NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
नज़रिया
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्यों पेटेंट से जुड़े क़ानून कोरोना की लड़ाई में सबसे बड़ी बाधा हैं?
अगर इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स से जुड़े कानून स्थगित नहीं किए जाते हैं तो इसका मतलब है कि पूरी दुनिया में बहुत बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन कर पाना नामुमकिन होगा। वायरस को जितना अधिक समय दिया जाएगा, उतना अधिक म्युटेट होगा। जितना अधिक म्यूटेट उतना अधिक वैज्ञानिकों के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी।
अजय कुमार
28 Apr 2021
क्यों पेटेंट से जुड़े क़ानून कोरोना की लड़ाई में सबसे बड़ी बाधा हैं?

जब पूरी दुनिया साथ में मौत को देखती है तो दुनिया से उम्मीद की जाती है कि कम से कम वह उन व्यवस्थाओं को खारिज कर देगी जो कहीं न कहीं मौत के लिए जिम्मेदार होते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता। वह व्यवस्थाएं और भी मजबूत तरीके से उभर कर सामने खड़ी हो जाती हैं, जिन्हें होना ही नहीं चाहिए था। 

जैसे इस कोरोना महामारी के दौर में पेटेंट से जुड़े कानून। जिसके मुताबिक यह वो कानूनी अधिकार है, जो किसी संस्था या फिर किसी व्यक्ति या टीम को किसी प्रोडक्ट, डिजाइन, खोज या किसी खास सर्विस पर एकाधिकार प्रदान करता है। एक बार किसी नई चीज पर कोई पेटेंट हासिल कर ले तो उसके बाद कोई दूसरा व्यक्ति, देश या संस्था बिना इजाजत उस चीज का उपयोग नहीं कर सकती। अगर वो ऐसा करती है तो इसे बौद्धिक संपदा की चोरी माना जाता है और कानूनी कार्रवाई होती है। कुल मिलाकर पेटेंट जिसके नाम पर है, उसकी खोज या उत्पाद के इस्तेमाल पर उसे ही पूरा फायदा मिल सके, इसके लिए ये नियम बना। अगर वैक्सीन के मामले में देखा तो सबसे पहला उसका बनता है जिसने वैक्सीन का उत्पादन किया है और यह उत्पादन करने वाले पर निर्भर करता है कि उत्पादन को बनाने बेचने और इस्तेमाल करने को लेकर किस तरह के नियम कानून को अपनाएं।

कहने का मतलब यह है कि अगर अमेरिका कि कोई संस्था कोरोना का वैक्सीन बनाती है तो अमेरिका की उस संस्था और अमेरिका के पास से अधिकार है कि उस वैक्सीन की तकनीक को दूसरे देश को मुहैया कराए या न कराए। जैसे एचआईवी की दवाएं विकसित देशों ने बहुत पहले बना लिया लेकिन पेटेंट के कानूनों की वजह से यह दवाएं विकसित देशों की बजाय भारत में बनने वाली जेनेरिक दवाओं की वजह से दुनिया के गरीब मुल्कों में पहुंच पाई।

कानूनी मामलों के जानकारों का कहना है कि पेटेंट के कानून का तीन आधारभूत सिद्धांत के आधार पर समर्थन किया जाता है कि पहला, अपनी बनाई गई चीज के प्रति व्यक्ति का प्राकृतिक और नैतिक अधिकार बनता है कि वह उसे किस तरीके से नियंत्रित करें। दूसरा, उपयोगिता वादी सिद्धांत जिसके मुताबिक केवल बनाने वाले को लाइसेंस मिलने की वजह से बनाने वाले के काम को प्रोत्साहन मिलता है जिसका अंततः फायदा पूरे समाज को होता है। तीसरा, व्यक्ति को अपने काम और मेहनत का मेहनताना जरूर मिलना चाहिए।

चूंकि दुनिया में पूंजीवादी विचार हावी है, इसलिए पेटेंट के समर्थन में बने यह सिद्धांत भी पूंजीवादी विचार के ही देन है। अगर समाजवादी रुझान से सोचा जाए तो समाजवादी रुझान के जानकारों का कहना होता है कि व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर करता है। इसलिए अगर परेशानी सामाजिक है और सामूहिक है तो परेशानी के इलाज पर भी पूरे समूह का हक होना चाहिए। वैज्ञानिक तभी कोई शोध कर पाता है जब समाज की तरफ से उसे वह सारी सुविधाएं मिलती हैं जिससे वह वैज्ञानिक बन पाए। उसकी वैज्ञानिक बनने में पूरे समाज का योगदान है। उसे अपने श्रम और मेहनत का इनाम जरूर मिलना चाहिए लेकिन इतना नहीं कि समाज को ही गुलाम बना ले।

यहां भी देखा जाए तो ऑक्सफोर्ड/ अस्ट्राजेनका वैक्सीन बनाने में तकरीबन 97 फ़ीसदी फंड अमेरिका के लोगों के जरिए मिला है। यह केवल किसी कंपनी का योगदान नहीं है कि कंपनी यह कहे कि उसे अपने रिसर्च की बढ़ाने के लिए पैसे की जरूरत है इसलिए वह पैसा लेती है। यही बात पूरी तरह भारत के कोवैक्सिन पर लागू होती है, जिसे बनाने में सबसे बड़ा योगदान इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का है, जो भारत सरकार की एक संस्था है। भारत सरकार से दिया गया पैसा यानी जनता की जेब से दिया गया पैसा। लेकिन फिर भी इसको वैक्सीन की कीमत 1200 रुपए निर्धारित की गई है। जो ऐसे लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना पर कहीं से भी फिट नहीं बैठता जो अपने वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए लोगों से मिले कई तरह के करो पर निर्भर होता है।

पेटेंट से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया है। पोलियो वैक्सीन बनाने वाले जोनास साल्क के साथ एक साक्षात्कार के दौरान सीबीएस के पत्रकार एडवर्ड आर मॉरो ने पूछा था कि इस वैक्सीन का पेटेंट किसके पास है। साल्क ने इस सवाल के जवाब में कहा था "मैं तो यही कहूंगा कि इसका पेटेंट लोगों के पास है। इस वैक्सीन का कोई पेटेंट नहीं है। क्या आप सूरज को पेटेंट करा सकते हैं? ” यही वह भावना है, जो विज्ञान और साल्क जैसे वैज्ञानिकों को इस बात के लिए प्रेरित करती है कि विज्ञान को सार्वजनिक हित के लिए होना चाहिए, न कि कंपनियों के निजी फ़ायदे के लिए के लिए।

हालांकि विज्ञान, विश्वविद्यालय या सार्वजनिक अनुसंधान संस्थान जैसे सार्वजनिक क्षेत्र ज़्यादातर दवाओं या टीकों के लिए ज़रूरी ज्ञान के प्रमुख वजह होते हैं, लेकिन इसका फ़ायदा निजी कंपनियों द्वारा उठाया जाता है, और वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन यानी विश्व व्यापार संगठन के ट्रेड रिलेटिड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स से यह नियंत्रित होता है।

ट्रेड रिलेटेड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के दौरान अनिवार्य लाइसेंसिंग देने की व्यवस्था भी है। जिसके मुताबिक महामारी जैसे समय में अगर कोई देश चाहे तो बिना पेटेंट धारक की अनुमति से पेटेंट धारक के देश से पेटेंट का लाइसेंस ले सकता है। किसे इस्तेमाल करने के लिए पेटेंट लेने वाले देश को पेटेंट धारक देश को रॉयल्टी के तौर पर कुछ देना पड़ेगा। लेकिन कंपलसरी लाइसेंसिंग के तहत पेटेंट लेने वाला देश केवल अपने देश के लिए उत्पादन कर सकता है। इसका इस्तेमाल निर्यात के लिए नहीं कर सकता। 

न्यूज़क्लिक के अपने एक लेख में प्रबीर पुरकायस्थ लिखते हैं कि जब भी भारत ने दूसरे गरीब देशों को निर्यात के लिए अनिवार्य लाइसेंस के इस्तेमाल पर विचार किया है जैसे कि जीवन रक्षक कैंसर दवाओं के लिए, तो यूएस ने यूएसटीआर 301 प्रावधान के तहत भारत को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे डाली है। यानी पूरी दुनिया से कोरोना संक्रमण खत्म करने में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स से जुड़े कानून बहुत बड़ी बाधा के तौर पर मौजूद हैं।

कोरोना के संक्रमण से बचाने के लिए पूरी दुनिया में हर्ड इम्यूनिटी की संभावना पैदा करना बहुत जरूरी है। यह तभी हो पाएगा जब दुनिया के सभी हिस्सों तक वैक्सीन पहुंच पाए। इसलिए पिछले साल की 2 अक्टूबर को भारत और दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर विश्व व्यापार संगठन से गुहार लगाई कि वह ट्रेड रिलेटिड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइटस से जुड़े इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को तब तक के लिए स्थगित कर दें जब तक इस दुनिया से कोरोना का कहर ना खत्म हो जाए। ऐसा होने पर ही दुनिया के तमाम देशों के बीच वैक्सीन उत्पादन से जुड़ी तकनीक फैल पाएगी और सभी बिना किसी रोक-टोक के वैक्सीन का उत्पादन कर पाने की कोशिश करेंगे। भारत और दक्षिण अफ्रीका के इस निवेदन का तकरीबन सौ देशों ने समर्थन किया।

लेकिन अमेरिका यूरोपियन यूनियन यूनाइटेड किंगडम कनाडा जैसे कुछ मुट्ठी भर चंद विकसित देशों ने इसका विरोध किया। जबकि इन देशों के पास अपनी जनता के लिए भरपूर वैक्सीन है। इन देशों के अलावा दुनिया के कई ऐसे गरीब मुल्क है जहां तक वैक्सीन पहुंचने में साल 2024 तक का समय लग जाए। अगर इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स से जुड़े कानून स्थगित नहीं किए जाते हैं तो इसका मतलब है कि पूरी दुनिया में बहुत बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन कर पाना नामुमकिन होगा। वायरस को जितना अधिक समय दिया जाएगा उतना अधिक म्युटेट होगा। जितना अधिक म्यूटेट उतना अधिक वैज्ञानिकों के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। चूंकि यह वायरस है तो इसका मतलब यह भी है कि अगर यह किसी गरीब मुल्क में उन लोगों के बीच मौजूद है जहां वैक्सीनेशन नहीं हुआ है तो यह दुनिया के किसी भी हिस्से को फिर से संक्रमित करने के लिए अपनी ताकत इकट्ठा कर रहा है। 

इसलिए दवाओं को कोने-कोने तक पहुंचाने की वकालत करने वाले गैर लाभकारी अभियान, मेडिसिंस लॉ एंड पॉलिसी की डायरेक्टर एलंट ह्योन अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ वेबसाइट डीडब्ल्यू से अपनी बातचीत में कहती हैं, "हमें ये स्वीकार करना होगा कि वायरस किसी सीमा को नहीं जानता, ये पूरे विश्व में घूमता है, लिहाजा इससे निपटने का तरीका भी वैश्विक होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को इसका आधार बनाया जाना चाहिए। कई बड़े स्तर के वैक्सीन निर्माता विकासशील देशों में हैं। जितनी प्रोडक्शन क्षमता है, उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि जिन लोगों के पास जानकारी और तकनीक है वे इसे साझा करें।"

Patents of Medicines
Vaccine Patents
Covid Vaccine
TRIPS
WTO
TRIPs Agreement
Oxford AstraZeneca

Related Stories

कोविड-19 टीकाकरण : एक साल बाद भी भ्रांतियां और भय क्यों?

जानिए ओमिक्रॉन BA.2 सब-वैरिएंट के बारे में

फाइज़र का 2021 का राजस्व भारत के स्वास्थ्य बजट से सात गुना ज़्यादा है

कोविड -19 के टीके का उत्पादन, निर्यात और मुनाफ़ा

कोविड-19: देश में 15 से 18 वर्ष के आयुवर्ग के बच्चों का टीकाकरण शुरू

ओमिक्रॉन से नहीं, पूंजी के लालच से है दुनिया को ख़तरा

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मानवीय संकटों की अलोकप्रियता को चुनौती

ट्रिप्स छूट प्रस्ताव: पेटेंट एकाधिकार पर चर्चा से कन्नी काटते बिग फार्मा

100 करोड़ वैक्सीन डोज आंकड़े के सिवाय और कुछ भी नहीं!

क्यूबा: 60 फ़ीसदी आबादी का पूर्ण टीकाकरण, बनाया रिकॉर्ड


बाकी खबरें

  • sc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पीएम सुरक्षा चूक मामले में पूर्व न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में समिति गठित
    12 Jan 2022
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘‘सवालों को एकतरफा जांच पर नहीं छोड़ा जा सकता’’ और न्यायिक क्षेत्र के व्यक्ति द्वारा जांच की निगरानी करने की आवश्यकता है।
  • dharm sansad
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
    12 Jan 2022
    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को भविष्य में 'धर्म संसद' के आयोजन के खिलाफ स्थानीय प्राधिकरण को अभिवेदन देने की अनुमति दी।
  • राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    विजय विनीत
    राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    12 Jan 2022
    "आरएसएस को असली तकलीफ़ यही है कि अशोक की परिकल्पना हिन्दू राष्ट्रवाद के खांचे में फिट नहीं बैठती है। अशोक का बौद्ध होना और बौद्ध धर्म धर्मावलंबियों का भारतीय महाद्वीप में और उससे बाहर भी प्रचार-…
  • Germany
    ओलिवर पाइपर
    जर्मनी की कोयला मुक्त होने की जद्दोजहद और एक आख़िरी किसान की लड़ाई
    12 Jan 2022
    पश्चिमी जर्मनी में एक गांव लुत्ज़ेराथ भूरे रंग के कोयला खनन के चलते गायब होने वाला है। इसलिए यहां रहने वाले सभी 90 लोगों को दूसरी जगह पर भेज दिया गया है। उनमें से केवल एक व्यक्ति एकार्ड्ट ह्यूकैम्प…
  • Hospital
    सरोजिनी बिष्ट
    लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़
    12 Jan 2022
    लखनऊ के साढ़ामऊ में स्थित सरकारी अस्पताल को पूरी तरह कोविड डेडिकेटेड कर दिया गया है। इसके चलते आसपास के सामान्य मरीज़ों, ख़ासकर गरीब ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। साथ ही इसी अस्पताल के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License