NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
नज़रिया
भारत
राजनीति
आंबेडकर का धर्म परिवर्तनः मुक्ति का आख़िरी प्रयास
आज सवाल यह है कि डॉ. आंबेडकर ने दलित समाज को अन्याय और अत्याचार से मुक्ति के लिए जो आख़िरी रास्ता दिखाया था वह क्या सार्थक हो सका है?
अरुण कुमार त्रिपाठी
14 Oct 2020
ambedkar

14 अक्टूबर 1956 को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने नागपुर की दीक्षा भूमि में हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। इसके बाद वे ज्यादा दिन नहीं जिए। उसी साल 6 दिसंबर को उन्होंने महाप्रयाण किया। आज का दिन नागपुर की दीक्षा भूमि में उत्सव की तरह मनाया जाता रहा है। बाहर भीतर एक प्रकार का मेला लगा रहता है। जिसमें बाबा साहेब के विचार दर्शन की किताबों से लेकर बच्चों और स्त्रियों के उपयोग के खिलौने, कपड़े और श्रृंगार के सामान बिकते रहते हैं। वहां लोग देश के कोने कोने से पहुंचते हैं। पूरे महाराष्ट्र में कार्यक्रमों की धूम रहती है और गांव गांव में बने बौद्ध मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है जहां भगवान बुद्ध के साथ आंबेडकर की मूर्ति भी रखी होती है।(हालांकि इस बार कोरोना काल में यह सब संभव नहीं हो पाया है और बाबा साहेब आंबेडकर स्मारक समिति ने लोगों से घरों में रहकर ही बौद्ध वंदना करने की अपील की है।)

आंबेडकर के जीवन और कर्म को देखते हुए लगता है कि अपने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करना उनका मुक्ति का आखिरी प्रयास था जो उन्होंने जाति व्यवस्था और अन्याय से पीड़ित समाज को सिखाना चाहा था। इससे पहले उनकी ओर से किए गए दो बड़े प्रयासों में पूना समझौता और संविधान निर्माण शामिल है। वे अपने जीवन में उन दोनों प्रयासों का प्रभाव देख चुके थे इसलिए उन्होंने तीसरे प्रयास को भी आजमाया। कहा जा सकता है कि यह उनका तीसरा महायज्ञ था जो उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध किया। चुनावों में अपनी विफलता को देखते हुए आंबेडकर की अध्यक्षता में अनुसूचित जाति फेडरेशन की वर्किंग कमेटी ने 27 अगस्त 1955 को यह प्रस्ताव पास कर दिया था कि पूना समझौते के तहत अनुसूचित जाति के लिए केंद्रीय और प्रांतीय धारा सभाओं में किया गया आरक्षण रद्द कर दिया जाए।

उससे पहले अनुसूचित जातियों पर होने वाले अत्याचारों से दुखी आंबेडकर ने एक बार कहा था कि अगर यह संविधान न्याय नहीं दिला सका तो मैं स्वयं उसे अपने हाथों से जलाऊंगा। इसलिए उन्होंने समाज के दलित वर्ग की मुक्ति के लिए अपना तीसरा हथियार धर्म परिवर्तन के रूप में चलाया। हालांकि वे 1935 में अहमदनगर जिले के  येवोला सम्मेलन में यह घोषणा कर चुके थे कि वे हिंदू होकर पैदा हुए हैं लेकिन हिंदू के रूप में मरेंगे नहीं। इस दौरान उन्हें मनाने की बहुत कोशिशें हुईं। सभी धर्म के गुरुओं ने उन्हें अपने अपने धर्म में खींचने की कोशिशें कीं। इस बीच घनश्याम दास बिड़ला के प्रयास से वे 1936 में गांधी जी से मिलने वर्धा के सेवाग्राम आश्रम भी आए। कहा जाता है कि उन्होंने गांधी जी को यह आश्वासन भी दिया कि वे हिंदू धर्म का कम से कम नुकसान करेंगे।

मई 1956 में ही उन्होंने अपनी आखिरी प्रसिद्ध पुस्तकों में से एक `बुद्ध एंड हिज धम्मा’ के प्रकाशन का प्रयास तेज कर दिया जिसका प्रकाशन सितंबर तक हो सका। इसमें उन्होंने बुद्ध के विशाल साहित्य में से चुन चुन कर उन बातों को रखा जो तर्क संगत हों और लोक कल्याणकारी हों। क्योंकि उनका मानना है कि बौद्ध साहित्य में बहुत सारी बातें ऐसी हैं जो कि बुद्ध ने कही नहीं हैं लेकिन उसे लिपिबद्ध करने वालों ने अपने मन से जोड़ दिया है। इस  ग्रंथ में उन्होंने कहा है कि बौद्ध धर्म हिंदू धर्म का अंग नहीं है बल्कि उससे अलग है। हिंदू धर्म ईश्वर में विश्वास करता है जबकि बौद्ध धर्म में कोई ईश्वर नहीं है। हिंदू धर्म आत्मा में विश्वास करता है जबकि बौद्ध धर्म में आत्मा की धारणा नहीं है। हिंदू धर्म चातुर्वर्ण और जाति व्यवस्था में विश्वास करता है जबकि बौद्ध धर्म में इन दोनों के लिए कोई स्थान नहीं है। इस ग्रंथ को उन्होंने 1951 में लिखना शुरू किया था जो 1956 के आरंभ में पूरा हुआ।

इसी के साथ उन्होंने जिन दो अन्य ग्रंथों को लेखन शुरू किया था वे हैं—रिवोल्यूशन एंड काउंटर रिवोल्यूशन इन इंडिया और बुद्ध एंड कार्ल मार्क्स। 1956 के मार्च तक वे दोनों पूरे नहीं हो सके थे। उन्होंने 1954 में रिडल्स इन हिंदुइज्म भी लिखना शुरू किया। यह सब ऐसे ग्रंथ हैं जिनका प्रकाशन उनके जीवन में नहीं हो सका। उनके लिए यह जरूर संतोष की बात थी कि `बुद्ध और उनका धम्म’ उनके सामने प्रकाशित हुआ जिसका प्रूफ उन्होंने स्वयं तेजी से पढ़ा था। इस ग्रंथ के लिए सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट बांबे ने 3000 रुपये का अनुदान दिया था।

बुद्ध और उनका धम्म को हिंदी में भी आना था और उसके लिए बाबा साहेब बहुत उत्सुक थे। उसका अनुवाद स्वयं बौद्ध धर्म और राष्ट्रभाषा हिंदी के विद्वान भदन्त आनंद कौशल्यायन ने किया है। वे चाहते थे कि गुटका के आकार की यह पुस्तक बाबा साहेब के जीवन में ही छप जाए ताकि सामान्य व्यक्ति इसका लाभ उठा सके लेकिन ऐसा हो न सका। अनुवादक ने उस ग्रंथ में अपना नम्र निवेदन करते हुए लिखा है, `` बौद्ध धर्म और बौद्ध समाज के पक्ष में जितना महान कार्य नागपुर की वह दीक्षा थी, उतना ही या उससे अधिक महत्वपूर्ण कार्य डॉ. भीमराव आंबेडकर की पुण्य लेखनी ने इस ग्रंथ की रचना करके किया है।’’ बिना किसी पाद टिप्पणी के लिखा गया डॉ. आंबेडकर का यह ग्रंथ बहुत कुछ मौलिकता लिए हुए है। वह न तो किसी प्रकार के चमत्कार में विश्वास करता हुआ दिखता है और न ही अतार्किक बातों का समर्थन। इसीलिए स्वयं भदन्त आनंद कौशल्यायन लिखते हैं, `` कहीं कहीं उन्होंने विषय को स्पष्ट करने के लिए कोई बात जोड़ दी है, किंतु कहीं एक भी जगह ऐसी बात नहीं है जहां धम्म का अपघात हुआ हो।...वे सभी कथन मान्य हों या न हों, किंतु एक भी ऐसा नहीं जो गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य न हो।’’

यानी यह एक प्रकार से मौलिक रचना है। जिसे कौशल्यायन ने तुलसीदास के रामचरितमानस के समकक्ष माना है। वे पाद टिप्पणियों के अभाव को कोई कमी नहीं मानते बल्कि कहते हैं कि आंबेडकर का लेखन ही इतना बड़ा प्रमाण है कि किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती। `` यदि तुलसीदास का रामचरितमानस बिना किसी एक भी प्रमाण या पादटिप्पणी के उत्तर भारत के घर घर में बांचा जा सकता है तो डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित इस भगवान बुद्ध और उनका धम्म को कौन भारतीय बौद्धों का एक सम्मानित ग्रंथ होने से रोक सकता है। स्वयं डॉ. आंबेडकर ने इस ग्रंथ में उन घटनाओं के प्रमाणिक होने पर सवाल उठाए हैं जिनके नाते बुद्ध प्रवज्या की ओर गए थे। वे कहते हैं कि यह बात गले से नीचे नहीं उतरती कि सिद्धार्थ ने प्रवज्या तब ग्रहण की जब उन्होंने एक बृद्ध पुरुष, एक रोगी व्यक्ति और एक मुर्दे की लाश को देखा। इसका मतलब उन्होंने 29 साल की उम्र तक ऐसा कुछ देखा ही नहीं था। दरअसल बुद्ध युद्ध और शस्त्रों के पीड़ित जनता के दुखों से आहत थे। उनके इस दुख में उनके राजवंश के झगड़ों ने बड़ा योगदान दिया और वे इस दुख का निवारण ढूंढने निकल पड़े। धर्मानंद कौशाम्बी ने भी इसी तरह का निष्कर्ष निकाला है।

आंबेडकर ने बुद्ध के दर्शन को मार्क्स के दर्शन से श्रेष्ठ बताते हुए बुद्ध और कार्ल मार्क्स जैसा ग्रंथ लिखा जिसमें उन्होंने बताया है कि बुद्ध के विचारों पर आधारित शासन पद्धति में तो बिना दबाव के निजी संपत्ति से मुक्ति की अवधारणा है।

लेकिन आज सवाल यह है कि डॉ. आंबेडकर ने दलित समाज को अन्याय और अत्याचार से मुक्ति के लिए जो आखिरी रास्ता दिखाया था वह क्या सार्थक हो सका है? निश्चित तौर पर नव बौद्धों का पढ़ा लिखा समाज हिंदू धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था और जाति व्यवस्था से मुक्त महसूस करता है। लेकिन यह बात लंबे समय से महसूस की जा रही है कि हिंदुत्व की रक्षा का दावा करने वाले संगठन डॉ. आंबेडकर का हिंदूकरण तेजी से कर रहे हैं। वे आंबेडकर के `रिडल्स इन हिंदुइज्म’ को भूल कर `पाकिस्तान आर पार्टीशन आफ इंडिया’ में मुस्लिम शासको के अत्याचारों को अपने समर्थन की बात मानते हैं। उससे अलावा ग्रामीण समाज में दलितों पर सवर्णों के अत्याचार की घटनाएं कम नहीं हुई हैं। हाथरस की घटना की आग शांत नहीं हुई कि एक दिन पहले गोंडा जिले में तीन दलित लड़कियों पर तेजाब डाल दिया गया।

पूना समझौते के विरुद्ध कांशीराम तो 1982 में पूना से दिल्ली तक यात्रा निकालकर उसे रद्द करने की मांग कर चुके थे। उन्होंने कहा भी था अगर हम दिल्ली की सत्ता में आए तो आरक्षण लेंगे नहीं सवर्णों को आरक्षण देंगे। आज उससे भी बड़ी चुनौती है संविधान के मूल्यों को बचाने की। संविधान में एक व्यक्ति और एक वोट के सिद्धांत पर सभी को बराबर माना गया है। वहां सामाजिक क्रांति की अवधारणा है जो तमाम तरह की असमानताओं को मिटाने का संकल्प लेती है। लेकिन आज स्थिति विचित्र है। सवर्ण मध्य वर्ग दलित महिला पर हुए अत्याचार के बरअक्स एक पुजारी की हत्या को खड़ा कर देता है। एक ओर वह एक गरीब स्त्री की हत्या को बदचलनी बताते हुए उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता रहा है तो दूसरी ओर पुजारी की हत्या को उसके सामने खड़ा करके मनुवाद को पुनर्जीवित कर रहा है।

डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म के उच्च सिद्धांतों के माध्यम से भारतीय समाज में प्रज्ञा, करुणा और समता के जिन महान मूल्यों की स्थापना चाहते थे वह प्रयास आज पराजित होता दिख रहा है। भारतीय समाज जितनी तेजी से विवेकहीनता, नफरत और असमानता की ओर जा रहा है वह उनके संविधान और बौद्ध दर्शन के लिए चिंताजनक है। दलित चिंतक डॉ. धर्मवीर तो बौद्ध धर्म को स्वीकार करने को कारगर उपाय नहीं मानते थे। उनका कहना था कि यह धर्म भी अन्य धर्मों की तरह ही सवर्णों का ही दिया हुआ धर्म है। इसलिए दलितों को अगर वास्तविक मुक्ति चाहिए तो उन्हें वह धर्म अपनाना चाहिए जो कबीर जैसे दलित का था। उसे वे आजीवक धर्म बताते हैं जिसे मक्खली घोषाल भी मानते थे।

कई आंबेडकरवादी कहते हैं कि दलित समाज ने न तो आंबेडकर को ठीक से पढ़ा न उनके रास्ते पर चले। अगर वे चलेंगे तो कोई कारण नहीं कि उनकी मुक्ति नहीं होगी और अत्याचार मिटेंगे नहीं। धम्म चक्र प्रवर्तन के दो माह के भीतर प्रयाण कर जाने वाले डॉ. आंबेडकर फिर जन्म लेंगे ऐसा तो बौद्ध धर्म नहीं कहता। लेकिन उनके विचारों की रोशनी अंधेरे में रास्ता दिखाती रहेगी और नई व्याख्याओं और प्रयोगों से उसक पुनर्जन्म जरूर होगा।  

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

Bhim rao Ambedkar
Dr. Ambedkar
Hindu
baudh dharm
caste oppression
Scheduled Caste

Related Stories

बीएचयू: अंबेडकर जयंती मनाने वाले छात्रों पर लगातार हमले, लेकिन पुलिस और कुलपति ख़ामोश!

जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार

सीवर और सेप्टिक टैंक मौत के कुएं क्यों हुए?

यूपी चुनाव: पूर्वी क्षेत्र में विकल्पों की तलाश में दलित

उत्तर प्रदेश चुनाव : हौसला बढ़ाते नए संकेत!

यूपी: ‘प्रेम-प्रसंग’ के चलते यूपी के बस्ती में किशोर-उम्र के दलित जोड़े का मुंडन कर दिया गया, 15 गिरफ्तार 

बिजनौर: क्या राष्ट्रीय स्तर की होनहार खिलाड़ी को चुकानी पड़ी दलित-महिला होने की क़ीमत?

सवर्ण आयोग: शोषणकारी व्यवस्था को ठोस रूप से संस्थागत बनाने का नया शिगूफ़ा

बिहार: मुखिया के सामने कुर्सी पर बैठने की सज़ा, पूरे दलित परिवार पर हमला

अनुसूचित जातियों की गरिमा और आत्म सम्मान पर कब बात होगी?


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License