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12 घंटे का कार्यदिवस है आधुनिक युग की बंधुआ मज़दूरी!
यूपी की जीत अभी पूरी जीत नहीं है, आठ और राज्य- गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, कांग्रेस-शासित पंजाब और कांग्रेस-समर्थित महाराष्ट्र सरकार आज भी 12 घंटे कार्यदिवस लागू करके निश्चिंत बैठे हैं।
बी सिवरामन
28 May 2020
 मज़दूर
Image courtesy: Realty Plus Magazine

दो माह की महामारी के दौर में श्रम-कानूनों और अधिकारों पर अप्रत्याशित हमले हुए हैं। श्रम कानूनों को 3 साल तक रद्द करने से लेकर 8 घंटे के बदले 12-घंटा कार्यदिवस आया। क्या ये वैधानिक और राजनीतिक रूप से धारणीय यानी सस्टेनेब्ल हैं? जिस तरह भाजपा के शक्ति-पुरुष, योगी आदित्यनाथ ने घबराकर सरकार के 12-घंटा कार्यदिवस के कार्यकारी आदेश को हफ्ते भर मे वापस ले लिया,  इससे साबित होता है कि निश्चित ऐसा नहीं है।

श्रमिक नेता दिनकर कपूर ने उ. प्र. मज़दूर मोर्चा के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की और न्यायालय ने सरकार से 18 मई 2020 को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इसी बात से उत्तर प्रदेश सरकार घबरा गई और इस डर से कि कहीं उच्च न्यायालय से उन्हें इस असंवैधनिक कदम के लिए फटकार न पड़े,  तुरन्त पीछे हट गई। 16 मई को कार्यकारी आदेश कूड़ेदान के हवाले हो गया।

पर श्रमिक आन्दोलन की इस त्वरित कानूनी विजय से देश भर में फैक्टरीज़ ऐक्ट 1948 (Factories Act 1948) के 8 घंटे काम के प्रावधान की सुरक्षा स्वतः नहीं हो जाती। आठ और राज्य- गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, कांग्रेस-शासित पंजाब और कांग्रेस-समर्थित महाराष्ट्र सरकार आज भी 12 घंटे कार्यदिवस लागू करके निश्चिंत बैठे हैं। यह समय बताएगा कि मजदूर आन्दोलन इन्हें कैसे पीछे हटने पर मजबूर करेगा, पर यह होना तो है ही।

फैक्टरीज़ ऐक्ट 1948 के धारा 5 में कहा गया है कि फैक्टरियों में मानक कार्यदिवस 8 घंटे का होगा। पर आपातकाल के दौर में इंदिरा गांधी ने धारा 5 में एक सुधार किया कि 8 घंटे का कार्यदिवस किसी ‘पब्लिक इमर्जेन्सी’ में खत्म किया जा सकता है। कांग्रेस सरकार ने भी संविधान में छेड़-छाड़ की थी और ‘आंतरिक गड़बड़ी’ को आपातकाल लागू करने के लिए उचित कारण बना दिया। जब इंदिरा की सत्ता को मतदाताओं ने 1977 में उखाड़ फेंका, जनता सरकार ने संविधान में सुधार के जरिये ‘आंतरिक गड़बड़ी’  की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ को आपातकाल लागू करने की पूर्वशर्त बनाया। परन्तु फैक्टरीज़ ऐक्ट में जहां ‘पब्लिक इमर्जेंसी’ (Public Emergency) लिखा गया था, वह जस-का-तस रहा।

6 मई 2020 को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अध्यादेश पारित कर चार छोड़, सभी श्रम कानूनों को तीन वर्ष के लिए मुअत्तल कर दिया था। इसके follow up के तौर पर,  8 मई 2020 को योगी सरकार ने कार्यकारी आदेश पारित कर 8-घंटा कार्यदिवस को 12-घंटे का बना दिया। मजदूर मोर्चे ने अपने जनहित याचिका में कहा है कि ‘‘यह कार्यकारी आदेश मनमाना, दुराग्रहग्रस्त और गैर-कानूनी है। करोना वायरस स्वास्थ्य संकट सशस्त्र विद्रोह के समान नहीं है।’’ इस तर्क के साथ उच्च न्यायालय से प्रार्थना की गई कि वह सरकार के आदेश को अमान्य करार दे। इस तर्क को प्रथम दृष्टया सही मानते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रिट दाखिल कर ली और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया। केस की सुनवाई से तीन दिन पूर्व, प्रदेश के श्रम मंत्री ने आदेश वापस लेकर कोर्ट में हाजिर होने और शर्मिन्दा होने से अपने को बचा लिया। इस तरह याचिका निष्फल हो गई पर उसने राज्य के श्रमिकों को उचित फल प्रदान किया।

उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश कई मायनों में कानून का उल्लंघन कर रहा था। प्रतिदिन 4 घंटे अतिरिक्त काम करने के बावजूद कोई ओवरटाइम पगार का प्रावधान नहीं रखा गया था। यह फैक्टरीज़ ऐक्ट का सीधा उलंघन है, जिसके तहत मानक कार्यदिवस 8 घंटे का होगा और श्रमिकों को सप्ताह में 48 घंटे काम करना होगा। इसके अलावा उनसे प्रतिदिन 2 घंटे अतिरिक्त काम लिया जा सकेगा (अधिकतम 60 घंटे काम प्रति सप्ताह), यदि उन्हें अतिरिक्त काम के लिए प्रति घंटे दूना वेतन दिया जाए। सरकार का आदेश इस प्रावधान का भी उल्लंघन कर रहा था।

2011 की जनगणना (Census) के अनुसार, राज्य की कुल कार्यशक्ति 4,73,55,524 थी। इनमें से औद्योगिक मजदूर, जो कुल कार्यशक्ति के 5.6 प्रतिशत थे, 26,51,909 होंगे। सरकार के आदेशानुसार हरेक श्रमिक को अपने कार्यदिवस का 50 प्रतिशत, यानी 4 घंटे अतिरिक्त काम करना पड़ता, लेकिन उसे इस ओवरटाइम का दुगनी दर पर भुगतान नहीं होता। इस तरह यह अवैतनिक कार्य होता, यानी बेगार! ऐसी स्थिति में नए रोजगार के अवसर भी 50 प्रतिशत घट जाते, यानी 13 लाख नए श्रमिकों की भर्ती रुक जाती। उत्तर प्रदेश में न्यूनतम मज़दूरी 333 रुपये है। तो केवल एक राज्य, उत्तर प्रदेश में श्रमिकों को प्रतिदिन 44 करोड़ रुपये का बेगार करना होता। यदि वे महीने में 24 दिन काम करते तो यह 1056 करोड़ रुपये प्रतिमाह बनता। 26.5 लाख श्रमिकों के हाड़-तोड़ मेहनत का इस तरह शोषण कर अपने प्रदेश के उद्योगों को पुनर्जीवित करने का नीतिशास्त्र क्या योगी जी को हिन्दुत्व के सिद्धान्त ने सिखाया है?

इतना ही नहीं, महिला श्रमिकों की स्थिति तो और भी बदतर हो जाती- उनकों 12 घंटों के काम और यातायात यानी आने-जाने में लगने वाले समय के अलावा फिर घर संभालने के काम में भी लगना ही पड़ता। यह उनके स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त घातक साबित होता। यह भारत के संविधान की धारा 24, 39 ई, 39 एफ और 42 में दिये गए व्यवसायिक स्वास्थ्य व सुरक्षा के प्रवधान के विरुद्ध भी है। क्या महामारी ने हमारे शासकों को यह अधिकार दे दिया है कि वे इस तरह संविधान की धज्जियां उड़ाएं?

शासकों को समझना होगा कि 50 प्रतिशत अधिक काम के मायने हैं 1/3 वेतन-कटौती। वेतन की गणना अधिकतर घंटों के हिसाब से की जाती है, खासकर जब न्यूनतम वेतन निर्धारित किया जाता है। इसी आधार पर द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय वेतन समझौते किये जाते हैं। इन समझौतों में अतिरिक्त या ओवरटाइम काम का वेतन भी जुड़ता है। वर्तमान स्थिति में ऐसे समझौतों का क्या होगा? कपड़ा (garments) उद्योग जैसे उद्योगों में पीस-रेट पर वेतन दिया जाता है। क्या ऐसे उद्योगों के श्रमिक भी 4 घंटे अतिरिक्त काम करेंगे?

क्या महावारी हो रहीं और गर्भवती महिलाएं, जो दुकानों पर असिस्टेंट (shop assistant) का काम करती हैं, या कारखानों में खड़े-खड़े काम करती हैं, 12 घंटे खड़ी रह सकेंगी? वर्तमान श्रम कानून तो कहता है कि 8 घंटों के बाद कुछ भी अतिरिक्त काम करवाने के लिए श्रमिक की अनुमति लेनी होगी। पर यहां तो बेगार थोपा जा रहा। सभ्य समाज में सरकारों द्वारा बेगार करवाने की बात तो कहीं सुनी ही नहीं गयी।

लगता है कि यह केवल योगी के अति-उत्साह का परिणम नहीं था। मीडिया की अटकलों के अनुसार केंद्र सरकार स्वयं फैक्टरीज़ ऐक्ट 1948 में सुधार लाकर 12 घंटा कार्यदिवस लागू करने पर उतावली है। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि 5 और भाजपा-शासित प्रदेशों ने एक सप्ताह के भीतर ताबड़तोड़ मज़दूर-विरोधी आदेश दिये-यह स्पष्ट है कि यह केंद्र की सोची-समझी चाल है।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह वाम नेता हैं, उनके संगठन ने उ.प्र. मजदूर मोर्चा (यू.पी. वर्कर्स फ्रन्ट) का निर्माण किया और इसी मोर्चे ने तुरंत उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दायर की। न्यूज़क्लिक से बात करे हुए उन्होंने बताया कि वे अन्य श्रमिक संगठनों और लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ न केवल अपने राज्य में बल्कि अन्य राज्यों में भी नेटवर्किंग कर रहे हैं, ताकि श्रम-विरोधी हमलों के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध खड़ा किया जा सके। उन्होंने कहा, ‘‘लॉकडाउन (lockdown) हमारे लिए राजनीतिक लॉकडाउन थोड़े ही है’’।

ट्रेड यूनियनों ने इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के स्तर पर भी उठाया है और आईएलओ ने खुलकार इसका विरोध किया है। प्रधानमंत्री इस निर्मम कदम को किसी तरह जायज नहीं ठहरा सकते; ऐसा औपनिवेशिक काल से, जब श्रम कानून बने थे, आज तक के भारतीय श्रम इतिहास में पहली बार हो रहा है। अखिलेंद्र सिंह का कहना है,‘‘ जल्द ही श्रमिक मोदी को बता देंगे कि विधि-शासन को वायरस के नाम पर चोरी से बाईपास नहीं किया जा सकता।’’

(लेखक श्रम मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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