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कोरोना के बाद भारत को बचाने के लिए बीजों को सुरक्षित रख के किसानों को बचाना ज़रूरी है
बीज सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा का ही पर्याय है। बिना एक-दूसरे पर नियंत्रण के दोनों का काम नहीं चल सकता।
इंद्र शेखर सिंह
30 Apr 2020
Seeds
Image Courtesy: Farmkey.in

कोरोना वायरस ने वैश्विक औद्योगिक ढांचे में सड़ांध के गहरे बीजों का रोपण कर दिया है। शेयर्स और स्टॉक तबाह हो चुके हैं, वॉल स्ट्रीट खाली है। ILO का अंदाजा है कि दुनियाभर में करीब ढाई करोड़ नौकरियां जाएंगी। यह 2008 में नौकरी खोने वाले लोगों की संख्या से ज़्यादा है। तब करीब दो करोड़ बीस लाख लोगों की नौकरी गई थी। इसी बीच एक दूसरी रिपोर्ट का दावा है कि भारत में क़रीब 40 करोड़ लोग गरीबी के दायरे में आ सकते हैं।

कोरोना वायरस से कोई भी सेक्टर अछूता नहीं रहा। खासतौर पर कृषि क्षेत्र। लेकिन कृषि क्षेत्र के लिए यह तो संकट की शुरूआत भर है। कृषि क्षेत्र में किसान, बीज, उन्हें ऋण देने वाली ईकाईयां आती हैं, यह सभी इस वक़्त बहुत खराब स्थिति में हैं। अब लुघ और मध्यम स्तर की कंपनियों के लिए भयानक उदासी वाला शोकगीत शुरू हो चुका है। उनका मुनाफ़ा दिनों-दिन कम हो रहा है और बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा इन कंपनियों पर कब्ज़े का खतरा बढ़ता जा रहा है।

हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हाल में शहरों से बड़े स्तर पर हुए प्रवास का भी असर पड़ा है। नतीज़तन अब हमारे जीर्ण-शीर्ण ग्रामीण ढांचे को कई लोगों का पालन करना है, जो लगभग नामुमकिन है। यह केवल वक़्त की बात है कि जब इतने भार से ग्रामीण भारत और दूर-दराज़ के इलाक़े टूट जाएंगे।

राष्ट्रहित में भारत को कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए। इसे प्राथमिकता बनाना चाहिए। क्योंकि यह राष्ट्र सुरक्षा का मुद्दा है। एक आर्थिक ताकत होने के बावजूद भारत 'शोध और विकास (रिसर्च एंड डिवेल्पमेंट-R&D)' के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में काफ़ी पीछे है, खासतौर पर कृषि बीजों के क्षेत्र में। सरकारी ढांचे में भी R&D पर बुरा असर पड़ रहा है। 2020-21 में कृषि क्षेत्र के लिए आवंटित निधि में कृषिगत शोध के लिए महज़ 8 फ़ीसदी का ही प्रावधान किया गया है। कई वैज्ञानिकों ने इस पर नाराज़गी भी जाहिर की थी। इस प्रावधान का सबसे बड़ा हिस्सा वेतन और सिस्टम चलाने के लिए खर्च होता है। कृषि शोध के लिए ज़्यादा संसाधनों की जरूरत है। अगर भारतीय किसानों को मौसम परिवर्तन के लिए तैयार रखना है, तो उन्हें ज़्यादा तेज और संसाधन संपन्न व्यवस्था की जरूरत है।

मौजूदा संकट ने भारतीय बीज क्षेत्र के लिए एक ऐसी खिड़की खोली है, जिसके ज़रिए राष्ट्र और किसानों के व्यपाक हित में यह क्षेत्र काम कर सकता है। R&D में निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए कम ब्याज़ पर पूंजी और आसान ऋण उपलब्ध कराए जाने चाहिए। हमें बीज कंपनियों (खासकर मध्यम और लघु स्तरीय कंपनियां) को दिए जाने वाले ऋण को कृषिक्षेत्र में वर्गीकृत कर उन्हें प्राथमिकता पर रखना होगा। क्योंकि बिना बीज के एक अच्छी फ़सल की आस लगाना कोरा सपना है। भारत को बीज स्वतंत्रता का लक्ष्य बनाना चाहिए और इसके लिए बीज क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निवेश करने के लिए कंपनियों को सब्सिडी दी जानी होगी। हमें यह प्रयास सभी राज्यों के ग्रामीण इलाकों में करने होंगे।

पूरे भारत में R&D केंद्रों की स्थापना करने के लिए हमें एक आसान और सर्वव्यापी नियामक ढांचा बनाना होगा। अलग-अलग राज्यों में शोध, प्रोसेसिंग और वितरण का काम करने वाले बीज उत्पादकों के लिए केंद्रीय स्तर से लाइसेंसिंग करने की जरूरत है। पूरे देश में बीज लाइसेंस या बीज की नई किस्म का लाइसेंस पाने के लिए एक ही प्रक्रिया हो। 

अगली डिज़ाइन कठिन होगी, लेकिन यह जरूरी है। भारत को चीन और दूसरे देशों से सीख लेते हुए बीज क्षेत्र में 100 फ़ीसदी FDI को लागू नहीं करना चाहिए। विदेशी निवेश वाली कंपनी में भारतीय नागरिकों के पास मालिकाना हक़ होने चाहिए। चीन और कई दूसरे दक्षिण-पूर्वी देशो में ऐसे ही प्रतिबंध हैं। बीज सुरक्षा, खाद्यान्न सुरक्षा का पर्याय है। हम अपने बीजों और भारतीय पौधों के जेनेटिक मटेरियल (PGR) को विेदेशी हाथों में नहीं दे सकते। आखिर भारतीय किसानों और हमारे पूर्वजों ने मिलकर पिछले दस हजार सालों में इनका विकास किया है। हमें इसकी कद्र और सुरक्षा करनी होगी। कुछ शिलिंग के लिए इसका व्यापार राष्ट्रीय आपदा होगा, जिसकी तुलना केवल ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी लुटेरी कंपनी के साथ किए गए व्यापार से हो सकती है।

इस क्षेत्र में लघु और मध्यम कंपनियों को गुणवत्ता वाले बीज उत्पादन के लिए प्रोत्साहन दिया जाए। इसके लिए बीज गुणवत्ता जांच तक मुफ़्त पहुंच और किसी तीसरे पक्ष द्वारा NABL से मान्यता प्राप्त 'बीज जांच केंद्र' बनाये जाने में सरकारी मदद दी जानी होगी। इससे दूसरे इंटरनेशनल प्रोटोकॉल पर निर्भरता कम होगी और हमारी राष्ट्रीय प्रोटोकॉल मजबूत होगा, साथ में देश के भीतर जांच का बेहतर ढांचा बनाया जा सकेगा। तब किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले कृत्रिम बीजों की आसानी से पहुंच मिल सकेगी। जांच व्यवस्था को ज़्यादा सुलभ बनाकर इससे भारत उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की कीमतों को भी नियंत्रण में रख सकता है।

R&D पर वापिस लौटते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता के बजाए हमें भारतीय बीज क्षेत्र को मजबूत करना चाहिए। इसमें निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र शामिल हों। इसका एक तरीका मध्यम और लघु कंपनियों द्वारा निवेश किया जाना है, जिसमें 100 फ़ीसदी शेयरहोल्डिंग भारतीय नागरिकों के पास हो। इनमें सरकार द्वारा शोध के लिए 50 फ़ीसदी मदद दी जाए। सरकार योग्यता के लिए अपने पैमाने बना सकती है। इससे चीन की तरह तेजतर्रार देशी ढांचा खड़ा हो सकेगा। भारतीय कंपनियों को शोध में जाने का प्रोत्साहन मिलेगा और कंपनियां ज़्यादा लोगों को काम पर लगाएंगी। हमें राज्य और केंद्र के स्तर पर ज़्यादा PPP मॉडल की जरूरत है।

कृषि-शोध में लगे ICAR और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों को भारतीय कंपनियों के साथ देश भर में काम करने के लिए प्रोत्साहन दिया जाए, ताकि दोनों के मिले-जुले संसाधनों के इस्तेमाल से बेहतर प्रजाति के बीज बनाए जा सकें। इससे इन संस्थानों के शोधार्थियों को अपने प्रोजेक्ट के लिए बेहतर निवेश और उद्योगों के साथ काम करने का बड़ा अनुभव भी मिल सकता है। एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा सकता है, जिसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले उद्यमियों को राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या निजी कृषि कॉलेजों के साथ काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इससे नए बीजों की प्रजातियां बनाकर मौसम परिवर्तन की चुनौतियों से खुद के 'माइक्रो-एग्रो-क्लाइमेट जोन' में रहकर निपटा जा सकेगा।

किसानों द्वारा विकासशील सहभागिता युक्त ब्रीडिंग करने में ऐसे विश्विद्यालयों की मदद वाले सामान्य तंत्र की ही जरूरत है। सरकार को शोध और विकास के लिए सभी तरह के पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि भारत तकनीक के लिए हमेशा विदेशी देशों पर निर्भर नहीं रह सकता। हमें देश की खाद्यान्न उपलब्धता बनाए रखने के लिए अपनी विविधता की ओर देखना होगा।

लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि सुधारों के चलते व्यापार पर असर न पड़े। इसलिए जरूरी है कि सरकार बीज उत्पादन और निर्यात के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों की पहचान करे। भारत का कृषि मौसम और बीज आसियान देशों से लेकर अफ्रीकी किसानों की मांग पूर्ति के लिए सक्षम हैं। यह कदम कोरोना के बाद की आर्थिक कूटनीति और खाद्यान्न/बीज मदद कार्यक्रमों के साथ-साथ चलने चाहिए। सरकार को विदेशी किस्मों के बीजों के उत्पादन के लिए भी सुविधाओं की स्थापना करनी चाहिए, ताकि उनका निर्यात किया जा सके। इस तरह भारतीय किसान और बीज उत्पादक अपनी आय को बढ़ाते हुए दुनियाभर के किसानों की मदद भी कर सकेंगे।

फिलहाल यह उद्योग एक कठिन दौर से गुजर रहा है। इसलिए ICAR AICRIP की ट्रॉयल में कीमतों को कम करना चाहिए। यह 100 फ़ीसदी स्थानीय लोगों के मालिकाना हक़ वाली कंपनियों के लिए किया जाए। ऐसा करने से कंपनियां अधिकतम स्थानों पर अपने बीजों की टेस्टिंग कर पाएंगी। कोरोना के बाद एग्रीकल्चर ग्रेजुएट्स को अच्छी नौकरियां मिल पाएं, इसके लिए ICAR और राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों को कृषि उद्योगों के लिए जरूरी मानव संसाधन  को ध्यान में रखना चाहिए। यह संस्थान बीज क्षेत्र से संपर्क कर अपने सिलेबस और कोर्स में आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बदलाव कर सकते हैं। सरकार को बीज क्षेत्र से चाय और कॉफी सेक्टर की तर्ज पर पर व्यवहार करने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी कर छूट दी जाए, क्योंकि कोरोना के बाद की दुनिया हम सभी के लिए बहुत कठिन होने वाली है।

बीज उत्पादन में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) की एक और चुनौती है। भारत में दुनिया का सबसे प्रगतिशील IPR कानून है, जिससे किसानों, बीज उत्पादकों, शोधार्थियों और बीज कंपनियों को ताकत मिलती है। दूसरी तरफ पृथ्वी का भी ख़याल रखा जाता है। हमें अपने कानून पर अड़े रहना चाहिए और UPOV (यह एक प्राइवेट पेंटेंट संधि है, जिसे भारतीय संसद ने खारिज कर दिया था) पर अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं झुकना चाहिए।

PPVFRA के तहत IPR की सुरक्षा बीजों और पौधों की किस्मों के लिए उपलब्ध है, जिसमें ट्रांसजेनक प्लांट वेरायटीज़ (GMOs) शामिल हैं। सभी तरह की ट्रेट-लाइसेंसिंग, जिसमें GM ट्रेट भी शामिल है, उसे PPVFRA के सेक्शन 26 के मुताबिक़ ही होना चाहिए। साथ में बीज उद्योग में एकाधिकार को रोकने के लिए 'इंडियन पेटेंट एक्ट' (जिसमें बीज और पौधों के प्रकार शामिल नहीं हैं) के सेक्शन 3(j) को लागू करना चाहिए। बता दें इस उद्योग में एकाधिकार किसानों और भारतीय कृषि के लिए नुकसानदायक है।

लेखक नेशनल सीड एसोसिएशन में पॉलिसी एंड ऑउटरीच के डायरेक्टर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख नीचे लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

In Post-Covid India, Save Farmers by Protecting Seeds

Indian seed industry
Plant Varieties
Genetic resources
India agriculture
Biodiversity
COVID-19
Agriculture Crisis

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