NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
नज़रिया
भारत
राजनीति
सीएए विरोधी आंदोलन : जीत-हार से अलग अहम बात है डटे रहना
समय-समय पर जनता के आक्रोश के बीच से बड़े आंदोलन पैदा हुए हैं। धीरे-धीरे उसका प्रभाव पूरे देश में फैला। यह आंदोलन जिन मूल मांगों के साथ शुरू हुए, अधिकतर मामलों में वह मांगें पूरी नहीं हो सकीं। इसके बावजूद उन जन संघर्षों ने पूरे देश पर जबरदस्त प्रभाव डाला। महमूद दरवेश के शब्दों में कहें तो हर आंदोलन के बाद नए युग की शुरुआत हुई है।
कुमार रहमान
18 Feb 2020
CAA Protest
Image courtesy: India Today

फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश ने बैरुत पर इज़रायली हमले के दौरान अपनी डायरी में लिखा था-

"कमोदोर जहां विदेशी पत्रकारों का हुजूम लगा रहता है, एक अमेरिकी पत्रकार मुझसे पूछता है:

- क्या आप यह युद्ध जीत जाएंगे?
- नहीं। अहम बात है डटे रहना। डटे रहना अपने आप में जीत होती है।
- उसके बाद क्या होगा?
- नए युग की शुरुआत।"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने साफ कह दिया है कि सीएए वापस नहीं होगा। इसके बावजूद पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ धरना-प्रदर्शन जारी है। घर से बाहर निकली महिलाएं, बच्चे और पुरुष किसी भी हाल में घरों के भीतर दुबकने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने सत्ता से उपजे भय को उतार फेंका है। उन्हें पुलिस की धमकी, लाठी-डंडे और गोली भी नहीं डिगा पा रही है। इन सबके बीच सभी के मन में एक सवाल जरूर है कि अगर केंद्र की मोदी सरकार ने सीएए वापस नहीं लिया तो इन जन आंदोलनों का क्या होगा?

विरोध जनता का अधिकार और हथियार है। यह लोकतंत्र का मूल भी है। समय-समय पर जनता के आक्रोश के बीच से बड़े आंदोलन पैदा हुए हैं। धीरे-धीरे उसका प्रभाव पूरे देश में फैला। यह आंदोलन जिन मूल मांगों के साथ शुरू हुए, अधिकतर मामलों में वह मांगें पूरी नहीं हो सकीं। इसके बावजूद उन जन संघर्षों ने पूरे देश पर जबरदस्त प्रभाव डाला। महमूद दरवेश के शब्दों में कहें तो हर आंदोलन के बाद नए युग की शुरुआत हुई है।

यह धारणा ही अपने आप में गलत है कि आंदोलन का अंत जीत के साथ होगा। आंदोलन का मूल मकसद अपनी आवाज़ सत्ता में बैठे लोगों तक पहुंचाना है। आम जन को जागरूक करना है। समस्या को लेकर समाज में वैचारिक बहस को जन्म देना है। जन आंदोलन ऊर्जा देते हैं और एकता को बढ़ाते हैं। हर बड़े आंदोलन के ऐसी सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं, जबकि अपनी मूल मांगों को पूरा करने में यह आंदोलन विफल ही रहे हैं।

गांधी जी ने देश की आज़ादी के लिए निरंतर आंदोलन किए। मकसद एक था मुल्क की आज़ादी। उस दौरान उन्होंने कई अन्य मांगों के लिए भी आंदोलन किए। जैसे दांडी यात्रा नमक के लिए थी। गांधी जी को कई आंदोलनों में सफलता भी मिली और कई आंदोलन असफल भी हुए। उन्होंने तात्कालिक प्रभाव की वजह से कई आंदोलन असमय खत्म भी किए। उनके आंदोलन की मूल भावना थी, डटे रहना। गांधी जी एक आंदोलन खत्म करने के बाद कुछ वक्त लेते और फिर दोबारा पूरी ताकत से नए आंदोलन का सूत्रपात करते।

आज़ादी के बाद के सबसे बड़े जन संघर्ष को हम जेपी आंदोलन के तौर पर जानते हैं। जय प्रकाश नारायण ने यह आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए शुरू किया था। इस आंदोलन का असर पूरे देश में रहा। तमाम युवा पढ़ाई-लिखाई छोड़कर जेपी के साथ हो लिए। जेपी के इस आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन जरूर किया, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन का ख्वाब पूरा नहीं हुआ।

याद करें अन्ना हजारे के आंदोलन को। इस आंदोलन ने धीरे-धीरे पूरे देश में भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बना दिया। युवा खासतौर से इसके प्रति आकर्षित हुए थे और आंदोलन और उसके बाद के सियासी हालात में ताकत भी बने। दिल्ली का रामलीला मैदान जन आंदोलन का प्रतीक बन गया था। अन्ना का यह आंदोलन अपनी मांगों को लेकर बुरी तरह से विफल हुआ। एक मजबूत लोकपाल देश को आज भी नहीं मिल सका। ऑफिस चार्टर बनाने की मांग भी पूरी नहीं हुई। यह आंदोलन अपनी मांग को लेकर असफल भले रहा, लेकिन इसकी कोख से एक पार्टी का जन्म हुआ। उसने दिल्ली में सरकार भी बनाई। साथ ही केंद्र में मोदी सरकार बनाने में इस आंदोलन का भरपूर योगदान रहा।

नक्सलबाड़ी देश का सबसे दीर्घकालिक आंदोलन है। यह देश का ऐसा आंदोलन है, जिसका असर अभी तक बरकार है। देश के कई हिस्सों में यह एक विचार के तौर पर अभी भी मौजूद है और संघर्ष आज भी जारी है। कई राज्यों में सरकार पर इसका खासा असर है। इससे सहमति-असहमति के बीच नए शब्द अर्बन नक्सली ने भी जन्म लिया है। इस पर सियासी और बौद्धिक बहस हो रही है। महाराष्ट्र में यह एक अहम मुद्दा भी है।

इसके बावजूद इन तमाम आंदोलनों ने देश की जनता को वैचारिक शून्यता से निकाला। नए चिंतन का सूत्रपात किया। अवाम में संघर्ष की समझ विकसित की। इससे लोकतंत्र मजबूत हुआ और देश भी। इसके जरिए ही कई बार सत्ता परिवर्तन हुआ। इन जन आंदोलनों ने देश को कई बड़े नेता भी दिए।

अब तक देश में जो भी आंदोलन हुए, उसमें लीडरशिप थी। सियासी पार्टियां उसकी दशा और दिशा तय कर रही थीं। इसके बरखिलाफ पूरे देश में सीएए के खिलाफ उठ खड़ा यह आंदोलन स्वतः स्फूर्त है। इसके पीछे कोई सियासी पार्टी नहीं है। इसका कोई नेता नहीं है। दरअसल यह देश में विपक्षविहीन राजनीति के खिलाफ जनता की पहलकदमी है। जनता ने भी साफ कर दिया है कि वह किसी सियासी पार्टी के भरोसे बैठने वाली नहीं है। अगर विपक्ष कमजोर साबित होगा तो जनता चुप बैठने वाली नहीं है। यह भी इस आंदोलन का सकारात्मक पहलू है।

देश भर में हो रहा आंदोलन भले नया संशोधित कानून वापस न करवा सकें, लेकिन इसकी वजह से ही देश में पहली बार मुसलमान इतनी बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकले हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि महिलाएं सड़कों पर हैं। यह आंदोलन मुसमलानों में सियासी समझ विकसित होने का जरिया बन रहा है। यही नहीं मुस्लिम महिलाएं अब अपने परिवारों के बीच अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो रही हैं। इसका सकारात्मक असर उनके बच्चों पर भी पड़ेगा।

एक बात साफ है कि शाहीन बाग से लेकर लखनऊ, इलाहाबाद, भोपाल, मैंगलोर जैसे तमाम शहरों की आंदोलनरत महिलाएं एक बड़ी ताकत बनकर सामने आई हैं। वह संविधान पढ़ रही हैं। भाषण दे रही हैं। आजादी के नारे लगा रही हैं। जनवादी गीत गा रही हैं। निश्चित ही इस आंदोलन के बाद अब यह महिलाएं रिवर्स गेयर में नहीं जाएंगी। आने वाले दो-तीन वर्षों में इसका सकारात्मक असर देश और समाज पर हम सब देखेंगे।

भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार और सत्याग्रह आयोजन समिति के सदस्य सचिन श्रीवास्तव बताते हैं कि भोपाल के इकबाल मैदान में सीएए के खिलाफ एक जनवरी से आंदोलन चल रहा है। यहां बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं शामिल हो रही हैं। पुरुषों से उन्हें अलग करने के लिए बीच में एक पर्दा डाल दिया गया था। कुछ दिनों बाद ही इस पर्दे को महिलाओं ने हटा दिया। इन महिलाओं का साफ कहना था कि हम मर्दों के साथ साझी लड़ाई में शामिल हैं। यह पर्दा हमें अलग करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने सीएए वापस न करने की बात कहकर सरकार का पक्ष साफ कर दिया है। इसके बावजूद अभी भी लोगों की निगाह सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं के फैसले पर टिकी हुई है। अगर फैसला जनता के पक्ष में नहीं आता है तो क्या आंदोलन खत्म हो जाएगा? यह भी एक अहम सवाल है। दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार राशिद अहमद खां कहते हैं, “यह आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा आंदोलन होने जा रहा है। धीरे-धीरे आंदोलन और विस्तार लेगा। अप्रैल में एनपीआर आने के बाद यह आंदोलन ज्यादा गति पकड़ जाएगा।”

इस आंदोलन का जो भी अंजाम हो, लेकिन इसने देश के मूल सेकुलर चरित्र को सामने ला दिया है। जिस तरह से हिंदू, मुस्लिम और सिख इस आंदोलन में मुसलमानों के साथ शाना ब शाना खड़े हैं, वह मिसाल बन गया है। इसकी उम्मीद सरकार को भी नहीं रही होगी। वरिष्ठ पत्रकार सचिन कहते हैं, “देश के 450 से ज्यादा जिलों में आंदोलन हो रहा है। 150 से ज्यादा भाषाओं में लोग सीएए के खिलाफ नारे लग रहे हैं।

यही देश की विरासत और विविधता है।” मेन स्ट्रीम मीडिया भले ही इसे मुसलमानों का आंदोलन बता रहा हो, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे धरने-प्रदर्शन में सभी धर्मों के लोग शामिल हैं। इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार सैयद आकिब रजा ने बताया कि सीएए के खिलाफ वहां चल रहे प्रदर्शनों में साधु-संत भी शिरकत कर रहे हैं।

शाहीन बाग के जन आंदोलन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा है कि प्रदर्शन करना लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी को ऐसा करने से नहीं रोका जा सकता। अलबत्ता यात्रियों की असुविधा का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा है कि आंदोलन को किसी दूसरी जगह पर शिफ्ट करने पर विचार करना चाहिए। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में दफा144 लगाकर और उल्लंघन करने पर प्रदर्शनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। अहम सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस कथन कि "प्रदर्शन करना लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है”, पर हमारी सरकारें अमल करेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

CAA
NRC
NPR
Protest against CAA
Protest against NRC
Shaheen Bagh
Lucknow Ghantaghar Protest
Roshan Bagh
Park Circus
Narendra modi
BJP
Amit Shah
Mahatma Gandhi
Women Leadership
Democratic Rights
Fundamental Rights
Constitution of India

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

शाहीन बाग से खरगोन : मुस्लिम महिलाओं का शांतिपूर्ण संघर्ष !

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 15,786 नए मामले, 231 मरीज़ों की मौत
    22 Oct 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 41 लाख 43 हज़ार 236 हो गयी है।
  • coal energy
    नीलाबंरन ए
    नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली ख़रीद पर निर्भर तमिलनाडु ने कोयले की कमी का किया मुक़ाबला 
    22 Oct 2021
    तमिलनाडु राज्य की थर्मल पावर स्टेशनों पर निर्भरता कम है, लेकिन निजी विक्रेताओं से महंगी बिजली ख़रीदने के कारण टैंजेडको 1.07 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ में धस गई है।
  • Ashfaqulla Khan
    हर्षवर्धन
    विशेष: अशफ़ाक़उल्ला को याद करना उनके विचारों को भी याद करना है
    22 Oct 2021
    आज शहीद क्रांतिकारी अशफ़ाक़ का 121 जन्मदिन है। आइये, इस मौके पर हम उनकी वैचारिकी की थोड़ी चर्चा करते हैं। 
  • Adam Gondvi
    न्यूज़क्लिक टीम
    अदम गोंडवी : “धरती की सतह पर” खड़े होकर “समय से मुठभेड़” करने वाला शायर
    22 Oct 2021
    जनता के शायर अदम गोंडवी (22 अक्टूबर, 1947-18 दिसंबर, 2011) के जन्मदिन पर न्यूज़क्लिक विशेष। यह वीडियो पैकेज 2018 में तैयार किया गया था, जो आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि आज अदम की ही तरह पुरज़ोर आवाज़…
  • ग्लोरिया ला रीवा
    आँखों देखी रिपोर्ट : क्यूबा के वैज्ञानिकों, स्वास्थ्यकर्मियों ने कोविड के ख़िलाफ़ संघर्ष तेज़ किया
    21 Oct 2021
    ग्लोरिया ला रीवा क्यूबा में थीं। वहां उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों से क्यूबा के प्रभावी टीकाकरण कार्यक्रम और डेल्टा वेरिएंट से निपटने के तरीकों पर बात की।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License