NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सूचना का अधिकार क़ानून के 15 साल
इस क़ानून से केवल पढ़े लिखे शिक्षित लोगों को ही फायदा नहीं पहुंचा बल्कि उनको भी फायदा पहुंचा जो दूरदराज के इलाकों में बसे हुए थे। इन 15 सालों के दौरान सूचना का अधिकार क़ानून ने लोगों के बीच किसी जमीनी आंदोलन की तरह काम किया है।
अजय कुमार
15 Oct 2020
सूचना का अधिकार

जरा सोचकर देखिए कि अगर आपको सही तरीके से पता चल जाए कि आपके गांव के मुखिया का काम क्या है? राज्य सरकार पंचायत को कितना पैसा देती है? पंचायत को उस पैसे का इस्तेमाल कहां करना है? एक नागरिक होने के नाते आप मुखिया से किस तरह के सवाल पूछ सकते है?

आप माने या ना माने लेकिन इस तरह की तमाम सवालों का जवाब अगर एक नागरिक को मिलता रहे तो आप यकीन मानिए एक नागरिक अपने आप को बहुत अधिक सशक्त महसूस करता है। जानकारियों और सूचनाओं के अभाव में किसी भी तरह के सिस्टम का चलना बहुत अधिक मुश्किल है। लोकतंत्र का चलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है।

इन्हीं सूचनाओं को नागरिकों के अधिकार के तौर पर तब्दील करने का कानून आज से 15 साल पहले 10 अक्टूबर साल 2005 में भारत में लागू हुआ। सैद्धांतिक तौर पर यह कानून भारत के नागरिकों को अधिकार देता है कि वह किसी भी लोक प्राधिकारी से जायज और जरूरी सूचनाएं मान सकें।

साल 2006 में द्वितीय प्रशासनिक सुधार की रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में सूचना के अधिकार पर लिखा गया है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका इनसे जुड़े सभी पदों पर नागरिकों के साथ खुलेपन के माहौल को विकसित करने की जरूरत है। अगर खुलेपन को नहीं अपनाया जा रहा है तो इसका मतलब है कि अंधकार में रखकर भ्रष्टाचार की संभावनाएं मजबूत हो रही है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सूचना का अधिकार कानून एक महत्वपूर्ण औजार साबित हो सकता है।

इसलिए इस कानून से केवल पढ़े लिखे शिक्षित लोगों को ही फायदा नहीं पहुंचा बल्कि उनको भी फायदा पहुंचा जो दूरदराज के इलाकों में बसे हुए थे। इन 15 सालों के दौरान सूचना का अधिकार कानून ने लोगों के बीच किसी जमीनी आंदोलन की तरह काम किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19 की व्याख्या करते हुए राइट टू इनफार्मेशन यानी सूचना के अधिकार को नागरिकों के मूलभूत अधिकार के तौर पर बतलाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है राइट टो फ्री स्पीच में यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में जानने की स्वतंत्रता भी शामिल होती है। इसलिए नागरिकों को राइट टू इनफार्मेशन से अलग-थलग नहीं किया जा सकता है।

बिना सही जानकारी के किसी भी तरह की रायशुमारी कमजोर होती है। सरकार को जिम्मेदार और नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए जरूरी सूचनाओं का महत्व इसलिए बहुत अधिक बढ़ जाता है। हर साल तकरीबन 60 लाख आवेदन सूचना के अधिकार कानून के तहत भारत में दाखिल किए जाते हैं। सरकार के अंदर पारदर्शिता के नाम पर किया गया दुनिया में नागरिकों द्वारा यह सबसे बड़ा हस्तक्षेप होता है।

राष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि गरीब और गांव के लोगों ने सूचना के अधिकार कानून के तहत सबसे अधिक आवेदन दाखिल किया है। सरकार द्वारा मदद के तौर पर नागरिकों को दी जाने वाली सर्विस डिलीवरी के लचर होने की दशा में राइट टू इनफार्मेशन ने गरीब और हाशिए पर मौजूद लोगों की सबसे अधिक मदद की है।

कोविड-19 के दौरान वेंटिलेटर, ICU bed की मौजूदा संख्या से लेकर बहुत सारी जरूरी सूचनाएं आरटीआई की वजह से ही बाहर आ पाई। Corona की महामारी के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय ने पीएम केयर्स फंड बनाया। राष्ट्रीय आपदा कोष और राज्य आपदा कोष होते हुए भी प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऐसा कदम क्यों उठाया? पीएम केयर्स फंड में कितने पैसे आए? यह सारी जानकारियां आरटीआई की वजह से नहीं मिल पाई। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह कहा कि पीएम केयर्स फंड आरटीआई के दायरे में नहीं आता है। इसका आनाकानी का क्या मतलब निकाला जाए। क्या यह कहना गलत होगा कि आरटीआई की वजह से कम से कम यह तो संदेह मजबूत हो रहा है कि आपदा के नाम पर लिए गए पैसे का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है?

कमोडोर बत्रा की आरटीआई की वजह से इलेक्टोरल बांड में होने वाली धांधलियां सामने आई। यह बात खुलकर पता चली कि भाजपा ने चंदे की पारदर्शिता के नाम पर इलेक्टोरल बांड का जो सिस्टम बनाया है, वह कोई सिस्टम नहीं बल्कि पारदर्शिता के नाम पर बनाया गया एक ऐसा परनाला है जिससे बह कर अधिकतर चंदे के पैसे भाजपा को मिलते हैं।

इस तरह से आरटीआई कानून के जरिए हिंदुस्तान के 130 करोड़ लोगों के पास यह संभावना मौजूद रहती है कि वह जब मर्जी तब सरकारी फाइलों में हो रही धांधलियों को उजागर कर व्हिसल ब्लोअर में तब्दील हो जाए। खुद ही सरकारी कामकाज की ऑडिटिंग करने लगे। इसीलिए सरकार आरटीआई से मिले नागरिक सशक्तता से डरती है।

और हर संभव आरटीआई को कमजोर करने में लगी रहती है। अगर कानून का उल्लंघन होता है तो किसी भी तरह के झगड़े का निपटारा करने के लिए केंद्र में केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य में राज्य सूचना आयोग की संस्था बनी है। लेकिन साल 2019 में आरटीआई कानून में संशोधन कर यह लिख दिया गया कि केंद्र और राज्य सूचना आयोग के सदस्यों का कार्यकाल और वेतन निश्चित नहीं होगा। इसमें जब मर्जी तब केंद्र सरकार फेरबदल कर सकती है। इस कानूनी प्रावधान का इशारा साफ है कि अगर केंद्र और राज्य सूचना आयोग ने ऐसा कुछ भी किया जिससे सरकार के छेद दिख सकते हैं तो इनकी खैर नहीं।

इसके साथ सरकार सही वक्त पर इनफॉरमेशन कमिश्नर की नियुक्ति नहीं करती है। परिणाम यह होता है कि नागरिकों के आवेदन शिकायत सब लंबे समय तक धरे के धरे रह जाते हैं। कोई पूछने वाला नहीं होता है। जानने का मूलभूत अधिकार अधिकारियों की गैरमौजूदगी की वजह से बहुत अधिक परेशान करने वाली प्रक्रिया में बदल जाता है।

साल 2014 से लेकर अब तक इनफॉरमेशन कमिश्नर का एक भी पद सरकार ने तब तक नहीं भरा जब तक मामला अदालत तक नहीं पहुंचा। अभी स्थिति यह है कि केंद्र सरकार के 11 इनफॉरमेशन कमिश्नर में से 6 पद खाली पड़े हुए हैं।

चीफ इनफॉरमेशन कमिश्नर का भी पद खाली है। 2014 के बाद यह पांचवीं बार है कि चीफ इनफॉरमेशन कमिश्नर के तौर पर किसी को जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। ठीक यही हाल राज्य सरकारों का भी है। तकरीबन 8 राज्य सूचना आयोग की चीफ इनफॉरमेशन कमिश्नर की पदवी खाली है। त्रिपुरा और झारखंड का हाल तो और अधिक बुरा है। ना कोई कमिश्नर है और ना ही कोई सूचना आयोग है।

यह है सूचना के अधिकार कानून की अब तक की संक्षिप्त कहानी। चलते चलते एक लाइन मशहूर पॉलिटिकल फिलॉस्फर जेम्स मेडिसिन की पढ़िए। जेम्स मेडिसिन ने कहा था कि जो व्यक्ति अपना शासक खुद बनना चाहता है उसे खुद को इतना समर्थवान बनाना होगा कि सारी जानकारियों तक उसकी पहुंच बन पाए।

right to information
Satark Nagarik Sangathan
rti . CIC
UPA
NDA
15 Years of RTI

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कथित शिवलिंग के क्षेत्र को सुरक्षित रखने को कहा, नई याचिकाओं से गहराया विवाद

बिहार में शराबबंदी से क्या समस्याएं हैं 

सद्भाव बनाम ध्रुवीकरण : नेहरू और मोदी के चुनाव अभियान का फ़र्क़

यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !

पंजाब में आम आदमी पार्टी का प्रचंड बहुमत तय, केवल मुहर लगना बाक़ी

सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भारत काफी पीछे: रिपोर्ट

यूपी चुनाव : बीजेपी का पतन क्यों हो रहा है?

आरटीआई अधिनियम का 16वां साल: निष्क्रिय आयोग, नहीं निपटाया जा रहा बकाया काम

क्या नीतीश सरकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने में नाकाम हो गई?

कोर्ट की दखल के बाद सरकार ने NDA में लड़कियों की भर्ती का रास्ता किया साफ़, लेकिन जीत अभी भी अधूरी!


बाकी खबरें

  • Anganwadi workers
    रौनक छाबड़ा
    हरियाणा: हड़ताली आंगनवाड़ी कार्यकार्ताओं के आंदोलन में अब किसान और छात्र भी जुड़ेंगे 
    08 Mar 2022
    आने वाले दिनों में सभी महिला कार्यबलों से सम्बद्ध यूनियनों की आस ‘संयुक्त महापंचायत’ पर लगी हुई है; इस संबंध में 10 मार्च को रोहतक में एक बैठक आहूत की गई है।
  • refugee crisis
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध अपडेट: संयुक्त राष्ट्र ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इसे यूरोप का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट बताया 
    08 Mar 2022
    अमेरीका ने रूस से आयात होने वाले तेल पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानूनी मुहिम शुरू की, तो दूसरी तरफ जेलेंस्की ने रूस को चिकित्सा आपूर्ति मार्ग पर हुआ समझौता याद दिलाया।
  • राज कुमार
    गोवा चुनावः कौन जीतेगा चुनाव और किसकी बनेगी सरकार?
    08 Mar 2022
    इस बार भाजपा के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है क्योंकि तमाम विपक्षी दल भाजपा को हराने के लिए लड़े हैं और ये स्थिति कांग्रेस के पक्ष में जाती है।
  • privatization of railways
    सतीश भारतीय
    निजी ट्रेनें चलने से पहले पार्किंग और किराए में छूट जैसी समस्याएं बढ़ने लगी हैं!
    08 Mar 2022
    रेलवे का निजीकरण गरीब और मध्यम वर्ग की जेब पर वजन लादने जैसा है। क्योंकि यही वर्ग व्यवसाय और आवाजाही के लिए सबसे ज्यादा रेलवे पर आश्रित है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की घटकर 50 हज़ार से कम हुई
    08 Mar 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 3,993 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.12 फ़ीसदी यानी 49 हज़ार 948 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License