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भारत
राजनीति
स्पेशल मैरिज एक्ट को बेमानी बनाता 30 दिन का नोटिस, अदालत में दी गयी चुनौती
इस क़ानून का इस्तेमाल ज़्यादातर वे लोग करते हैं जो घर-परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर गुपचुप शादी कर रहे होते हैं, और यह नोटिस सीधे 'प्यार के दुश्मनों' तक पहुंचता है। इस प्रावधान के ख़िलाफ़ एक अंतरधार्मिक जोड़ा दिल्ली हाइकोर्ट पहुंचा है।
सरोजिनी बिष्ट
09 Oct 2020
स्पेशल मैरिज एक्ट
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : गूगल

लोग अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन सकें और इसमें धर्म, जाति, क्षेत्र, दकिनयानूसी परंपराएं बाधा न बन सकें, इसके लिए भारत की संसद ने 66 साल पहले ही क़ानून बनाया था। इसे स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 यानी विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के नाम से जाना जाता है। लेकिन इसमें एक प्रावधान ऐसा है, जो इसे इस्तेमाल करने से उन्हीं को रोकता है जिनके लिए यह क़ानून बना है। यह प्रावधान है, विवाह से कम से कम 30 दिन पहले नोटिस जारी किये जाने का।

आपको मालूम होना चाहिए कि आज भी हमारे देश में बहुत राज़ी-खुशी से, लड़का-लड़की दोनों परिवारों की मर्ज़ी से कोर्ट मैरिज यानी इस एक्ट के तहत शादी नहीं होती। इस क़ानून का इस्तेमाल ज्यादातर वे लोग करते हैं जो घर-परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर गुपचुप शादी कर रहे होते हैं, और यह नोटिस सीधे 'प्यार के दुश्मनों' तक पहुंचता है। इस प्रावधान के खिलाफ एक अंतरधार्मिक जोड़ा दिल्ली हाइकोर्ट पहुंचा है। उनकी याचिका पर अदालत ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत आपत्तियां मंगाने को लेकर जारी किये जाने वाले सार्वजनिक नोटिस के प्रावधान पर केंद्र और दिल्ली राज्य की सरकार से जवाब मांगा है। 7 अक्टूबर को दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. एन. पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने यह नोटिस जारी किया।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 30 दिन की नोटिस अवधि लोगों को दूसरे धर्म में विवाह करने से हतोत्साहित करती है। पीठ ने 27 नवंबर की अगली तारीख तय करते हुए केंद्र सरकार से याचिका के जवाब में अपनी आपत्तियों का जिक्र करने को कहा है। याचिका दायर करने वाले प्रेमी युगल के मुताबिक  जिन कारणों का हवाला देकर नोटिस निकालने को जरूरी कदम बताया गया है वे सही नहीं। उनके मुताबिक  दोनों में से किसी एक पक्ष के दिमागी रूप से स्वस्थ नहीं होने या विवाह की आयु नहीं होने जैसी ‘आपत्तियों’ का पता किसी सरकारी अस्पताल या किसी तय प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्रों के आधार पर लगाया जा सकता है और इसके लिए नोटिस निकालने की जरूरत नहीं है।  याचिकाकर्ताओं ने नोटिस अवधि के प्रावधान को मौलिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया है। उनका कहना है कि एक धर्म के भीतर विवाह के लिए बने ‘पर्सनल कानूनों' में इस तरह के नोटिस का कोई प्रावधान नहीं है। इस तरह देखें तो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह करनेवालों के साथ क़ानून का रवैया भेदभावपूर्ण है। याचिकाकर्ताओं ने इस क़ानून में नोटिस के प्रावधान को अमान्य और असंवैधानिक करार दिये जाने का अनुरोध किया गया है।

इस प्रसंग में मुझे याद आती है अपने एक परिचित जोड़े की कहानी। हालांकि वे एक ही धर्म के थे। दोनों उत्तर प्रदेश के एक शहर में एक ही कंपनी में नौकरी करते थे। तीन साल तक चले अफेयर के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही यह बात उन्होंने अपने घरों में बतायी तो मानो बम फट गया। अलग जाति-बिरादरी के इस रिश्ते को दोनों परिवारों ने सख्ती से 'न' बोल दिया। लड़के को उसकी बहनों की शादी का वास्ता दिया गया, तो लड़की की नौकरी छुड़ाकर उसके परिवार ने उसके लिए अपनी जाति-बिरादरी में लड़का खोजना शुरू कर दिया। ऐसे में अपने प्यार को बचाने के लिए दोनों के सामने एक ही चारा था कि जल्दी से जल्दी गुपचुप शादी कर लें। अपने शहर में रहते हुए तो यह संभव नहीं था इसलिए अपने कागज-पत्र लेकर दोनों दिल्ली भाग गये। योजना यह थी कि दिल्ली पहुंचते ही कोर्ट मैरिज कर लेंगे और नयी नौकरी ढूंढ़ कर गृहस्थी बसायेंगे। समय के साथ परिवार के लोग भी मान ही जायेंगे।

इन्हीं सपनों के साथ यह प्रेमी जोड़ा दिल्ली में नौकरी करनेवाले अपने एक दोस्त के घर पहुंचा। 

मित्रमंडली भी कोर्ट मैरिज की तैयारी में युद्धस्तर पर जुट गयी। पता चला कि दिल्ली में एसडीएम (सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट) मैरिज ऑफिसर के रूप में शादी कराते हैं (वैसे कई राज्यों में इसके लिए अलग से मैरिज रजिस्ट्रेशन ऑफिसर हैं)। दोनों स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत शादी के आवेदन के लिए एसडीएम ऑफिस पहुंचे, लेकिन वहां जो लंबी-चौड़ी प्रक्रिया बतायी गयी, उसने उनके उत्साह को ठंडा कर दिया। पहचान के लिए उनके पास आधार कार्ड था। उम्र का प्रमाण साबित करने के लिए दसवीं की मार्कशीट थी। एफिडेविट बनवाना भी मुश्किल काम नहीं था। दोनों पक्षों के लिए दो-दो गवाहों का इंतजाम भी हो जाना था। लेकिन पहली मुश्किल यह आयी कि जिस इलाके में वे शादी करना चाह रहे थे, वहां लड़का या लड़की में से किसी एक के कम से कम एक महीने से रहने का प्रमाण पेश करना था, जबकि दोनों के पास अपने पुराने शहर के पते के ही कागजात थे। अगर वह कुछ जुगाड़ करके इसकी व्यवस्था कर भी लेते तो दूसरा रोड़ा सामने था। उनके पहचानपत्र पर जो पता दर्ज था, उस पर रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेजा जाना था। यह नोटिस घर पहुंचते ही गुपचुप शादी की योजना का सत्यानाश हो जाना था। तीसरा मसला यह था कि नोटिस जारी होने के बाद कम से कम एक महीना आपत्तियों के लिए इंतजार करना था। तब तक नोटिस एसडीएम ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर टंगा रहना था।

दूसरी तरफ लड़के-लड़की के परिवारवाले उन्हें तलाशने में जुटे थे। लड़की के पिता तो लड़के के खिलाफ पुलिस में अपनी बेटी के अपहरण का केस तक दर्ज करवाने की योजना बना रहे थे। अपने शहर के दोस्तों से इस बारे में उन्हें लगातार खबर मिल रही थी। ऐसे में उन पर दबाव बढ़ता जा रहा था। उन्होंने एसडीएम ऑफिस के कर्मचारियों से जल्दी का कोई तरीका पूछा, तो कर्मचारियों ने कहा कि आप लोग स्पेशल मैरिज एक्ट का चक्कर छोड़ किसी मंदिर में हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत शादी कर लें और उसका प्रमाण लाकर हमारे पास शादी का रजिस्ट्रेशन करा लें। आखिरकार उन्हें यहीं करना पड़ा। दोनों ने एक आर्यसमाज मंदिर से संपर्क किया। आवेदन करने के दो-तीन दिन में शादी हो गयी और एसडीएम ऑफिस में रजिस्ट्रेशन का काम भी जल्द ही हो गया।

इस तरह दोनों विवाह के बंधन में बंध तो गये, लेकिन वह क़ानून उनके काम नहीं आया जिसे इस देश की संसद ने 1954 में उन लोगों के लिए बनाया था जो धर्म, जाति वगैरह की दीवारों को तोड़कर विवाह करना चाहते थे। आजादी के हमारे नेताओं का सपना था कि भारत न सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो, बल्कि एक आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र भी बने, जिसमें जात-पांत, छुआछूत की कोई जगह न हो। नये समाज के निर्माण के इस लक्ष्य की शुरुआत होती है जीवनसाथी चुनने की आजादी से, जो स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 से दे दी गयी। लेकिन यह क़ानून जिस मकसद के लिए बना, क्या यह उसे पूरा कर पा रहा है, इसे देखने की जहमत उठाने वाला कोई नहीं? एक ओर अपनी मर्जी से विवाह के लिए यह क़ानून रास्ता तैयार करता है, तो दूसरी ओर उसी रास्ते में कांटे भी बिछा देता है।

ऐसे न जाने कितने ही प्रेमी युगल हैं, जिन्हें स्पेशल मैरिज एक्ट होने के बावजूद अनिच्छापूर्वक विभिन्न धार्मिक विवाह कानूनों के तहत शादी करनी पड़ती है। दोनों पक्षों के अलग-अलग धर्म के होने पर, कई बार सिर्फ शादी के लिए धर्म बदलना पड़ता है। इसके अलावा कुछ जोड़े कोर्ट मैरिज की पेचीदगियों से बचने के लिए ऐसे मंदिरों में शादी कर लेते हैं, जहां से कोई प्रमाणपत्र नहीं मिलता। समुचित प्रमाण और विवाह के पंजीकरण के अभाव में भविष्य में यदि कोई पक्ष शादी होने की बात से ही मुकर जाए तब क्या? ऐसे मामले में लडकियां ही सबसे ज्यादा भुक्तभोगी बनती हैं।

प्रेमी जोड़ों को शादी के लिए सुरक्षित माहौल देने के बजाय कई बार स्पेशल मैरिज एक्ट उन लोगों के ही हाथ मजबूत करता नजर आता है जो उनके विवाह में बाधक हैं। कल्पना कीजिए कि प्रेमी युगल में से एक हिंदू हो और एक मुसलमान, और उनकी पूरी पहचान के साथ नोटिस बोर्ड पर शादी का नोटिस चिपका दिया गया हो। धर्म के कई ठेकेदार संगठन तो ऐसे 'लव जेहाद' को सूंघते घूमते रहते हैं, ताकि उनकी राजनीति चमकती रहे। कुछ ऐसी ही स्थिति उन लोगों के मामले में हो सकती है, जहां ऑनर किलिंग का खतरा हो।

कुल मिलाकर कहें तो स्पेशल मैरिज एक्ट की नीयत तो अच्छी है, पर उसकी नियति कुछ और ही हो गयी है। सरकार और संसद को चाहिए कि इस क़ानून के उन प्रावधानों की समीक्षा करे जो प्रेम विवाह के रास्ते में रोड़ा बनते हैं। अब देखना है कि दिल्ली हाइकोर्ट के नोटिस के बाद केंद्र सरकार इस दिशा में सोचती है या नहीं?

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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