वे दिल्ली के अपने ‘विकास माडल’ और ‘काम की राजनीति’ को लेकर अभियान शुरू कर सकते हैं।

 अफ़ज़ल इमाम
14 Feb 2020
arvind kejariwal

आम आदमी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘बजरंगी भाईजान’ का अवतार लेकर दिल्ली में चुनावी वैतरणी तो कुशलतापूर्वक पार कर ली है। इस चुनाव में भाजपा बुरी तरह धाराशयी हुई है, लिहाजा तमाम विपक्षी नेताओं के दिलों को भी ठंडक पहुंची है, लेकिन अब सवाल भी उठ रहा है कि क्या केजरीवाल राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-आरएसएस को वैचारिक चुनौती दे पाएंगे? क्योंकि 11 फरवरी को मतगणना के दौरान जब आम आदमी पार्टी को बढ़त मिल रही थी तो पार्टी कार्यालय पर एक पोस्टर नजर आया जिसमें लिखा था ‘राष्ट्र निर्माण के लिए आप से जुड़ें।’ साथ ही उस पर मिस्ड काल देने के लिए एक नंबर भी दिया गया है। इससे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि अब केजरीवाल दिल्ली, पंजाब, हरियाणा व गोवा जैसे राज्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में पूरे जोरशोर के साथ कूदने को तैयार हैं। निकट भविष्य में वे दिल्ली के अपने ‘विकास माडल’ और ‘काम की राजनीति’ को लेकर अभियान शुरू कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो वे भाजपा के लिए कम, अन्य विपक्षी पार्टियों के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती साबित होंगे। इसका ट्रेलर इसी वर्ष बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में दिखने वाला है, जबकि अगले वर्ष प. बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु व पुडुचेरी जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं, जहां आप अपने कदम रख सकती है। मुंबई महानगर पालिका (मनपा) चुनाव लड़ने का एलान तो पार्टी ने अभी से कर दिया है।

यह बात सही है कि बीते एक साल में भाजपा आधा दर्जन राज्यों में चुनाव हारी है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले उसका वोट प्रतिशत ज्यादा नहीं गिरा है। हरियाणा और झारखंड में तो उसका करीब 2-2 फीसदी वोट बढ़ा था। दिल्ली में तो महज 8 सीटों पर सिमटने के बावजूद उसने 38.51 फीसदी वोट हासिल किए हैं, जो पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में 6.32 फीसदी ज्यादा है। हैरत की बात है कि ऐसा तब हुआ है जब संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं के बारे में भाजपा के जिम्मेदार नेताओं ने बेहद गंदी भाषा का इस्तेमाल किया और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की भी कोशिश की गई। इतना ही नहीं जेएनयू में हॉस्टल में घुसकर गुंडों ने निहत्थे छात्र-छात्राओं पर हमला किया, जबकि जामिया में पुलिस ने बर्बता की। वोटिंग से ठीक 4 दिन पहले राजधानी के गार्गी कॉलेज की छात्राओं के साथ बदसलूकी की गई। चुनाव के दौरान ऐसा माहौल बना दिया गया कि बेरोजगारी और मंहगाई जैसे मुद्दों पर चर्चा ही नहीं हो सकी। जाहिर है कि इसका असर दूसरी तरफ भी दिखाई पड़ा। धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र व संविधान में विश्वास में रखने वाली जनता भी गोलबंद हुई और बिना किसी भ्रम के आम आदमी पार्टी के पक्ष में शिद्दत के साथ मतदान किया। इस जनादेश को सीएए, प्रस्तावित एनआरसी व बंटवारे की राजनीति के खिलाफ माना जा रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पहले केजरीवाल ने अपनी सरकार के कामकाज के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन सच्चाई यह भी है कि अंत में उन्हें भी धर्म का सहारा लेना पड़ा। कुछ लोग इसे चुनावी रणनीति बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि यह उनकी सियासी मजबूरी थी। निजी जीवन में किसी नेता या व्यक्ति की धार्मिक आस्था हो सकती है और इस पर किसी को प्रश्न करने का अधिकार नहीं है, लेकिन जब उसका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के बतौर किया जाएगा तो उस पर चर्चा होनी स्वाभाविक है। सिर्फ यह कह देने से काम नहीं चलेगा ‘कुछ भी हो, उसने तो अपने विरोधियों को धूल चटा दी है।‘ जब राहुल गांधी के जनेऊ व मंदिर भ्रमण और अखिलेश यादव के अयोध्या में रामायण संग्रहालय व थीम पार्क पर बहस हो सकती है तो केजरीवाल की राजनीति पर बात क्यों नहीं होनी चाहिए? यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अब आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में उतरने का संकेत दे रही है और बुद्धिजीवियों व समाज का एक वर्ग उसे बेहतर विकल्प के रूप में देख रहा है। यह वही वर्ग है, जो मौजूदा विपक्षी पार्टियों से अपनी उम्मीदें खो चुका है।

उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जब इमाम अहमद बुखारी ने आम आदमी पार्टी के पक्ष में अपील की थी, तो केजरीवाल ने दो टूक लहजे में उसे खारिज कर दिया था। इसकी सराहना मुस्लिम समेत समाज के सभी वर्गों ने की थी। यह माना गया था कि कम से कम आम आदमी पार्टी राजनीति के साथ धर्म का घालमेल नहीं करेगी और सांप्रदायिकता के खिलाफ भी उसके तेवर उतने ही तीखे होंगे, जितने कि भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। यही कारण है कि तमाम वामपंथी विचारों के लोग भी इससे जुड़ गए, लेकिन इस मोर्चे पर उसने उन्हें निराश किया है। दिल्ली के त्रिलोकपुरी में जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो केजरीवाल सरकार और पार्टी दोनों खामोश रहीं। सामाजिक न्याय, आरक्षण व माब लिंचिंग आदि जैसे मुद्दों पर भी उसकी उतनी ही भूमिका दिखी, जितनी कि कांग्रेस या विपक्ष की अन्य मध्यमार्गी पार्टियों की रही है। इतना ही नहीं पिछले 5 साल के दौरान उसे किसी भी जगह भ्रष्टाचार नजर नहीं आया। वर्ष 2014 में राज्य सरकार ने जिन नेताओं व उद्योगपति के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में आपराधिक साजिश व धोखाधड़ी की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करवाया था, उसका नतीजा भी शून्य ही रहा। अब चुनाव के दौरान शाहीनबाग जैसे गंभीर मुद्दे पर केजरीवाल मौन रहे और अपने को हनुमान भक्त और देशभक्त साबित करने में जुटे रहे। दूसरी तरफ पार्टी उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा शाहीनबाग के पक्ष में दिए गए उनके बयान पर बचाव की मुद्रा में नजर आई। यही कारण है कि कई लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि इस तरह की राजनीति किसी पार्टी को चुनाव तो जितवा सकती है, लेकिन वह सांप्रदायिकता व नफरत के कैंसर को खत्म करने के लिए ‘कीमोथेरेपी’ नहीं बन सकती है। फिलहाल आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार विरोध और गरीबों के लिए कुछ वेलफेयर स्कीमों के दाएरे से आगे निकलने को तैयार नहीं दिख रही है।

वैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत को लेकर कुछ विपक्षी नेताओं व बुद्धिजीवियों में ठीक उसी तरह की भावना नजर आ रही है, जैसा कि नोटबंदी के समय गरीबों के एक तबके में दिखाई पड़ी थी। उन्हें भी लगा था कि उनके पास तो खोने के लिए कुछ है नहीं, असली बर्बादी तो उनका खून चूसने वाले साहूकार की होगी... बहरहाल राष्ट्रीय राजनीति के अखाड़े में कूदने को तैयार आम आदमी पार्टी सबसे बहले बिहार में अपने ट्रेलर दिखाने वाली है। इसकी एक वजह यह भी है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) अब केजरीवाल के साथ हैं। चंद दिनों पहले मुख्यमंत्री व जद (यू) प्रमुख नीतीश कुमार ने उन्हें अपमानित कर पार्टी से निकाल दिया था। चर्चा है कि राज्य विधानसभा चुनाव में वे इसका हिसाब बराबर करने की ठान चुके हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी बिहार में किसी के साथ गठबंधन करती है या एकला चलो... का रास्ता अपनाती है। यदि वह अकेले चुनाव लड़ती है तो इसका फाएदा किस पार्टी को होगा?  इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके बाद अगले साल 5 राज्यों में चुनाव होने हैं, जिनमें प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, केरल में वामपंथी और पुडुचेरी में कांग्रेस की सरकारें है। फिर  वर्ष 2022  में भी यूपी, गुजरात, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर में चुनाव होंगे।  

Arvind Kejriwal
aam aadmi party
aam aaadmi party furture plan
aam admi party and india

Related Stories

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

धनशोधन क़ानून के तहत ईडी ने दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ़्तार किया

ख़बरों के आगे-पीछे: MCD के बाद क्या ख़त्म हो सकती है दिल्ली विधानसभा?

‘आप’ के मंत्री को बर्ख़ास्त करने से पंजाब में मचा हड़कंप

मुंडका अग्निकांड के लिए क्या भाजपा और आप दोनों ज़िम्मेदार नहीं?

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रपति के नाम पर चर्चा से लेकर ख़ाली होते विदेशी मुद्रा भंडार तक

मुंडका अग्निकांड: लापता लोगों के परिजन अनिश्चतता से व्याकुल, अपनों की तलाश में भटक रहे हैं दर-बदर

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती


बाकी खबरें

  • Sustainable Development
    सोनिया यादव
    सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भारत काफी पीछे: रिपोर्ट
    03 Mar 2022
    एनुअल स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2022 रिपोर्ट के मुताबिक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भारत फिलहाल काफी पीछे है। ऐसे कम से कम 17 प्रमुख सरकारी लक्ष्य हैं, जिनकी समय-सीमा 2022 है और धीमी गति…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पूर्वांचल की जंग: 10 जिलों की 57 सीटों पर सामान्य मतदान, योगी के गोरखपुर में भी नहीं दिखा उत्साह
    03 Mar 2022
    इस छठे चरण में शाम पांच बजे तक कुल औसतन 53.31 फ़ीसद मतदान दर्ज किया गया। अंतिम आंकड़ों का इंतज़ार है। आज के बाद यूपी का फ़ैसला बस एक क़दम दूर रह गया है। अब सात मार्च को सातवें और आख़िरी चरण के लिए…
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव: बस्ती के इस गांव में लोगों ने किया चुनाव का बहिष्कार
    03 Mar 2022
    बस्ती जिले के हर्रैया विधानसभा में आधा दर्ज़न गांव के ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार करने का एलान किया है। ग्रामीणों ने बाकायदा गांव के बाहर इसका बैनर लगा दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी…
  • gehariyaa
    एजाज़ अशरफ़
    गहराइयां में एक किरदार का मुस्लिम नाम क्यों?
    03 Mar 2022
    हो सकता है कि इस फ़िल्म का मुख्य पुरुष किरदार का अरबी नाम नये चलन के हिसाब से दिया गया हो। लेकिन, उस किरदार की नकारात्मक भूमिका इस नाम, नामकरण और अलग नाम की सियासत की याद दिला देती है।
  • Haryana
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हरियाणा: आंगनबाड़ी कर्मियों का विधानसभा मार्च, पुलिस ने किया बलप्रयोग, कई जगह पुलिस और कार्यकर्ता हुए आमने-सामने
    03 Mar 2022
    यूनियन नेताओं ने गुरुवार को कहा पंचकुला-यमुनानगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बरवाला टोल प्लाजा पर हड़ताली कार्यकर्ताओं और सहायकों पर  हरियाणा पुलिस ने लाठीचार्ज  किया।  
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License