NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सोशल/डिजिटल मीडिया दिशा-निर्देशों के बारे में 6 ज़रूरी सवाल
केंद्रीय मंत्रियों ने प्रेस वार्ता में जिन दिशा-निर्देशों और आचार संहिता को जारी किया, उनके बारे कुछ अहम सवाल हैं जो पूछे जाने चाहिये और मंत्रालय को इनके जवाब भी देने चाहिये।
राज कुमार
27 Feb 2021
सोशल/डिजिटल मीडिया
प्रतीकात्मक तस्वीर

25 फरवरी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके डीजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और ओटीटी के लिये दिशा-निर्देश और आचार संहिता जारी की। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और रवि शंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इन दिशा-निर्देशों और आचार संहिता बारे कुछ सवाल हैं जो पूछे जाने चाहिये और मंत्रालय को इनके जवाब भी देने चाहिये।

सवाल नंबर- 1

मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में शुरू में ही लिखा है कि-

“जनता और हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श के बाद ये दिशा-निर्देश बनाए गये हैं। ”

अब सवाल उठता है कि क्या सचमुच हितधारकों के साथ सलाह-मशविरा किया गया है? ये सवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उठा। इकोनोमिक टाइम्स की पत्रकार सुरभि ने पूछा-

“किसी भी न्यूज़ पोर्टल से इन दिशा-निर्देशों बारे परामर्श नहीं किया गया है। तो क्या कोई औपचारिक पहल की जाएगी जिसमें न्यूज़ पोर्टल को बुलाया जाएगा और उनकी राय ली जाएगी?”

प्रकाश जावड़ेकर ने जवाब में बताया कि ओटीटी मंचों के साथ तीन बार बैठक हुई है। सिर्फ न्यूज़ पोर्टल से परामर्श नहीं किया गया है। क्योंकि पता ही नहीं कि कौन-कौन हैं। अब जब वो अपनी जानकारी सार्वजनिक करेंगे तो पता चलेगा। हमारे दरवाज़े आपके लिये खुले हैं।

मतलब साफ है कि वेब न्यूज़ पोर्टल के साथ कोई चर्चा नहीं की गई। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि उन्हें पता ही नहीं कि कौन-कौन से वेब पोर्टल हैं। ये बात हास्यास्पद है। क्योंकि फिलहाल तो वेब न्यूज़ पोर्टल के संगठन भी बने हुए हैं। DIGIPUB News India Foundation इन्हीं में से एक है, जिसके 30 से ज्यादा वेब पोर्टल सदस्य हैं। इसके अलावा भी डिजिटल न्यूज़ पोर्टल की संस्थाएं हैं। वेब न्यूज़ पोर्टल जो महत्वपूर्ण हितधारक है, अगर उनसे कोई चर्चा की ही नहीं गई तो फिर प्रेस विज्ञप्ति में इस तरह की बात क्यों कही गई है? क्या इन दिशा-निर्देशों को जस्टीफाई करने के लिए इस तरह का झूठ बोला गया है? ताकि ये दिखाया जा सके कि हमने तो सबसे बात करके ही दिशा-निर्देश बनाए हैं।

सवाल नंबर- 2

दिशा-निर्देशों और आचार संहिता बारे में प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि पिछले सालों से अपराधी और देशद्रोही सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले छह सालों से भाजपा लगातार कार्यकर्ताओं, सवाल उठाने वालों, सरकार के खिलाफ धरने-प्रदर्शन करने वालों और सरकार की नीतियों से असहमति रखने वालों को देशद्रोही के तौर पर प्रचारित करके उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर रही हैं। क्या उपरोक्त कथन को इसी संदर्भ में देखें?

क्या दिशा रवि टूलकिट मामला और किसान एकता मंच के साथ-साथ अनेकों पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के ट्विटर अकाउंट को रोकने के कानूनी आदेश को भी इसी रौशनी में देख सकते हैं? ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं।

सवाल नंबर- 3

केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने प्रेस वार्ता में 26 जनवरी की लाल क़िले की घटना का भी ज़िक्र किया। हालांकि प्रेस विज्ञप्ति में ये नहीं लिखा है। शायद इसका ज़िक्र इन दिशा-निर्देशों की भावना समझाने के लिये गया है। केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा-

“अगर कैपिटल हिल (अमेरीका) पर हमला होता है तो सोशल मीडिया पुलिस की कार्रवाई का समर्थन करता है। लेकिन अगर लाल क़िले पर हमला होता है, जो भारत की स्वतंत्रता का प्रतीक है, जहां प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। तो हम दोहरे मापदंड अपनाते हैं। ”

जहां तक देखा गया तकरीबन हर न्यूज़ पोर्टल ने लाल क़िले की घटना की निंदा की है। हालांकि कैपिटल हिल और लाल क़िले की घटनाएं अलग-अलग हैं। दोनों की निंदा के कारण अलग-अलग हैं। जब घटनाएं अलग-अलग हैं तो रवि शंकर प्रसाद इन्हें एक चश्में से क्यों देख रहे हैं?

इन्हें अलग-अलग ही समझा जाना चाहिये। दोनों के संदर्भ अलग हैं। लेकिन समझ नहीं आ रहा कि दिशा-निर्देशों बारे प्रेस कांफ्रेस में इस उदाहरण के ज़रिये रविशंकर प्रसाद क्या कहना चाहते हैं।

क्या इसे ऐसे समझें कि हमेशा पुलिस की हर कार्रवाई का समर्थन किया जाना चाहिये? या ऐसे समझें कि हमेशा सरकार का हर स्थिति में समर्थन करें? या ऐसे कि जहां दक्षिणपंथी नैरेटिव फिट होता है, हमेशा उसका समर्थन करें? या ऐसे समझें कि अगर किसी घटना बारे किसी ने एक राय दे दी है, तो उसके बाद हर घटना पर वही राय देनी पड़ेगी, घटनाओं के संदर्भ घटनाएं बेशक अलग हों?

रवि शंकर प्रसाद जी! जब आपने किसान आंदोलन का उदाहरण दे ही दिया है तो क्या हम इन दिशा-निर्देशों और आचार संहिता को किसान आंदोलन के संदर्भ में देख सकते हैं? क्या आप इस बात से परेशान हैं कि सोशल मीडिया पर समस्त किसान आंदोलन को देशद्रोही क्यों नहीं कहा गया? क्या जब तक किसान आंदोलन को देशद्रोह ना कह दें तब तक आप लाल क़िले की घटना की निंदा को स्वीकार नहीं करेंगे?

सवाल नंबर- 4

फ़र्ज़ी ख़बरें और भ्रामक सूचनाएं, जो इस समय एक गंभीर समस्या बन चुकी है, उसको रोकने बारे क्या करेंगे? क्या इस समस्या को आपने इसके सही अनुपात में जगह दी है? इन अफवाह, झूठी और भ्रामक सूचनाओं से देश में जो तनाव, अविश्वास और ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, इससे कैसे निपटेंगे? इन भ्रामक और झूठी ख़बरों का बड़ा हिस्सा राजनीतिक, प्रोपगेंडा और साज़िश के सिद्धांतों से भरा पड़ा हैं। नफ़रती भाषण और नफ़रत फैलाने वाली सामग्री के बारे में कोई टिप्पणी प्रेस कांफ्रेस में क्यों नहीं की गई? क्या आप इसे समस्या नहीं मानते?

सवाल नंबर- 5

तकरीबन सारा मीडिया सरकार के कसीदे पढ़ रहा है। झूठा नैरेटिव और प्रोपगेंडा चला रहा है। ऐसे में इंटरनेट ही एक ऐसी जगह बची है जहां खुलकर अपने विचार रखे जा सकते हैं। वंचित तबके और संघर्षशील समुदाय इसी के ज़रिये सरकारी प्रचार-तंत्र और गोदी मीडिया के प्रचार से लड़ रहे हैं। केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इंटरनेट पर टिप्पणी करते हुए कहा-

“इंटरनेट मूलभूत अधिकार नहीं है, मूलभूत अधिकार अभिव्यक्ति की आज़ादी है। ”

फैक्ट की तरह बोल दिये गये इस वाक्य की भावना क्या है? क्या अब इंटरनेट भी इस हाशिये और असहमति की आवाज़ के लिए अनुपलब्ध हो सकता है? इंटरनेट के ज़रिये ही ये संभव हो पाया कि सारा गोदी मीडिया, सारा सरकारी प्रचार-तंत्र और आइटी सेल पूरा ज़ोर लगाकर भी किसान आंदोलन को कमज़ोर और बदनाम नहीं कर पाया। क्या इस जगह कि शिनाख़्त हो चुकी है?

सवाल नंबर- 6

प्रेस कॉन्फ्रेंस में रवि शंकर प्रसाद ने भारत में सोशल मीडिया यूजर्स के कुछ आंकड़ें भी साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत में 1 करोड़ 75 लाख लोग ट्विटर इस्तेमाल करते हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर फोलोवर्स 6 करोड़ 60 लाख हैं। मंत्रालय इसे समझने में भी मदद करे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं।)

इसे भी पढ़ें : क्या ऑनलाइन प्लेटफार्म का रेगुलेशन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जायज़ हैं?

Digital Media
Social Media
online content
Facebook
twitter
youtube online content regulation
freedom of speech

Related Stories

भारत में ‘वेंटिलेटर पर रखी प्रेस स्वतंत्रता’, क्या कहते हैं वैकल्पिक मीडिया के पत्रकार?

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

ज़मानत मिलने के बाद विधायक जिग्नेश मेवानी एक अन्य मामले में फिर गिरफ़्तार

विज्ञापन में फ़ायदा पहुंचाने का एल्गोरिदम : फ़ेसबुक ने विपक्षियों की तुलना में "बीजेपी से लिए कम पैसे"  

बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल

फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये

कानून का उल्लंघन कर फेसबुक ने चुनावी प्रचार में भाजपा की मदद की?

रामदेव विरोधी लिंक हटाने के आदेश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया की याचिका पर सुनवाई से न्यायाधीश ने खुद को अलग किया

प्रेस की आजादी खतरे में है, 2021 में 6 पत्रकार मारे गए: रिपोर्ट 

यूपी चुनावः कॉरपोरेट मीडिया के वर्चस्व को तोड़ रहा है न्यू मीडिया!


बाकी खबरें

  • आंकड़ों की बाज़ीगरी से बिगड़ती बेरोज़गारी को छुपाना ग़लत 
    ज्ञान पाठक
    आंकड़ों की बाज़ीगरी से बिगड़ती बेरोज़गारी को छुपाना ग़लत 
    31 Jul 2021
    मोदी सरकार जिस डेटा का बखान कर रही है, वह सालाना आधार पर देश में रोजगार परिदृश्यों की सामान्य स्थिति का डेटा है।
  • प्रेमचंद
    अनीश अंकुर
    मज़दूरों और किसानों के साथी प्रेमचंद
    31 Jul 2021
    जब शिवरानी देवी ने पूछा कि क्रांति हुई तो वे किसका साथ देंगे, तब प्रेमचंद ने उत्तर दिया, "मज़दूरों और काश्तकारों का। मैं पहले ही सबसे कह दूँगा कि मैं तो मज़दूर हूँ। तुम फावड़ा चलाते हो, मैं कलम चलाता…
  • बाघजान: तेल के कुंए में आग के साल भर बाद भी मुआवज़ा न मिलने से तनाव गहराया 
    अयस्कांत दास
    बाघजान: तेल के कुंए में आग के साल भर बाद भी मुआवज़ा न मिलने से तनाव गहराया 
    31 Jul 2021
    मुआवजे के तौर पर अब तक कुल 102.59 करोड़ रूपये भुगतान किया जा चुका है, जबकि स्थानीय लोगों का दावा है कि कई प्रभावित परिवारों की अनदेखी की गई है। 
  • 1969 के बैंकों के राष्ट्रीयकरण से अब निजीकरण के एजेंडा तक का सफ़र
    प्रभात पटनायक
    1969 के बैंकों के राष्ट्रीयकरण से अब निजीकरण के एजेंडा तक का सफ़र
    31 Jul 2021
    नवउदारवाद का सार ही है शास्त्रीय पूंजीवाद को आगे बढ़ाना। इसका मतलब है लघु उत्पादन तथा किसानी खेती पर अतिक्रमण, शासन का नियमनकर्ता तथा नियंत्रक की उसकी भूमिका को खत्म करना और आय व संपदा में भारी असमान…
  • कार्टून क्लिक: डायरेक्ट कैश ट्रांसफर बनाम डायरेक्ट वोट ट्रांसफर!
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: डायरेक्ट कैश ट्रांसफर बनाम डायरेक्ट वोट ट्रांसफर!
    31 Jul 2021
    जैसे रिश्वत का नाम सुविधा शुल्क हो गया है, वैसे ही कुछ मामलों में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम का नाम बदलकर डायरेक्ट वोट ट्रांसफर स्कीम भी रख दिया जाए तो बुरा नहीं होगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License