NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
समाज
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
एक महान मार्क्सवादी विचारक का जीवन: एजाज़ अहमद (1941-2022)
एजाज़ अहमद (1941-2022) की जब 9 मार्च को मौत हुई तो वे अपनी किताबों, अपने बच्चों और दोस्तों की गर्मजोशी से घिरे हुए थे।
विजय प्रसाद
11 Mar 2022
Translated by महेश कुमार
Ejaz Ahmed

ब्रिटिश भारत में मुजफ्फरनगर में जन्मे, एजाज़ ने कम उम्र से ही बड़े पैमाने की पढ़ाई की और अपने दिमाग से अपने बचपन के कस्बे को बाहर की दुनिया में उभरने दिया। बचपन में उनके पिता ने उनके साथ कुछ क्रांतिकारी किताबें साझा की थीं, जिससे उन्हें भारत में गंगा के दोआब क्षेत्र के बाहर की दुनिया और पूंजीवादी व्यवस्था की सीमाओं से परे की दुनिया को समझने में मदद मिली थी। ऐजाज़ अहमद ने कम उम्र से ही अंतर्राष्ट्रीयवाद और समाजवाद का सपना देखना शुरू कर दिया था। उन्होंने पाकिस्तान के लाहौर में अध्ययन किया, जहां उनका परिवार 1947-48 में विभाजन के बाद पलायन कर गया था, लेकिन उनका अध्ययन कॉलेज की कक्षाओं में उतना ही हुआ जितना कि कैफे और राजनीतिक संगठनों के कक्षों में हासिल किया था। कैफ़े में, ऐजाज़ उर्दू साहित्य के बेहतरीन लोगों से मिले, जिन्होंने उन्हें गीत और राजनीति दोनों में शिक्षा मिली; राजनीतिक दलों की बहसों में, उन्होंने मार्क्सवाद की गहराई को समझा और दुनिया के एक उस असीम दृष्टिकोण को जाना जिसने उन्हें जीवन भर जकड़े रखा। पाकिस्तान में वामपंथी राजनीतिक अशांति में पूरी तरह से डूबे हुए, एजाज़ अधिकारियों की नज़रों में चढ़ गए थे और यही वजह थी कि उन्होंने अपना देश छोड़ न्यूयॉर्क शहर (संयुक्त राज्य अमेरिका) में शरण ले ली थी। 

ऐजाज़ अहमद के दो जुनून थे – शायरी और राजनीति – उए जुनून न्यूयॉर्क में फले-फूले। उन्होंने अपने समय के सबसे प्रसिद्ध कवियों (जैसे एड्रिएन रिच, विलियम स्टैफोर्ड और डब्ल्यूएस मेर्विन) के सामने उर्दू की कविताओं/नज़मों/ग़ज़लों के प्रति अपना अपार प्यार दिखाया, उन्हें ग़ालिब के शेर सुनाए, वाइन पिलाई, उनके लिए ग़ालिब की शायरी की भाषा की व्याख्या की, और अर्थ समझाए। इस बेहतरीन काम के परिणामस्वरूप ऐजाज़ की पहली पुस्तक, ग़ज़ल ऑफ़ ग़ालिब (1971) में आई थी। उसी समय, ऐजाज़, फ़िरोज़ अहमद के साथ पाकिस्तान फोरम पत्रिका निकालने में शामिल हो गए थे, जो एक कठिन पत्रिका थी, जिसने याह्या खान (1969-1971) की सैन्य तानाशाही पर विशेष ध्यान देने के साथ-साथ दक्षिण एशिया में अत्याचारों का दस्तावेजीकरण और जुल्फिकार अली भुट्टो की नागरिक संभावनाओं (1971-1977); पाकिस्तान पर, मुख्य रूप से पूर्वी पाकिस्तान (जो 1972 में बांग्लादेश बन गया) और बलूचिस्तान में विद्रोह के बारे में लिखा और दस्तावेजीकरण किया था। यह वह वक़्त था जब ऐजाज़ ने मंथली रिवियु जैसी समाजवादी पत्रिका में दक्षिण एशियाई राजनीति के बारे में लिखना शुरू किया, जिनके साथ वे अगले कई दशकों तक घनिष्ठ सहयोग करते रहे। 

1980 के दशक में, ऐजाज़ अहमद भारत लौट आए, दिल्ली में रहने लगे और शहर के विभिन्न कॉलेजों (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित) में अध्यापन का काम किया। इस दौरान, ऐजाज़ आलोचना की लय में बस गए और इसमें उन्होने तीन अलग-अलग क्षेत्रों पर पर्याप्त काम किया: उत्तर-आधुनिक और उत्तर-उपनिवेशवाद, हिंदुत्व और उदारीकरण, और संयुक्त राज्य अमेरिका और अमेरिका द्वारा संचालित वैश्वीकरण के आसपास केंद्रित नई विश्व व्यवस्था पर बेहतरीन काम किया।

संस्कृति और साहित्य के प्रति अपनी महान प्रशंसा के आधार पर, ऐजाज़ ने अनौपचारिक तरीके से एक शक्तिशाली विश्लेषण विकसित किया जिसमें महानगरीय विश्वविद्यालयों द्वारा तीसरी दुनिया की संस्कृतियों का मूल्यांकन किया जा रहा था। उनका यह काम उत्तर-आधुनिकतावाद और उत्तर-उपनिवेशवाद के एक मजबूत नकारात्मक मूल्यांकन पर विस्तृत था, जिसमें प्रमुख मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचक फ्रेड जेमिसन और ओरिएंटलिज्म के मुख्य आलोचक एडवर्ड सैद के काम का बारीकी से अध्ययन शामिल था। ऐजाज़ के उत्तर-आधुनिकतावाद और उत्तर-उपनिवेशवाद के अध्ययन के केंद्र में मार्क्सवाद का उनका खंडन था। उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘उत्तर-मार्कस्वाद 'पूर्व-मार्क्सवाद’ के अलावा और कुछ नहीं है, यह उस आदर्शवाद की वापसी है जिसे मार्क्स ने आगे बढ़ाया' था। यह टिप्पणी करते वक़्त, ऐजाज़ के दिमाग में अर्नेस्टो लैक्लाऊ और चैंटल मौफ़े की अत्यधिक प्रभावशाली पुस्तक, हेजेमोनी एंड सोशलिस्ट स्ट्रैटेजी, 1985 थी, जिसमें इतालवी कम्युनिस्ट एंटोनियो ग्राम्स्की को उत्तर-आधुनिक विचारक के रूप में पेश किया गया था। इसी संदर्भ में ऐजाज़ ने ग्राम्शी के काम का बारीकी से अध्ययन शुरू किया था। ये लेखन ऐजाज़ की क्लासिक किताब, इन थ्योरी: क्लासेस, नेशंस, लिटरेचर्स (वर्सो एंड तुलिका, 1992) में प्रकाशित हुए थे। कुछ वाक्यों में यह कहना बहुत ही कठिन है कि इस पुस्तक का विश्व भर के विद्वानों पर क्या प्रभाव पड़ा था। जब मार्क्सवाद पर हमले हो रहे थे, ऐजाज़ उन कुछ विचारकों में से एक थे जिन्होंने इसकी प्रासंगिकता का नहीं, बल्कि इसकी आवश्यकता का एक विवेकपूर्ण लेखा-जोखा तैयार किया था। 'उत्तर-उपनिवेशवाद भी, अधिकांश चीजों की तरह, वर्ग की ही बात है',जिसे  उन्होंने बड़े तीखेपन के साथ लिखा था और जिसने उनके गद्य को परिभाषित किया था। थ्योरी में, यह एक ऐसी किताब थी जिसने एक पूरी की पूरी पीढ़ी को थ्योरी के बारे में सोचना और लिखना सिखाया। यह वह पुस्तक थी, और मंथली रिव्यू में उनके प्रकाशित निबंध थे, जिनके ज़रिए  ऐजाज़ ने मार्क्सवादी परंपरा की एक महत्वपूर्ण रक्षा की स्थापना की थी। समीर अमीन ने लिखा कि 'मार्क्स असीम है', एक पंक्ति है जिसकी चर्चा ऐजाज़ ने मुझसे उस वक़्त की थी जब हमने समीर के बाद के लेखन की एक पुस्तक तैयार की और ऐजाज़ ने प्रस्तावना लिखी थी। यह इसलिए असीम है क्योंकि पूंजीवाद की आलोचना भी तब तक अधूरी है जब तक पूंजीवाद पर काबू नहीं पा लिया जाता है। इसलिए, मार्क्स को अस्वीकार करना, पूंजीवादी व्यवस्था और मानवता पर उसकी पकड़ की पोल खोलने के लिए बनाए गए उपकरणों के सबसे शक्तिशाली सेट को अस्वीकार करना है।

 

'हर देश को वह फासीवाद मिलता है जिसका वह हक़दार है', यह एक ऐसा वाक्य है जो एजाज़ के लेखन में इस अवधि में पाया जा सकता है, जब ग्राम्शी के अध्ययन ने उन्हें 1992 में बाबरी मस्जिद के विनाश से ठीक पहले और बाद की अवधि में हिंदुत्व के उदय को समझने में मदद की थी। भारत की एक पूरी पीढ़ी, जो तेजी से उदारीकरण और हिंदुत्व के विकास की दोहरी घटनाओं से हतप्रभ थी, उसकी व्याख्या ने ऐजाज़ के स्पष्ट गद्य में शरण ली, जिसने भारतीय धूर दक्षिणपंथ के उदय के चरित्र की पहचान की थी। ये लेखन, उनमें से कई वर्तमान वंशावली राजनीतिक निबंध (तुलिका, 1996) में प्रकाशित हुए हैं, सटीक सैद्धांतिक और ऐतिहासिक भाषा में धूर दक्षिणपंथ के विकास का वर्णन किया गया है। ये ख्याल ऐजाज़ को कभी नहीं छोड़ेंगे। अपने जीवन के अंतिम दशक में, उन्होंने बड़ी सावधानी से धूर दक्षिणपंथ का पाठ पढ़ा। ये अध्ययन वेलेक लेक्चर बन गए, जिसे उन्होंने 2017 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (इरविन) में दिए थे, और जिसे लेफ्टवर्ड बुक्स द्वारा एकत्र किया जाएगा और प्रकाशित किया जाएगा। इन लेखनों में ऐजाज़ का एक योगदान यह है कि उन्होंने हमारी संस्कृति के अंदर कठोरता पर जोर दिया है – जो जाति व्यवस्था की दुर्दशा और पितृसत्ता के पदानुक्रम में निहित है। हर देश को वह फासीवाद मिल रहा है जिसके वह हकदार है, उस सूत्र से उनका यही मतलब था। हिंदुत्व की जड़ों को समझने के लिए, कठोर संस्कृति की जड़ को समझना होगा, यह समझना होगा कि किस तरह निजीकरण के एजेंडे ने श्रम को और अधिक क्रूर बना दिया है, और राजनीतिक दक्षिणपंथ के उदय के लिए परिस्थितियों का निर्माण किया है। ये लेखन, जिनमें से कई को महान राजनीतिक उथल-पुथल के समय में पूरे भारत में व्याख्यान के रूप में पेश किया गया था, आज भी क्लासिक बने हुए हैं, जिन्हें पढ़ना और फिर से पढ़ना जरूरी है क्योंकि हम इन फासीवादी ताकतों की तरफ से मानवीय गरिमा पर हमले का सामना कर रहे हैं। जब दुनिया की उम्मीदों पर ग्रहण लग रहा था तो ऐजाज़ ने हमें आत्मविश्वास दिया था।

वे कठिन वर्ष थे। 1991 में भारत का उदारीकरण हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उसी वर्ष इराक पर क्रूर हमला किया। अगले वर्ष, 1992, कट्टर दक्षिणपंथियों की ताकतों ने अयोध्या में सोलहवीं शताब्दी की एक मस्जिद को नष्ट कर दिया। दो साल बाद 1994 में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई। समाजवाद के संसाधन बहुत कम हो गए थे। इस दशक के दौरान, ऐजाज़ के लेखन और भाषण - अक्सर छोटी पत्रिकाओं और पार्टी प्रकाशनों में प्रकाशित होते थे - व्यापक रूप से प्रसारित हुए। दिल्ली में हममें से उन लोगों को नियमित रूप से सुनने का सौभाग्य मिला, न केवल इन सार्वजनिक स्थानों पर, बल्कि नेहरू मेमोरियल संग्रहालय जहाँ वे एक वरिष्ठ फेलो थे और पुस्तकालय में कुट्टी की चाय की दुकान पर - और कई ‘स्टूडेंट्स  फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के कार्यक्रमों में जिसमें उन्होंने एक वक्ता के रूप में भाग लिया था।

वर्ष 1997 में, जब अरुंधति रॉय ने अपना उपन्यास द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स प्रकाशित किया, तो ऐजाज़ ने उसे बड़े ध्यान और उत्साह के साथ पढ़ा। मैं उस समय एन. राम और एजाज के साथ एक बैठक में मौजूद था, जब उन्होंने किताब के बारे में बात की थी, और राम ने एजाज को इसके बारे में फ्रंटलाइन में लिखने के लिए कहा था। उस निबंध में – एजाज़ ने अरुंधति रॉय को राजनीतिक रूप से पढ़ा था – जो साहित्यिक आलोचना का एक अनमोल रत्न था और अजीब बात है कि इन्हे ऐजाज़ के संग्रह या अरुंधति के काम पर किताबों में संकलित नहीं किया गया था। उस निबंध ने फ्रंटलाइन के साथ एक लंबा रिश्ता शुरू किया जो अंत तक चला। ऐजाज़ पाठकों को दुनिया में होने वाली घटनाओं के प्रति उन्मुख करने के लिए लंबे लेख लिखते थे,  विशेष रूप से 9/11 के बाद की घटनाओं के विनाशकारी मोड़, अफगानिस्तान और इराक पर युद्ध, सीरिया और लीबिया में युद्ध की घटनाओं पर लिखते, लेकिन उन्होने लैटिन अमेरिका में एक ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में वामपंथ की तरक्की पर लिखा जिसकी हम सभी प्रशंसा करते थे, वे थे ह्यूगो शावेज। ये निबंध, एक बार फिर व्यापक रूप से प्रसारित हुए, एजाज की पुस्तक, इराक, अफगानिस्तान और हमारे समय के साम्राज्यवाद (लेफ्टवर्ड, 2004) का आधार बन गए थे।

1990 के दशक के मध्य में, यूएसएसआर के पतन के बाद, यह स्पष्ट हो गया था कि मार्क्सवाद विचारों की लड़ाई से पीड़ित है, क्योंकि नव-उदारवाद ने न केवल लोकप्रिय संस्कृति की शब्दावली में प्रवेश कर लिया था (व्यक्तिवाद और जिसके केंद्र में लालच था) बल्कि नव के रूप में -उत्तर-आधुनिकतावाद के माध्यम से उदारवाद ने बौद्धिक जगत में भी प्रवेश किया था। एक गंभीर वामपंथी प्रकाशन परियोजना की कमी ने हम सभी को निराश कर दिया था। इसी अवधि में - 1999 में - दिल्ली में लेफ्टवर्ड बुक की स्थापना की गई थी। ऐजाज़ पब्लिशिंग हाउस के पहले लेखकों में से एक थे - प्रकाश करात द्वारा संपादित पुस्तक में, ए वर्ल्ड टू विन में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पर शानदार निबंध लिख रहे थे। ऐजाज़ लेफ्टवर्ड बुक्स के संपादकीय बोर्ड में थे और उन्होंने पिछले दशकों में अपने काम की दिशा के साथ हमें प्रोत्साहित किया। अपने जीवन के अंत में, सुधन्वा देशपांडे, माला हाशमी और मैंने एजाज के साथ उनके जीवन और उनके काम के बारे में एक लंबा साक्षात्कार करने के लिए कुछ दिन उनके साथ बिताए थे। यह साक्षात्कार अंततः नथिंग ह्यूमन इज एलियन टू मी (लेफ्टवर्ड, 2020) के रूप में प्रकाशित हुआ था। अपने अंतिम दो वर्षों के दौरान, ऐजाज़ ने मार्क्स के राजनीतिक लेखन के बारे में कई परिचय लिखने की योजना बनाई थी। वे कहते थे, कि 'मार्क्स को उनके आर्थिक कार्यों के लिए बहुत संकीर्ण माना जाता है, जो महत्वपूर्ण है', 'लेकिन उनके राजनीतिक लेखन उनकी क्रांतिकारी दृष्टि को समझने की कुंजी हैं'। हमने इनमें से कुछ ग्रंथों के बारे में साक्षात्कार की एक श्रृंखला की (कम्युनिस्ट घोषणापत्र, जर्मन विचारधारा का पहला खंड, द अठारहवीं ब्रूमायर, पेरिस कम्यून पर मार्क्स का लेखन); हम इन ग्रंथों को उनके द्वारा कल्पना किए गए परिचय में बदल देंगे और साथ ही मार्क्स पर उनके लेखन की एक पुस्तक भी एकत्र करेंगे।

2009 में, प्रबीर पुरकायस्थ और अन्य ने हमारे समय के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एक वेब-आधारित समाचार पोर्टल न्यूज़क्लिक की शुरुआत की थी। ऐजाज़ शुरुआती मेहमानों में से एक थे और न्यूज़क्लिक चैनल पर एक नियमित आवाज़ बने रहे। वह पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में युद्धों के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन, दक्षिण अमेरिका और यूरोप में राजनीतिक विकास के बारे में विस्तार से बताते रहे। ये बातचीत उस समय का संग्रह है। वे एजाज़ की बुद्धि, उसकी मुस्कान को भी सामने लाते हैं ताकि किसी को तीखी टिप्पणी के लिए सचेत किया जा सके। उन फ्रंटलाइन कॉलम और न्यूज़क्लिक साक्षात्कारों के बीच, लोगों की एक पीढ़ी ने न केवल इस या उस घटना के बारे में सीखा बल्कि यह भी सीखा कि पूरी दुनिया ने बारे में कैसे सोचना और समझना है और हमारे समय की महान प्रक्रियाओं के संबंध में घटनाओं को कैसे समझना है। इनमें से प्रत्येक हस्तक्षेप एक संगोष्ठी की तरह था, यह जानने के लिए कि क्या हो रहा है, और उसके बारे में जानने के लिए कितना सोचना जरूरी है।

ऐजाज़ ने भारत, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया, साथ ही फिलीपींस से मैक्सिको तक व्याख्यान दिए। अपने जीवन के अंत में, वे ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च में सीनियर फेलो बन गए, जहां उन्होंने मार्क्सवाद की असीमता पर नई पीढ़ी के बुद्धिजीवियों को सलाह दी। वे हमारे विचारों की लंबी चलाने वाली लड़ाई में नए बुद्धिजीवियों के विश्वास का निर्माण करने के मामले में लोकप्रिय शिक्षा पर कुछ समय बिताने के लिए उत्सुक थे।

एजाज़ जैसा शख्स जब हमें छोड़ गया है तो उसकी आवाज आज भी हमारे कानों में गूँजती है। उनकी आवाज़ लंबे समय तक हमारे साथ रहेगी।

Aijaz ahmed
Marxism
aijaz ahmed death
Karl Marx
in theory book aijaz ahmed

Related Stories

पूंजीवाद के दौर में क्यों ज़रूरी है किसान-मज़दूरों का गठबंधन

सावरकर के पैदा होने से बहुत पहले ही 1857 की जंग को लिख दिया गया था- राष्ट्रीय क्रांति


बाकी खबरें

  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 30,615 नए मामले, 514 मरीज़ों की मौत
    16 Feb 2022
    देश में लगातार कम हो रहे कोरोना में मामलो में आज बढ़ोतरी हुई है | देश में 24 घंटो में कोरोना के 30,615 नए मामले सामने आए है, जबकि कल 15 फ़रवरी को कोरोना के 27,409 नए मामले सामने आए थे |
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License