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क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?
सवाल यही उठता है कि जब देश में 90 प्रतिशत लोगों की मासिक आमदनी 25 हजार से कम है, लेबर फोर्स से देश की 54 करोड़ आबादी बाहर है, तो महंगाई के केवल इस कारण को ज्यादा तवज्जो क्यों दी जाए कि जब 'कम सामान और सेवाओं के पीछे जब ज्यादा पैसा' होता है, तब महंगाई बढ़ती है।
अजय कुमार
02 Jun 2022
inflation
Image courtesy : Webdunia

जब जीवन जीने की लागत बढ़ जाती है तो महंगाई का दौर शुरू हो जाता है। जब सामान और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं और एक ही तरह के सामान और सेवाओं के लिए पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ता है तब महंगाई का कहर बरपना शुरु हो जाता है। इसका सबसे बड़ा असर वित्त मंत्री के मुताबिक आम लोगों पर नहीं, बल्कि अमीरों पर पड़ता है। लेकिन हकीकत कुछ और है। महंगाई दर के हिसाब से आम आदमी की आमदनी बढ़ती नहीं है। यानी महीने का वेतन सालों साल 10 हजार ही रहता है, लेकिन आलू, प्याज, पेट्रोल और स्कूल की फ़ीस बढ़ जाती है। सैलरी, मेहनताना, मजदूरी उतनी ही रहती है, लेकिन खर्चा बढ़ जाता है और इससे बचत कम हो जाती है।  

महंगाई की इस बुरी अवधारणा को लेकर एक कारण सबसे अधिक चलन में रहता है, वह यह है कि जब अर्थव्यवस्था में सामान और सेवाओं से ज्यादा पैसे का  ज्यादा संचरण होता है, तब डिमांड बढ़ती है, लेकिन सप्लाई कम रहती है। इसलिए सामान और सेवाओं की कीमतें बढ़ने लगती हैं। जिन्हें महंगाई समझ में आती है, उनमें से अधिकतर लोग भी इसी कारण को महंगाई के लिए जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन सवाल यही उठता है कि जब देश में 90 प्रतिशत लोगों की मासिक आमदनी 25 हजार से कम है, लेबर फोर्स से देश की 54 करोड़ आबादी बाहर है तो महंगाई के केवल इस कारण को ज्यादा तवज्जो क्यों दी जाए कि जब 'कम सामान और सेवाओं के पीछे जब ज्यादा पैसा' होता है, तब महंगाई बढ़ती है। ऐसा कहने और सोचने से महंगाई को लेकर दूसरे कारण समझ में नहीं आते।  यह बात ढंग से सामने नहीं आ पाती  है कि बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार और सरकारी नीतियां का दोष कितना है?

अर्थशास्त्र का पुराना सिद्धांत है "टू मच मनी चेज़िंग टू फ्यू गुड्स" (Too much money chasing few goods)' यानी जब बहुत कम सामानों और सेवाओं के पीछे बहुत ज्यादा पैसा वाली स्थिति पैदा होती है तब  महंगाई की हालत पैदा होती है। इससे बचने का उपाय यह है कि देश में पैसे का चलन कम कर दिया जाए। कर्ज देना और लेना महंगा  बना दिया जाए। ऐसा करने के लिए अर्थशास्त्री देश के केंद्रीय बैंक को इंटरेस्ट बढ़ाने की सलाह देते हैं। 

कुछ समाजवादी अर्थशास्त्री कहते हैं कि हम जब हम उत्पादन से ज्यादा पैसे की सप्लाई की बात करते हैं तब महंगाई के लिए जिम्मेदार कारकों में सरकार की नीतियों को नहीं देख पाते।  सरकारी संस्थान के काम काज को जिम्मेदार नहीं ठहराते.यह नहीं पूछते कि आखिरकार यह कैसे हो सकता है कि लोग न्यूनतम मजदूरी से भी कम काम पर करे, 90 प्रतिशत लोगों की मासिक आय 25 हजार महीने से भी कम हो, लेबर फोर्स के बहुत बड़े हिस्से के पास काम ही न हो, अधिकतर लोगों के पैसे की इतनी कमी हो कि वह जीवन की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा न कर पाएं  तो अर्थव्यवस्था में  उत्पादन यानी सामान और सेवाओं से ज्यादा पैसे की अधिकता कैसे हो सकती है? अगर सामान और सेवाओं से ज्यादा पैसे की अधिकता है तो यह पैसा किस के पास पड़ा हुआ है? क्या आम लोगों के हाथों में पैसा पहुंच रहा है? अगर आम लोगों के हाथों में पैसा नहीं है फिर भी अर्थव्यवस्था में पैसे की अधिकता हो रही है और इसकी वजह से महंगाई बढ़ रही है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

अर्थशास्त्री यह भी कहते हैं कि यह विचार की अर्थव्यवस्था में पैसे के कुल मात्रा को सरकरी नीतियों द्वारा तय किया जा सकता है, इस विचार में खामी है।  सरकार और केंद्रीय बैंक ज्यादा से ज्यादा बैंकों के ब्याज दर को निर्धारित कर सकते हैं। ब्याज दर के आधार पर बैंकिंग सिस्टम कर्ज देने और लेने की ब्याज दर तय कर सकती है।  इसके अलावा अर्थव्यवस्था में पैसे की मात्रा और संचरण इस बात पर निर्भर करती है कि अर्थव्यवस्था में किस तरह से काम कर रही है। आर्थिक गतिविधियां कैसी चल रही है? पैसे का संचरण कितने लोगों के हाथों से कितनी बार और कितनी मात्रा में हो रहा है? यह सारे कारक अर्थव्यवस्था में पैसे की कुल सप्लाई को तय करते हैं। इसलिए केंद्रीय बैंक ब्याज दर में परिवर्तन कर पैसे की कुल सप्लाई में उतना बड़ा हस्तक्षेप नहीं कर सकता जितना बड़ा हस्तक्षेप अख़बारों और मीडिया के जरिये बताया जाता है।  

मतलब कई तरह की ऐसी संभावनाएं हैं जो अर्थव्यवस्था में मौजूद हैं , जिनकी वजह से  महंगाई यानी जीवन जीने की लागत का भार सहनसीमा से बाहर चला जाता है। लेकिन उन संभावनाओं पर कम चर्चा होती है। जैसे यह संभावना कि अर्थव्यवस्था में पैसा है लेकिन वह सबके पास नहीं है।  कुछ लोगों के पास पैसा बहुत ज्यादा है और अधिकतर लोगों के पास कम है। जिनके पास पैसा बहुत ज्यादा है, उससे अर्थव्यवस्था में पैसे की कुल मात्रा तो ज्यादा दिखती है लेकिन उससे आर्थिक गतिविधियां इतनी नहीं होती कि अर्थव्यवस्था का पूरा चक्र बेहतर ढंग से चल सके। अर्थव्यवस्था ठीक ढंग से तभी चलेगी जब सबके पास खर्च करने के लिए पैसा हो।  एक आँकड़ा देखिये। कारोबारियों ने साल 1990 से लेकर साल 2018 ने अपने मुनाफा का 58 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखा।  केवल 19 प्रतिशत हिस्सा अपने कर्मचरियों और मजदूरों में वेतन और मजदूरी के तौर पर बांटा। यानि अर्थव्यवस्था में पैसा तो आया लेकिन वह सबके हिस्से में नहीं आया। सबके हिस्से में यह पैसा न आने की वजह से वह हालात नहीं पनपे जिनसे आर्थिक गतिविधियां बेहतर होती हैं।  

इस तरह की एक और संभावना पर तमिलनाडु के वित्त मंत्री त्यागराजन फ्रंटलाइन में दिए अपने इंटरव्यू में बताते हैं कि सरकार की तरफ से लाखों करोड़ वित्तीय मदद के तौर पर कोरोना के दौरान दिया गया। वह पैसा लोगों के हाथ में नहीं आया। वह पैसा अमीरों के हाथ में गया जो कारोबार चलाते हैं, जो निवेश करते हैं। अगर लोगों के हाथ में पैसा नहीं पहुंचेगा तो आर्थिक गतिविधयां नहीं बढ़ेगीं। अगर लोगों को काम नहीं मिलेगा, उनकी आय नहीं बढ़ेगी तो लागत की वजह से अगर सामानों और सेवाओं की कीमतें बढ़ेंगी तो उसे वह सहन नहीं कर पाएंगे। भारत में महंगाई की यही सबसे बीहड़ स्थिति है कि पेट्रोल, डीजल से लेकर कई कई कारणों की वजह से उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। कारोबारी और मालिक सामान और सेवाओं की कीमत भी बढ़ा देता है। मुनाफा भी कमा लेता है। लेकिन बहुतेरे मजदूरों और कर्मचारियों का वेतन बढ़ी हुई जीवन के लागत मुताबिक नहीं बढ़ता। महंगाई दर साल दर साल बढ़ती रहती है, लेकिन उस हिसाब से मजदूरी नहीं बढ़ती। इस वैचारिक किस्म की चर्चा का मतलब केवल इतना था कि हम समझ पाए कि महंगाई पर बात करते समय किस तरह की जरूरी चर्चाएं दबा दी जाती हैं।

Inflation
Economy
workforce
Nirmala Sitharaman

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