NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सबक़ : एक बे‘बस’ प्रदेश, जहां सरकारी बसों पर सबसे पहले लगा था ब्रेक
पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश सड़क राज्य परिवहन निगम के कर्मचारियों ने सरकार द्वारा की जा रही रोडवेज के निजीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया था। इस मामले में पड़ोसी राज्य मध्य-प्रदेश से सबक़ लिया जा सकता है जहां पंद्रह साल पहले राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों पर ब्रेक लगा दिया गया था।
शिरीष खरे
19 Nov 2020
बसों के अभाव में प्राइवेट जीप
बसों के अभाव में प्राइवेट जीप, ट्रैक्टर ट्रॉली इत्यादि पर लदकर जाने को मजबूर ग्रामीण।  

पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश सड़क राज्य परिवहन निगम के कर्मचारियों ने सरकार द्वारा की जा रही रोडवेज के निजीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया था। इन कर्मचारियों ने अलग-अलग संगठनों के बैनर तले मुखर होकर सरकार के खिलाफ कई स्थानों पर प्रदर्शन भी किया था और जल्द ही एक बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी थी। दूसरी तरफ, भले ही एक तबका निजीकरण को समस्या के समाधान के रूप में देख रहा हो, लेकिन असल में यह संकट की नींव पर एक और संकट की ऐसी आधारशिला है जिससे न सिर्फ कर्मचारी बल्कि एक बड़ी आबादी प्रभावित हो सकती है। इस मामले में पड़ोसी राज्य मध्य-प्रदेश से सबक लिया जा सकता है जहां पंद्रह साल पहले राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों पर ब्रेक लगा दिया गया था।

दरअसल, मध्य प्रदेश में सड़क परिवहन निगम की बसों का बंद होना आर्थिक अनियमतिता की ऐसी कहानी है जिसने नेताओं के लिए करोड़ों रुपये के मुनाफे का एक नया रास्ता खोला। इसके पीछे की कहानी बताती है कि एक राज्य में कैसे करोड़ों की आबादी के लिए हर दिन लुटने की परिस्थितियां भी पैदा कर दीं है।

मध्य प्रदेश के बारे में यह जानकारी कई लोगों को हैरत में डाल सकती है कि यह देश का ऐसा प्रदेश है जहां सरकार ने परिवहन निगम की बसों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। अपने विस्तृत क्षेत्रफल और रेल लाइनों के कम घनत्व के बावजूद राज्य सरकार ने जनता को प्राइवेट बस ऑपरेटरों के सहारे छोड़ दिया है। इस सरकारी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हर दिन लाखों यात्रियों को इसका खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। दूसरी तरफ, राज्य सेवा बंद होने के बाद यहां निजी बस मालिकों को सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है।

मध्य प्रदेश में प्राइवेट बसें ही चलती हैं।

बता दें कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से गांवों की ओर प्रतिदिन करीब 450 बसें चलती हैं। लेकिन, यह संख्या तब छोटी लगने लगती है जब यह राज्य के पचास जिलों से जुड़ने की बात तो कोसों दूर चंद कस्बों तक भी बमुश्किल ही पहुंच पाती है। राज्य के तीन लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक और ऊंट के आकार के क्षेत्रफल के भीतर फैले निमाड़ और मालवा के कई इलाकों तक रेल-लाइन नहीं पहुंची हैं। लिहाजा यहां बसों को यात्रा के आखिरी उपाय के रुप में देखा जाता है। लेकिन, बसों की संख्या कम पड़ने से यात्री ट्रैक्टर की ट्रॉली जैसे मालवाहनों में जबरदस्ती लदने को बेबस हो गए हैं।

गणेश पाटीदार को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 350 किलोमीटर दूर बड़वानी पहुंचने में कोई 8 घंटे का समय लगना चाहिए, लेकिन सफर 12 घंटे से भी ज्यादा समय में पूरा होता है। वे बताते हैं, "प्रदेश में पहले राज्य परिवहन की बसों से घर तक पहुंचने की गारंटी तो होती थी, लेकिन प्राइवेट बस पता नहीं कब आपको पर्याप्त यात्री न होने की बात कहकर बीच रास्ते में छोड़ दें। भोपाल से बड़वानी पहुंचने के लिए दो-दो प्राइवेट बसें बदलनी पड़ती हैं। बस मालिक मनमर्जी से किराया वसूलने के बावजूद समय पर नहीं चलते।"

प्राइवेट जीप पर लदकर जाने को मजबूर ग्रामीण

मंडला जैसे आदिवासी जिलों में चुटका जैसे कई गांवों में तो बस मालिक घाटे का मार्ग बताकर दूर-दराज के गांवों में जाना तक ठीक नहीं समझते। इस बारे में चुटका के मोती यादव बताते हैं, "हमें पास के शहर जैसे नारायणगंज तक पहुंचने के लिए निजी जीपों का दिन-दिनभर इंतजार करना पड़ता है। जीप किसी तरह मिल भी गई तो उसमें 25-30 लोगों को लादकर लाया-ले जाया जाता है। लोग भी जान हथेली पर रखकर यात्रा करने पर मजबूर हैं।"

एक अहम बात है कि राज्य के निमाड़ (खरगौन, बड़वानी, झाबुआ, अलीराजपुर) और मालवा (देवास) के ग्रामीण इलाकों तक रेल लाईन नहीं पहुंची हैं। लिहाजा यहां लोग बसों को यात्रा के आखिरी उपाय के रूप में देखते हैं। लेकिन, ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में बसों की संख्या कम पड़ने से यात्री ट्रैक्टर की ट्रॉली जैसे मालवाहनों में जबरदस्ती लदने को बेबस हो गए हैं।

राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनता की इस बेबसी से वाकिफ हैं। इसलिए, साल 2017 के अक्टूबर में उन्होंने ग्रामीण इलाकों में एक हजार छोटी बसें चलाने की कोशिश की थी। उन्होंने छोटी बसों को खरीदने के लिए 25 करोड़ रुपये राज्य सरकार से और बाकी 25 करोड़ रुपये अनुदान के तौर पर बैंकों से बस मालिकों को दिलाने की कोशिश भी की थी। लेकिन, तब घाटे वाले मार्गों पर बस मालिकों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

वहीं, बीते कई सालों में बार-बार किराया बढ़ाने से शहरी यात्रियों की यात्रा भी बहुत अधिक महंगी होती जा रही है। पिछले पांच साल के दौरान परिवहन विभाग के किराये में 70 प्रतिशत बढ़ोतरी का सीधा लाभ बस मालिकों को मिला है। लेकिन, बात यहीं नहीं थमी। किराये से कहीं अधिक रुपया वसूलने की शिकायतें राज्य सरकार को लगातार मिलती रही हैं। यही वजह थी कि तीन साल पहले खुद मुख्यमंत्री चौहान ने सभी बसों में किराया-सूची लगाने के सख्त निर्देश भी दिए थे। लेकिन, ये निर्देश कभी अमल में नहीं आ सके। वजह यह है कि परिवहन विभाग के पास इसके लिए कोई निगरानी एजेंसी ही नहीं है। इसीलिए, आज तक बसों में तय किराये से ज्यादा वसूली की शिकायतें आनी जारी हैं।

जब लगा था निगम में ताला

मध्य प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन की बदहाली के तार पंद्रह साल पहले भाजपा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत बाबूलाल गौर के उस फैसले से जुड़े हैं जिसमें उन्होंने करीब पचास वर्षों तक गांवों, कस्बों और शहरों को एक सूत्र में बांधने वाले सड़क परिवहन निगम को बंद किया था। साल 2005 में सरकार के इस फैसले ने 11,500 कर्मचारियों को तो मुसीबत में डाला दिया था।

राज्य सरकार पर तब यह आरोप लगा था कि उसने घाटे के नाम पर निगम को बंद करने से पहले कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया। राज्य परिवहन कानून के मुताबिक जब घाटे का संचय इतना बढ़ जाए कि वह निगम की कुल संपत्ति से अधिक हो जाए तो ऐसी स्थिति में सरकार उस अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया में जा सकती है जिसमें तय होगा कि यदि निगम का चला पाना संभव नहीं है तो उसे बंद किया जा सकता है। विशेषज्ञों की राय में सरकार इस प्रक्रिया में जाने से इसलिए बची कि निगम इतने घाटे में था ही नहीं। वहीं, औद्योगिक विवाद अधिनियम के मुताबिक किसी उद्योग को बंद करने से पहले संबंधित प्राधिकरण की मंजूरी लेनी जरूरी होती है। लेकिन, इस मामले में राज्य सरकार ने केंद्र के श्रम विभाग से मंजूरी नहीं ली थी।

कैसे निगम सड़क पर आया

राज्य सरकार का मानना था कि उसके सामने निगम को बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। क्योंकि, हर साल करोड़ों रूपए का घाटा हो रहा था। इसलिए, सरकार ने निगम के गठन के मूल मकसद यानी जनता को सस्ती और सुलभ परिवहन सेवा की व्यवस्था से हाथ खींचने में ही अपनी भलाई समझी। लेकिन, निगम से जुड़े कर्मचारी बताते हैं कि असल में प्राइवेट बस लॉबी के लिए यह खेल खेला गया था। क्योंकि, प्रदेश में अवैध बसों का परिचालन तो शुरू से होता रहा और ये निगम की आय में सेंध भी लगाती रहीं। लेकिन, जितनी आमदनी होती थी उससे निगम का खर्च आराम से चलता था। आरोप है कि असल गड़बड़ी 1991 के बाद से तब हुई जब निगम के अध्यक्ष के तौर पर नेताओं ने सारे अधिकार अधिकारियों से छीन लिए और कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर निगम की बसों पर हमेशा के लिए ब्रेक लगा दिया।

राष्ट्रीयकृत मार्गों पर निजी वाहनों के अवैध संचालन को घाटे के पीछे की एक खास वजह माना गया था। सरकार के मुताबिक इससे उसे प्रतिमाह पांच करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा था। उल्लेखनीय है कि निगम की प्रतिमाह की आमदनी 10 करोड़ 20  लाख रुपये थी। जबकि, खर्च था प्रतिमाह 14 करोड़ रुपए। यानी आमदनी और खर्च के बीच का घाटा सिर्फ 3 करोड़ 80 लाख रुपए था। ऐसी स्थिति में यदि सिर्फ अवैध बसों से होने वाले घाटे को ही ठीक किया जाता तो निगम घाटे के बजाय लाभ में आ सकता था। निगम ने ऐसी अवैध बसों की सूची भी राज्य सरकार को सौंपी थी। लेकिन, राज्य सरकार ने निगम को ही बंद कर दिया।

बता दें कि साल 1992-94 में बसों की संख्या 1,800 थी और कर्मचारियों की संख्या थी 10,500. इनमें से 1,500 कर्मचारियों को कम किया जाना था। लेकिन, उल्टे 450 कर्मचारियों की भर्ती की गई। इससे बस और कर्मचारी के बीच का अनुपात इस हद तक बिगड़ गया था कि एक बस पर दस-दस कर्मचारी सवार हो गए।

इसके बाद 1995-97 में निगम की तीन वर्कशॉप ऐसी थीं जिनसे निगम खुद प्रतिमाह बसों का निर्माण कर सकता था। इसके बावजूद तत्कालीन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने गोवा की एक निजी कंपनी से दुगुनी कीमत पर 400 से अधिक बसें खरीदीं। इसी तरह, 1998-2001 में 16 निजी वित्तीय कंपनियों से एक हजार बसें खरीदने के लिए 90 करोड़ रुपये का कर्ज ऊंची ब्याज दर पर लिया गया। 16 प्रतिशत ब्याज दर पर तीन साल के लिए लिये गए इस कर्ज में शर्त यह रखी गई कि यदि किस्त समय पर नहीं चुकाई तो निगम को 18 से 36 प्रतिशत ब्याज की दर से भुगतान करना पड़ेगा। जबकि उस समय राष्ट्रीयकृत बैंकों की अधिकतम ब्याज दर 10 प्रतिशत थी।

आखिरी मार्ग ही क्यों चुना

निगम से जुड़े कुछ बड़े फैसलों ने ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया। घाटे की स्थिति से उबरने के लिए राज्य सरकार के पास तीन मार्ग थे। इसमें से उसने कम आर्थिक बोझ वाले दो मार्गों को छोड़कर सबसे अधिक बोझ वाले मार्ग को चुना। पहला मार्ग निगम की बसों का पूर्ण सुदृढ़ीकरण करके संचालन का था। इसमें 1,400 करोड़ रुपये का खर्च आता। दूसरा मार्ग निगम को पुनर्गठित करके बसों को सीमित मार्गों में चलाना था। इसमें 900 करोड़ रुपये का खर्च आता। लेकिन, राज्य सरकार ने 1,600 करोड़ रुपये के खर्च वाला आखिरी मार्ग चुनते हुए निगम में ताला डाल दिया। मध्य प्रदेश अनुबंधित बस ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्याम सुंदर शर्मा कहते हैं कि यदि निगम में घाटा था तो सरकार को बताना चाहिए कि उसने उभारने के लिए क्या किया। उनका आरोप है कि घाटे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मलाईदार पदों पर बैठाना बताता है कि नेताओं ने एक साजिश के तहत निगम बंद करवाया।

मध्य प्रदेश में सरकारी बसों पर ब्रेक लगने की कहानी का सार यह है कि भले ही नेताओं के लिए निगम एक चरागाह रहा हो लेकिन जिन अधिकारियों पर इसे बचाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी थी उन्होंने भी इसे बर्बाद करने  में कोई कसर नहीं छोड़ी।

सभी फोटो: शिरीष खरे

(शिरीष खरे स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Madhya Pradesh
UttarPradesh
Road State Transport Corporation
Privatization of roadways
privatization

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

परिक्रमा वासियों की नज़र से नर्मदा

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

कड़ी मेहनत से तेंदूपत्ता तोड़ने के बावजूद नहीं मिलता वाजिब दाम!  

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

ख़ान और ज़फ़र के रौशन चेहरे, कालिख़ तो ख़ुद पे पुती है

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी


बाकी खबरें

  • Ukraine
    सी. सरतचंद
    यूक्रेन युद्ध की राजनीतिक अर्थव्यवस्था
    01 Mar 2022
    अन्य सभी संकटों की तरह, यूक्रेन में संघर्ष के भी कई आयाम हैं जिनकी गंभीरता से जांच किए जाने की जरूरत है। इस लेख में, हम इस संकट की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि की जांच करने की कोशिश करेंगे।
  • Chamba Tunnel
    सीमा शर्मा
    जाने-माने पर्यावरणविद् की चार धाम परियोजना को लेकर ख़तरे की चेतावनी
    01 Mar 2022
    रवि चोपड़ा के मुताबिक़, अस्थिर ढलान, मिट्टी के कटाव और अनुक्रमित कार्बन(sequestered carbon) में हो रहे नुक़सान में बढ़ोत्तरी हुई है।
  • UP Election
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश चुनाव: 'कमंडल' पूरी तरीके से फ़ेल: विजय कृष्ण
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव में इन दिनों सत्ताधारी भाजपा जनता पार्टी के राज्य बिगड़ते जातीय समीकरणों पर काफी चर्चा चल रही है. विशेषज्ञों के अनुसार जिन जातीय समीकरणों ने भाजपा को 2017 में सत्ता दिलाने में…
  • Manipur Elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर चुनावः जहां मतदाता को डर है बोलने से, AFSPA और पानी संकट पर भी चुप्पी
    28 Feb 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने नौजवानों की राजनीतिक आकांक्षाओं और उम्मीदों को टटोला, साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता ओनिल से जाना पानी संकट और ड्रग्स पर भाजपा की चुप्पी का सबब। साथ ही भारत…
  • Modi
    सोनिया यादव
    काशी में पीएम मोदी ने 'राजनीतिक गिरावट' की कही बात, लेकिन भूल गए ख़ुद के विवादित बोल
    28 Feb 2022
    चुनावी रैलियों में पीएम मोदी ने भले ही बीजेपी के स्टार प्रचारक के तौर पर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों को ख़ुश किया होगा, लेकिन एक पीएम के तौर पर वो इस पद की गरिमा को गिराते ही नज़र आते…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License