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जेएनयू हिंसा के दो साल : नाराज़ पीड़ितों को अब भी है न्याय का इंतज़ार 
ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस की जांच भटक चुकी है। अब तक दोषियों की पहचान तक नहीं की जा सकी है।
रवि कौशल
06 Jan 2022
jnu

5 जनवरी, 2020 को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हिंसा का शिकार हुए पीड़ितों को अब भी न्याय का इंतज़ार है। ऐसा लग रहा है कि दोषियों की पहचान करने में नाकामयाब रही दिल्ली पुलिस अब अपने रास्ते से भटक चुकी है।

30 से ज़्यादा छात्र और शिक्षक जेएनयू में 100 से ज़्यादा नकाबपोश लोगों के हमले में घायल हो गए थे। घायलों में जेएनयू छात्र संगठन की तत्कालीन अध्यक्ष आएशी घोष और शिक्षिका सुचारिता सेन भी शामिल थीं। हमला करने वाले लोग लाठियां और लोहे की छड़ें लेकर यूनिवर्सिटी में 4 घंटे तक आतंक मचाते रहे थए। घायल छात्र और शिक्षकों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पर हिंसा का आरोप लगाया था। ऐसा लगता है कि यह हमला छात्रों को फ़ीस में वृद्धि और नागरिकता संशोधन अधिनियम में बढ़ोत्तरी के खिलाफ़ प्रदर्शन से रोकने के लिए किया गया था।  

जांच के शुरुआती दिनों में पीड़ितों के वक्तव्य लेने के बाद दिल्ली पुलिस वॉट्सऐप ग्रुप "फ्रेंड्स ऑफ़ आरएसएस एंड यूनिटी अगेंस्ट लेफ़्ट" की बातचीत इकट्ठा करने में नाकामयाब रही। इसी समूह में हमले की योजना बनाई गई थी, लेकिन वॉट्सऐप ने अपने सदस्यों के बारे में जानकारी साझा करने से इंकार कर दिया। अमेरिका में पंजीकृत वॉट्सऐप ने कहा कि वह डेटा का संरक्षण कर लेगी, लेकिन जानकारी साझा करने के लिए एक अमेरिकी कोर्ट के आदेश की जरूरत पड़ेगी।  

यूनिवर्सिटी लगातार कहती रही है कि उन्होंने महामारी के चलते हिंसा की जांच रोक दी थी और जल्द ही वे छात्रों से जांच में शामिल होने के लिए कहेंगे। न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के साथ एक इंटरव्यू में वाइस-चांसलर एम जगदीश कुमार ने कहा कि यूनिवर्सिटी ने छात्रों से इसलिए अपनी गवाही देने को नहीं कहा, क्योंकि उस समय हालात सही नहीं थे। उन्होंने कहा, "जब छात्र अपने गृहनगरों में हैं, तब उन्हें जांच के लिए बुलाना सही है क्या? वे हमारे छात्र हैं। कोविड हालातों को देखिए, अब तक वक्तव्य नहीं लिए गए हैं। हम स्थिति के सामान्य होने का इंतज़ार कर रहे हैं।"

जब मामला संसद में उठा, तो गृहराज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा को बताया कि दिल्ली पुलिस ने हिंसा के संबंध में अब तक किसी को गिरफ़्तार नहीं किया है। उन्होंने कहा, "जांच की गई, साथ ही गवाहों के बयान भी लिए गए। वीडियो फुटेज को इकट्ठा किया गया औऱ उसका परीक्षण किया गया। साथ ही चिन्हित आरोपियों से भी पूछताछ की गई।"

हमले के दौरान गंभीर तौर पर घायल हुईं भाषा विज्ञान की छात्रा द्रिप्ता सारंगी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि पुलिस ने कभी उनका बयान दर्ज नहीं किया। 

उन्होंने कहा, "पूरी दुनिया ने देखा कि उस भयावह रात को कैंपस में क्या हुआ। तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता था कि कैसे कोमल शर्मा कैंपस में अपने साथियों के साथ घूम रही थी और छात्रों को बुरे तरीके से घायल करने के बाद सुरक्षाकर्मियों और आराम से बाहर चली गई। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों और पुलिसकर्मियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। कोई भी दूसरी सरकार होती, तो दुनिया में ख्यात प्रोफ़ेसरों पर हमले के बाद कार्रवाई करती।" बता दें यूनिवर्सिटी के बाहर से आई कोमल शर्मा को हाथ में लोहे की रॉड के साथ चलते हुए देखा गया था। उनके साथ बहुत बड़ी भीड़ भी मौजूद थी। कोमल शर्मा इस दौरान छात्रों को साबरमती हॉस्टल से बाहर आने की स्थिति में गंभीर नतीज़े भुगतने के लिए कह रही थीं। 

यूनिवर्सिटी के क्षेत्रीय विकास अध्ययन केंद्र में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अमित थोराट उन शिक्षकों में शामिल थे, जिनपर हमला किया गया। उन्होंने कहा, "पहले जिन शिक्षकों पर हमला किया गया, मैं उनमें से था। कैंपस में क्या हो रहा है, मैं यह देखने के लिए पेरियार हॉस्टल गया था। किसी तरह मैं बचकर अपने साथियों के पास पहुंचा, जो एक दिन पहले हुई हिंसा के विरोध के लिए जुटे थे। कुछ देर बाद एक भीड़ ने साबरमती हॉस्टल के बाहर टी प्वाइंट पर सभी के ऊपर हमला कर दिया।" 

जब पुलिस कुछ दिन के लिए कैंपस में थी तभी थोराट ने "अपना बयान दर्ज करवा दिया था और पुलिस के पास फोटो-वीडियो जमा करवा दिए थे।" वे कहते हैं, "इसके बाद भी कार्रवाई नहीं की गई। हमें अब कैंपस में सुरक्षित महसूस नहीं होता। मेरा बचपन यहां बीता है, यहां मैंने पढ़ाई की है, लेकिन कभी मैंने इतना असुरक्षित महसूस नहीं किया। लेकिन उस हमले ने हमें भविष्य में संघर्ष के लिए मजबूत और तैयार किया है, क्योंकि हम बदतर हालात देख चुके हैं।"

घोष और सेन को तारा नरूला कानूनी परामर्श दे रही हैं। उन्होंने न्यूज़क्लिक को फोन पर बताया कि यह हैरान करने वाला है कि अब तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई और ना ही अंतिम रिपोर्ट जमा की गई। वे कहती हैं, "ऐसा लगता है कि प्रशासन ने छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं। हमले की भयावहता को देखते हुए अब तक जांच पूरी हो जानी चाहिए थी और यह जनसामान्य के हित में होता कि दोषियों को अब तक गिरफ़्तार कर लिया जाता।"

नरूला पीड़ितों को सलाह देती हैं कि वे कोर्ट से जांच पर नज़र रखने की अपील करें। उन्होंने कहा, "अगर पुलिस कार्रवाई नहीं करती है, तो पीड़ितों को सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत कोर्ट में याचिका लगानी चाहिए, जिसके तहत कोर्ट अब तक हुई जांच पर निगरानी कर सकेगा। आदर्श तौर पर यह कदम यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर और दूसरे अधिकारियों द्वारा उठाया जाना था, जो उनके छात्रों और शिक्षकों के हित में रहता।"

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की सचिव मौसमी बसु कहती हैं कि हमले की भयावहता अब भी छात्रों और बच्चों को डराती है। उन्होंने कहा, "वाइस-चांसलर अपनी त्वरित कार्रवाई के ज़रिए यूनिवर्सिटी के लोगों को विश्वास में लेने में नाकामयाब रहे हैं। मुझे अच्छे से याद है कि कैसे जान बचाने के लिए शिक्षकों को तीन घंटे तक झाड़ियों में छुपना पड़ा था। दिल्ली पुलिस से ज़्यादा यूनिवर्सिटी प्रशासन ने छात्रों और शिक्षकों को निरीह स्थिति में छोड़ दिया था, जबकि प्रशासन का पहला काम उन्हें सुरक्षित रखना है।"

बसु कहती हैं, "दुनिया कभी टीवी पर चलाए गए हमले को नहीं भूल सकती, जिसमें नकाबपोश हमलावरों को दिल्ली पुलिस अपने संरक्षण में यूनिवर्सिटी के मुख्य द्वार से बाहर निकाल रही थी। फिर इस जांच की नौटंकी को भी नहीं भूला जा सकता, जो सिर्फ़ वाइस-चांसलर को हिंसा में अपनी सांस्थानिक भूमिका से बचाए जाने के लिए मुखौटे के तौर पर की जा रही है।"

वह आगे कहती हैं, "पिछले दो सालों में यह साफ़ हो चुका है कि कार्यवाहक वीसी के पद पर बने प्रोफ़ेसर जगदीश कुमार को जेएनयू के लोकतांत्रिक माहौल और बौद्धिक ताने-बाने को तार-तार करने के आदेश के साथ भेजा गया है।"  

बसु आरोप लगाते हुए कहती हैं कि "जगदीश कुमार न केवल यूनिवर्सिटी के हितों की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं, बल्कि जो संस्थाएं और लोग उस तबाही के काम में शामिल थे, उन्हें जगदीश कुमार ने पुरुस्कृत भी किया है। जैसे साइक्लोप्स सिक्योरिटी एजेंसी से दोबारा यूनिवर्सिटी की सुरक्षा का अनुबंध किया जाना, इस एजेंसी को हमले के पहले ही काम पर रखा गया था। 5 जनवरी को हुए हमले के साथ-साथ कई सुरक्षा उल्लंघनों के बावजूद इस एजेंसी को यूनिवर्सिटी में सुरक्षा के काम पर रखा गया है।"

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

2 Years After JNU Violence, Angry Victims Await Justice

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