NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
आंदोलन
भारत
निर्भया कांड के आठ साल : कितनी बदली देश में महिला सुरक्षा की तस्वीर?
हर पंद्रह मिनट में बलात्कार का एक मामला निर्भया कांड के न्यायिक नतीजे से आने वाले व्यापक सामाजिक बदलावों की उम्मीद पर कई सवाल खड़े करता है।
सोनिया यादव
16 Dec 2020
Image Courtesy:  Social Media
Image Courtesy: Social Media

16 दिसंबर 2012, ये वो तारीख है जब देश की राजधानी दिल्ली में निर्भया चलती बस में गैंगरेप का शिकार हुई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। दिल्ली समेत तामाम दूसरे राज्यों में लोग सड़कों पर उतर आए थे। और जगह-जगह मोमबत्तियाँ और प्लेकार्ड पकड़े हुए लोग 'निर्भया को इंसाफ दो’, 'लड़की के कपड़े नहीं, अपनी सोच बदलिए' और 'बेटियों के लिए चाहिए सुरक्षा' जैसे नारे लगा रहे थे।

इस मामले के बाद महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण को लेकर बड़े-बड़े वादे हुए, क़ानून में संशोधन हुए, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 2013 में जस्टिस वर्मा कमेटी गठित की गई। सरकारें बदली लेकिन आज आठ साल बाद भी महिला सुरक्षा की तस्वीर नहीं बदली।

निर्भया कांड महिला सुरक्षा को कितना आगे ले गया?

ऐसे में सवाल उठता है कि जनआक्रोश को सड़कों पर लाने वाला यह मामला, आख़िर देश में महिला सुरक्षा के विमर्श को कितना आगे ले गया? जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफ़ारिशें कितनी कारगर रहीं? और आख़िर में सवाल ये भी कि निर्भया कांड के दोषियों को फांसी देने के बाद देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों में कितनी कमी आने की उम्मीद है?

सबसे पहले बात करते हैं, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों की। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में देशभर में पुलिस ने कुल 33,977 रेप केस दर्ज किए। इसका मतलब है हर रोज़ 93 रेप केस। यानी हर पंद्रह मिनट में एक लड़की यौन हिंसा और बलात्कार का शिकार होती है।

वहीं साल 2019 की बात करें तो प्रतिदिन बलात्कार के औसतन 87 मामले दर्ज हुए और साल भर के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4,05,861 मामले दर्ज हुए जो 2018 की तुलना में सात प्रतिशत अधिक हैं।

सामाजिक दबाव और पारिवारिक प्रतिष्ठा के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं होती!

हालांकि महिलाओं से जुड़े अपराधों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने वालों का कहना है कि रेप और यौन हिंसा के हज़ारों मामले पुलिस के पास तक पहुंचते ही नहीं हैं। असल में इसके वास्तविक आंकड़ें कहीं ज्यादा हैं।

निर्भया कांड के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ता रंजना कुमारी का मानना है कि ज्यादातर महिलाएं शर्मिंदी या सामाजिक लांछन के डर से इस तरह के मामलों को रिपोर्ट नहीं करती तो वहीं कुछ  महिलाओं को लगता है कि उनकी बातों पर कोई भरोसा नहीं करेगा इसलिए वे चुप हो जाती हैं।

रंजना कुमारी न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहती हैं, “ निर्भया की यादें हमारे मानस पटल पर आने वाले कई सालों तक ज़िंदा रहेगी। इसे एक ऐतिहासिक आंदोलन के रूप में हमेशा याद रखा जाएगा लेकिन अगर हम इस पर बात करें कि इसके बाद क्या बदला तो मैं कहुंगी की सिर्फ कागज़ों पर कानून बदले हैं, इसके अलावा ज़मीन पर कुछ नहीं बदला।”

दुष्कर्म के कुल मामलों में सिर्फ़ 27 फीसदी को सज़ा

बलात्कार मामलों में अगर सज़ा के दर की बात करें, तो एनसीआरबी रिपोर्ट 2018 के मुताबिक दुष्कर्म के दोषियों को सजा देने की दर देश में मात्र 27.2% है। 2017 में दोषियों को सजा देने की दर कुछ ज्यादा 32.2 फीसदी थी। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार बीते 17 सालों की तुलना में बलात्कार के मामले दोगुने हो गए हैं। 2001‐2017 के बीच पूरे देश में कुल 4,15786 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं। इस लिहाज से देखें तो इन मामलों में सज़ा दर बेहद कम है।

सामाजिक कार्यकर्ता और वुमन प्रोटेक्शन राइट्स संस्था से जुड़े अमित सचदेवा बताते हैं कि आज भी देश में यौन हिंसा का शिकार हो रही हज़ारों महिलाएँ न्याय की लंबी और दुरूह लड़ाइयों से जूझ रही हैं। एसे में लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था में तभी बढ़ेगा, जब तय समय में सही न्याय मिल पाए।

अमित के कहते हैं, “हमारा सिस्टम पीड़िता को बार-बार उस ट्रॉमा की ओर धकेलता है जिससे वो पहले ही टूट चुकी होती है। निर्भया मामले में भी न्याय की लड़ाई 8 साल लंबी चली। इस दौरान कई बार उसके मां-बाप सार्वजनिक तौर पर इंसाफ की गुहार लगाते दिखाई दिए। इस मामले में को फिर भी बहुत दबाव था, सरकारी हस्तक्षेप था। लेकिन आज भी ऐसे अनेक मामले हैं जो सालों-साल अदालती चक्कर कांटते रह जाते हैं और मामला निपटने तक कई बार वे खुद निपट जाते हैं।”

पितृसत्तात्मक सोच को ख़त्म करना ज़रूरी

हालांकि कई जानकारों का मानना है कि इस तरह के मामलों में कानून की सख्ती के साथ समाजिक ताने-बाने को भी बदलना जरूरी है। इस समस्या का स्थायी इलाज उस पितृसत्तात्मक सोच को खत्म करना है जिसमें महिलाओं को पुरुष की संपत्ति माना जाता है।

जानी-मानी नारीवादी कमला भसीन न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहती हैं, “जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक महिलाओं को वास्तव में बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, सुरक्षा नहीं मिलेगी। परिवार से लेकर सरकार तक सबको समाज के स्तर पर मिलकर आधी आबादी के लिए सुरक्षित जगह बनाने के लिए अपनी भूमिका को समझना होगा।”

कमाला आगे कहती हैं, “सिस्टम को जेंडर के मुद्दों पर ज़्यादा संवेदनशील किया जाना चाहिए साथ ही स्कूलों में जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम शुरू किये जाने चाहिए। जिससे बच्चों के अंदर मानसिकता बदलने का काम हो, ताकि भविष्य में ऐसे अपराध हों ही नहीं।”

सरकार की प्राथमिकता से गायब महिला सुरक्षा!

गौरतलब है कि विपक्ष में रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कई चुनावी रैलियों में दिल्ली को 'रेप कैपिटल' कहा था। 2014 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपने पहले स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बढ़ते बलात्कारों पर बात भी की थी लेकिन उसके बाद से दिल्ली सहित देशभर में यौन हिंसा के केस बढ़ते रहे जिनमें कई प्रभावशाली लोग भी शामिल थे। लेकिन नरेंद्र मोदी ने सिर्फ़ एक बार 2018 में ट्वीट किया कि भारत की बेटियों को इंसाफ़ मिलेगा। तब उनकी पार्टी के कुछ सदस्यों पर बलात्कार के आरोप सुर्खियों में थे।

पत्रकार ऋचा सिंह कहना है कि पीएम मोदी के सत्ता संभालने के बाद महिला अपराधों से जुड़े कई जघन्य मामले देश के सामने आए। कठुआ में नाबालिग बच्ची से बलात्कार का मामला हो या हैदराबाद वैटनरी डॉक्टर की रेप के बाद हत्या। उन्नाव का कुलदीप सिंह सेंगर मामला हो या हाथरस। ये सभी मामले कई दिनों तक सुर्खियों में रहे। इन्हें लेकर जन आंदोलन भी हुए। लेकिन तब महिला सुरक्षा को प्राथमिकता बताने वाले पीएम और उनके मंत्री अब मौन साधे हुए हैं।

Nirbhaya movement
Nirbhaya rape and murder case
crimes against women
Nirbhaya gang rape
rape cases in india
sexual crimes

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

यूपी : महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा के विरोध में एकजुट हुए महिला संगठन

बिहार: आख़िर कब बंद होगा औरतों की अस्मिता की क़ीमत लगाने का सिलसिला?

बिहार: 8 साल की मासूम के साथ बलात्कार और हत्या, फिर उठे ‘सुशासन’ पर सवाल

मध्य प्रदेश : मर्दों के झुंड ने खुलेआम आदिवासी लड़कियों के साथ की बदतमीज़ी, क़ानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

बिहार: मुज़फ़्फ़रपुर कांड से लेकर गायघाट शेल्टर होम तक दिखती सिस्टम की 'लापरवाही'

यूपी: बुलंदशहर मामले में फिर पुलिस पर उठे सवाल, मामला दबाने का लगा आरोप!

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर

असम: बलात्कार आरोपी पद्म पुरस्कार विजेता की प्रतिष्ठा किसी के सम्मान से ऊपर नहीं


बाकी खबरें

  • Chhattisgarh
    रूबी सरकार
    छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय
    16 Feb 2022
    ‘अपना हक़ लेके रहेंगे, अभी नहीं तो कभी नहीं’ नारे के साथ अन्नदाताओं का डेढ़ महीने से सत्याग्रह’ जारी है।
  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License