NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अपने रंगभेदी इतिहास से मुठभेड़ करता अमेरिका
लगभग 12 वर्ष पूर्व जब बराक ओबामा पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तो दुनिया भर में यह माना गया था कि यह मुल्क अपने इतिहास की खाई (नस्लभेद और रंगभेद) को पाट चुका है। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ओबामा के कार्यकाल में ही वहां नस्लवादी और रंगभेदी नफ़रत ने बार-बार फन उठाया और वह सिलसिला आज भी जारी है।
अनिल जैन
01 Jun 2020
protest
फोटो साभार : TIME

अमेरिका की एक बार फिर अपने इतिहास से मुठभेड़ हो रही है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और मानवाधिकारों के सबसे बडे प्रवक्ता माने जाने वाले इस देश में काला समुदाय अपने नागरिक अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आया है। एक गोरे पुलिस अधिकारी के हाथों एक काले नागरिक की हत्या के विरोध में लोग बेहद आक्रोशित हैं।

लोगों की नाराजगी एक वीडियो क्लिप के वायरल होने के बाद सामने आई है, जिसमें एक गोरा पुलिस अधिकारी जॉर्ज फ्लॉयड नाम के अफ्रीकी मूल के एक निहत्थे काले व्यक्ति की गर्दन को अपने घुटने से दबाता दिखता है। इसके कुछ ही मिनटों बाद 46 साल के जॉर्ज फ्लॉयड की मौत हो गई। वीडियो में देखा जा सकता है कि जॉर्ज और उनके आसपास खड़े लोग पुलिस अधिकारी से उसे छोड़ने की मिन्नतें कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी के घुटने के नीचे दबा जॉर्ज बार-बार कह रहा है कि ''प्लीज़, आई कान्ट ब्रीड (मैं सांस नहीं ले पा रहा)।’’ यही उसके आख़िरी शब्द बन गए।

यह घटना मिनेसोटा प्रांत के मिनेपॉलिस शहर की है। इस वीडियो के सामने आने के बाद लोगों में नाराजगी है। मिनेसोटा प्रांत समेत अमेरिका के कई इलाकों में लोग घटना के विरोध में उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। नेशनल एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल ने एक बयान जारी कर कहा है, ''यह घटना हमारे समाज में काले लोगों के खिलाफ एक खतरनाक मिसाल पेश करती है, जो नस्लीय भेदभाव, जेनोफोबियों और पूर्वाग्रह से प्रेरित है।’’

बयान में कहा गया है, ''हम अब और मरना नहीं चाहते।’’

मिनेपॉलिस शहर का यह वाकया कोई नया नहीं है। इसी साल 23 फरवरी को कथित तौर पर कुछ हथियारबंद गोरों ने 25 साल के अहमद आर्बेरी का पीछा कर उसे गोली मार दी थी। इसी तरह 13 मार्च को ब्रेओना टेलर की उस वक्त हत्या कर दी गई थी, जब कथित तौर पर एक गोरे पुलिस अधिकारी ने उनके घर पर छापा मारा था।

लगभग 12 वर्ष पूर्व जब बराक ओबामा पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तो दुनिया भर में यह माना गया था कि यह मुल्क अपने इतिहास की खाई (नस्लभेद और रंगभेद) को पाट चुका है। ओबामा के रूप में एक काले व्यक्ति का दुनिया के इस सबसे ताकतवर मुल्क का राष्ट्रपति बनना ऐसी युगांतरकारी घटना थी जिसका सपना मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में देखा था और जिसको हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने जीवनभर अहिंसक संघर्ष किया था। ओबामा का राष्ट्रपति बनना एक तरह से मार्टिन लूथर किंग के अहिंसक संघर्ष की ही तार्किक परिणति थी। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ओबामा के कार्यकाल में ही वहां नस्लवादी और रंगभेदी नफ़रत ने बार-बार फन उठाया और वह सिलसिला आज भी जारी है।

वहां कभी किसी गुरुद्वारे पर हमला कर दिया जाता है तो कभी किसी सिख अथवा दक्षिण-पश्चिमी एशियाई मूल के किसी दाढ़ीधारी मुसलमान को आतंकवादी मानकर उस पर हमला कर दिया जाता है। कभी कोई गोरा पादरी किसी नीग्रो या किसी और मूल के काले जोड़े की शादी कराने से इनकार कर देता है तो कभी किसी भारतीय राजनेता, राजनयिक और कलाकार से सुरक्षा जांच के नाम बदसुलूकी जाती है तो कभी किसी भारतीय अथवा एशियाई मूल के व्यक्ति को रेलगाड़ी के आगे धक्का देकर मार दिया जाता है। हाल के वर्षों में वहां इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं।

नस्लीय नफ़रत से उपजी इन घटनाओं के अलावा भी अमेरिकी और गैर अमेरिकी मूल के अश्वेत, खासकर एशियाई मूल के हर सांवले या गेहुंए रंग के व्यक्तियों को हिकारत और शक की निगाह से देखने की प्रवृत्ति वहां हाल के वर्षों में तेजी से ब़ढ़ी है। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान जो कुछ बोलता है, उससे वहां के समाज को लेकर एक अलग छवि उभरती है, लेकिन उस जन्नत की हक़ीक़त का पता अन्य घटनाओं के अलावा नीना दावुलुरी के मामले से भी चला। साल 2014 में भारतीय मूल की नीना दावुलुरी के 'मिस अमेरिका' चुने जाने पर वहां सोशल वेबसाइट्‌स पर नीना को लेकर नस्लवादी टिप्पणियां की गई थीं, उनका मज़ाक उड़ाया गया था। कई अमेरिकी गौरांग महाप्रभुओं ने उन्हें अरबी समझते हुए उनका संबंध अल कायदा से जोड़ने की फूहड़ कोशिश भी की थी।

दुनिया को बड़ी शान से एक ग्लोबल विलेज़ बताने वालों से पूछा जाना चाहिए कि इतनी अजनबीयत और नफ़रत से भरा यह कैसा विश्व गांव है? पूंजीवाद के आराधकों और गुण-गायकों का दावा रहा है कि पूंजी राष्ट्रों की दीवारों को गिराने के साथ ही लोगों के जेहन में बनी धर्म, जाति, नस्ल और संप्रदाय और रंगभेद की गांठों को भी खत्म कर देगी। लेकिन यह दावा बार-बार लगातार बोगस साबित होता जा रहा है।

अगर अमेरिका की युवा पीढ़ी भारतीय और अरबी में फर्क नहीं कर सकती और हर एशियाई को, दाढ़ी-पगड़ी वाले को और सांवले-गेहुंआ रंग के व्यक्ति को आतंकवादी मानती है तो इससे बड़ा उसका मानसिक दिवालियापन और क्या हो सकता है! वैसे इस स्थिति के लिए वहां का राजनीतिक तबका भी कम जिम्मेदार नहीं है जो अपने देश के बाहर तो अपने को खूब उदार बताता है और दूसरों को भी उदार बनने का उपदेश देता है लेकिन अपने देश के भीतर व्यवहार के स्तर पर वह कठमुल्लेपन को पालने-पोषने का ही काम करता है।

दरअसल, पश्चिमी देशों में अमेरिका एक ऐसा देश है, जहां विभिन्न नस्लों, राष्ट्रीयताओं और  संस्कृतियों के लोग सबसे ज्यादा हैं। इसकी वजह यह है कि अमेरिका परंपरागत रूप से पश्चिमी सभ्यता का देश नहीं है। उसे यूरोप से गए हमलावरों या आप्रवासियों ने बसाया। अमेरिका के आदिवासी रेड इंडियनों को इन आप्रवासियों ने तबाह कर दिया, लेकिन वे अपने साथ अफ्रीकी गुलामों को भी ले आए। उसके बाद आसपास के देशों से लातिन अमेरिकी लोग वहां आने लगे और धीरे-धीरे सारे ही देशों के लोगों के लिए अमेरिका संभावनाओं और अवसरों का देश बन गया। अमेरिका में लातिनी लोगों के अलावा चीनी मूल के लोगों की भी बड़ी आबादी है। भारतीय मूल के लोग भी वहां बहुत हैं। जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका की 72 प्रतिशत आबादी गोरे यूरोपीय मूल के लोगों की है, जबकि 15 प्रतिशत लातिनी और 13 प्रतिशत अफ्रीकी मूल के काले नागरिक हैं। भारतीय मूल के आप्रवासी कुल आबादी का एक प्रतिशत (लगभग 32 लाख) हैं, जो वहां प्रशासनिक कामकाज और आर्थिक गतिविधियों में अपनी अहम भूमिका निभाते हुए अमेरिका की मुख्य धारा का हिस्सा बने हुए हैं।

इस तरह अनेक जातीयताओं और नस्लों के लोगों के होते हुए भी बहुसंख्यक अमेरिकियों के लिए अमेरिका अब भी गोरे लोगों का मुल्क है और अन्य लोग बाहरी हैं। अमेरिका के कई हिस्से हैं, जहां अन्य नस्लों या जातीयताओं के लोग बहुत कम हैं और वे सिर्फ गोरे अमेरिकियों को ही पहचानते हैं। उनका बाकी दुनिया के बारे में ज्ञान भी बहुत कम है, उनके लिए उनके देश की एक खास छवि के अलावा बाकी दुनिया मायने नहीं रखती। अमेरिका एक समृद्ध देश है और दुनिया की एकमात्र महाशक्ति भी, इसलिए वहां के लोगों को बाकी दुनिया के बारे में जानने की फिक्र नहीं है। आतंकवाद क्या होता है, यह भी अमेरिकी जनता को कुछ वर्षों पहले ही मालूम हुआ है।

वैसे तो अमेरिका में नस्लवादी नफ़रत और हिंसा की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन इस सदी की शुरुआत में न्यूयॉर्क के वर्ल्ड  सेंटर की जुड़वा इमारतों पर हुए हैरतअंगेज आतंकवादी हमले के बाद ऐसी घटनाओं का सिलसिला कुछ तेज़ हो गया है। 9/11 के हमले के बाद अमेरिका में दूसरे देशों खासकर एशियाई मूल के लोगों को और उनमें भी दाढ़ी रखने और पगड़ी पहनने वालों को या अपने नाम के साथ अली या खान लगाने वालों को संदेह और हिकारत की नज़र से देखने की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। अमेरिका में नस्लभेदी बदसुलूकी के शिकार सिर्फ भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के लोग या स्थानीय और प्रवासी मुसलमान ही नहीं होते बल्कि अमेरिका के काले मूल निवासियों के साथ भी वहां के गोरे भेदभाव और बदसुलूकी करते हैं। मई 2012 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के विशेष जांचकर्ता जेम्स अनाया ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिका के मूल निवासियों के खिलाफ 'व्यवस्थित' ढंग से भेदभाव किए जाने का आरोप लगाया था।

बहुत हैरानी होती है इस विरोधाभास को देखकर कि एक तरफ तो अमेरिकी नागरिक समाज इतना जागरूक, उदार और न्यायप्रिय है कि एक काले नागरिक को दो-दो बार अपना राष्ट्रपति चुनता है, वहीं दूसरी ओर उसके भीतर नस्ली दुराग्रह की हिंसक मानसिकता आज भी जड़ें जमाए बैठी हैं। अमेरिका अपने को लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और धार्मिक आजादी का सबसे बड़ा हिमायती मानता है। दुनिया के दूसरे मुल्कों को भी इस बारे में सीख देता रहता है। लेकिन उसके यहां जारी चमड़ी के रंग और नस्ल पर आधारित नफ़रत और हिंसा की घटनाएं उससे अपने गिरेबां में झांकने की मांग करती हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

America
Land accusation
History of Racism
Racism and apartheid
racism in america
Barack Obama
democracy
Human right

Related Stories

झंझावातों के बीच भारतीय गणतंत्र की यात्रा: एक विहंगम दृष्टि

आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष में हमारा गणतंत्र एक चौराहे पर खड़ा है

हम भारत के लोग: झूठी आज़ादी का गणतंत्र!

महज़ मतदाता रह गए हैं हम भारत के लोग

क्यों वरवरा राव को ज़मानत भारतीय लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है?

कोरोना वायरस ने आधुनिक समाज के भेदभाव से भरे चरित्र को उजागर कर दिया

‘सहिष्णु देश’ में स्टैंडअप कॉमेडी की भी जगह नहीं!

#metoo : जिन पर इल्ज़ाम लगे वो मर्द अब क्या कर रहे हैं?

अमेरिकी संसद ने ट्रम्प की ‘नस्लीय टिप्पणी’ के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव पारित किया

#metoo: मैक्डॉनाल्ड्स में यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं महिलाएँ


बाकी खबरें

  • दो साल के संघर्ष के बाद पेरिस के आईबिस होटल के चैंबरमेड्स ने वेतन वृद्धि की लड़ाई जीती
    पीपल्स डिस्पैच
    दो साल के संघर्ष के बाद पेरिस के आईबिस होटल के चैंबरमेड्स ने वेतन वृद्धि की लड़ाई जीती
    27 May 2021
    22 महीने के अथक संघर्ष के बाद पेरिस के आईबिस बैटिग्नोल्स होटल के लगभग 20 चैंबरमेड्स ने बेहतर वेतन और काम करने की स्थिति हासिल कर ली।
  • सरकार जिस बीपीसीएल को निजी हाथों में बेच रही है, उसने 12,581 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड मुनाफ़ा कमाया
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सरकार जिस बीपीसीएल को निजी हाथों में बेच रही है, उसने 12,581 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड मुनाफ़ा कमाया
    27 May 2021
    सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की जिस कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपारेशन लि. (बीपीसीएल) को निजी हाथो में बेचने जा रही है, उसने उसे जबरदस्त मुनाफ़ा कमाकर दिया है। बीपीसीएल का मुनाफ़ा सात गुना बढ़कर 19,041.67…
  • तमिलनाडु: पीएसबीबी स्कूल के छात्रों  ने साझा किए यौन उत्पीड़न के भयानक वृत्तांत, दक्षिणपंथी संगठनों ने किया स्कूल का ‘समर्थन’
    नीलाम्बरन ए
    तमिलनाडु: पीएसबीबी स्कूल के छात्रों  ने साझा किए यौन उत्पीड़न के भयानक वृत्तांत, दक्षिणपंथी संगठनों ने किया स्कूल का ‘समर्थन’
    27 May 2021
    स्कूल प्रबंधन परस्पर विरोधी वक्तव्य दे रहा है। पहले उसने ऐसे किसी मामले से इनकार किया, लेकिन विवाद के तूल पकड़ने पर कहा कि इस बारे में उसे कोई लिखित शिकायत नहीं मिली है। 
  • सीताराम येचुरी
    भाषा
    माकपा ने केंद्र से कोविड-19 के कारण अनाथ हुए बच्चों को नवोदय विद्यालय में दाखिला देने की अपील की
    27 May 2021
    ‘‘भारत सरकार को ऐसे बच्चों की देखभाल करनी चाहिए और इन्हें सरकार के बोर्डिंग स्कूल नवोदय विद्यालयों में दाखिला देना चाहिए। साथ ही इन्हें रोजगार मिलने और सामान्य जीवन व्यतीत करने में समर्थ होने तक यहीं…
  • रामदेव
    भाषा
    रामदेव पर राजद्रोह का मामला दर्ज होना चाहिए :आईएमए ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा
    27 May 2021
    ‘‘हम आपसे अपील करते हैं कि अपने कंपनी के उत्पादों के निहित स्वार्थ के चलते टीकाकरण पर डर का संदेश फैलाने वाले तथा भारत सरकार के उपचार प्रोटोकॉलों को चुनौती देने वाले लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई करें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License