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मप्र : वन उत्पादों को इकट्ठा करने वाले आदिवासियों की ख़राब हालत कोविड-19 के चलते बदतर हुई
मध्यप्रदेश के जंगलों में रहने वाली स्थानीय आबादी और वन घूमंतु समुदाय की 'अल्प वन उत्पादों' के एकत्रीकरण और बिक्री से होने वाली आय को, इन उत्पादों के सीज़न में जारी महामारी और उसके बाद लगे लॉकडाउन से गहरा झटका लगा है। यह उत्पाद इन लोगों की आय का एक बड़ा हिस्सा हैं।
शिंजानी जैन
07 Jul 2021
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भारतीय समाज के वंचित और गरीब़ तबकों को स्वास्थ्य संकट और कोरोना को नियंत्रित करने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते बहुत दर्द झेलना पड़ा है।

इन हालातों में जिन्हें सबसे ज़्यादा झेलना पड़ा है, उनमें भारत के जंगलों के भीतर और उसके आसपास रहने वाली आबादी भी शामिल है। इन लोगों की आय का बड़ा हिस्सा 'अल्प वन उत्पादों (माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस या MFP) को इकट्ठा कर, उन्हें बेचने से आता है। लेकिन राष्ट्रीय और प्रदेश सरकारों द्वारा 2020 और 2021 में लगाए गए लॉकडाउन के चलते इसपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मार्च से जून तक की चार महीने सबसे बदतर रहे हैं, जबकि वन उत्पादों को इकट्ठा करने और बेचने का यही समय होता है। 

कोविड-19 से पैदा हुईं अभूतपूर्व स्थितियों को देखते हुए जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने राज्यों के साथ मिलकर MFP की संशोधित MSP के लिए साझा रणनीति बनाई और जारी की। यह एक मई, 2020 से लागू मानी जाएगी। 

कुछ वन उत्पादों के लिए MSP 90 फ़ीसदी तक बढ़ा दिया गया था। मंत्रालय ने अल्प वन उत्पाद सूची में 23 नई चीजों को जोड़ने का भी सुझाव दिया है। इन नई चीजों में जनजातीय लोगों द्वारा इकट्ठे किए जाने वाले कृषि और बागानी उत्पाद शामिल है। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद, पिछले साल की रिपोर्टों में सरकारी अधिकारियों ने माना है कि MFP में होने वाले व्यापार में पिछले साल की तुलना में निश्चित तौर पर 30 से 40 फ़ीसदी की कमी आई है। लॉकडाउन के जनजातीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव के सटीक विश्लेषण में फिलहाल वक्त लगेगा। 

MFP अर्थव्यवस्था भारत की ग्रामीण आबादी में एक बड़े हिस्से को आसरा देती है। इस आबादी का भी एक बड़ा हिस्सा जनजातीय लोगों का है। अनुमानों के मुताबिक MFP के एकत्रीकरण और बिक्री से भारत में करीब़ 10 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी चलती है। 

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (TRIFED) के हालिया आंकड़ों द्वारा लगाए गए अनुमानों के मुताबिक़ MFP में शामिल 55 अहम चीजों का व्यापारिक मूल्य करीब़ 20,000 करोड़ रुपये है। TRIFED एक राष्ट्रीय सहकारी संस्था है, जो जनजातीय उत्पादों के विकास और विपणन की दिशा में काम करती है। 

बड़ी अर्थव्यवस्था होने का बावजूद, MFP को इकट्ठा करने वाले लोगों की सालाना आय बहुत कम है। इसकी पुष्टि, इस लेख में नीचे शामिल, मध्यप्रदेश के कुछ गांवों में MFP इकट्ठा करने वालों की वार्षिक आय और एकत्रीकरण से जुड़े आंकड़ों से हो जाती है।

2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश में जनजातीय आबादी की हिस्सेदारी कुल आबादी में 21,1 फ़ीसदी है। ग्रामीण क्षेत्र की आबादी की बात करें, तो यह आंकड़ा 27.2 फ़ीसदी बैठता है। अलीराजपुर, झाबुआ, डिंडौरी, बड़वानी और मंडला जिले बड़ी जनजातीय आबादी वाले क्षेत्र हैं। मध्यप्रदेश में बड़े स्तर पर वन संपदा मौजूद है। राज्य बड़े पैमाने पर भारत में होने वाले MFP व्यापार में योगदान करता है। राज्य का करीब़ 31 फ़ीसदी क्षेत्र वनों के तौर पर वर्गीकृत है। 

मध्यप्रदेश में मिलने वाले चिकित्सकीय वनस्पति में तेंदू पत्ता, साल के बीज, हर्रा, गम, चिरौंजी, महुआ के फूल और बीज शामिल हैं। इनमें से तेंदू पत्ता, साल के बीज और कुल्लु गम, राज्य के राष्ट्रीयकृत वन उत्पाद हैं। इन उत्पादों में मध्यप्रदेश का एकाधिकार है। दूसरे MFP का एकत्रीकरण कर मुक्त व्यापार किया जा सकता है। इन्हें ज़्यादातर निजी व्यापारी ही खरीदते हैं।

मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एस आर आजाद बताते हैं, "गैर-राष्ट्रीयकृत MFP को गांव के छोटे व्यापारी सरकार द्वारा घोषित MSP के आसपास का मूल्य चुकाकर आदिवासियों से खरीद लेते हैं। यह छोटे व्यापारी फिर इन उत्पादों को लाभ के साथ गांव के बाज़ारों या हाट बाज़ारों में आने वाले बड़े व्यापारियों को बेच देते हैं।" हाट बाज़ार खुले मैदान में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार होते हैं, जहां MFP का व्यापार किया जाता है। 

उन्होंने आगे कहा, "हाट बाज़ार में MFP की निगरानी और नियंत्रण के लिए किसी तरह की सरकारी मशीनरी मौजूद नही हैं। सरकार द्वारा MFP में शामिल कई उत्पादों के लिए MSP का ऐलान किया जाता है, लेकिन राष्ट्रीयकृत उत्पादों के अलावा सरकार शायद ही किसी MFP का उपार्जन करती है।"

MFP को तय करने की प्रक्रिया से वाकिफ़ सूत्रों ने न्यूज़क्लिक को बताया, "MSP तय करने के दौरान MSP समिति कई चीजों को ध्यान में रखती है। इनमें किसी उत्पाद से जुड़ा एकत्रीकरण, मज़दूरी और उसका बाज़ार मूल्य शामिल होता है। लेकिन गणना से संबंधित यह चीजें सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं हैं।"

सूत्र ने कहा, "हालांकि कई चीजों के लिए MSP तय किया गया है, लेकिन पिछले कुछ वक़्त से इनका उपार्जन नहीं किया जा रहा है। बाज़ार में होने वाली प्रतिस्पर्धा के चलते, कई बार व्यापारियों द्वारा चुकाया जाने वाला मूल्य MSP को पार कर जाता है। नतीज़तन उत्पादों को इकट्ठा करने वाले आदिवासी उन्हें निजी व्यापारियों को बेच देते हैं।" 

मध्यप्रदेश विज्ञानसभा (MPVS) के शोधार्थियों की मदद से न्यूज़क्लिक ने मध्यप्रदेश के पातालकोट इलाके में वन उत्पादों का एकत्रीकरण करने वाले लोगों की वस्तुओं से जुड़ा आंकड़ा इकट्ठा किया। 72 वर्ग किलोमीटर में फैला पातालकोट क्षेत्र छिंदवाड़ा जिले की तामिया तहसील में स्थित है। यह घाटी कई जनजातीय बसाहटों का केंद्र है। यह क्षेत्र वन उत्पादों, चिकित्सकीय पौधों और जड़ी-बूटियों से भरा-पूरा है। 

नीचे पातालकोट घाटी के लोगों द्वारा इकट्ठा किए गए MFP पर दी गई सूची में, हर दिन होने वाला एकत्रीकरण, हर दिन एकत्रीकरण पर बिताया जाने वाला वक़्त, वह कीमत जिसपर उत्पाद इकट्ठा करने वाले लोग निजी व्यापारियों को अपना उत्पाद बेचते हैं, अलग-अलग MFP का MSP और उत्पाद इकट्ठा करने वालों की कुल आय शामिल की गई है। 

उत्पाद इकट्ठा करने वालों ने मौसम की शुरुआत की जो कीमतें बताईं, वे बेहद कम थीं, कई बार MSP के बराबर। लेकिन यह बताया गया कि ज्यों-ज्यों मौसम आगे बढ़ता है, बाज़ार में प्रतिस्पर्धा के चलते उत्पाद की कीमत भी बढ़ती जाती है। यह चिरौंजी और हर्रा की मौसम के अंत में बढी हुई कीमतों से भी दिखाई पड़ता है। 

MPVS ने यह बताया कि जितने भी लोगों का सर्वे किया गया, उन्हें सरकार द्वारा अपने उत्पाद के लिए तय किए गए MSP की जानकारी ही नहीं थी। आजाद बताते हैं, "आदिवासियों से MFP उत्पादों को खरीदने वाले छोटे व्यापारी MSP के बारे में पता करते हैं और इससे थोड़ी ज़्यादा कीमत वस्तुओं को इकट्ठा करने वालों को देने का प्रस्ताव रखते हैं। इन लोगों को खुद MSP का पता नहीं होता, फिर यह लोग अपने उत्पाद छोटे व्यापारियों को ही बेच देते हैं, क्योंकि इन लोगों के पास उत्पादों को एकत्रित कर रखने और बाद में बेचने की व्यवस्था नहीं होती। कई बार आदिवासियों को पैसे की आपात जरूरत के चलते, MFP इकट्ठा करने और बेचने की जरूरत होती है।"

महुआ की बिक्री कीमत 30 रुपये से 70 रुपये किलोग्राम के बीच होती है। लेकिन MPVS सर्वे में शामिल उत्पादों को इकट्ठा करने वाले जनजातीय लोगों ने बताया कि महुए के मौसम के जाने के बाद यह 90 रुपये किलो की दर से बिकता है। 

यह तथ्य कि निजी व्यापारी MFP के लिए MSP के ऊपर जाकर कीमत चुका रहे हैं, वह बताता है कि सरकार द्वारा तय की गई उत्पाद की कीमत बिल्कुल सतही है। बल्कि इन उत्पादों का बाज़ार मूल्य MSP से कहीं ज़्यादा है। चूंकि बाज़ार में दी जाने वाली कीमतें MSP से ज़्यादा हैं, तो उत्पादों को इकट्ठा करने वाले लोग अपने पूरे माल को खुले बाज़ार में बेंच देते हैं। इससे सरकार द्वारा MSP तय करने की प्रक्रिया व्यर्थ हो जाती है। 

MFP इकट्ठा किए जाने वाले मौसम में लॉकडाउन और महामारी के चलते आदिवासियों के लिए पहले से खराब स्थिति और भी ज़्यादा बदतर हो गई है। इसकी प्रतिक्रिया में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अप्रैल, 2020 में कुछ MFP के न्यूनतम समर्थ मूल्य में भी वृद्धि की घोषणा की और वायदा किया कि कोविड संकट की घड़ी में वन उत्पादों के उपार्जन से वनों के घूमंतू समुदाय को राहत मिलेगी। महुआ, चिरौंजी, लाक, हर्रा, शहर और साल के MFP का MSP बढ़ा दिया गया। 

लेकिन ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो बता सके कि इन कदमों से MFP इकट्ठा करने वालों को पिछले और मौजूदा सीजन में कोई राहत मिली हो। राष्ट्रीयकृत वन उत्पादों (तेंदुपत्ता, कुल्लु गम और साल बीज) के अलावा बाकी उत्पादों का सरकार द्वारा उपार्जन ना करने के चलते, MSP में हुए इज़ाफे से संभावित हितग्राहियों को लाभ नहीं मिला है। 

अंतिम कॉलम "कुल आय" उत्पादों को इकट्ठा करने वालों की कुल आय प्रदर्शित करता है, इस क्रम में माना गया है कि यह लोग चार उत्पाद (चिरौंजी, हर्रा, महुआ और आंवला) किसी निश्चित तारीख पर, निश्चित दर पर इकट्ठा करते हैं। ऐसी स्थिति में इन लोगों की कुल आय 10,900 से 19,200 रुपये के बीच रही। अगर हम लें कि कोई व्यक्ति किसी सीजन में दोगुने दिन भी इन उत्पादों का एकत्रीकरण करता है, मतलब इन उत्पादों को 20-25 दिन तक इकट्ठा करता है, तो भी इस पूरे सीजन में कोई व्यक्ति अधिकतम 40,000 रुपये कमा सकता है। 

यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह पूरी आय इन लोगों की सालभर में MFP इकट्ठा करने और बेचने की कुल आय है। मतलब हर महीने यह लोग सिर्फ़ 3000 से थोड़े ज्यादा रुपये ही कमा पाए।  

MFP इकट्ठा करने और बेचने से बहुत कम आय होती है, इसलिए मध्यप्रदेश की आबादी के लिए यह सिर्फ़ एक अतिरिक्त आय का साधन है। दूसरे साधनों में कृषि, पशुपालन, मज़दूरी- कृषि मजदूरी और निर्माण कार्यों में मिलने वाली मज़दूरी, शामिल होती है। कई आदिवासी शहरों में आय के दूसरे साधन खोजने चले गए हैं।

चूंकि MFP पर घोषित MSP बिल्कुल सतही कीमत होती है, ऐसी स्थिति में वन उत्पादों को उकट्ठा करने वालो लोगों की आय इन तरीकों से बढ़ाई जा सकती है- 1) MFP का MSP बढ़ाया जाए। 2) सरकार द्वारा MFP के उपार्जन को बढ़ाया और विस्तार दिया जाए। 

इन लोगों की आय को और बढ़ाने के लिए सरकार MFP उत्पादों के लिए मूल्य वर्द्धन केंद्र खोल सकती है और वन उत्पादों में लगे लोगों को इससे जोड़ सकती है। इससे उस ग्राहक को भी लाग होगा, जिसे प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे- शहद, बाजरा और दूसरे चिकित्सकीय उत्पाद कम कीमत पर उपलब्ध हो सकेंगे। 

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

 

COVID-19 Worsened Already Precarious Condition of MFP Collectors in MP

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Shiv Raj Chouhan

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