NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
फिल्में
भारत
राजनीति
फ़िल्म: एक भारतीयता की पहचान वाले तथाकथित पैमानों पर ज़रूरी सवाल उठाती 'अनेक' 
डायरेक्टर अनुभव सिन्हा और एक्टर आयुष्मान खुराना की लेटेस्ट फिल्म अनेक आज की राजनीति पर सवाल करने के साथ ही नॉर्थ ईस्ट क्षेत्र के राजनीतिक संघर्ष और भारतीय होने के बावजूद ‘’भारतीय नहीं होने’’ के संकट जैसे मुद्दों पर भी बात करती है।
सोनिया यादव
29 May 2022
anek

"आखिर क्या तय करता है कि एक आदमी 'भारतीय' है?”

एक्टर आयुष्मान खुराना की लेटेस्ट फिल्म 'अनेक' का ये डायलॉग देश में चल रहे कई विरोधाभासों के बीच एक जरूरी सवाल उठाता है। आज जब देश में अपने ही लोगों को परायों की भावना से देखा जा रहा है, नेशनल-एंटीनेशनल की बहस तेज़ है और राजद्रोह कानून की फिर से समीक्षा हो रही है तो ऐसे में ये सवाल और जरूरी हो जाता है, 'भारतीयता' की पहचान वाले तथाकथित पैमानों को, सवालों के एक घेरे में ला खड़ा करता है। ‘अनेक’ नॉर्थ ईस्ट क्षेत्र के राजनीतिक संघर्ष और भारतीय होने के बावजूद ‘’भारतीय नहीं होने’’ के संकट जैसे मुद्दों पर बात करती है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि विविधता में एकता प्राप्त करने की हमारी क्षमता ही हमारी सभ्यता की सुंदरता और परीक्षा होगी। ये सूत्र पूर्वोत्तर राज्यों की सुंदरता और चुनौतियों को बखूबी आत्मसात् करता है। फिल्म की कहानी उत्तर-पूर्वी राज्यों के संघर्ष और तनाव की कहानी को पर्दे पर उतारने के साथ ही इन राज्यों की वास्तविक तस्वीर भी हमारे सामने रखती है, जो बाकी भारत के लिए तस्वीरों में तो खूबसूरत है लेकिन खबरों में डरावनी ही लगती है। यहां न तो विकास है, न ही शांति। न यहां के लोगों को अपने ही देश ‘इंडिया’ में सम्मान मिलता है और न ही ये लोग खुद को ‘इंडियन’ मानने में सहज महसूस करते हैं।

नॉर्थ-ईस्ट का राजनीतिक संघर्ष और दूसरे राज्यों में सौतेले बर्ताव

डायरेक्टर अनुभव सिन्हा अलग तरह की सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाने के लिए जाने जाते है। इस बार भी उन्होंने 'नॉर्थ ईस्ट' के एक हिस्से पर फोकस न करके वहां के अलग-अलग राज्यों में चल रहे अलगाववादी आंदोलनों को एक छतरी के नीचे समेटने की कोशिश की है। देश के बाकी हिस्सों में इन राज्यों से आए लोगों की पहचान की लड़ाई, बोली और वेशभूषा हमेशा से राजनीतिक डिस्कोर्स का बड़ा मुद्दा रही है। नॉर्थ-ईस्ट के राजनीतिक संघर्ष के साथ ही फिल्म उन तमाम कमेंट पर भी रोशनी डालती है जो वहां के लोग दिल्ली जैसे कथित ‘मेन लैंड इंडिया’ में अक्सर सुनते हैं- जैसे ‘चिंकी’, नेपालन, पार्लर वाली.... उत्तर-पूर्व के सात राज्यों की बातें हिन्दी फिल्मों में कम हुई हैं। फिल्म में वहां के लोगों के साथ भारत के दूसरे हिस्सों में होने वाले सौतेले बर्ताव से लेकर उनके साथ उनके अपने ही राज्यों में हो रहे दुर्व्यवहार तक पर बात की गई है।

फिल्म प्रमोशन के दौरान आयुष्मान खुराना ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि अनेक जैसी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस आंकड़े ज्यादा मायने नहीं रखते, मायने रखता है इस बात का लोगों तक पहुंचना। ये फिल्म नॉर्थ-ईस्ट भारत में रहने वाले लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव और राजधानी दिल्ली की उससे वैचारिक दूरी पर खुलकर बात करती है। हम अक्सर अनेकता में एकता के नारे तो खूब लगाते हैं लेकिन आज भी कॉलेज हो या फिर कोई बाज़ार, अक्सर लोगों की नज़र ऐसे चेहरों पर जाकर टिक सी जाती है जो कुछ अलग से नज़र आते हैं, बस यहीं पर कई तरह की नस्लभेदी टिप्पणियां सुनाई देती है। कई ऐसे शब्द हैं जिन्हें राजधानी दिल्ली में उन लोगों के लिए अक्सर संबोधन के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं, जो पूर्वोत्तर भारत यानी नॉर्थ ईस्ट और लेह लद्दाख से आते हैं। फिल्म में वहां के लोगों के साथ भारत के दूसरे हिस्सों में होने वाले सौतेले बर्ताव से लेकर उनके साथ उनके अपने ही राज्यों में हो रहे दुर्व्यवहार तक पर बात की गई है।

हिंसा में झुलसते जवानों और किसानों की त्रासदी

यह फिल्म दिखाती है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों पर ‘इंडिया’ की सरकार और ‘इंडिया’ के सैनिक अत्याचार कर रहे हैं। यहां के युवाओं ने दशकों पहले हथियार उठा लिए थे और आज भी यहां कई गुट सक्रिय हैं। सरकार यहां शांति कायम करना चाहती है। इसके लिए वह किसी से बात करने तो किसी को शांत करने तक को तैयार है। सरकार ने इसके लिए अंडर कवर एजेंट्स से लेकर पुलिस, सेना, राजनेता, अफसर, बिचौलिए आदि यहां तैनात कर रखे हैं।

फिल्म में जवानों और किसानों की त्रासदी देखने को मिलती है कि कैसे सिर्फ 24 किमी चौड़े गलियारे से बाकी देश से जुड़े उत्तर पूर्व के राज्यों के किसानों की पूरी फसल हाईवे पर खड़े ट्रकों में सड़ जाती है क्योंकि उन्हें दूसरी तरफ से आती फौज की गाड़ियों के लिए जगह बनानी होती है। वहीं दूसरी और एक युवा बेटी है, जिसे भारत के लिए बॉक्सिंग करनी है लेकिन उसका पिता एक अलगाववादी आंदोलन चला रहा है। पिता एक सीन में कहता है- "मैं तेरे फाइट के लिए चियर नहीं कर सकता, तू मेरे फाइट के लिए चियर नहीं कर सकती। हम सब ऐसी ही ट्रेजेडी में जी रहे हैं!" 'अनेक' इसी ट्रेजेडी को जन्म देने वाली पॉलिटिक्स की कहानी है। फ़िल्म के सब-प्लॉट में एक मां और उसके टीनेज बेटे की भी कहानी है जिसे नॉर्थ ईस्ट का हिंसक अलगाववाद अपनी चपेट में लेता है।

अपने ही देश में पराए बनते लोग

गौरतलब है कि कुछ सालों पहले दुकानदारों के साथ मारपीट की घटना के बाद अरूणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तनियम की मौत और उसके कुछ ही दिन बाद दिल्ली में मणिपुर की एक छात्रा के साथ कथित बलात्कार, और मणिपुर के दो युवकों के साथ मारपीट की घटनाओं के मामले ने देशभर में तूल पकड़ लिया था। इन घटनाओं को लेकर कई आंदोलन और प्रदर्शन भी हुए लेकिन जमीनी हकीकत आज भी जस की तस ही बनी हुई है। इससे पहले 2014 में तब के दुनिया के नंबर तीन मुक्केबाज़ शिव थापा ने अपने एक बयान में कहा था कि देश के भीतर उन्हें भी कई मौकों पर नस्लीय टिप्पणियों का शिकार होना पड़ा है। तब उन्होंने भारत सरकार से किसी भी तरह की नस्लीय भेदभाव या हिंसा के मामलों को गंभीरता से लिए जाने और तुरंत कार्रवाई की गुज़ारिश भी की थी।

अभी बीते साल दिसंबर के महीने में ही नगालैंड के मोन जिले में सुरक्षाबलों की कार्रवाई में 14 लोगों की मौत की खबर सामने आई थी। जिसके बाद पूरे राज्य में आम नागरिकों के बीच तनाव और गुस्सा देखने को मिला था। वैसे उत्तर-पूर्व के सात राज्यों की बातें हिन्दी फिल्मों में कम हुई हैं। खासतौर से वहां की अशांति और हिंसा पर तो कायदे से कोई बात कभी हुई ही नहीं। ऐसे में इन्हीं सब मुद्दों को ध्यान में रखकर बनी फिल्म अनेक एक नज़र से देखने पर लगभग हर 5 मिनट में आज की राजनीति पर भी सवाल करती है, वहीं हर दसवें मिनट भारत की तथाकथित मुख्यधारा की राजनीति और सबकुछ ठीक कर देने के दावे और वादे की पोल भी खोलती है। भारत का संविधान सभी को धर्म, जाति, भाषा, वेशभूषा से परे बिना किसी भेदभाव के एक समान होने की बात करता है, लेकिन नस्लीय भेद इस अनेकता में एकता की भावना को कलंकित करता है।

इसे भी पढ़ें: अपने ही देश में नस्लभेद अपनों को पराया बना देता है!

Anek
Anek Movie Review
Ayushmann Khurrana
Anubhav Sinha
North East
North-East India

Related Stories

थप्पड़ फ़िल्म रिव्यू : यह फ़िल्म पितृसत्तात्मक सोच पर एक करारा थप्पड़ है!

आर्टिकल 15 : एक आधी-अधूरी कोशिश!

आर्टिकल 15 : लेकिन राजा की ज़रूरत ही क्या है!


बाकी खबरें

  • Farmers
    रवि कौशल
    आंशिक जीत के बाद एमएसपी और आपराधिक मुकदमों को ख़ारिज करवाने के लिए किसान कर रहे लंबे संघर्ष की तैयारी
    25 Nov 2021
    कृषि क़ानूनों की वापसी की घोषणा के बावजूद, किसान, अपने संघर्ष की दूसरी मांगों पर अडिग हैं, जिनमें एमएसपी पर गारंटी, प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज केस रद्द किए जाने, केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी की…
  • workers
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी में छोटी होती जा रही मज़दूरों की ज़िंदगी
    25 Nov 2021
    यूपी के चंदौली जिले में चंधासी, देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी है। यह इलाका उस संसदीय क्षेत्र के साथ लगा है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है। ..."जिस सड़क से पांच मिनट गुजरने में दम निकलता हो…
  • Gandhi ji
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    ख़तो-किताबत: आंदोलनजीवी बापू की चिट्ठी आई है
    25 Nov 2021
    पेशे से चिकित्सक, व्यंग्यकार डॉ. द्रोण कुमार शर्मा ने दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर उनके नाम एक चिट्ठी लिखकर उन्हें देश के हालात से अवगत कराया था। अब उन्होंने इसका जवाब लिखा है। यानी लेखक…
  • farmers
    अजय गुदावर्ती
    कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के बाद भाजपा-आरएसएस क्या सीख ले सकते हैं
    25 Nov 2021
    सत्ताधारी पार्टी संकट आने पर हर बार हिंदू-मुस्लिम का बटन नहीं दबा सकती और कामयाब भी नहीं हो सकती। 
  • cop 26
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    जलवायु को बचाने के नाम पर, वे खेतों को बाज़ारू वस्तु जैसा बना देंगे
    25 Nov 2021
    सीओपी26 में, विकृत खाद्य प्रणाली, जो कि पृथ्वी और हमारे शरीर को प्रदूषित करती है, पर चुप्पी रही; स्वस्थ भोजन के उत्पादन और ग्रह पर जीवन बनाए रखने के लिए खाद्य प्रणाली में किसी तरह के परिवर्तन के बारे…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License