NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
गुजरात दंगों के 20 साल: विस्थापित मुस्लिम परिवार आज भी अस्थाई शिविरों में रहने के लिए मजबूर
20 वर्षों के बाद भी बुनियादी सुविधाओं के बिना ये शिविर हिंसा प्रभावित परिवारों के लिए स्थायी आवास बन चुके हैं, जो एक बार फिर से विस्थापित कर दिए जाने की आशंका के बीच रहने के लिए मजबूर हैं।
दमयन्ती धर
01 Mar 2022
Gujara

जैसे ही आप गुजरात के अहमदाबाद में एक शहरी झुग्गी बस्ती सिटिज़न नगर के पास पहुँचते हैं, कुख्यात 75 फीट ऊँचे पिराना कचरे के ढेर की दुर्गंध लगातार तीव्र होती जाती है। सिटीजन नगर तक जाने लायक कोई सड़क नहीं है। झुग्गी बस्ती के साथ-साथ एक खुला नाला बहता है जहाँ के निवासी आस-पास के रासायनिक कारखानों से निकलने वाले धुएं में मिश्रित हवा में निरंतर सांस लेने के लिए मजबूर हैं। सिटीज़न नगर 2002 के दंगों में विस्थापित हुए करीब 40 मुस्लिम परिवारों का आवास है, जो पिछले 20 वर्षों से यहाँ पर रह रहे हैं।

सिटीज़न नगर जिसे बॉम्बे होटल एरिया के तौर पर जाना जाता है, को केरल मुस्लिम लीग रिलीफ कमेटी के द्वारा दान दिया गया था, जिसकी अगुआई तब के मलप्पुरम सांसद, ई. अहमद ने की थी, जिनका देहांत फरवरी 2017 के शुरूआती दिनों में हो गया था। सिटीज़न शहर को 2002 के विस्थापितों के लिए एक अस्थायी शिविर के तौर पर स्थापित किया गया था, लेकिन अंततः यह उन मुस्लिम परिवारों के लिए स्थायी झुग्गी बस्ती के तौर पर तब्दील हो गया।

2002 के दंगों में तकरीबन दो लाख लोग विस्थापित हुए थे। इनमें से अधिकांश लोग एक साल तक विस्थापित का दंश झेलते रहे जब तक कि इस्लामिक राहत संगठनों ने कुछ स्थानीय एनजीओ के साथ मिलकर राज्य भर में 83 राहत शिविरों में 16,087 लोगों को बसा नहीं लिया। 

वर्तमान में समूचे गुजरात में इस समय 83 राहत कालोनियों में 3,000 से अधिक की संख्या में परिवार रह रहे हैं – जिनमें अहमदाबाद में 15 बस्तियां, आणंद में 17, साबरकांठा में 13, पंचमहल में 11, मेहसाणा में आठ, वडोदरा में छह, अरावली में पांच और भरूच और खेड़ा जिलों में चार-चार बस्तियां हैं। अधिकांश बस्तियों का निर्माण कार्य चार संगठनों – जमायत-ए-उलेमा-ए-हिन्द, गुजरात सार्वजनिक राहत समिति, इस्लामिक राहत कमेटी, यूनाइटेड इकॉनोमिक फोरम के साथ-साथ कुछ छोटे-छोटे ट्रस्टों और स्थानीय गैर सरकारी संगठनों के द्वारा किया गया।

अहमदाबाद आधारित एनजीओ, जनविकास, जिसका काम दंगा विस्थापितों के बीच में है, से सम्बद्ध कार्यकर्त्ता, होज़ेफा उज्जैनी ने न्यूज़क्लिक को बताया, “इनमें से ज्यादातर बस्तियों में कोई बुनियादी सुविधायें नहीं हैं। 59 बस्तियों में पहुँचने लायक आंतरिक सडकें नहीं हैं, 53 बस्तियों में संपर्क सड़कें तक नहीं हैं, 68 बस्तियों में कोई गटर की व्यवस्था नहीं है, 18 बस्तियों में स्ट्रीट लाइट नहीं है और 62 बस्तियों के निवासियों के पास 20 वर्षों से यहाँ पर रहने के बावजूद मालिकाना अधिकार हासिल नहीं है।”

उन्होंने आगे बताया, “ये बस्तियां अधिकतर शहरों और कस्बों के बाहरी इलाकों में बनी हैं। कुछ बस्तियों में तो पीने का पानी, आंगनवाड़ी या प्राथमिक विद्यालयों जैसी बेहद बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। इन बस्तियों को 20 साल पहले हुए दंगों में विस्थापित लोगों के लिए एक अस्थायी शरण स्थली के तौर पर समझा गया था, लेकिन आज भी द्वेषपूर्ण स्थितियों के बने रहने के चलते वे कभी वापस नहीं लौट सके।” 

गुजरात सरकार का बहु-प्रचारित ‘विकास मॉडल’ उन झुग्गियों और मलिन बस्तियों तक नहीं पहुँच सका है जहाँ दंगों में विस्थापित हुए मुसलमान इतने वर्षों से रह रहे हैं। अहमदाबाद में मुस्लिमों की सबसे बड़ी बस्ती, जुहापुरा जैसे इलाकों में, जहाँ बड़ी संख्या में दंगों में विस्थापित हो चुके लोगों को शरण मिली थी, वहां पर भी अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) की जल-आपूर्ति पाइपलाइन को 2016 में इस मामले में एक जनहित याचिका दायर किये जाने के बाद ही उपलब्ध कराया जा सका था। इससे पहले एएमसी की पाइपलाइन पड़ोस के हिन्दू-बहुल वार्ड जोधपुर तक आकर समाप्त हो जाती थी।

अहमदाबाद के मदनीनगर बस्ती में जमायत-ए-उलेमा-ए-हिंद के द्वारा निर्मित 300 से अधिक दंगा-विस्थापित परिवारों के घर आबाद हैं। यहाँ की महिलाओं को एक बोरवेल से पानी हासिल करने के लिए करीब एक किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था। मदनीनगर के निवासियों का कहना है कि राहत शिविर में आकर रहने के एक साल बाद ही उन्हें बिजली का कनेक्शन मिल गया था, लेकिन पानी का कनेक्शन 2016 में जाकर मिल पाया। कुछ वर्षों तक पानी की आपूर्ति और प्रबंधन का काम जमायत-ए-उलेमा-ए-हिंद के प्रतिनिधियों के द्वारा प्रति परिवार 150 रूपये के बदले में किया जाता था। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं को अभी भी टैंकरों से पानी लेना पड़ता है।  

इन राहत बस्तियों के हालात के बारे में मुख्यमंत्री को अवगत कराने के लिए गुजरात सरकार के समक्ष कई बार नुमाइंदगी की जा चुकी है। जनविकास एनजीओ से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात के मुख्यमंत्री को पांच आवेदन लिखे गये हैं, और 2015 से लेकर 2017 के बीच में 15 से अधिक ज्ञापन भेजे जा चुके हैं। 

2016 में, अहमदाबाद स्थित अल्पसंख्यक अधिकार कार्यकर्त्ता, कलीम सिद्दीकी के द्वारा आरटीआई (सूचना का अधिकार) आवेदन दायर किया गया था, जिसमें सिटीज़न नगर के 10 किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या के बारे में जानकारी मांगी गई थी। एएमसी ने अपने जवाब में क्षेत्र के सभी निजी दवाखानों सहित एक नूरानी हकीम, एसआर फकरूद्दीन के क्लिनिक को भी इस सूची में शामिल कर दिया था।

प्रमुख रूप से, राज्य भर के कस्बों और शहरों के बाहरी इलाकों में बनाए गये इन राहत शिविरों को अस्थायी शरणस्थली के तौर पर देखा गया था, लेकिन इनका समापन दंगों में विस्थापित लोगों के स्थाई घरों के रूप में हो गया है। इनमें से बहुत से लोग आर्थिक संकट और वहां के अस्थिर हालातों के भय की वजह से अपने पुराने इलाकों में वापस नहीं लौटे। 2002 के बाद से इन बस्तियों में रहने के बावजूद, कुछ ही लोग अपने नाम पर इन आवास का हक स्थानांतरित करा पाने में सफल रहे हैं। इसकी वजह से दूसरी दफा विस्थापित हो जाने का डर पैदा हो गया है।

47 वर्षीय, नदीमभाई सैय्यद पहले बढ़ई हुआ करते थे, जिनका नरोदा पाटिया वाला घर और बढ़ईगिरी की दुकान दंगों में जलकर ख़ाक हो गई थी। 2003 में अपने परिवार के साथ सैय्यद, सिटीज़न नगर में रहने के लिए आ गए। इन 20 वर्षों के दौरान उनके परिवार के सदस्यों की संख्या में विस्तार तो हो गया है, लेकिन वे इस झुग्गी बस्ती में बने एक कमरे में रहने के लिए मजबूर हैं। 

होज़ेफा उज्जैनी कहते हैं, “कुछ दंगा-विस्थापित पीड़ितों ने सामूहिक रूप से एक निजी मालिक से एक राहत कॉलोनी स्थापित करने के लिए जमीन का एक टुकड़ा खरीदने में कामयाबी हासिल कर ली थी। हालाँकि, अधिकांश पीड़ितों ने या तो 2002 के उन्माद में अपने क़ानूनी दस्तावेज खो दिए या उन्हें कभी उचित दस्तावेज सौंपे ही नहीं गये। हिम्मतनगर और आणंद के राहत शिविरों में अब वहां के रहवासियों को खाली करने की धमकियां मिल रही हैं, क्योंकि संबंधित जमीन अब बेहद कीमती हो गई है। वे अब एक बार फिर से विस्थापित कर दिए जाने की कगार पर खड़े हैं।”

16 मार्च, 2002 को अपने सात लोगों के परिवार के साथ रहीमभाई ने भरूच के टंकरिया में एक राहत बस्ती में शरण ली थी। इस्लामिक रिलीफ कमेटी (आईआरसी) नामक एक गैर सरकारी संगठन के द्वारा इस पुनर्वास कालोनी को बसाया गया था, और यह दंगा प्रभावित आठ परिवारों का घर है, जो वडोदरा, खेड़ा और अहमदाबाद के विभिन्न क्षेत्रों से यहाँ पर विस्थापित हुए थे।

बीस साल बाद भी 12 फीट x 20 फीट का कमरा रहीमभाई का स्थायी निवास बना हुआ है।

2002 से जिस मकान में रह रहे हैं, उसका मालिकाना हक पाने के लिए संघर्ष कर रहे रहीमभाई कहते हैं, “मैं एक निजी बस चलाया करता था और अपनी खुद की मीट शॉप थी। हम वडोदरा के मकदरपुरा के अपने घर से किसी तरह जान बचा कर भागे। आईआरसी का एक प्रतिनिधि हमें यहाँ टंकरिया ले आया। हमने 2002 में बिजली के मीटर के लिए करीब 2,000 रूपये चुकता किये थे, जो हम भागते समय किसी तरह अपने साथ ले आये थे। लेकिन बिजली का कनेक्शन हमें 2005 में ही जाकर मिल पाया।”

रहीमभाई जो अब अपने जीविकोपार्जन के लिए नकली आभूषण बेचते हैं, कहते हैं, “मेरा घर जला दिया गया था और मेरी मीट की शॉप को अब किसी और ने हथिया लिया है।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

20 Years of Gujarat Riots – Displaced Muslim Families Still Living in Temporary Camps

Godhra Violence
Gujarat 2002 Riots
Gujarat Muslims
Gujarat Relief Camps
Juhapura
Communal riots

Related Stories

कानपुर हिंसा: दोषियों पर गैंगस्टर के तहत मुकदमे का आदेश... नूपुर शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं!

मध्य प्रदेश : खरगोन हिंसा के एक महीने बाद नीमच में दो समुदायों के बीच टकराव

क्यों मुसलमानों के घर-ज़मीन और सम्पत्तियों के पीछे पड़ी है भाजपा? 

चुनाव से पहले गुजरात में सांप्रदायिकता तनाव, उन जिलों में दंगों की कोशिश जहां भाजपा मजबूत नहीं

सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो

गोधरा, भाजपा और देश में बढ़ती सांप्रदायिकता

यूपी चुनाव: क्या पश्चिमी यूपी कर सकता है भाजपा का गणित ख़राब?

सांप्रदायिक दंगों के ज़रिये किसान आंदोलन से ध्यान भटकाने की कोशिश

विभाजन के वक़्त मारे गए पंजाबियों की याद में बना स्मारक क्यों ढाया गया?

बिगाड़ के डर से ईमान की बात न करना ‘विवेक’ का विपथ होना है


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License