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आंदोलन
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राजनीति
"जनता और देश को बचाने" के संकल्प के साथ मज़दूर-वर्ग का यह लड़ाकू तेवर हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ है
इस ऐतिहासिक हड़ताल से यह भरोसा पैदा होता है कि लड़ाकू मज़दूर, किसानों तथा छात्र-नौजवानों के साथ मिलकर जनता के सच्चे प्रतिपक्ष का निर्माण करेंगे तथा कारपोरेट हिंदुत्व के राष्ट्रीय विनाश के अभियान पर लगाम लगाएंगे और मोदी सरकार के अश्वमेध के उन्मत्त घोड़े को वे निश्चय ही रोकेंगे। 
लाल बहादुर सिंह
28 Mar 2022
all india strike

28-29 मार्च की दो दिवसीय मजदूर-हड़ताल हाल के दिनों का मजदूर वर्ग का सबसे बड़ा protest action है। सीटू (CITU),  एटक (AITUC), ऐक्टू ( AICCTU ), इंटक (INTUC ) समेत 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त फोरम की ओर से सारे मेहनतकशों से देशव्यापी हड़ताल में शामिल होने का आह्वान किया गया है। सेंट्रल ट्रेड यूनियनों के अनुमान के अनुसार 56 करोड़ भारतीय कर्मचारियों-मजदूरों में से कम से कम 20 करोड़ के 28 और 29 मार्च की दो दिवसीय आम हड़ताल में भाग लेने की उम्मीद है।

इस हड़ताल का किसान-आंदोलन के नेतृत्वकारी मंच संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) तथा AISA-RYA समेत देश के तमाम छात्र-युवा संगठनों ने समर्थन किया है। यूनियनों ने "केंद्र सरकार की मजदूर विरोधी, किसान विरोधी, जनविरोधी और राष्ट्र विरोधी नीतियों " के ख़िलाफ़ हड़ताल का ऐलान किया है।

हड़ताल में कोयला, इस्पात,तांबा, तेल, दूरसंचार, डाक, आयकर और बीमा जैसे विभिन्न क्षेत्रों तथा असंगठित क्षेत्र के श्रमिक भाग ले रहे हैं। रेलवे और रक्षा क्षेत्र की यूनियनें देश भर में कई स्थानों पर हड़ताल के समर्थन में जन गोलबंदी कर रही हैं।

हड़ताल में Financial सेक्टर-बैंक और बीमा कर्मी भी भाग ले रहे हैं। बैंक यूनियनें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण की सरकार की योजना के साथ-साथ बैंकिंग क़ानून संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में  हड़ताल में भाग ले रही हैं।

पिछले 16-17 दिसम्बर को दसियों लाख बैंक  कर्मचारियों ने निजीकरण के खिलाफ जबरदस्त हड़ताल करके संसद के शीतकालीन सत्र में बैंक निजीकरण बिल पेश करने के मंसूबे से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था। 

ट्रेड यूनियनों के Joint फोरम के बयान में कहा गया है कि हरियाणा में रोडवेज, ट्रांसपोर्ट और बिजली कर्मी सरकार द्वारा ESMA की धमकी के बावजूद हड़ताल में भाग लेंगे।

यूनियनों के अनुसार केरल पूरी तरह बंद रहेगा, गाड़ियां सड़क पर नहीं चलेगी तथा आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी establishment बंद रहेंगे।

मजदूरों-कर्मचारियों के प्रति एक संवेदनहीन आदेश में प. बंगाल सरकार ने कहा है कि हड़ताल के दिन सरकारी कार्यालय खुले रहेंगे और उस दिन कर्मचारी छुट्टी भी नहीं ले सकेंगे, अनुपस्थित रहने पर उनका वेतन काटा जाएगा। एक अन्य दुर्भाग्यपूर्ण आदेश में केरल उच्च न्यायालय ने भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड (BPCL) की 5 ट्रेड-यूनियनों के हड़ताल में भाग लेने पर रोक लगा दिया है।

ऑल इंडिया सेंट्रल कौंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (AICCTU )के हवाले से स्ट्राइक चार्टर की मांगें हैं :

1- बढ़ती हुई बेरोजगारी, छंटनी, बंदी पर रोक लगाओ, आसमान छूती महंगाई पर लगाम लगाओ।

2- चार श्रम कोड खारिज करो। 12 घण्टे काम का दिन नहीं चलेगा। Essential Defence Service Act वापस वापस लो। श्रम कानूनों, नियमितीकरण तथा समान काम के लिए समान वेतन की गारंटी करो।

3- काम तथा रोजगार के अधिकार की गारण्टी करो। बीमार और बंद उद्योगों तथा संयंत्रों को पुनर्जीवित करो तथा फिर से चालू करो । मनरेगा को सुदृढ़ करो तथा सभी जरूरतमंदों को काम की गारंटी करो। मनरेगा जैसी रोजगार गारंटी योजना शहरी गरीबों के लिए भी लागू करो।

4- 100% FDI और कारपोरेटीकरण समेत निजीकरण पर रोक लगाओ। राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइप लाइन( NMP ) वापस लो। विद्युत (संशोधन) बिल वापस लो।

5- सभी स्कीम/मानदेय कर्मियों के लिए कानूनी न्यूनतम मजदूरी तथा सामाजिक सुरक्षा की गारंटी करो। सभी फ्रंट-लाइन वर्कर्स के लिए बीमा और सुरक्षा की गारंटी करो।

6- मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा में कटौती बंद करो। 26000 न्यूनतम मासिक मजदूरी और 10000 मासिक पेंशन की गारंटी करो। NPS वापस लो और पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल करो।

7- सभी असंगठित मजदूरों, कृषि व ग्रामीण मजदूरों समेत, के लिए 10000 प्रति माह समर्थन तथा मुफ्त राशन की व्यवस्था करो। PDS व खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करो !

8- किसानों के खिलाफ सभी मुकदमे वापस लो। गृहराज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी को बर्खास्त करो। MSP की कानूनी गारण्टी करो।

9- देशद्रोह कानून, UAPA तथा सभी निरंकुश काले कानून निरस्त करो। सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करो! 

मांगों से यह स्पष्ट है कि हड़ताल की धार मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के पूरे पैकेज के खिलाफ केंद्रित है, साथ ही यह देश बचाने और लोकतन्त्र की रक्षा के बड़े राष्ट्रीय सरोकार को सम्बोधित है।

इस हड़ताल ने RSS से जुड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ ( BMS ) को, जो अपने को देश की सबसे बड़ी यूनियन होने का दावा करती है, पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। BMS ने इस ऐतिहासिक हड़ताल से न सिर्फ अपने को अलग रखा है, बल्कि, राष्ट्रव्यापी हड़ताल की भर्त्सना की है।

मजदूरों के हितों को मोदी की कारपोरेट राजनीति की बलिबेदी पर कुर्बान करने वाली BMS आरोप लगा रही है कि यह हड़ताल राजनीति से प्रेरित है और इसका मजदूरों के हित से कोई लेना देना नहीं है। वह पूछती है कि इसका किसान व छात्र संगठन से क्या मतलब, वे क्यों समर्थन कर रहे हैं? BMS के अनुसार इसी से स्पष्ट है कि मजदूरों का इस्तेमाल चंद यूनियनें अपनी पार्टियों के फायदे के लिए कर रही हैं। उसके अनुसार यूनियनों द्वारा अपने पार्टी हित में मजदूरों का यह शोषण निंदनीय है!

जाहिर है उसके तर्क बेतुका और हास्यास्पद हैं। आज जब देश के आम मेहनतकश, मजदूर वर्ग, किसान सब मोदी सरकार की नीतियों की अभूतपूर्व मार झेल रहे हैं, उस समय उनसे यह कहना कि वे एक दूसरे का समर्थन क्यों कर रहे हैं और अकेले अकेले क्यों नहीं लड़ रहे हैं, उन्हें निश्चित पराजय के मुंह में धकेलना है। क्या BMS यही चाहती है, ताकि कारपोरेट और उनकी सरकार देश को लूटते और राज करते रहें? सबसे मजेदार यह है कि उसने सभी यूनियनों से कहा कि वे political affiliations से अलग होकर एक "अराजनीतिक" मजदूर आंदोलन खड़ा करें, जिसका नेतृत्व करने में उसे खुशी होगी! यह बयान संघ-परिवार के दोमुंहेपन का classic नमूना है। 

कौन नहीं जानता कि भाजपा की जनविरोधी फासीवादी राजनीति की कमान अपने को अराजनीतिक सांस्कृतिक संगठन बताने वाले RSS के हाथ में है। जो यूनियन संघ-भाजपा से नाभिनालबद्ध है, उसका अराजनीतिक होने का स्वांग आम मजदूरों की आंख में धूल झोंकने की कोशिश नहीं तो और क्या है? BMS की इस दौर में पूरी भूमिका ही मेहनतकश वर्गों में भाजपा के खिलाफ पैदा हो रहे गुस्से को राजनीतिक दिशा में जाने से रोकना और भाजपा की कारपोरेट-राजनीति के लिए रक्षा कवच का काम करना है।

यूनियनों ने इस बात को नोट किया है कि हाल के विधानसभा चुनावों में जीत से सरकार का मनोबल बढ़ा है और उसने मजदूरों पर हमले तेज कर दिए हैं। उनके EPF पर ब्याज दरें 8.5% से घटाकर 8.1% कर दी गयी हैं और पेट्रोल, LPG, किरोसिन के दाम में लगातार बढोत्तरी की जा रही है। 

जाहिर है किसानों की तरह मजदूर भी इस सच को समझते जा रहे हैं कि अगर सरकार की जनविरोधी नीतियों को रोकना है, तो भाजपा की चुनाव में राजनीतिक अग्रगति को रोकना होगा।

मजदूर-आंदोलन को नई ऊंचाई पर ले जाते हुए ट्रेड यूनियनों के सामने आज सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार सरकार के खिलाफ मजदूरों के गुस्से को राजनीतिक दिशा देना है। इस सिलसिले में पिछले अनेक दशकों का अनुभव अच्छा नहीं रहा है, उम्मीद है अर्थवाद के दलदल से निकलकर मजदूर-आन्दोलन  कारपोरेट-वित्तीय पूँजी तथा हिंदुत्व गठजोड़ के खिलाफ लोकतंत्रिक दिशा की ओर बढ़ेगा और मेहनतकश तबकों को उनकी राजनीति के दायरे से खींचकर बाहर ले आयेगा। इस सिलसिले में किसान और मजदूर आंदोलन के बीच जो एकता कायम हो रही है, वह स्वागत योग्य है। 

दो-दिवसीय हड़ताल के प्रमुख नारे हैं :

"जनगण को बचाओ, देश बचाओ" 

"मजदूर बचाओ, रोजगार बचाओ, अधिकार बचाओ! राष्ट्रीय संसाधन बचाओ, सार्वजनिक क्षेत्र बचाओ!"

"खेती बचाओ, किसान बचाओ!"

"मजदूर-किसान एकता को बुलंद करो! मोदी-राज के विभाजनकारी, साम्प्रदायिक मंसूबों को ध्वस्त करो!"

"मोदी के नेतृत्व में सत्तासीन कम्पनी-राज को शिकस्त दो! भारत को मोदी-शाह के शिकंजे से मुक्त करो ! "

"4 श्रम कोड के खात्मे, रेकॉर्ड बेरोजगारी-आसमान छूती महंगाई, निजीकरण तथा राष्ट्रीय सम्पदा की बिक्री के खिलाफ! "

"संविधान और लोकतन्त्र ओर हमले का प्रतिरोध करो! "

मजदूरों ने जो नारे दिए हैं उनसे यह साफ है कि आज हमारे राष्ट्र, लोकतन्त्र तथा मेहनतकश जनसमुदाय के सामने जो अभूतपूर्व चुनौती आ खड़ी हुई है, उसके प्रति वे पूरी तरह सजग हैं और देश की सबसे संगठित और अगुआ ताकत के बतौर वे राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में अपनी भूमिका निभाने के प्रति गम्भीर हैं।

इस ऐतिहासिक हड़ताल से यह भरोसा पैदा होता है कि लड़ाकू मजदूर, किसानों तथा छात्र-नौजवानों के साथ मिलकर जनता के सच्चे प्रतिपक्ष का निर्माण करेंगे तथा कारपोरेट हिंदुत्व के राष्ट्रीय विनाश के अभियान पर लगाम लगाएंगे और मोदी सरकार के अश्वमेध के उन्मत्त घोड़े को वे निश्चय ही रोकेंगे। 

क्या राजनीतिक विपक्ष जनता के उभरते जनांदोलनों के साथ मजबूती से खड़ा होगा और जनविरोधी मोदी सरकार के विरुद्ध राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के नए विकल्प की ओर बढ़ेगा ?

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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