NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
फिल्में
भारत
राजनीति
जल-जंगल-ज़मीन पर बनी फ़िल्म “स्प्रिंग थंडर” के निर्देशक श्रीराम डाल्टन से एक मुलाक़ात
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में सराहना पा रही ये महत्वपूर्ण फिल्म भारतीय दर्शकों से महरूम है। फिल्म रिलीज़ नहीं हो पा रही है। क्या है फिल्म की विषय-वस्तु, कैसे बनी ये फिल्म और रिलीज़ में होने क्या हैं मुश्किलें इन सब सवालों पर हमने फिल्म निर्देशक श्रीराम डाल्टन से बात की है।
राज कुमार
20 Oct 2020
जल-जंगल-ज़मीन पर बनी फ़िल्म “स्प्रिंग थंडर” के निर्देशक श्रीराम डाल्टन से एक मुलाक़ात

झारखंड, डाल्टनगंज में जन्में श्रीराम डाल्टन राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कार से सम्मानित फ़िल्मकार हैं। दो दशक से फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय श्रीराम डाल्टन कई महत्वपूर्ण फ़िल्में बना चुके हैं। श्रीराम डाल्टन की नई फ़िल्म “स्प्रिंग थंडर” यानी बसंत का वज्रनाद, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में आलोचकों और दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींच रही है। झारखंड में खनन और जल, जंगल और ज़मीन के मुद्दे पर बनी ये महत्वपूर्ण फिल्म भारतीय दर्शकों से महरूम है। फिल्म रिलीज़ नहीं हो पा रही है। क्या है फिल्म की विषय-वस्तु, कैसे बनी ये फिल्म और रिलीज़ में होने क्या हैं मुश्किलें इन सब सवालों पर हमने फिल्म निर्देशक श्रीराम डाल्टन से बात की है। प्रस्तुत है निर्देशक श्रीराम डाल्टन से एक लंबे साक्षात्कार के संपादित अंश।

सबसे पहले हमें बताइये कि आपने फ़िल्म बनाने के लिए इस मुद्दे का ही चुनाव क्यों किया?

क्या है ना कि झारखंड के बारे में और झारखंड में लंबे समय से चले आ रहे जल-जंगल-ज़मीन के संघर्ष के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां है लोगों के बीच में। लोग अंदाज़े लगाते हैं झारखंड में क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? क्या ये सिर्फ झारखंड का मुद्दा है? इसके विरोध में खड़े होने वाले लोग कौन है? जल-जंगल-ज़मीन का मुद्दा असल में है क्या? मैंने देखा कि लोग इस मुद्दे को नहीं समझते हैं। मैं खुद झारखंड से हूं। फाइन आर्ट्स की पढाई के लिए बनारस गया। उसके बाद मुंबई गया। तो मैंने देखा कि बाहर लोग इन मुद्दे के बारे में ना के बराबर जानते हैं। इसलिये मुझे बहुत ज़रूरी लगा कि इस मसले पर फिल्म बनाई जाए और इस मुद्दे को लोगों के बीच में लाया जाए।

और ये सिर्फ झारखंड का मुद्दा नहीं है। देश के दूसरों राज्यों में प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का संघर्ष चल रहा है। जैसे आपको पता होगा कि गोवा में ज़मीन और खनन एक बहुत बड़ा मुद्दा है। तो मैं ये बिल्कुल नहीं कहूंगा कि ये सिर्फ झारखंड का मुद्दा है। लेकिन हां, झारखंड से ये बात लगातार रखी जा रही है। पूरी दुनिया जानती है कि भारत में कुल माइनिंग का 40 प्रतिशत अकेले झारखंड से है। और ये लीगल आंकड़ा है, अवैध तौर पर भी भारी मात्रा में खनन किया जाता है। ये माइनिंग स्थानीय आदिवासियों के जीवन को दांव पर रखकर की जाती है। आदिवासियों के प्रश्न और ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया में इस समय पर मुद्दा बना हुआ है। मुझे लगा कि झारखंड में खनन माफिया और जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दे पर एक फ़िल्म मुझे बनानी चाहिये।

इस फ़िल्म को लेकर आपके दिमाग में कोई कशमकश कब शुरू हो गई थी?

मैं जब बनारस में पढ़ रहा था तो लोग आमतौर पर मुझे झारखंड से होने की वज़ह से नक्सलवाद से जोड़कर बात करने लगते थे। लोगों का लगता है झारखंड में सिर्फ नक्सल रहते हैं। मुझे आश्चर्य होता था कि ये मुझे नक्सलाइट क्यों कह रहे हैं? मतलब, झरखंड का कोई आदमी है तो वो नक्सल है? मुंबई में भी इस तरह के अनुभव रहे। मैं 2002 में मुंबई गया जब बिहार और झारखंड अलग भी हुये। तो दिमाग में ये विषय तभी से चल रहा था।

मैं मुंबई में प्रसिद्ध सिनेमटोग्राफर अशोक महता को असिस्ट करता था। जिन्होंने बैंडिट क्वीन और इस तरह की अनेकों फिल्मों की सिनेमटोग्राफी की है। मेनस्ट्रीम की बेहतरीन फिल्में वो कर रहे थे और मैं उनको असिस्ट कर रहा था। एक बार उन्होंने मुझे कहा कि तुम्हें फिल्म बनानी चाहिये और अपनी कहानी कहनी चाहिये। तुम एक अच्छे स्टोरीटेलर हो और तुम्हारे पास अनूठी कहानी है।

तो जब मेरे पास जीवन में विकल्प आया अपनी कहानी खुद चुनने का तो मैंने बहुत सोचा। सिनेमा में ट्रेंड था शहरी कहानियां कहने का, लव स्टोरी वगैरह। लेकिन मेरे लिए सिनेमा के मायने बहुत अलग थे। मैंने देखा है, फिल्म बनाने में कितनी मेहनत और संसाधन लगते हैं, कितने सारे लोग लगते हैं। मैं इन संसाधनों को और इस मेहनत को मौज-मस्ती और चुटकुला कहने में व्यर्थ नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था कुछ ऐसी बात कही जाए जो ज़रूरी बात है। तो, मैंने अपने जीवन से जुड़े इस जल-जंगल-ज़मीन के विषय को चुना। जिसमें मैंने सांप्रदायिकता, जातिवाद और वर्ग संघर्ष पर फोकस किया और बताने की कोशिश की कि इनसे चीजें कैसे प्रभावित होती है। मुझे लगा मेरी कहानी मुझे ही कहनी है, कोई और थोड़ी कहेगा।

तो फिर इस आइडिया ने स्क्रिप्ट और फ़िल्म की शक्ल लेना कब शुरू किया?

स्क्रिप्ट का पहला रजिस्टर ड्राफ्ट 2009 में हुआ। उसके बाद भी हम स्क्रिप्ट पर काम करते रहे। फिर 2013 में हमने फाइनल ड्राफ्ट रजिस्टर कराया और 10 मार्च 2014 को फिल्म शुरू की। उस दौरान मुम्बई में और दूसरी जगहों पर इस फिल्म को फंड करने के लिए लोगों से सम्पर्क तो कर ही रहे थे हम। लोगों को कहानी सुनने में अच्छी लग रही थी। लेकिन इतनी बड़ी कहानी, इतनी सारी बातचीत, लोगों को समझ नहीं आता था कि ये कैसे कर पाएगा। स्टारकास्ट वाला मामला भी था। फ़िल्म में कोई स्टारकास्ट नहीं थी। उस समय मुट्ठी में कुछ पैसे थे तो उसी पैसे से मैने काम शुरू किया। मुझे पता था कि इस काम को करने में मुझे लंबा समय लगेगा। धीरे-धीरे पैसा और अन्य संसाधन इकठ्ठे किए गये और लगभग पांच साल का लंबा वक्त लगा इस फिल्म को बनाने में।

तो माने कि आपने ये फ़िल्म क्राउड फंडिंग से बनाई?

हां। बिल्कुल। बिल्कुल। हुआ यूं कि मेरे पास कुछ छह लाख रुपये थे। उसी से काम शुरू किया। और दोस्तों का एक सर्कल था जो इंडस्ट्री के बड़े नाम बेशक ना हों लेकिन उनको काम का अनुभव था। मैंने उनको कहानी सुनाई और उनको कहानी पसंद आई। ये भी तय हो गया था कि भई, ये मानकर चलें कि पैसे की समस्या बनी रहेगी और समय भी लंबा लगेगा। तो ये तय हुआ कि जो लोग मुंबई में रह हैं वो अपने किराये आदि के बोझ से बरी हों। अपने कमरे को ताला-वाला मारें, सामान किसी दोस्त के यहां या हमारे यहां रखें। सब झारखंड चलते हैं और वहां एकमुश्त एक लंबा वक्त लगाते हैं। झारखंड पहुंचे। एक टीम बनाना शुरू किया। लगभग 40-45 लोगों की एक टीम थी हमारी। डाल्टनगंज को हमने अपना केंद्र बनाया। एक बड़ा सा घर किराये पर लिया और गद्दे वगैरह बिछाये। रसोई का इंतज़ाम किया गया और मकान की दीवारों पर कहानी और सीन फैला दिये। हमने एक-एक सीन को चुना और धीरे-धीरे उसे शूट किया गया।

तकरीबन महीने भर के अंदर ही हमारे पैसे खत्म हो गये थे और ये तब था जब हम बहुत बेसिक खर्चों पर काम कर रहे थे। हमने समाज की तरफ सहयोग के लिये रूख किया। इस दौरान एक अच्छी बात ये हुई कि महीना खत्म होते-होते मुझे "द लोस्ट बहरूपिया" के लिए नेशनल अवार्ड मिलने की घोषणा हो गई और अख़बार आदि में ये ख़बर आ गई। तो स्थानीय लोगों ने मुझे काफी गंभीरता से लेना शुरू किया। इससे परेशानी कुछ कम हो गई थी और समाज, गांव-देहात सब तरह के लोगों ने मुझे सहयोग किया।

40-50 लोगों का इकठ्ठा रहने का क्या अनुभव था? कैसे मैनेज करते थे? इकठ्ठे रहने क्या तरीका था? कैसे काम करते थे?

(हंसते हुए) क्या तरीका था...सब जगह गद्दे लगे हुए थे। एक-एक कमरे में आठ-आठ, दस-दस लोग सो रहे हैं। काम कर रहे हैं। फिल्म की प्रोपर्टी बना रहे हैं। ये दृश्य था। हमारी फ़िल्म में जो बंदूकें वगैरह इस्तेमाल की गई हैं वो सब हम लोगों ने ही बनाई हैं। साइकिल को काट-कूट कर घिस-घास कर, वेल्डिंग वगैरह करके सब खुद ही बनाया। हमारी फ़िल्म में एक खास तरह की मोटरसाइकिल है। वो मेरे भाई साहब ने काट-छांट करके बनाया। क्योंकि फाइन आर्टस और मूर्तिकला के भी कुछ लोग साथ थे तो इससे काफी मदद हुई। मेरे एक घनिष्ठ मित्र प्रमोद कुमार सिंह परिंदा जिन्होंने फ़िल्म के गीत भी लिखे हैं वो मेरे सहपाठी भी रहे। वो फाइन आर्ट से थे। मेरे छोटे भाई खुद मूर्तिकार हैं। एक और मित्र हैं रविशंकर और खुद मैं, तो ये सब लोग फाइन आर्ट भी जानते थे जो काफी कम आई। कहीं अगर कोई दुविधा आती थी तो हम खुद ही निपटा लेते थे।

सिर्फ प्रोडक्शन ही नहीं हो रहा था बल्कि सीखने की भी एक कार्यशाला साथ-साथ चल रही थी। हम सबको कहते थे कि तुम भी कैमरा सीखो, तुम भी एडिट सीखो वगैरह। हालांकि इसमें समय जाता था लेकिन प्रक्रिया मज़ेदार थी। मुझे लोग कहते थे कि श्रीराम “ऐंजी” लोगों की टाम बनाकर काम कर रहा है। ऐंजी मतलब नोट गुड। असल में जब समाज के हाशिये पर धकेल दिये गये लोग काम करते हैं तो लोगों को समझ नहीं आता कि ये हो क्या रहा है। इसलिये ऐसा कहते हैं। हमारी फिल्म में हर तरह के लोग थे। साइकिल मैकेनिक, मोटर मैकेनिक, लोहार, शिक्षक, किसान, खेत-मज़दूर तमाम तरह के लोग हमारी टीम में शामिल थे। इस तरह टीम बनी थी। रहने-खाने और काम का एक अनुशासन था। सब काम मिल-बांटकर किये जाते थे।

क्या आपने फ़िल्मी दुनिया के दूसरे लोगों से इस फिल्म के प्रोडक्शन के बारे में बात की? क्या किसी ने इस फिल्म को प्रोड्यूस करने के लिए हामी नहीं भरी?

देखिये, क्या है ना कि एक ट्रेंड है अर्बन स्टोरी प्रोड्यूस करने का। लोगों को लगता है कि वैसी ही फ़िल्में सफल होती हैं जो सपने बेचती हैं। जो कल्पना लोक में ले जाती हैं। जो यथार्थ से दूर हो लोग उसी को इटरटेनमेंट मानने लगे हैं। रही बात सहयोग की, तो फ़िल्म में बहुत पैसा लगता है और लोग सेफ रिटर्न देखते हैं। उसका एक पैरामीटर सा है कि इस तरह की फ़िल्मों को फंड करना चाहिये और इस तरह की फ़िल्मों को नहीं। अगर गंभीर मुद्दों पर स्क्रिप्ट लेकर जाएं तो लोग डर जाते हैं। कहते हैं इसे कौन देखेगा? हालांकि मेरी इस फ़िल्म ने हर तरह के फ़िल्मेकर का ध्यान खींचा है और चर्चा में रही है। लेकिन इस तरह की फिल्में बनाना मुश्किल है। बहुत मुश्किल। मैंने तकरीबन दो दशक फ़िल्म इंडस्ट्री में दिये हैं। लेकिन मैंने इस बात का इंतज़ार नहीं किया कि कोई फंड करेगा तो फ़िल्म बनाऊंगा।

तो कुल कितना समय लगा इस फ़िल्म को बनने में? फिल्म कब बनकर तैयार हुई?

तकरीबन चार साल लग गये। इस फ़िल्म का पहला प्रिमियर अमेरिका सैनफ्रांसिस्को में अक्टूबर 2018 में बासा अतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में हुआ।

तो दर्शकों की कैसी प्रतिक्रिया रही?

फ़िल्म देखकर लोग बहुत घबराये। इस कठोर सत्य को देखकर लोग डर गये। क्योंकि एक तो फ़िल्म कई जगह पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म की तरह भी दिखती है। तो इस तरह का भी फीडबैक मिला कि ये तो डॉक्यूमेंट्री है। मेरे लिये तो ये अच्छी बात है कि दर्शकों को यथार्थ के इतने क़रीब लगी। ऐसा इसलिये भी हुआ कि मेरी फ़िल्म में वो स्थानीय आदिवासी चेहरे हैं, समूह के बहुत सारे दृश्य है। जिसे एक हद तक ही कंट्रोल किया जा सकता है। लोगों ने फ़िल्म को बहुत पसंद किया। इस अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टीवल में फ़िल्म को बेस्ट डॉयरेक्टर का अवार्ड भी मिला।

फ़िलहाल तो ओटीटी (Over the top platform: नेटफ्लिक्स, अमेज़न आदि) मंच भी उपलब्ध हैं। आप वहां रिलीज़ क्यों नहीं कर रहे?

उपलब्ध नहीं है। ना...ना...(हंसते हुए) अगर उपलब्ध होते तो आज आप लोगों के बीच में फ़िल्म उपलब्ध होती। उपलब्ध नहीं है। शुरू में तो ओटीटी मंच बहुत प्रो साउंड किया कि ये बहुत अलग तरह का कंटेट ले रहा है। प्रोग्रेसिव कंटेट ले रहा है। लेकिन ऐसा है नहीं। उनको भी स्टार चाहिये। बहुत सारा ताम-झाम चाहिये। उनका भी अपना फार्मूला है।

जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दे पर आपकी फेवरेट बॉलीवुड फ़िल्म कौन-सी है?

(ऊपर गर्दन करके सोचते हुये...लंबी ख़ामोशी...) जल-जंगल-ज़मीन पर मुझे नहीं लगता कोई फ़िल्म बनी है। मेरी जानकारी में तो नहीं है।

फ़िलहाल फ़िल्म को रिलीज़ करने में क्या दिक्कत आ रही है? हम इस फ़िल्म को पर्दे पर कब तक देख पाएंगे?

(लंबी ख़ामोशी....फिर हंसते हुये) पता नहीं...मैं बता नहीं सकता। बता नहीं सकता पर कुछ तो होगा। फ़िल्म लोगों के बीच में आयेगी। कैसे आयेगी, क्या होगा, उसका अभी मुझे नहीं पता।

किसी डिस्ट्रीब्यूटर से कोई बात हुई है इस बारे में?

देखिये, फ़िल्म इंडस्ट्री के कुछ ख़ास-ख़ास लोगों ने ये फ़िल्म देखी है। श्याम बेनेगल ने देखी है, अनुभव सिन्हा ने देखी है, प्रकाश झा ने देखी है और भी कई ख़ास लोगों ने देखी है। सब लोगों ने इस फ़िल्म को रिलीज़ को करना चाहा है। लेकिन सबका इफ एंड बट कुछ ना कुछ रहा है। तो...कोई साथ में आएगा, कोई प्लेटफार्म मिलेगा, कोई मज़बूत सहयोग मिलेगा। नहीं तो फिर अपना कुछ करेंगे। अपना प्लेटफार्म बना देंगे।

ये जो इफ एंड बट आप कह रहे हैं। इस बारे अगर आप कुछ बताना चाहें!

नई चीजें हैं। नया स्टाइल, नया कंटेंट, नया ट्रीटमेंट, नया प्रेजेंटेशन है...

क्या इसे संशय से देखते हैं कि पता नहीं फ़िल्म चलेगी या नहीं?

नहीं...नहीं...फ़िल्म सबको बहुत अच्छी लगी है। और तुरंत लोग बोलते हैं कि बताओ क्या करना है। इस फ़िल्म को दर्शकों तक पहुंचाते हैं। ये बोलते हैं। लेकिन फिर कोई पूछता है कि पैसे कितने हैं। कोई कहता है कि बाज़ार के हिसाब से कुछ प्रजेंटेशन बदल दें क्या, कुछ एडिट कर दें क्या, ट्रीटमेंट बदल दें क्या। जबकि मेरा मानना है कि इस मुद्दे को मैं जैसे देखता हूं, मैं कैसे प्रस्तुत करना चाहता हूं। अगर आप इसको स्वीकर कर रहे हैं तो ठीक है अन्यथा...। तो ये सब चल रहा है। ये मामला है।

फ़िल्म को देखते हुए ये लगता है कि आपके दिमाग में इसका सिक्वेल भी है। क्या सचमुच ऐसा है?

(हंसते हुए...) जी! चाहता तो हूं मैं। हां, चाहता हूं मैं।

तो सिक्वेल में क्या एक्सप्लोर करना चाहेंगे?

अभी इस कहानी में जंगल को फिर भी कम दिखाया गया है। बाहरी षड़यंत्र और बाहरी तामझाम ज्यादा दिखाया गया है। तो अगली कहानी में थोड़ा अंदर घुसूंगा। जो एक अनदेखा अनुभव है उसे सामने लाने की कोशिश करूंगा।

स्थानीय आदिवासी समुदाय को जंगल से बेदखल करके शहर में एक मज़दूर बनाने में सरकार और कार्पोरेट की क्या भूमिका आप मानते हैं?

लालच एक बहुत बड़ा फैक्टर है। इन सब विषयों पर सोचते-सोचते बहुत थक जाता हूं। सरकारें कहती हैं कि हम सबके लिए काम कर रहे हैं। लेकिन ज़मीन पर स्थितियां नहीं बदलतीं। परिणास से ही तो नीयत का पता चलेगा। सिर्फ़ कहने से क्या हो जाता है। अख़बारों और मीडिया के ज़रिये हम तक जो बातें पहुंचाई जाती हैं उससे हमें क्या लेना-देना। अगर ज़मीन पर हालत नहीं सुधरती। हर सरकार यही कहती हम अच्छा करेंगे। अच्छा होगा तो दिखेगा ना।

पानी के बाज़ारीकरण के खिलाफ आपने महाराष्ट्र से लेकर झारखंड तक पदयात्रा भी की है। इस यात्रा के क्या अनुभव रहें? आप जिन राज्यों से गुज़रें वहां क्या हालत देखी?

बहुत बुरी स्थिति है पानी को लेकर। मैंने यात्रा के दौरान देखा कि किसान तीस रुपये का पानी का डिब्बा ख़रीदकर बैलगाड़ी पर रखे हुए है। खेत में हल चलाता है और फिर आकर थोड़ा सा पानी पीता है और फिर काम पर लग जाता है, पसीना बहा देता है। नदियों की स्थिति भी ख़राब है। जेसीबी मशीन लगाकर नदियों को खोदा जा रहा है। ताकि नदियां पानी पी सकें और भूजल का स्तर कुछ ठीक हो सके। महाराष्ट्र से लेकर झारखंड तक मैंने इसी सच्चाई को देखा। लोग इसे इग्नोर कर रहे हैं। बल्कि कहना चाहूंगा कि लोगों को समझ भी नहीं है। अब कहां कोई पदयात्रा करता है। सोशल मीडिया पर बैठे-बैठे ही यात्रा करते हैं ज़मीनी सच्चाई से बहुत ही कम वास्ता है। लोगों लगता है कि बस मेरे गांव की परेशानी है, सबको बस इतना ही लगता है। ये समझ नहीं आता कि ये पूरी दुनिया की समस्या बन रही है।

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अभी भारत की न्यूक्लियर पावर कैपेसिटी 6750 मेगावाट है भारत सरकार का लक्ष्य है कि इसे 2030 तक 40,000 मेगावाट तक पहुंचाया जाएगा। आप क्या भविष्य देख रहे हैं?

जब श्याम बेनेगल ने “स्प्रिंग थंडर” फ़िल्म देखी तो कहा ये तथाकाथित डेवलेपमेंट एक टाइम बम है। जितना इस डेवलेपमेंट की तरफ बढ़ेंगे उतना ही प्रकृति का नाश करेंगे। प्राकृतिक संतुलन को नष्ट करेंगे। तो इसी तरफ जा रहे हैं। अभी कंधे पर ऑक्सीजन लेकर चलने का कांसेप्ट बीच में आ गया ना। वो लोगों को मानसिक रूप से तैयार कर रहे हैं। पानी ख़रीदना अब लोगों को परेशान नहीं करता, उन्होंने इसे मान लिया है, स्वीकर कर लिया है। प्यास लगती है जेब से बीस रुपये निकालते हैं, प्यास बुझाते है और आगे बढ़ जाते हैं। आप समझ लीजिये, अगर हवा-पानी-पेड़-पौधों के लिये पैसे देने पड़ेंगे तो हम विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। जो बुनियादी चीजें प्रकृति ने हमें दी हैं वो हमारा मूलभूत अधिकार है। उनका बाज़ारीकरण और माइंडलेस दोहन विनाश का रास्ता है। देखिये, हम टाइम बम पर बैठे हैं और पता नहीं कब विस्फोट हो जाए।

(राज कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं।) 

Spring Thunder
Sriram Dalton
Jharkhand
Adiwasi community
dalit-adiwasi
film
Social Issue
Jal Jangle Jameen

Related Stories

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध

'सोहराय' उत्सव के दौरान महिलाओं के साथ होने वाली अभद्रता का जिक्र करने पर आदिवासी महिला प्रोफ़ेसर बनीं निशाना 

भारत में हर दिन क्यों बढ़ रही हैं ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएं, इसके पीछे क्या है कारण?

झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना

झारखंड: ‘स्वामित्व योजना’ लागू होने से आशंकित आदिवासी, गांव-गांव किए जा रहे ड्रोन सर्वे का विरोध

झारखण्ड : शहीद स्मारक धरोहर स्थल पर स्कूल निर्माण के ख़िलाफ़ आदिवासी संगठनों का विरोध


बाकी खबरें

  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड: NIOS से डीएलएड करने वाले छात्रों को प्राथमिक शिक्षक भर्ती के लिए अनुमति नहीं
    23 Oct 2021
    उत्तराखंड सरकार द्वारा नवंबर 2020 में प्राथमिक शिक्षक के 2287 पदों पर भर्ती के लिए सूचना जारी की गई थी, इसमें राज्य सरकार द्वारा इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी से होने वाले डीएलएड को मान्य किया गया…
  • Supreme Court
    न्यूजक्लिक रिपोर्ट
    खोरी पुनर्वास संकट: कोर्ट ने कहा- प्रोविजनल एलॉटमेंट के समय कोई पैसा नहीं लिया जाएगा, फ़ाइनल एलॉटमेंट पर तय होगी किस्त 
    23 Oct 2021
    मजदूर आवास संघर्ष समिति ने कहा कि अस्वीकृत आवेदन की प्रकिया में अपारदर्शिता है एवं प्रार्थी को अपील का मौका न देना सरासर अत्याचार एवं धोखा है।
  • inflation
    अजय कुमार
    सरकारी आंकड़ों में महंगाई हो गई कम, ग़रीब जनता को एहसास भी नहीं हुआ! 
    23 Oct 2021
    आख़िर क्या वजह है कि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों में कमी आने के बाद भी आम आदमी इस पर भरोसा नहीं कर पाता।
  • 100 crore vaccines
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेक: क्या भारत सचमुच 100 करोड़ टीके लगाने वाला दुनिया का पहला देश है?
    23 Oct 2021
    भारत न तो पहला देश है जिसने 100 करोड़ डोज़ लगाई है और न ही भारत का टीकाकरण विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान है।
  • shareel
    द लीफलेट
    सीएए विरोधी भाषण: भीड़ उकसाने के ख़िलाफ़ ‘अपर्याप्त और आधे-अधूरे सुबूत’, फिर भी शरजील इमाम को ज़मानत से इनकार
    23 Oct 2021
    दिल्ली की एक अदालत ने दिसंबर 2019 में राष्ट्रीय राजधानी में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA)-राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर अपने कथित भड़काऊ भाषण के सिलसिले में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License