NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कोर्ट की दखल के बाद सरकार ने NDA में लड़कियों की भर्ती का रास्ता किया साफ़, लेकिन जीत अभी भी अधूरी!
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि महिलाएं नेशनल डिफेंस एकेडमी में दाख़िला ले सकती हैं और वो स्थायी कमिशन के लिए पात्र होंगी। सरकार ने एननडीए के साथ-साथ इंडियन नेवल एकेडमी में भी लड़कियों की भर्ती का फैसला लिया है, जो एक लंबे संघर्ष की जीत है।
सोनिया यादव
09 Sep 2021
कोर्ट की दखल के बाद सरकार ने NDA में लड़कियों की भर्ती का रास्ता किया साफ़, लेकिन जीत अभी भी अधूरी!
Image courtesy : The Hindu

“ये खुशी की बात है कि आर्म्ड फोर्सेस के प्रमुखों ने एक सकारात्मक फैसला लिया है। आप फैसले को रिकॉर्ड पर डालें। हम इस मामले की सुनवाई करेंगे। हम इस स्टैंड से खुश हैं। हम ये मैटर सुनेंगे. हम इससे अवगत हैं कि बदलाव एक दिन में नहीं लाया जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच सेना के जिस फैसले को सकरात्मक बता रही है, दरअसल वो फैसला महिलाओं के नेशनल डिफेंस एकेडमी यानी एनडीए में भागीदारी को लेकर है। बुधवार, 8 सितंबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि महिलाएं मिलिट्री कॉलेज में दाख़िला ले सकती हैं और वो स्थायी कमिशन के लिए पात्र होंगी। सरकार ने एननडीए के साथ-साथ इंडियन नेवल एकेडमी में भी लड़कियों की भर्ती का फैसला लिया है, जो एक लंबे संघर्ष की जीत है।

ये फैसला कुश कालरा द्वारा दायर एक याचिका पर आया है, जो प्रतिष्ठित पुणे स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और केरल स्थित भारतीय नौसेना अकादमी (आईएनए) में प्रवेश पाने के लिए महिलाओं के वास्ते समान अवसर की मांग कर रही हैं। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 19 के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि महिलाओं को केवल जेंडर के आधार पर एनडीए में शामिल नहीं किया जाता है। यह समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

आपको बता दें कि बीते महीने अगस्त में कोर्ट ने महिलाओं को नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी थी, जिसके बाद सरकार का ये फ़ैसला आया है। उस समय कोर्ट नेमहिलाओं को एनडीए की परीक्षा में नहीं बैठने देने के लिए केंद्र सरकार की "पुरानी मानसिकता" की आलोचना भी की थी। कोर्ट ने कहा था कि ये एक नीतिगत फ़ैसला है जो कि लैंगिक असमानता के आधार पर बना है।

कोर्ट ने भेदभाव वाली मानसिकता के लिए सेना को लगाई थी फटकार

इस मामले में 18 अगस्त की पिछली सुनवाई में जस्टिस संजय किशन कौल और हृषिकेश राय की खंडपीठ ने महिलाओं को परीक्षा में शआमिल होने को लेकर अंतरिम फैसला सुनाया था। कोर्ट ने एक बार फिर इस बात पर जोर दिया था कि आर्मी में महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाली मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अंतरिम आदेश के जरिए कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि आगामी 5 सितंबर को होने वाली एनडीए (नेशनल डिफेंस अकैडमी) प्रवेश परीक्षा में महिलाएं भी बैठ सकेंगी। हालांकि उनका दाखिला इस मामले में आने वाले अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा, लेकिन कोर्ट के इस फैसले की अहमियत महज एडमिशन प्रॉसेस तक सीमित नहीं है।

आख़िर आर्मी में महिलाओं के सवाल पर खुलापन क्यों नहीं दिख रहा?

कोर्ट का ध्यान मुख्य तौर पर इस बड़े सवाल पर था कि आखिर आर्मी में महिलाओं के सवाल पर खुलापन क्यों नहीं दिख रहा? क्यों हर बार कोर्ट को दखल देकर फैसला सुनाना पड़ता है और फिर भी बात उस खास मामले से जुड़े फैसले पर अमल तक ही सीमित रह जाती है, उससे आगे नहीं बढ़ती? गौर करने की बात है कि अन्य तमाम क्षेत्रों में तो महिलाएं काफी तेजी से आगे बढ़ी हैं, लेकिन सेना में उनकी गति काफी धीमी रही। करीब 14 लाख सैनिकों वाली आर्मी में आज भी महिलाओं का प्रतिशत 0.56 ही है। इस मामले में पिछले साल फरवरी में आया सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला ऐतिहासिक माना जाता है, जिसमें अदालत ने न केवल महिलाओं को कमांड पोस्टिंग के लायक बताया बल्कि केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया कि उन्हें परमानेंट कमिशन दिया जाए।

मालूम हो कि सेना में अभी तक महिलाओं की शॉर्ट सर्विस कमिशन (एसएससी) के तहत भर्ती होती थी, स्थायी कमिशन के तहत नहीं, जो पूरे कार्यकाल के लिए सर्विस की अनुमति होती है। इसलिए महिलाओं को पांच साल सेवा का अवसर मिलता है, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है, लेकिन उन्हें पुरुषों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। इसमें सेना की कानून और शिक्षा विभाग अपवाद हैं, जहां महिला अफसर साल 2008 से स्थायी कमिशन के योग्य हैं।

महिलाएं सेना में डॉक्टर, नर्स, इंजीनियर, संकेतक, एडमिनिस्ट्रेटर और वकील के तौर पर काम करती रही हैं। उन्होंने जंग के मैदान में सैनिकों का इलाज किया है, विस्फोटकों को हैंडल किया है। माइन खोजे और निष्क्रिय किये हैं और संचार के लिए लाइने बिछाई हैं। सेना में लड़ाई के अलावा महिलाओं को इंफेंटरी और बंख़्तबंद सेवा से भी दूर रखा गया है।

एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

साल 2019 में सरकार ने महिलाओं को स्थायी कमिशन देने की इजाज़त दी थी लेकिन उमरदराज़ महिलाओं की शारीरिक परेशानियों को देखते हुए सरकार ने कहा था कि ये केवल उन अफ़सरों पर लागू होगा तो जिन्होंने 14 साल से कम की सेवा दी है।

गौरतलब है कि एनडीए में महिलाओं की एंट्री को लेकर लंबे समय से मांग चल रही थी। भारतीय सेना के 1 लाख 40 हज़ार की संख्या वाले सैन्य बलों में केवल 0.56 प्रतिशत महिलाएं हैं। वायुसेना (1.08 प्रतिशत) और नौसेना (6.5 प्रतिशत) में महिलाओं का प्रतिशत थोड़ा बेहतर है।

ध्यान रहे कि हर साल यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के एग्‍जाम के तहत एनडीए में एडमिशन होता है। तीनों सेनाओं में भर्ती के लिए एनडीए ही एक सेंटर प्‍वाइंट है। औसतन 1470 ऑफिसर्स हर साल कमीशन होते हैं। इसमें से 670 ऑफिसर्स एनडीए और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) से आते हैं जबकि कुछ अधिकारी ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओटिए) से आते हैं। इंडियन मिलिट्री एकेडमी और ओटीए वो जगह है जहां पर महिलाओं और पुरुषों को एक साथ कमीशन दिया जाता है। इससे अलग 453 ऑफिसर्स शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के जरिए नॉन-टेक्निकल और टेक्निकल विंग में जाते हैं।

एनडीए में सह-शिक्षा एक समस्या क्यों है?

अदालत ने इस बात पर भी सख्त आपत्ति जताई थी कि आखिर एनडीए में सह-शिक्षा एक समस्या क्यों है? सेना में महिलाओं के लिए प्रवेश का एक और अतिरिक्त स्रोत बंद क्यों है? यह सिर्फ एक लैंगिक सिद्धांत नहीं है बल्कि भेदभावपूर्ण है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सेना में महिलाओं के स्थाई कमीशन के संघर्ष की बातें भी याद दिलाई थी। साथ ही सेना की मानसिकता को भी बदलने की जरूरत बताई थी।

ये बात किसी से छिपी नहीं है कि बीते साल एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद 17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने से इंकार करना समानता के अधिकार के ख़िलाफ़ है। सरकार द्वारा दी गई दलीलें स्टीरियोटाइप हैं जिसे क़ानूनी रूप से कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

अब जब कोर्ट की दखल के बाद सरकार ने एनडीए में लड़कियों की भर्ती का रास्ता साफ़ कर दिया है, तो ऐसे में इसे एक सकारात्मक पहल जरूर कहा जा सकता है लेकिन जीत अभी भी अधूरी है। क्योंकि महिलाओं की जीत तब पूरी होगी जब सेना के सभी स्टीरियोटाइप टूटेंगे और सभी विभागों में आधी आबादी का खुले दिल से स्वागत होगा।

इसे भी पढ़ें: महिलाओं को NDA की परीक्षा देने का हक़ तो मिल गया, लेकिन सेना के स्टीरियोटाइप को टूटने में अभी भी वक्त लगेगा!

Indian army
National Defence Academy
NDA
Supreme Court
Constitutional right
Against Gender Discrimination
Rashtriya Indian Military College
Women in army

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • srilanka
    न्यूज़क्लिक टीम
    श्रीलंका: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा बर्बादी और तानाशाही से निजात पाने का संघर्ष
    10 May 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने श्रीलंका में तानाशाह राजपक्षे सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर बात की श्रीलंका के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. शिवाप्रगासम और न्यूज़क्लिक के प्रधान…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की : दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवार ने घर के बाहर लिखा 'यह मकान बिकाऊ है', पुलिस-प्रशासन ने मिटाया
    10 May 2022
    गाँव के बाहरी हिस्से में रहने वाले इसी मुस्लिम परिवार के घर हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा में आगज़नी हुई थी। परिवार का कहना है कि हिन्दू पक्ष के लोग घर से सामने से निकलते हुए 'जय श्री राम' के नारे लगाते…
  • असद रिज़वी
    लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी
    10 May 2022
    एक निजी वेब पोर्टल पर काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर की गई एक टिप्पणी के विरोध में एबीवीपी ने मंगलवार को प्रोफ़ेसर रविकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में घेर लिया और…
  • अजय कुमार
    मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
    10 May 2022
    साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
  • अनीस ज़रगर
    श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों में शराब की दुकान खुलने का व्यापक विरोध
    10 May 2022
    राजनीतिक पार्टियों ने इस क़दम को “पर्यटन की आड़ में" और "नुकसान पहुँचाने वाला" क़दम बताया है। इसे बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि दुकान ऐसे इलाक़े में जहाँ पर्यटन की कोई जगह नहीं है बल्कि एक स्कूल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License