NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कब तक रहेगा पी एन ओक का सम्मोहन ?
ताज़महल के तेजोमहल अर्थात शिव मंदिर होने को लेकर अदालत में एक और याचिका दायर की गयी है। इस याचिका में कहा गया कि ताजमहल के बंद कमरे खोले जाएं ताकि मालूम चल सके कि उसके भीतर क्या है?
सुभाष गाताडे
12 May 2022
taj

एरिक एन्टन पाॅल वाॅन डाॅनिकेन, (Erich Von Doniken 1935-)स्विस मूल के इस लेखक का नाम दक्षिण एशिया के इस हिस्से में बहुत कम लोगों ने सुना है।

समूचे बुद्धिजीवी वर्ग ने ‘प्रारंभिक मानवीय संस्कृति परग्रह के असर’ को बयां करते उनके विचारों को भले ही सिरे से खारिज किया हो, उनकी रचनाओं को  छद्मइतिहास, छद्मविज्ञान और यहां तक कि छद्मपुरातत्व विज्ञान घोषित किया गया हो, लेकिन 1968 में आयी अपनी पहली किताब ‘चैरियटस आफ गाॅडस’ से लेकर वह इसी विषय पर कई  बेस्टसेलर किताबें लिख चुके है।

एक बार फ्राॅड के चलते वह जेल की हवा भी खा चुके हैं, अलबत्ता उनका लेखन जारी है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रबुद्ध समाज हो या पिछड़ेपन से मुक्त हो रहे समाज वहां कुछ ऐसे ‘विचारकों’ के लिए हमेशा जगह मौजूद रहती है - जिनके लेखन में भारी तार्किक एवं तथ्यपरक गलतियां हो।

पाॅल वाॅन डाॅनिकेन ‘मानवीय जीवन पर परग्रह से आए लोगों के असर’ के कई तरह के ‘प्रमाण’ देते दिखते हैं, जिनका प्रधान सिद्धांत बकौल विज्ञान लेखक कार्ल सागान यही बताना है कि ‘हमारे पुरखे नक़ली/बनावटी थे’ (principal thesis is that our ancestors were dummies) बरबस दक्षिण एशिया के इस हिस्से के एक पत्रकार एवं स्वयंभू इतिहासकार पी एन ओक (1928- 2007 )  की याद दिलाते हैं।

यह वही पी एन ओक है, जो 60-70 के दशक में पहली दफा देश के अन्दर एवं बाहर की तमाम ऐतिहासिक इमारतों/स्मारकों/यादगार स्थलों के बारे में अपनी अविश्वसनीयसी लगनेवाले सिद्धांतों के साथ नमूदार होते दिखे थे। ऐसे ही एक लेख का फोकस ताज़ महल था। इसमें दावा किया गया था वह ताज़ महल नहीं बल्कि तेजो महाआलय है, जो एक तरह से शिव नामक हिन्दू देवता का मूल स्थान रहा है। उन दिनों पूरे मुल्क में जिस तरह का आलम था, हिन्दुत्व की ताकतें सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर लगभग हाशिये पर थी, सेक्युलर विचारों, आंदोलनों का बोलबाला था। तब जाहिर था कि उनकी बातें किसी अहमक का प्रलाप कह कर खारिज की गयी थी।

तब से लेकर आज तक एक लंबा वक्फ़ा गुजर गया है। चीजें बिल्कुल बदली सी हैं। सियासत में हाशिये पर रहने वाली ताकतें फिलवक्त उसके केंद्र में आयी है।लाजिम है कि आज वही पी एन ओक हिन्दुत्व खेमे के पॉपुलर इतिहासकार हो गए हैं।
 
पिछले दिनों भाजपा के एक कार्यकर्ता द्वारा ताजमहल के कथित ‘बंद कमरे’ खोलने को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका की ख़बर जबसे सूर्खियां बनी है, फिर एक बार पी एन ओक का नाम नए सिरे से चर्चा में आया है। लगभग पांच साल पहले जनाब विनय कटियार, जो उन दिनों राज्यसभा सदस्य थे, उन्होंने इसी किस्म का राग अलापा था जब उन्होंने यू पी के मुख्यमंत्राी योगी आदित्यनाथ को दी यह सलाह कि ‘‘उन्हें चाहिए कि वह ताज़ महल जाएं। उसमें हिन्दू चिन्हों को खुद देख लें’’।

दिलचस्प है कि हिन्दुत्व के हिमायतियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वर्ष 2000 में जब इन्ही जनाब ओक ने ‘ताज़महल को शिवमंदिर घोषित करने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाली थी, तब किस तरीके से सुप्रीम कोर्ट की द्वि सदस्यीय पीठ ने उनकी याचिका को सिरे से खारिज किया था। उन दिनों पहली दफा केन्द्र में हिन्दुत्व की हिमायती सरकार थी और पी एन ओक को लगा था कि मुमकिन है कि बदले वातावरण में उनके इस ‘सिद्धांत’ को तवज्जो मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय के दो सदस्यीय पीठ ने इस ‘‘मिथ्या’’ याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि ‘‘किसी की बाॅनेट में मधुमक्खी घुस गयी है, इसलिए यह याचिका दायर की गयी है।’’ और न इस बात से कोई फरक पड़ता है कि खुद आर्किलोजिकल सर्वे आफ इंडिया अदालत में कह चुका है कि ‘ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि ताज़महल कभी मंदिर था, वह एक मकबरा है।’
 
गौरतलब है कि कभी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज से जुड़े पी एन ओक के ‘सिद्धांत’ महज ऐतिहासिक इमारतों से जुड़े नहीं हैं, भारत में इस्लामिक आर्किटेक्चर से पूरी तरह इंकार तक सीमित नहीं हैं, वह यह भी मानते रहे हैं कि ‘क्रिश्चानिटी और इस्लाम दोनों हिन्दू धर्म से निर्मित हैं ’ या ‘ताज़ महल की तरह कैथोलिक वैटिकन, काबा, वेस्टमिन्स्टर अब्बे आदि शिवा के मंदिर थे या -‘‘वैटिकन मूलतः एक वैदिक निर्मिति है जिसे वाटिका कहा जाता था यहां तक पोप की प्रथा भी बुनियादी तौर पर वैदिक पुरोहितप्रथा थी आदि।

‘‘आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों द्वारा तैयार पूर्वाग्रहों से लैस एवं विकृत भारतीय इतिहास को ’’ कथित तौर पर ठीक करने में जुटे रहे पी एन ओक के विचारों की इतिहास के जानकारों ने, भाषाविज्ञान के विशेषज्ञों की पर्याप्त छानबीन की है और एक दिलचस्प बात रेखांकित की हैै कि किस तरह वह खास तरीके से ‘संस्कृत के ध्वनियों के समकक्ष गैर संस्कृत धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं। मिसाल के तौर पर श्रीनिवास अरावामुदन रेखांकित करते हैं कि वह खास तरीके से ‘‘डीप पुनिंग deep punning ‘‘का सहारा लेकर संस्कृत के ध्वनियों के समकक्ष गैर संस्कृत धार्मिक शब्दावली  का इस्तेमाल करता है। जैसे वैटिकन अर्थात वाटिका, क्रिश्चियानिटी अर्थात क्रष्ण नीति या क्रष्ण का मार्ग ; इस्लाम अर्थात ईशालयम यानी ईश्वर का मंदिर,अब्राहम जो ब्रह्म का विकृत रूप है आदि। इसी आधार पर ओक दावा करते हैं कि क्रिश्चियानिटी और इस्लाम दोनों ‘‘वैदिक’’ विश्वासों के तौर पर पैदा हुए।(Srinivas Aravamudan, Guru English: South Asian Religion in a Cosmopolitan Language Princeton University Press (2005), ISBN 0-691-11828-0).

दिलचस्प है कि पी एन ओक के विचारों में भले ही बेहद असंगतियां मालूम पड़ती हों, अपने तमाम ‘सिद्धांतों’ के लिए किसी भी किस्म का प्रमाण देने में वह असफल होते रहे हों, लेकिन इसका कत्तई मतलब यह नहीं कि हिन्दुत्व के विचारों के प्रबुद्ध जनों में उनके हिमायती नहीं हैं। ‘वी एस गोडबोले, परमेश चैधरी, एन एस राजारा, एस तालागेरी, फ्रांसिस गाॅटियर, स्टीफन क्नाप और डेविड फ्रायले जैसे लेखक प्राचीन दुनिया में हिन्दू विज्ञान एवं संस्कृति की प्रधानता के बारे में ओक के साथ’ सहमत दिखते हैं। 

लेकिन हिन्दुत्व के हिमायती विद्वानों एक हिस्से में ओक के विचारों को लेकर ढेर सारे सवाल हैं, मिसाल के तौर पर सीताराम गोयल नामक हिन्दुत्व के इतिहासकार ओक को ‘हिन्दू विद्वता के लिए सबसे बड़ी आपदा’ (“the greatest disaster for Hindu scholarship”.) के तौर पर देखते हैं।  बैल्जियन प्राच्यवादी और इंडोलोजिस्ट फलेमिश लेखक कोइनराड एल्स्ट ओक के प्रति ‘हिन्दुओं के इस सम्मोहन’ को लेकर जबरदस्त क्षुब्ध दिखते हैं।
 
लगभग बारह साल कोइनराड एल्स्ट ने एक दिलचस्प लेख लिखा था, जिसमें ‘पत्राकार और स्वयंभू इतिहासकार पी एन ओक के प्रति हिन्दुओं की बढ़ती जा रही आसक्ति’ को रेखांकित किया था जिसका शीर्षक था: ‘पी एन ओक के प्रति लाइलाज होता हिन्दू अनुराग’।

यह वही कोइनराड एल्स्ट हैं, जो अमेरिकी लेखक, ज्योतिर्विज्ञानी पदमभूषण डेविड फा्रॅले, उर्फ पंडित रामदेव शास्त्राी ; पत्राकार फ्रांसिस गाॅटियर /Francois Gautier / या पाकिस्तानी कनाडाई लेखक तारक फतेह आदि की तरह  भारत में हिन्दुत्व वर्चस्ववाद की राजनीति के उभार के हिमायती कहे जाते हैं।

‘डीकालोनायजिंग हिन्दू माइंड; जैसी किताबों के इस रचयिता  का साफ कहना था कि बीस साल पहले मेरी अपेक्षा थी कि जैसे - जैस हिन्दू ऐतिहासिक सुधारवाद में अधिक संतुलित आवाज़े बुलंद होती जाएंगी, ओक जैसों की हैसियत कम होती जाएगी, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। ‘कितनी विचित्र बात है कि आप्रवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों में उनकी शोहरत बढ़ती जा रही हैै। उन्होंने साफ लिखा था:
 
"... पी एन ओक के सिद्धांतों की लोकप्रियता समकालीन हिन्दू कार्यकर्ताओं की भारी अपरिपक्वता को दर्शाता है। वह भारतीय इतिहास में धार्मिक विवादों के तथ्यों को लेकर व्याप्त भ्रम को रेखांकित करता है। इतना ही नहीं बाहरी लोगों द्वारा निर्मित किए गए मूल्यवान वस्तुओं आदि पर मिल्कियत का दावा करने की विचित्रा सी ख्वाहिश प्रदर्शित करता है / गोया हिन्दू धर्म की वास्तविक उपलब्धियां गर्व करने लायक न हों/"

दिलचस्प है कि ‘हिन्दू कार्यकर्ताओं की भारी अपरिपक्वता’ या एक तरह से उनमें जड़मूल हीनभावना - जिसके तहत वह ‘हिन्दू धर्म की वास्तविक उपलब्धियों’ पर भी गर्व नहीं कर पाता, उजागर होने के बावजूद ओक का सितारा हिन्दुत्व में बुलंदियों पर ही रहा है।

हम याद कर सकते हैं कि वर्ष 2014 में जब भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटी, तब उसके अग्रणी नेताओं के प्रलापों से तथा उसके कदमों से ही यही उजागर हो रहा था कि पी एन ओक की उनके लिए क्या अहमियत है। इंडियन कौन्सिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च जैसी अग्रणी एवं प्रतिष्ठित संस्थन के चेअरमैन के तौर पर उन्होंने प्रो वाई सुदर्शन राव को नियुक्त किया था, यह वही प्रोफेसर थे ‘जिनके आलेख जो भारतीय महाकाव्यों की ऐतिहासिकता पर फोकस्ड थे, वह किसी अग्रणी जर्नल में नहीं बल्कि अख़बारों, पत्रा-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे।’ इस पद के लिए उनकी सबसे अधिक योग्यता यही समझी गयी थी कि वे पी एन ओक द्वारा स्थापित ‘भारत इतिहास संकलन समिति’ से लंबे समय से जुड़े थे।

अंत में प्रश्न उठता है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद पी एन ओक के चाहने वाले क्यों बढ़ रहे हैं ?

वह यही है कि ‘प्राचीन वैदिक वर्चस्व का सिद्धांत - जो एक तरह से समग्र हिन्दुत्व परियोजना की विचारधारात्मक जड़ है, और भारत पर समग्र मिल्कियत तथा अन्य वैश्विक संस्कृतियों पर दबदबे के उसके दावे’ हिन्दुत्व सियासत के साथ कदमताल करते चल रहे हैं।

वही लाजिम है कि कभी अहमक के तौर पर खारिज किए जाते रहे ओक आज पढ़े लिखें लोगों, एनआरआई अंकलों एवं आंटियों के बीच ‘कल्ट स्टेटस’ हासिल कर चुके हैं।

भारतीय मानस के अच्छे खासे हिस्से के बौद्धिक दिवालियापन का इससे बेहतर सबूत कहाँ मिल सकता है।   

Communalism
History
taj mahal
History of Taj Mahal
P. N. Oak
Shiv Mandir

Related Stories

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

अजमेर : ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह के मायने और उन्हें बदनाम करने की साज़िश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

पूजा स्थल कानून होने के बावजूद भी ज्ञानवापी विवाद कैसे?


बाकी खबरें

  • dharm sansad
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
    12 Jan 2022
    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को भविष्य में 'धर्म संसद' के आयोजन के खिलाफ स्थानीय प्राधिकरण को अभिवेदन देने की अनुमति दी।
  • राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    विजय विनीत
    राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    12 Jan 2022
    "आरएसएस को असली तकलीफ़ यही है कि अशोक की परिकल्पना हिन्दू राष्ट्रवाद के खांचे में फिट नहीं बैठती है। अशोक का बौद्ध होना और बौद्ध धर्म धर्मावलंबियों का भारतीय महाद्वीप में और उससे बाहर भी प्रचार-…
  • Germany
    ओलिवर पाइपर
    जर्मनी की कोयला मुक्त होने की जद्दोजहद और एक आख़िरी किसान की लड़ाई
    12 Jan 2022
    पश्चिमी जर्मनी में एक गांव लुत्ज़ेराथ भूरे रंग के कोयला खनन के चलते गायब होने वाला है। इसलिए यहां रहने वाले सभी 90 लोगों को दूसरी जगह पर भेज दिया गया है। उनमें से केवल एक व्यक्ति एकार्ड्ट ह्यूकैम्प…
  • Hospital
    सरोजिनी बिष्ट
    लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़
    12 Jan 2022
    लखनऊ के साढ़ामऊ में स्थित सरकारी अस्पताल को पूरी तरह कोविड डेडिकेटेड कर दिया गया है। इसके चलते आसपास के सामान्य मरीज़ों, ख़ासकर गरीब ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। साथ ही इसी अस्पताल के…
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    चिंता: कोरोना ने फिर रफ़्तार पकड़ी, देश में 24 घंटों में 2 लाख के क़रीब नए मामले
    12 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,94,443 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 60 लाख 70 हज़ार 233 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License