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भारत
राजनीति
8-9 जनवरी की ऐतिहासिक हड़ताल के लिए उद्योग और ग्रामीण क्षेत्र तैयार
मोदी के सत्ता में आने के बाद यह तीसरी देशव्यापी हड़ताल होगी और यह दावा है कि यह ग्रामीण श्रमिकों के शामिल होने से एक बड़ी कार्रवाई होगी।
सुबोध वर्मा
02 Jan 2019
Translated by महेश कुमार
मज़दूरों का प्रदर्शन (फाइल फोटो)
दिल्ली में हुए मज़दूरों के ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन की तस्वीर (फाइल फोटो)।

भारत जो सबसे बड़ी हड़ताल की कार्रवाई देखने जा रहा है, उसके लिए देश भर में बड़ी भारी तैयारी चल रही है। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच और दर्जनों स्वतंत्र महासंघों, सभी औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों और कर्मचारियों, सभी आकारों की औद्योगिक इकाइयों और यहां तक कि सेवा क्षेत्र और सरकारी कर्मचारियों के संयुक्त मंच के आह्वान पर 8-9 जनवरी, 2019 को अपने 12 सूत्री मांग पत्र को मनवाने के लिए दो दिवसीय हड़ताल होगी। विभिन्न किसानों और कृषि श्रमिक यूनियनों ने इस आह्वान का समर्थन किया है, जो हड़ताल की कार्रवाई के बढ़ते व्यापक स्तर को बताता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (BMS) को छोड़कर, हड़ताल का समर्थन सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों– सेंटर आफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू), ऑल इंडिया सेंट्रल कॉउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन (ऐक्टू), ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस, इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस, हिंद मजदूर सभा, ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर, ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेन्टर, सेल्फ एम्प्लॉयड वुमेन्स एसोसिएशन, लेबर प्रोग्रेसिव फ्रंट और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस द्वारा समर्थित है।

यह दूसरी बार है जब दो दिनों की हड़ताल की जाएगी, पहली हड़ताल 2013 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए)-2 के शासन के दौरान हुयी थी। इसके अलावा, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा यह पांचवीं हड़ताल है, जिसमें पहले बीएमएस भी शामिल थी। हालांकि, 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद से, बीएमएस पीछे हट गयी है, और मोदी सरकार के तहत श्रमिकों की स्थिति खराब होने के बावजूद एक अलग मार्ग पर चलकर ट्रेड यूनियनों की एकता को तोड़ने की कोशिश कर रही है।

श्रमिकों की प्रमुख मांगों में आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाना, नई और अच्छी नौकरियों को पैदा करना, न्यूनतम मजदूरी 18,000 रूपये प्रति माह करना और सबको न्यूनतम 6,000 रुपये प्रति माह पेंशन देना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने के लिए सभी कदमों पर रोक लगाना और विभिन्न मार्गों के माध्यम से शेयरों को बेचना और एकमुश्त निजीकरण पर रोक लगाना, सभी के लिए सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज, श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करना और उनके कमजोर करने की कोशिशों पर रोक लगाना, ठेकेदारी प्रथा को समाप्त करना आदि मांगें शामिल हैं। मोदी सरकार ने इन पूरे पांच साल के समय के शासनकाल के दौरान मज़दूरों की माँगों के प्रति कठोर चुप्पी साध ली थी। दूसरे शब्दों में कहे तो - श्रमिकों और सरकार के बीच पूर्ण गतिरोध है।

कठोर हमला

मोदी युग में गैर-कृषि और कृषि दोनों क्षेत्रों में कामकाजी लोगों के जीवन और आजीविका पर लगातार एक हमला देखा गया है। इस अवधि में बढ़ती कीमतों, स्थिर मजदूरी, सरपट दौड़ने वाली बेरोजगारी, मज़दूरों को जब चाहे काम पर रखने और उन्हे जब चाहे निकाल देने की लगातार कोशिशें हुईं हैं और सुरक्षात्मक श्रम कानूनों को नष्ट करने और सार्वजनिक क्षेत्र के रिकॉर्ड-तोड़ने वाले निजीकरण को देखा गया है।

सरकार की इस हठ ने कॉर्पोरेट मुनाफे को बढ़ावा देने में मदद की है, भले ही अर्थव्यवस्था कठिन समय से गुजर रही हो, निवेश और ऋण का प्रवाह धीमा हो रहा है, मांग और क्षमता का कम उपयोग हो रहा है। नोटबंदी/विमुद्रीकरण और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू करने जैसी दोहरी आपदाओं ने छोटे उद्योगों और अनौपचारिक क्षेत्र को तबाह कर दिया है, जिसमें लाखों नौकरियां चली गईं और छोटे निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं को बर्बाद कर दिया।

न केवल भोजन और खाना पकाने के ईंधन जैसी आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से श्रमिकों का जीवन प्रभावित हुआ है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती लागत से भी इस पर असर पड़ा है। यह मोदी की कल्याणकारी योजनाओं और आवश्यक सेवाओं और निधियों के निजीकरण की नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

किसानों और कृषि श्रमिकों की चौतरफा तबाही श्रमिकों पर बढ़ते हमले से बखूबी मिलते हैं। नव-उदारवादी हठधर्मिता और विश्व व्यापार संगठन के मानदंडों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण, मोदी सरकार ने किसानों को बेहतर खरीद मूल्य न देकर कृषि पर अधिक खर्च करने से इनकार कर दिया है, हालांकि उन्होंने 2014 के चुनावों के प्रचार के दौरान ऐसा करने का वादा किया था।

नतीजतन, किसानों को उनकी उपज के लिए उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, यह स्थिति उन्हें ऋण के एक दुष्चक्र में फंसा देती है जो अंततः उन्हे बेरोजगार तो बनाते हैं साथ ही उन्हे पलायन और आत्महत्या करने पर मज़बूर कर देती है। कृषि संकट बेरोजगारों की एक ऐसी फौज बनाने में योगदान देता है जो औद्योगिक मजदूरी कम रखने में मदद करती है। कृषि श्रमिकों की मजदूरी मुद्रास्फीति-समायोजित की स्थिति यह सुनिश्चित करती है ताकि कामकाजी लोगों का यह बड़ा वर्ग-लगभग 15 करोड़-अत्यधिक गरीबी और सामंती उत्पीड़न को झेलता रहे।

बढ़ता विरोध

मोदी शासनकाल के खिलाफ औद्योगिक रोजगार और कृषि दोनों क्षेत्रों में कामकाज़ी लोगों द्वारा लगभग निरंतर संघर्षों द्वारा चिह्नित किया गया है। 2015 में, मोदी के शासन के खिलाफ एक दिवसीय देशव्यापी हड़ताल का पहला दौर 2 सितंबर की हड़ताल से किया गया था। इसके बाद 2016 में एक और एक दिवसीय हड़ताल हुई। 2017 में, दिल्ली में श्रमिकों का तीन दिवसीय महापड़ाव आयोजित किया गया था, उन्हीं मांगों के लिए जिसमें देश भर से दो लाख से अधिक मज़दूर शामिल हुए थे। अगस्त 2018 में, श्रमिकों ने जेल भरो आंदोलन के लिए किसानों को लामबंद किया और देश के 394 जिलों में लगभग पांच लाख लोगों ने गिरफ्तारी दी। इसके बाद 5 सितंबर को संसद के सामने एक ऐतिहासिक मार्च निकाला गया, जिसका संयुक्त रूप से ट्रेड यूनियनों और किसानों और खेत मजदूर यूनियनों ने आह्वान किया था।

“इस तरह की सामूहिक देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों के अलावा, मोदी युग को विरोध संघर्षों और हड़तालों द्वारा चिह्नित किया गया है, जिनमें सेवाओं और सरकार सहित लगभग सभी प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र के कर्मचारी शामिल हैं।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सीटू के महासचिव तपन सेन ने बताया कि क्षेत्र-विशेष के मुद्दों पर विरोध करते हुए नए वर्ग शामिल हुए हैं।

उन्होंने कहा,''इन्होंने क्षेत्र वार संघर्षपूर्ण लड़ाई लड़ते हुए और आगामी दो-दिवसीय हड़ताल को एक बड़ी गति प्रदान की हैं।''

पिछले चार वर्षों में कुछ प्रमुख क्षेत्रवार विरोध या हड़ताल की कार्रवाई इस प्रकार हैं :

स्कीम श्रमिक : विभिन्न सरकारी योजनाएँ (जैसे एकीकृत बाल विकास योजना, मध्याह्न भोजन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन आदि) लगभग एक करोड़ श्रमिकों को रोजगार देती हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएँ होती हैं, जिन्हें बहुत कम वेतन मिलता है और कोई कानूनी लाभ भी नहीं मिलने के कारण उन्हें अल्पकालिक श्रमिक माना जाता है। उन्होंने कई राज्यों जैसे कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, आदि में लड़ाई लड़ी। जनवरी 2018 में, उन्होंने एक दिवसीय देश व्यापी हड़ताल भी की थी।

कोयला : कोयला खदानों में काम करने वालों श्रमिकों ने निजीकरण के खिलाफ हड़ताल करने की धमकी दी और सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया।

इस्पात : बेहतर काम की परिस्थितियों और मजदूरी के लिए निरंतर संघर्ष के अलावा, इस्पात श्रमिकों ने इस्पात संयंत्रों के निजीकरण के खिलाफ लड़ाई लड़ी और सलेम, दुर्गापुर और भद्रावती में हड़ताल पर गए।

परिवहन : बड़े पैमाने पर परिवहन क्षेत्र के श्रमिकों ने एक दिन की हड़ताल की और नए कानून के खिलाफ जिसके तहत इस क्षेत्र में बड़े निजी निगमों में प्रवेश की अनुमति के खिलाफ और बेहतर काम करने की स्थिति के लिए बार-बार बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया।

दूरसंचार : राज्य के स्वामित्व वाली बीएसएनएल में काम करने वाले इस महत्वपूर्ण दूरसंचार दिग्गज के निजीकरण के विरोध में दो दिन की हड़ताल सहित दो बार हड़ताल पर गए।

बिजली : कई राज्यों में, बिजली वितरण के निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ राज्य बिजली बोर्डों के कर्मचारियों ने कई और निरंतर आंदोलन किए। यूपी और हरियाणा में महत्वपूर्ण जीत दर्ज की गई, जो भाजपा शासित राज्य है। सरकार को मजबूर होकर पीछे हटना पड़ा।

रक्षा : रक्षा उत्पादन की इकाइयों के कर्मचारियों ने निजी कॉर्पोरेट संस्थाओं को इन इकाइयों को बेचने के खिलाफ 40 दिनों का धरना और कई विरोध प्रदर्शन किए।

टी-प्लांटेशन : चाय बागानों के श्रमिक 2016 में असम में हड़ताल पर चले गए और फिर पश्चिम बंगाल में उन्होंने बेहतर मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की मांग के लिए दो दिवसीय हड़ताल की।

ऑटोमोबाइल : निजी स्वामित्व वाली ऑटोमोबाइल और ऑटोमोबाइल पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिटों ने तमिलनाडु और कर्नाटक में विरोध प्रदर्शनों की एक लहर देखी है, जिसमें यामाहा, रॉयल एनफील्ड, एमएसआई, टोयोटा के आपूर्तिकर्ता आदि शामिल हैं, जो वेतन बढ़ाने, मज़दूरों को पीड़ित करने और सेवानिवृत्ति से संबंधित मुद्दों पर लड़े हैं।

बैंक, बीमा क्षेत्र : बैंक के कर्मचारी पिछले चार वर्षों में तीन बार हड़ताल पर गए हैं, जिनमें एक, दो दिन की हड़ताल भी शामिल है, जिसमें निजीकरण और विलय की नीतियों को समाप्त करने और बेहतर काम करने की स्थिति शामिल है। इस अवधि के दौरान बीमा क्षेत्र के कर्मचारी भी संघर्षों में लगे रहे हैं।

चिकित्सा प्रतिनिधि : फार्मा कंपनियों के विशाल बिक्री बल ने बेहतर वेतन और काम करने की स्थिति में सुधार के  लिए एक दिन की हड़ताल की है।

मोदी को हराना ही केवल एक रास्ता है

निरंतर और लगातार बढ़ते औद्योगिक विरोधों की इस गाथा ने ट्रेड यूनियनों और लाखों श्रमिकों को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि अब मोदी सरकार के पास कुछ महीनें बचे हैं और उसे आने वाले आम चुनावों में सत्ता से बाहर करना ही इसका एकमात्र समाधान है।

सेन ने कहा "श्रमिकों की समस्याओं से निपटने में मोदी का रिकॉर्ड इतना निराशाजनक है और उनकी सरकार का रवैया इतना पक्षपाती और शत्रुतापूर्ण है, जो खुले तौर पर उद्योगपति समर्थक और मज़दूर विरोधी है, इसलिए श्रमिकों को राहत मिलने की उम्मीद केवल तभी हो सकती है जब उनकी सरकार को बाहर फेंक दिया जाए और एक अधिक उत्तरदायी सरकार सत्ता में आए।''

आने वाली हड़ताल इस प्रकार न केवल श्रमिकों की तात्कालिक मांगों के बारे में है, बल्कि यह गरिमा से जीवन जीने और भविष्य में अधिक सभ्य जीवन को सुनिश्चित करने की लडाई है। यह हड़ताल उस चुनावी लड़ाई की तैयारी के रूप में है जो चुनाव अब आने वाले है।

इसे भी पढ़ें : #श्रमिकहड़ताल : दिल्ली की स्टील रोलिंग इकाइयों में औद्योगिक श्रमिकों का जीवन

इसे भी पढ़ें : निर्माण मज़दूर : शोषण-उत्पीड़न की अंतहीन कहानी

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