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भारत
राजनीति
2018 - बेरोज़गारी बढ़ाने वाला वर्ष
रोज़गार का संकट जारी है, जिसे सरकार द्वारा तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है क्योंकि उसके पास आँकड़ों के साथ घालमेल करने के अलावा अन्य कोई समाधान नहीं है।
सुबोध वर्मा
29 Dec 2018
Translated by महेश कुमार
UNEMPLOYMENT

अगर 2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी द्वारा एक स्पष्ट वादा किया गया था, तो वह यह था कि वे हर साल एक करोड़ नौकरियां देंगे। लगभग पांच साल गुज़र गए है अब यही वादा केंद्र में उन्हें और उनकी सरकार को डुबो देने का वादा बनता नज़र आ रहा है।

इस वादे को पूरा करना तो दूर की बात है, मोदी सरकार के कार्यकाल को युवाओं के लिए निरंतर बढ़ती रोजगारहीनता के रूप में चिह्नित किया गया है - विशेष रूप से शिक्षित युवाओं के लिए –जो इससे सबसे अधिक पीड़ित हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के नवीनतम सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, समाप्त होने वाला वर्ष भी कोई अपवाद नहीं है: जनवरी 2018 से बेरोजगारी में बढ़ोतरी लगातार पांच प्रतिशत से  बढ़कर 28 दिसंबर को 7.3 प्रतिशत हो गई है।

Rising Joblessness.jpg

याद रखें: सीएमआईई स्पष्ट रूप से उन लोगों के बारे में बेरोजगारी को परिभाषित कर रहा है जो बिना नौकरी के हैं और सर्वेक्षण के समय सक्रिय रूप से नौकरियों के अवसरों की तलाश कर रहे हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होने वर्तमान में नौकरियों की तलाश न करने का फैसला लिया है और जो हालात से निराश, गैर-उम्मीद और थक गए हैं। अगर आप इन नंबरों को जोड़ते हैं तो बेरोजगारों का हिस्सा पिछले अनुमान से बढ़कर 9-10 फीसदी हो जाएगा। उदाहरण के लिए, अगस्त 2018 में, कड़े तौर पर परिभाषित बेरोजगारी दर 5.67 प्रतिशत थी, जबकि सीएमआईई द्वारा प्रकाशित मई-अगस्त 2018 में यह दर भारत में बेरोजगारी की सांख्यिकीय प्रोफाइल के अनुसार, 7.87 प्रतिशत थी।

अगस्त में, स्नातकों में बेरोजगारी 14 प्रतिशत के बराबर थी, जबकि उसी प्रकाशन के अनुसार 20-24 वर्ष के व्यक्तियों के बीच बेरोजगारी 32 प्रतिशत थी। इसलिए, वर्ष के अंत में, दोनों और भी अधिक बढ़ जाएंगे अगर  दोनों को जोड़े तो कुल बेरोजगारी दर में दो प्रतिशत से अधिक की वृद्धि मिलती है।

इसी तरह, अगस्त में महिला बेरोजगारी 22 प्रतिशत से अधिक थी, और साल के अंत तक इसमें ओर बढ़ोतरी हो गई होगी।

कई अन्य तरीके हैं, जिसके जरिये देश में यह स्पष्ट दिखाई देता है, हालांकि यह सत्तारूढ़ भाजपा को दिखाई नहीं देता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में, 7.2 करोड़ लोगों ने इस साल 15 दिसंबर तक काम के लिए आवेदन किया था। वित्तीय वर्ष के ख़त्म होने में अभी भी तीन महीने से अधिक समय बचा है, काम के लिए संपर्क करने वाले व्यक्तियों की संख्या एक रिकॉर्ड बनाती नज़र आ रही है। पिछले वर्ष 2016-17 में यह उच्च आँकड़ा था जब 8.5 करोड़ लोगों ने इस योजना के तहत काम की मांग की थी। उल्लेखनीय बात यह है कि इस तरह की योजनाओं से मोदी सरकार के वित्तीय दबाव के परिणामस्वरूप 1.29 करोड़ लोग काम न पाने की वजह से वापस लौट गए और उन्हे सरकार ने काम देने से इनकार कर दिया, हालांकि योजना के मुताबिक सभी आवेदकों को काम प्रदान करना अनिवार्य है। इस योजना की शुरुआत के बाद की यह सबसे अधिक संख्या है, सरकार के इंकार ने बेरोजगार लोगों की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। फिर से, तीन महीने बचे हैं, और यह संख्या आगे बढ़ने के लिए तैयार है।

हालाँकि प्रधानमंत्री यह घोषणा करना जारी रखते हैं कि भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा सेल फोन निर्माता है - जिसका अर्थ है कि इस क्षेत्र में बहुत सारे लोगों को रोजगार मिल रहा है, यह किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है। भारत हर साल 1.2 करोड़ लोगों को अपनी कामकाजी उम्र की आबादी में शामिल कर रहा है और कुछ लाख लोगों को कम मज़दूरी वाले रोजगार मुहैया करा रहा है, जिससे समस्या का समाधान संभव नहीं है।

लेकिन ऐसा ही है जैसे मोदी और उनके सहयोगियों ने नौकरियों के संकट को संभाला है - धोखे से, हाथ की सफाई और संख्या की धोखाधड़ी से। विभिन्न अवसरों पर, मोदी और उनके मंत्रियों की टोली ने कहा कि इतनी सारी नौकरियां पैदा हुई हैं - कभी 70 लाख, कभी 40 लाख, तो कभी कुछ और। उन्होंने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के नामांकन डेटा का उपयोग कर बार-बार यह दिखाने के लिए किया कि नौकरियां पैदा हो रही हैं; जबकि, यह केवल भविष्य निधि कवर के तहत लाए गए लोगों की संख्या को दर्शाता है। ये नए श्रमिक हो भी सकते हैं या नहीं भी। लेकिन मोदी और उसके सहयोगी हमें सहर्ष बताएं कि ये नई नौकरियां कहां हैं।

इसी तरह, विभिन्न रोजगार सृजन योजनाओं को यह साबित करने के लिए उद्धृत किया जाता है कि नौकरियों का विस्तार कैसे हो रहा है। लेकिन ये भी डेटा में घालमेल करने के गुर हैं। मिसाल के तौर पर, संसद में एक मंत्री ने कहा कि 17.6 लाख नौकरियां प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत पैदा हुई। यह मानकर इसे प्रोजेक्ट किया गया था कि प्रत्येक परियोजना के लिए जिसके लिए बैंक सब्सिडी मंजूर की गई थी, वह 12 नई नौकरियों का सृजन करती है। जबकि इस तरह की धारणा का कोई आधार नहीं है - वास्तव में ऐसे उद्यमों के एकमात्र सर्वेक्षण से पता चला है कि ऐसी इकाइयों में औसत रोजगार सिर्फ सात का है। लेकिन इसकी कौन परवाह करता है! मोदी और उनके सहयोगी बैठे-बैठे संख्याओं को जोड़ते रहते हैं।

वर्ष, 2018, इस प्रकार का वर्ष रहा है जिसमें बढ़ती बेरोजगारी देखी गई, और इसके बारे में झूठ गढ़ा गया है। इस साल कामकाजी लोगों, विशेष रूप से युवाओं में, बेहतर नौकरियों की मांग, और निश्चित रूप से, अधिक नौकरियों की मांग की एक बड़ी चाहत देखी गयी है। आगामी वर्ष के आम चुनाव में, मोदी को इन सबका जवाब देना होगा।

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