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आंदोलन
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भारत
राजनीति
खेत मज़दूर बने किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन का अहम हिस्सा
आपसी मतभेदों के बावजूद, खेत मज़दूर किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि तीनों कृषि-क़ानून उनको भी प्रभावित करेंगे और फिर उन्हें वापस करना संभव नहीं होगा।
विक्रम सिंह
22 Dec 2020
Translated by महेश कुमार
खेत मज़दूर

कृषि व्यवसाय से जुड़े बड़े कॉर्पोरेटों के पंजे से देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए भारत में किसानों का अभूतपूर्व संघर्ष एक जन आंदोलन में बदल गया है। किसानों के इस आंदोलन में जनसमूहों की भागीदारी और बढ़ते समर्थन के कारण किसानों के प्रति आम जनता में सहानुभूति बढ़ रही है। किसानों के अलावा, मज़दूरों का एक बड़ा वर्ग, जिसमें जोतदार किसान, अन्य किसान और भूमिहीन मज़दूर शामिल हैं, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं, वे भी इस संघर्ष का हिस्सा बन गए हैं।

खेत-मज़दूर, शुरू से ही इस आंदोलन में शामिल रहे हैं। वैसे यह कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है क्योंकि सामान्य धारणा के अनुसार किसानों और खेत-मज़दूरों के बीच कई विरोधाभास मौजूद हैं। ये बात कुछ हद तक सही भी है। हाल ही में, ये विरोधाभास पंजाब और हरियाणा तब उभरे जब धान रोपण के लिए मज़दूरी दरों की बात आई। यदि कोई दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन स्थलों का दौरा करता है, तो वहाँ बड़ी संख्या में खेत-मज़दूर भाग लेते नज़र आएंगे। इस एकता का आधार समाज के इस वर्ग पर इन तीन क़ानूनों का पड़ने वाला दुषप्रभाव है। तीन कृषि-क़ानूनों और बिजली संशोधन बिल पर तत्काल चर्चा की जरूरत है, क्योंकि ये क़ानून भारत के 14,43,29,833 (जनगणना 2011 के अनुसार) केट-मज़दूरों के जीवन को बदल देंगे।  

काम में कमी 

जैसा कि स्पष्ट है इन तीन क़ानूनों के लागू होने से कृषि क्षेत्र में सरकार का समर्थन और कम हो जाएगा। किसानों को कृषि सामग्री जैसे कि बीज, उर्वरक, खरीद की आदि में सहायता नहीं दी जाएगी। क़ानून को लाने के प्रमुख कारणों में से ये एक है। तब सरकार की प्राथमिकता अनुबंध यानि ठेकेदारी की खेती पर अधिक से अधिक होगी। आम तौर पर अनुबंध खेती बड़े किसानों के लिए तो ठीक है, लेकिन किसी भी किस्म की सरकारी सहायता के अभाव में, सभी वर्ग फिर चाहे वे मध्यम, छोटे किसान आदि हों उन पर जमीन को अनुबंध पर देने का दबाव होगा। इसका सीधा असर खेत-मज़दूरों पर पड़ेगा। कृषि के निगमीकरण/कॉर्पोरेटीकरण से अधिक मशीनीकरण होगा, जिससे खेत-मज़दूरों के लिए काम के दिन कम हो जाएंगे। अनुबंध खेती में, निजी कंपनी/कॉर्पोरेट की पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता लाभ को बढ़ाने की होगी और यह सब मज़दूरों की आय को कम करके किया जाएगा। इसलिए, बड़ी मशीनों का इस्तेमाल किया जाएगा, जो बड़ी संख्या में खेत-मज़दूरों को उनके काम से विस्थापित कर देगा। 

अधिक से अधिक अनुबंध खेती की वजह से कृषि व्यवसाय से जुड़े बड़े घराने मज़दूर आधारित कृषि के काम को उन फसलों में स्थानांतरित कर देंगे जहां कम श्रम की आवश्यकता होगी।  उदाहरण के लिए धान की खेती, जहां अधिक मैनुअल श्रम की जरूरत होती है। जब धान की जगह किसी अन्य फसल को बोया जाएगा तो खेत-मज़दूरों को बड़ी संख्या में काम से विस्थापित किया जाएगा। बड़े पैमाने पर कृषि परिवारों से आने वाले काश्तकार भी सीधे तौर पर इससे प्रभावित होंगे। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या अनुबंध खेती के बाद, उनके पास किसी भी किस्म की भूमि तक पहुंच नहीं होगी क्योंकि उन पर बड़े कॉरपोरेट्स का एकाधिकार होगा और वे केवल भूमि मालिकों (उत्पादकों) के साथ सीधे अनुबंध करेंगे।

न्यूनतम वेतन/मज़दूरी 

न्यूनतम मज़दूरी एक ऐसा सवाल है, जहां किसान और खेत-मज़दूरों को आम तौर पर दो विपरीत दिशाओं में देखा जा सकता हैं। लेकिन खेत-मज़दूरों ने अपने अनुभव से सीखा है कि न्यूनतम मज़दूरी का सवाल सीधे न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़ा है। स्वामीनाथन आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी, जिसे उत्पादन की व्यापक लागत के रूप में जाना जाता है और इसे सी2+50 फोर्मूले से मापा जाता है जिसमें सभी प्रकार के श्रम इनपुट शामिल हैं। हमारा मानना हैं कि इसकी गणना करते वक़्त, सरकार को न्यूनतम मज़दूरी की दर यानि खेत-मज़दूरों की लागत को शामिल करना चाहिए- कम से कम सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मज़दूरी में इसकी जरूरत है। अब तक, जो किसान एमएसपी का लाभ नहीं उठा पाए हैं और दयनीय स्थिति में हैं, वे खेत-मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी देने की स्थिति में नहीं हैं। सरकार के दावों के विपरीत क़ानून में एमएसपी की कोई गारंटी नहीं है, और ये क़ानून  कृषि व्यापार को इस तरह बदल देगा कि एमएसपी पर फसलों की खरीद न्यूनतम हो जाएगी- यानि बाज़ार एक अनिश्चितता के हेरे में आ जाएगा। 

इस अनिश्चितता भरे वातावरण में, किसान अपनी फसलों की लागत का अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं होंगे, और इसलिए, वे नुकसान से बचने के लिए मज़दूरी को कम करके खेती की लागत को बचाने की कोशिश करेंगे। जब किसानों को उनकी फसलों की सही एमएसपी मिलेगी तो न्यूनतम मज़दूरी के संघर्ष को बल मिलेगा। इसलिए, एमएसपी के लिए किसानों का संघर्ष और एमएसपी पर कृषि उपज की खरीद, न्यूनतम मज़दूरी के संघर्ष से अलग नहीं है, जो किसानों और खेत-मज़दूरों के चल रहे संघर्ष को मुद्दा-आधारित बल देता है।

पीडीएस और खाद्य सुरक्षा 

सीमित आय स्रोतों और भूमि के स्वामित्व तथा संसाधनों के बिना, अधिकांश खेत-मज़दूर  सरकारी सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर निर्भर हैं। इसलिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) सरकार की सभी सामाजिक कल्याण योजनाओं में से एक बड़ी केंद्रीय योजना है।

नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के लागू करने से पीडीएस सहित अन्य सामाजिक कल्याण की योजनाओं के दायरे को लगातार कम किया जा रहा है। नवउदारवादी निज़ाम के पिछले 25 वर्षों के अनुभव ने बताया है कि इन नीतियों ने जनसाधारण पर घातक हमला किया है, खासकर ग्रामीण खेत-मज़दूरों पर। यूनिवर्सल पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को पहले ही एक लक्षित कार्यक्रम में बदल दिया गया है, जिसका अर्थ है कि लाखों परिवारों को सरकारी सहायता से दूर कर दिया गया है। भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और उनके आईटी तंत्र के लंबे दावों के बावजूद, भविष्य में खाद्यान्नों की खरीद पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस बारे में जनता के बीच स्पष्टता है। कई प्रमुख अखबार अपने लेखों में नवउदारवादी नीति के साए में तैयार  इन क़ानूनों के समर्थन में दलील दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें वापस लेने का मतलब है कि ऐसे ही क़ानूनों को रोकना, जो सरकार और उनके कॉरपोरेट लॉबिस्टों की सूची में हैं। सरकारी बाजार की (एपीएमसी अधिनियम के कमजोर पड़ने पर) की अनुपस्थिति में निजी खरीद को बढ़ावा मिलेगा और सरकारी खरीद में कमी आएगी- जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है और सीधे पीडीएस को भी प्रभावित करता है, और जो सभी को भोजन सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

सरकार द्वारा कम खरीद किए जाने पर सरकार के गोदामों में खाद्यान्न की उपलब्धता कम हो जाएगी। इन हालात में, पीडीएस में खाद्यान्न के लिए नकद (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से) की वकालत तेज़ हो जाएगी। पहले से ही, विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नेतृत्व में विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भारत में पीडीएस को बदलने और इसके लिए सब्सिडी कम करने का दबाव बढ़ा रही हैं। भारत में कुछ राज्यों में बहुप्रचारित प्रणाली (खाद्यान्न के लिए नकद हस्तांतरण) का प्रयोग विफल हो चुका है। पीडीएस ग्रामीण गरीबों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सस्ती कीमतों पर अनाज वितरण और आपातकालीन स्थितियों के प्रबंधन की बेहतरीन प्रणाली है।

वर्षों से, पीडीएस 'खाद्य सुरक्षा' का पर्याय बन गया है। कमजोर पीडीएस प्रणाली और खाद्यान्न की जगह नकद हस्तांतरण हमारे देश के लिए आपदा बन सकती है जहां लगभग हर चौथा बच्चा कुपोषित है और प्रजनन आयु की उम्र की सभी महिलाएं कमजोर और उनमें खून की कमी हैं। भारत में, 36 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और 6 से 59 महीने की उम्र के 58 प्रतिशत बच्चे कमजोर और एनीमिक (2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े) हैं। अविकसित/स्टंटिंग बच्चों की बढ़ती संख्या के बारे में ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। कॉम्प्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रीशन सर्वे 2018 के अनुसार, 38.4 प्रतिशत बच्चे अविकसित हैं और प्रजनन उम्र की 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं एनीमिक/कमजोर हैं। इन अधिनियमों के लागू होने से पीडीएस की प्रकृति हमेशा के लिए बदल जाएगी, जिससे भारत आज की तुलना में अधिक कुपोषित हो जाएगा।

अनुबंध खेती से नकदी कमाने वाली फसलों या खाद्यान्न की तुलना में निर्यात वाली उपयुक्त फसलों पर अधिक जोर दिया जाएगा, क्योंकि उनमें लाभ की गुंजाइश अधिक होगी। इस पहलू पर भी भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है। भारत में समृद्ध और विविध जलवायु के क्षेत्र के अलावा समृद्ध मिट्टी की विविधता है जो विविध फसलों का समर्थन कर सकती है, जिन्हे कि पश्चिम में प्रचलित ठंड के मौसम की वजह से नहीं उगाया जा सकता है। ये देश हमारी फसलों को खाद्यान्न से इन फसलों में स्थानांतरित करने का अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से दबाव बना रहे हैं। किसानों को कृषि में निवेश के उच्च रिटर्न के आकर्षक सपने दिखाए जा रहे हैं। यह सुनने में अच्छा लग सकता है लेकिन वैश्विक दुनिया में, भारत खाद्यान्न के आयात पर भरोसा नहीं कर सकता। यह हमारी खाद्य सुरक्षा को अनिश्चितता में डाल देगा क्योंकि हमारे सामने हरित क्रांति के पहले का कड़वा अनुभव है जब भारत भूख से लड़ रहा था। खेत-मज़दूर जो अधिकांश समाज के वंचित वर्गों से हैं, इस असुरक्षा के पहले शिकार होंगे।

खुदरा मुद्रास्फ़ीति 

अनिवार्य रूप से कमोडिटी एक्ट में संशोधन करने से आपराधिक जमाखोरी की आजादी मिल जाती है- व्यापारी तबके में वैसे भी मुनाफे को बढ़ाने की आम प्रवृत्ति होती है। यह असाधारण मूल्य वृद्धि के मामले में युद्ध, अकाल, और गंभीर प्राकृतिक आपदाओं को छोड़कर सरकारी विनियमन को प्रतिबंधित करता है। यह सामान्य परिस्थितियों में आवश्यक वस्तुओं की मूल्य वृद्धि पर नज़र रखने को प्रतिबंधित करता है। दूसरे शब्दों में, यह साग-सब्जी उत्पादन के मामले में 100 प्रतिशत और सड़ने वाले कृषि उत्पादों को 50 प्रतिशत खुदरा मुद्रास्फीति को वैध बनाता है। लाभ को बढ़ाने वाली मुद्रास्फीति, बड़े स्टॉक के माध्यम से कृत्रिम कमी पैदा की जाएगी जो कृषि श्रमिकों के बड़े तबके को भूखे रहने पर मजबूर कर देगी, और जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, उनके बचाव में पीडीएस भी नहीं होगा। सामान्य परिस्थितियों में, यहां तक कि आवश्यक वस्तु अधिनियम की उपस्थिति में भी आमतौर पर देखा जाता है कि कृषि श्रमिक प्याज, टमाटर और कभी-कभी दालों जैसी वस्तुओं की उच्च कीमतों के कारण महीनों तक इन  खाद्य पदार्थों की खरीद करने में विफल हो जाते हैं। जब पूरे खाद्य बाजार को नियमित किया जाएगा तो स्थिति और बदतर हो जाएगी।

भूमि का सवाल 

कृषि के कोर्पोरेटिकरण से भूमि का सवाल नया आयाम ले लेगा। किसानों के पास पहले से ही बड़ी कंपनियों के हाथों अपनी जमीन खोने को लेकर मजबूत आशंकाएं हैं। अगर हम इस संशय को नहीं मानते हैं, तब भी, कृषि में बड़े कॉरपोरेट्स के विशाल पैमाने पर प्रवेश से एक नया आयाम पैदा होगा और यह उन लाखों भूमिहीन कृषि श्रमिकों की आशाओं के लिए हानिकारक होगा जो अभी भी अपनी हिस्से की जमीन का इंतजार कर रहे हैं। गांवों में खेत-मज़दूरों को उनके अधिकारों एसई वंचित करने का यह सबसे प्रभावी तरीका है, जो हक़ उन्हे आज़ादी के आंदोलन से मिला था। पिछले 20 वर्षों में भूमि सुधारों का उलटा होना और भी बदतर हुआ है; इस दौरान ग्रामीण इलाकों में भूमिहीन परिवारों (0.01 हेक्टेयर से कम भूमि वाले) की संख्या 35   से बढ़कर 49 प्रतिशत हो गई है। हालत इतने खराब है कि इनमें 58 प्रतिशत भूमिहीन दलित हैं।

भूमि के हक़ को लेकर विभिन्न संघर्ष चल रहे हैं जहाँ भूमिहीन कृषि श्रमिकों को सरकारी अधिकारियों, वन अधिकारियों, जमींदारों या वन माफिया की मार को झेलना पड़ रहा है। लेकिन कृषि में कॉरपोरेट्स के आने से संघर्ष कॉरपोरेट्स के खिलाफ होगा, जो अधिक क्रूर और कठोर होगा। पंजाब जैसे कुछ राज्यों में, सरकारें पहले ही निजी कंपनियों को गाँव की सामान्य भूमि में दाखल देने की अनुमति दे चुकी हैं, जिस ज़मीन को भूमिहीन ग्रामीण जनता के बीच वितरित किया जाना था।

यह एक ऐसा समय है जब भारत उच्च बेरोजगारी और भूख का सामना कर रहा है, और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भविष्य में भुखमरी के कारण होने वाली मौतों के बारे में चेतावनी दे रही हैं। सरकार को खेती की जरूरतों पर अधिक खर्च करने और संसाधनों को व्यापक रूप से विकसित करने की जरूरत है, ताकि विस्तृत खरीद प्रणाली और एमएसपी को मज़बूत किया जा सके ताकि कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाया जा सके। इससे किसानों की आय में वृद्धि तो होगी साथ ही हमारी खाद्य सुरक्षा भी मजबूत होगी। लेकिन केंद्र सरकार, जो संकटों में अवसर देख रही है, वह कारपोरेट और विदेशी पूंजी को आमंत्रित करने पर प्रतिबद्ध है, और शोषण के लिए खुद के कृषि क्षेत्र को परोस रही है। यहाँ, दरिद्रता की पुरानी औपनिवेशिक प्रणाली को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है।

खेत-मज़दूर इस ऐतिहासिक आंदोलन का महत्वपूर्ण अंग हैं, और वे किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सक्रिय रूप से इसमें भाग ले रहे हैं। खेत-मज़दूर दिल्ली की सीमाओं पर बड़ी तादाद में मौजूद हैं। यह एक ऐतिहासिक आंदोलन है, जो विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को एकजुट कर रहा है और लोगों को विभाजित करने वाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संघर्ष का सार जीत होने तक लड़ाई जारी रखना है।

(लेखक अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Agricultural Workers an Integral Part of Ongoing Historic Struggle of Farmers

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