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भारत
राजनीति
हड़ताल-आंदोलन: अतार्किकता के विमर्श पर चोट
‘...यहाँ हम एक अंतहीन दुश्चक्र से रूबरू होते हैं। जितना ही सरकार संकट में घिरती जा रही है, लोगों के कष्टों को कम कर पाने में खुद को अक्षम पा रही है, उतना ही उसके लिए उन्हें भटकाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है, ताकि उन्हें भौतिक जीवन के डिस्कोर्स में एक बार फिर से जाने से रोका जा सके।’
प्रभात पटनायक
29 Nov 2020
हड़ताल

26 नवंबर की हड़ताल सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी क्योंकि यह मोदी सरकार के देश भर में श्रमिकों एवं किसानों के ऊपर निर्ल्लज एवं अभूतपूर्व हमलों का विरोध करती है, या सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि ये हमले साम्राज्यवादी एजेंडे को ही आगे बढ़ाने का काम करते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि यह कहीं ज्यादा गहन एवं कम चर्चा में रहने वाले कारणों पर भी चोट करती है, जिसे निम्नलिखित तथ्यों के आलोक में देखा जा सकता है-

हिन्दुत्ववादी तत्वों के उदय के पीछे देश के भीतर सार्वजनिक डिस्कोर्स को बदलकर रख देने में उन्हें जो सफलता प्राप्त हुई, उसका योगदान रहा है। जिस डिस्कोर्स या विमर्श को उन्होंने विस्थापित करने में सफलता हासिल कर ली है वह करीब एक शताब्दी से केन्द्रीय मंच पर काबिज बना हुआ था। वास्तव में देखें तो 1917 के बाद से ही, जब गाँधी जी ने किसानों की दशा के बारे में मालूमात हासिल करने के लिए चंपारण का दौरा किया था। इस बहस ने जिसने समूचे उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष और उसके बाद आजादी के बाद की भारतीय राजनीति की बुनियाद का काम किया था, जबतक कि हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ सत्ता में नहीं आ गईं, तब तक यह डिस्कोर्स लोगों के भौतिक जीवन के इर्दगिर्द ही चक्कर काटता रहा है या उनके व्यवहारिक बने रहने में “इस-पक्षीयता (this-sidedness)” (मार्क्स के एक वाक्यांश से उधार लेते हुए) के सन्दर्भ में।

राज्य की भूमिका इस दौरान भौतिक जीवन में सुधार लाने को लेकर मानी जाती थी, और विभिन्न राजनीतिक प्रारूपों ने राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने के अपने प्रयासों में इस डिस्कोर्स के भीतर ही रहते हुए अलग-अलग मार्गों के जरिये इसे हासिल करने के उपाय सुझाने का काम किया था। दूसरे शब्दों में कहें तो, विभिन्न राजनीतिक दलों की इसको लेकर अलग-अलग स्थिति थी, लेकिन ये सभी स्थितियां इसी खास डिस्कोर्स के दायरे में ही व्यक्त की जा रही थी, जिसका संबंध गरीबी, बेरोजगारी, वृद्धि, विकास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा एवं इनसे जुड़े कई अन्य मुद्दों से था।

यहाँ तक कि इंदिरा गाँधी द्वारा थोपे गए बदनाम आपातकाल के दौर में भी, जिसने लोगों के अधिकारों को छीन लिया था और देश के ऊपर अपने निरंकुश शासन को थोपने का काम किया था, ने भी इस डिस्कोर्स को बदलने का प्रयास नहीं किया था। उल्टा उन्होंने आपतकाल को इसी डिस्कोर्स के दायरे में रखकर अपने 20-सूत्रीय कार्यक्रम और घोषणाओं, जिनके बारे में कहा गया कि यह लोगों के भौतिक जीवन को सुधारने में रामबाण सिद्ध हो सकता है, को स्वादिष्ट साबित करने का प्रयास किया था। हालाँकि बीजेपी इस डिस्कोर्स के भीतर किसी भी प्रकार के योगदान को दे पाने में अक्षम रही है, इसके पास सिवाय अपने कॉर्पोरेट प्रयाजकों अथवा ब्रेटन वुड्स संस्थानों द्वारा मुहैया कराये गए अबोध हाथ-हिलाने का पालन करने के सिवाय कोई आईडिया हो।

वास्तव में देखें तो इसके अजेंडे में हमेशा इस डिस्कोर्स को ही बदलने की बात रही है और इसके विकल्प में मंदिर निर्माण, मस्जिदों के विध्वंस, हर जगह आतंकवादी साजिशों को खोजते रहने जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य शामिल हों, हर तरफ घृणा को फैलाना एवं सुनियोजित तरीके से अतार्किकता की आदत को लोगों के जीवन का हिस्सा बनाने के जरिये आपस में विभाजित करने पर ही पूरी तरह से केन्द्रित रहा है। अतार्किक को अवश्य ही इस डिस्कोर्स के बारे में सूचित किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके जरिये ही नफरत को उत्पन्न किया जाता है, जिसे बनाए रखने के लिए एक ऐसे नैरेटिव को गढ़ा जाता है जो इतिहास और पौराणिक कथाओं के अंतर को खत्म कर देता है और जिसे तथ्यों के प्रति जरा भी परवाह नहीं रहती।

वर्तमान सन्दर्भ में देखें तो कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र की भूमिका आज नव-उदारवादी पूंजीवाद जिस अंतिम मुकाम पर पहुँच चुका है, इसे देखते हुए उसे इन बहसों के प्रतिस्थापन को अपना समर्थन देने के जरिये काफी कुछ हासिल होने जा रहा है। इसके जरिये उसे अपने आधिपत्य को जो कि अब पूरी तरह से विकसित अवस्था को प्राप्त हो चुका है और उसमें कोई विश्वसनीयता नहीं बची, के लिए किसी आर्थिक औचित्य को साबित करने की जरूरत नहीं रह जाती है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं हो रहा कि विकास निश्चित तौर पर प्रभावशाली होने के बावजूद ‘नीचे की और टपक’ नहीं रहा है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि नव-उदारवाद के संकटग्रस्त होने के चलते बेरोजगारी पहले से भी दिनों-दिन ज्यादा बढ़ रही है और विकास फुस्स हो चुका है। इस नई परिस्थिति में कुलीनतंत्र के लिए डिस्कोर्स में बदलाव उसके मन मुताबिक है, और यही वजह है कि इसने बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए इतने भारी पैमाने पर वित्तीय मदद के जरिये प्रेरित किया है।

बीजेपी को सत्ता में बने रहने के लिए इस अतार्किकता के डिस्कोर्स को बनाए रखना बेहद आवश्यक है, और इसके साथ ही उसे वैकल्पिक डिस्कोर्स को भी रोके रखना है जो इन वर्षों में बना हुआ है, जिसके भीतर आम तौर पर अभी तक वर्ग संघर्ष लड़े जाते रहे हैं, ताकि पुराना डिस्कोर्स एक बार फिर से केन्द्रीय रंगमंच पर वापस न लौट आये। यदि वह डिस्कोर्स एक बार फिर से वापस आ जाता है तो बीजेपी को मालूम है कि उसके आधिपत्य को ख़तरा है। लेकिन ठीक इसी वजह से नव-उदारवाद के कारण लोगों को जिन बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जिस पर कोविड-19 के संकट ने उसे और भी गहरा दिया है, के कारण इस डिस्कोर्स को लम्बे समय तक दरकिनार करके नहीं रखा जा सकता है। यह लगातार अपनी वापसी के लिए प्रयासरत है और बीजेपी के वर्चस्व के लिए खतरे की घंटी बना हुआ है।

यह 2019 के संसदीय चुनावों से पहले एक बार फिर से मजबूती से उभरा था जब दिल्ली ने एक विशाल किसान रैली के दीदार किये थे, जिसे महाराष्ट्र में किसानों द्वारा आयोजित किये गए एक मार्च के बाद किया गया था। लेकिन पुलवामा आतंकी हमले, जिसके बाद बालाकोट एयर-स्ट्राइक किया गया, ने एक बार फिर से हिन्दुत्ववादियों द्वारा चलाए जा रहे डिस्कोर्स को प्रचलन में ले आने का काम किया था, जिसने मोदी सरकार को एक बार फिर से सत्ता में लाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

यह दूसरा कार्यकाल पहले से भी अधिक व्यवस्थित, निर्मम साबित हुआ है जिसमें लोकतान्त्रिक अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रता, और बड़े पैमाने पर लोगों की जिन्दगी पर और भी अधिक सुनियोजित तरीके से हमले हुए हैं। इसके कुछ स्पष्ट उदाहरणों में अनुच्छेद 370 का खात्मा, राज्यों को जीएसटी मुआवजे को दिए गए वायदे से मुकरना, साफ़ तौर पर भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन अधिनियम को क़ानूनी दायरे में लाने का काम, तीन कृषि कानूनों एवं मजदूरों के अधिकारों को वापस छीन लेना शामिल है। इस सबने देश को एक ऐसे बिंदु पर ला खड़ा कर दिया है जहाँ लगभग एक सदी पहले जो लाभ हासिल किये गये थे, उन्हें उलट कर रख दिया है।

मार्च में मात्र चार घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन लगा देने की घोषणा के चलते लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को बिना किसी आसरे या आय के साधनों के पूरी तरह से बेसहारा छोड़ दिया गया था। जो लोग अपनी आजीविका से हाथ धो बैठे थे उनके प्रति राहत प्रदान करने को लेकर सरकार ने जिस प्रकार की अकर्मण्यता का प्रदर्शन किया, ऐसी अकर्मण्यता दुनिया के किसी भी अन्य पूंजीवादी सरकारों में देखने को नहीं मिली, जो कि मोदी सरकार की घोर लापरवाही और अमानवीय होने का जीता-जागता प्रमाण है। वास्तव में देखें तो इस सरकार ने महामारी का इस्तेमाल उन सभी लोगों की सामूहिक गिरफ्तारी और डराने-धमकाने में किया है, जिन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ शांतपूर्ण विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, और जिनके विरोध स्वंय महामारी के फ़ैल जाने के कारण खत्म करना पड़ा था।

इन सभी कार्यवाहियों को सरकार द्वारा और भी जोर-शोर के साथ न्यायोचित सिद्ध किया जाता है, क्योंकि जिस डिस्कोर्स के जरिये हिंदुत्व पनपता है वह है अतार्किकता के डिस्कोर्स के जरिये, एक ऐसे डिस्कोर्स जिसमें षड्यंत्रों के नैरेटिव, राजद्रोह और निगरानी रखे जाने की जरूरत पर बल दिया जाता है। यहाँ हम एक अंतहीन दुश्चक्र से रूबरू हैं। जितना ही सरकार संकट में घिरते जा रहे लोगों के कष्टों को कम कर पाने में खुद को अक्षम पा रही है, उतना ही उसके लिए उन्हें भटकाए रखना बेहद जरुरी हो गया है, ताकि उन्हें भौतिक जीवन के डिस्कोर्स में एक बार फिर से जाने से दूर रखा जा सके। इसके लिए इसे और भी जोरशोर से हिंदुत्व के डिस्कोर्स को उठाने पर जोर देना होगा। इस डिस्कोर्स को मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए और भी ज्यादा बेतुके एवं अतिकाल्पनिक कथाओं को गढ़ना होगा। और भी अधिक क्लिष्ट, यहाँ तक कि और भी ज्यादा मनगढ़ंत मिथकों के अविष्कार के जरिये लोगों को भटकाए रखना बेहद जरुरी हो गया है।

अमर्त्य सेन ने मोदी सरकार को भव्य चीजों को करते रहने की जरूरत को लेकर बता रखा था, जिससे लोगों को कोई मदद तो नहीं पहुँचती, लेकिन इसके चलते उन्हें भटकाव में बनाये रखना संभव हो जाता है। लेकिन इससे भी अधिक जो काम यह करता है वह यह कि इसे निरंतर नए-नए किस्सों को गढ़ना पड़ता है। इसके तहत लोगों का भौतिक जीवन जितना भी दुष्कर होता जा रहा हो, इसे हिंदुत्व के डिस्कोर्स को जारी रखने के लिए उतनी ही अधिक काल्पनिक कहानियों को गढ़ने का सहारा लेना पड़ेगा, उतना ही अतार्किकता का आश्रय लेने की जरूरत पड़ेगी।

हिन्दुत्ववादी शक्तियों के लोकतंत्र-विरोधी एवं धर्मनिरपेक्ष-विरोधी स्वरूप को व्यापक तौर पर नोट किया गया है। वास्तव में लोकतंत्र, धर्मनिपेक्षता और बाकी सभी संवैधानिक मूल्य जिनपर स्वतंत्र भारत की नींव रखी गई है, वे सभी तर्क के डिस्कोर्स पर आधारित हैं। इसका मूल आधार ही इसी बात पर टिका हुआ है कि यह जीवन के “इस पक्षीय” से पहले से ही घिरा हुआ है, जिसके बारे में समझा जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र को भौतिक जीवन के व्यावहारिक प्रश्नों से जूझना ही पड़ता है। इसलिए हिन्दुत्ववादी नेता भले ही कितना भी संविधान के प्रति अपनी दृढ निष्ठा को लेकर जोरशोर से प्रचार कर लें, वे जिस डिस्कोर्स को प्रचारित करने में मशगूल हैं वह उन्हें लोकतंत्र या धर्मनिरपेक्षता या संविधान के प्रति किसी भी चिंता से परे रखने का काम करता है।

लेकिन विडंबना यह है कि उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद व्यवहारिक मुद्दों के इर्दगिर्द डिस्कोर्स लौटकर आ रहा है, जिसे आना ही चाहिए, जो इस बात को रेखांकित करता है कि हिन्दुत्ववादी उभार अपने आप में एक अल्पकालीन परिघटना से अधिक नहीं है। बिहार चुनावों में एक बार फिर से बेरोजगारी को लेकर चिंता देखी गई, और इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। भले ही एनडीए की ओर से विशाल संसाधनों को तैनात किया गया था, लेकिन इसके बावजूद विपक्षी गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया (वास्तव में इसे एनडीए की तुलना में अधिक लोकप्रिय वोट हासिल हुए)। बिहार चुनाव में एक सकारात्मक उपलब्धि यह रही कि इसने अतार्किकता के डिस्कोर्स को विस्थापित करने का काम किया है।

26 नवंबर की हड़ताल ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम किया है। तार्किकता को डिस्कोर्स के केन्द्रीय मंच पर लाने का यह अब तक का सबसे साहसिक कदम है। और चूँकि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रश्न तार्किकता के डिस्कोर्स को एक बार फिर से पुनर्जीवित करने पर टिका हुआ है, जो कि आवश्यक तौर पर व्यवहारिक जीवन के मुद्दों पर केन्द्रित है, उसी प्रकार से 26 नवंबर की हड़ताल भी लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बचाव में एक जवाबी हमले के तौर पर है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

A Strike Against the Discourse of Unreason

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Hindutva
Secularism
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CAA
November 26 Strike
DILLI CHALO
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