NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी: बीजेपी को इमरजेंसी जैसे हालात अब क्यों आए याद?
अगर महाराष्ट्र में घटी यह घटना इमरजेंसी का प्रतीक है तो देश के अन्य भागों में पत्रकारों के साथ जो घटनाएं घटती रही हैं उनके बारे में बीजेपी की राय क्या है?
प्रेम कुमार
05 Nov 2020
cartoon click

गृहमंत्री, वित्तमंत्री, रक्षा मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री समेत तमाम मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी को प्रेस की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं। केंद्र सरकार और सत्ताधारी दल की ऐसी एकजुट आवाज़ कभी किसी पत्रकार के लिए नहीं देखी गयी थी। इससे पता चलता है अर्णब गोस्वामी का रसूख।

और, यह बात भी कि 2018 में डबल सुसाइड के मामले में अर्णब पुलिस की गिरफ्त से दूर कैसे रह गये। सुसाइड लेटर में नाम लेकर अर्णब गोस्वामी को मौत का जिम्मेदार ठहराया गया था।

एडिटर्स गिल्ड, इंडिया टीवी, आजतक और कई स्वतंत्र पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने भी अर्णब की गिरफ्तारी की निन्दा की है। अर्णब गोस्वामी के साथ धक्का-मुक्की को भी गलत बताया है।

मगर, प्रश्न यह है कि क्या अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पत्रकारीय वजह से हुई है? क्या यह एक पत्रकार को उसका काम करने से रोकने का मामला है? अगर हां, तो वे सब लोग सही हैं जो इस गिरफ्तारी को गलत बता रहे हैं।

सुशांत के लिए इंसाफ की आवाज़ तो अन्वय-कुमुद नाइक के लिए क्यों नहीं?

कोंकोर्ड डिजाइन के मैनेजिंग डायरेक्टर अन्वय नाइक और कंपनी में डायरेक्टर रहीं उनकी मां कुमुद नाइक ने 5 मई 2018 को आत्महत्या कर ली थी। सुसाइड नोट में जिम्मेदार लोगों में अर्णब गोस्वामी का नाम भी था जिन पर 83 लाख बकाया रकम नहीं देने के आरोप थे।

अन्वय की पत्नी का कहना है कि बगैर जांच के ही रायगढ़ पुलिस ने पिछले साल केस बंद कर दिया। मृत्यु की दूसरी बरसी पर पत्नी वीडियो जारी कर हत्यारों को अदालत तक पहुंचाने की अपील की। तब महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने मामले की जांच सीआईडी से कराने की घोषणा की। अर्णब की गिरफ्तारी के बाद अन्वय की पत्नी अक्षता नाइक और बेटी आज्ञा नाइक ने प्रेस कान्फ्रेन्स कर इंसाफ की मांग की है।

अगर पत्रकारिता की बात है तो आवाज़ इंसाफ के लिए उठनी चाहिए। अन्वय और उनकी मां कुमुद को इंसाफ कैसे मिलेगा, यह आवाज़ मिलनी चाहिए। रिपब्लिक टीवी के लिए यह मामला खास तौर पर उठाना जरूरी है क्योंकि वह सुशांत सिंह आत्महत्या मामले में इंसाफ की लड़ाई लड़ता रहा है।

जबकि, उस मामले में हत्या को लेकर अब तक कोई पुख्ता सबूत सामने नहीं आए हैं। अन्वय-कुमुद डबल सुसाइड केस में सुसाइड लेटर है। अर्णब समेत अन्य दो जिम्मेदार लोगों के नाम हैं। हिन्दुस्तान की पत्रकारिता क्यों मौन है? सुशांत के लिए इंसाफ मांगने वाले अन्वय-कुमद के लिए क्यों नहीं इंसाफ की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं?

देशभर में पत्रकारों पर जुल्म होते रहे, चुप्पी क्यों बनी रही?

अर्णब मामले में विपक्ष की चुप्पी को पत्रकारिता के खिलाफ बता रही है बीजेपी। इमरजेंसी के दौर की याद दिला रहे हैं बीजेपी नेता। अगर महाराष्ट्र में घटी यह घटना इमरजेंसी का प्रतीक है तो देश के अन्य भागों में पत्रकारों के साथ जो घटनाएं घटती रही हैं उनके बारे में बीजेपी की राय क्या है?

सीएए एनआरसी का विरोध करने वाले पत्रकार मंजीत महंता और उनके साथ साहित्यकार हीरेन गोहैन और आरटीआई कार्यकर्ता अखिल गोगोई पर देशद्रोह का केस डालना और उन्हें गिरफ्तार करना क्या इमरजेंसी की याद नहीं दिलाता है?

उत्तर प्रदेश में बीते एक साल में 15 पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह के मुकदमे ठोंके गये। कुछेक मामलों का जिक्र उदाहरण के तौर पर करना जरूरी है :

* जनसंदेश टाइम्स के सुरेश बहादुर सिंह और धनंजय सिंह पर ऑफिशियल सेक्रेट एक्ट के उल्लंघन के आरोप में केस दर्ज किए गये।

* क्वारंटीन सेटर पर बदइंतजामी की खबर छापने के बाद सीतापुर में रवींद्र सक्सेना पर केस दर्ज हुआ।

* वाराणसी की सुप्रिया शर्मा को इसलिए मुकदमों में फंसाया गया क्योंकि उन्होंने पीएम के गोद लिए गांव डोमरी में भूखे रहने को मजबूर लोगों की खबर दिखाई थी।

* सरकारी स्कूल में मिड डे मील में बच्चों को नमक-रोटी खिलाने की खबर छापने पर मिर्जापुर के पत्रकार पंकज जायसवाल पर केस दर्ज करा दी गयी, जिसे बाद में हंगामे के बाद हटा लिया गया।

* बिजनौर में पांच पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज हुए जब दबंगों के डर से वाल्मीकि परिवार के पलायन की खबर छापी गयी। इनमें आशीष तोमर, शकील अहमद, लाखन सिंह, आमिर खान और मोइन अहमद शामिल हैं।

* लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार असद रिजवी पर सितंर में मुहर्रम के दौरान शांति भंग करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। 2 अक्टूबर को एक प्रदर्शन के दौरान उनकी पिटाई भी की गयी।

* द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ अयोध्या में दो एफआईआर दर्ज की गयी। लॉकडाउन के बावजूद एक समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शामिल होने संबंधी खबर छापने और अफवाह फैलाने का दोष उन पर मढ़ा गया।

* लॉकडाउन के दौरान एक नेत्रहीन दंपती को कम्युनिटी किचन से खाना लेने में हो रही दिक्कत संबंधी ख़बर छापने पर फतेहपुर के पत्रकार अजय भदौरिया पर एफआईआर दर्ज की गयी।

* प्रशांत कनौजिया को मुख्यमंत्री के खिलाफ ट्वीट करने पर अलग-अलग मामलों में दो बार गिरफ्तार किया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप पर रिहाई के बाद दूसरी बार यूपी पुलिस ने उन्हें दिल्ली से गिरफ्तार किया।

कश्मीर टाइम्स का दफ्तर बीते महीने ही सील किया गया है। संपादक अनुराधा भसीन लंबे समय से कश्मीर में ज्यादती के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही हैं। यहां पत्रकारों पर जुल्म के उदाहरण एक से बढ़कर एक हैं, मगर कभी बीजेपी नेताओं को इमरजेंसी की याद नहीं आयी।

अनलॉफुल प्रिवेन्शन एक्ट यानी यूएपीए के तहत पत्रकारों को जेलों में ठूंस दिया गया। मशरत जाहरा, गौहर गिलानी, द हिन्दू के श्रीनगर संवाददाता पीरजादा आशिक को 5 अगस्त 2020 के बाद जेलों में डाला गया। एडिटर्स गिल्ड ने भी इन गिरफ्तारियों की निन्दा की थी और यूएपीए लगाने को गलत ठहराया था। इससे पहले भी कश्मीर नैरेटर की आसिफ सुल्तान पर 27 अगस्त 2018 को यूएपीए के तहत केस दर्ज हुआ तो काजी शिबली पर 25 जुलाई 2019 को। क्या ये उदाहरण इमर्जेंसी की याद नहीं दिलाते?

कर्नाटक में पत्रकार डी नरसिम्हमूर्ति को माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया गया। पत्रकारों के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन सीपीजे ने भी इस गिरफ्तारी का विरोध किया था।

कर्नाटक में ही सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन में मारे गये व्यक्ति के परिजनों से बात करने पर केरल के 5 पत्रकारों को पुलिस ने गिरफ्तार करने की घटना भी भुलाने वाली नहीं है। केरल के सीएम ने जब कर्नाटक के सीएम को चिट्ठी लिखी तब उन्हें छोड़ा गया था।

पत्रकारों को उनका काम करने से रोकना, उन पर देशद्रोह के मुकदमे लगाना और आपराधिक मामलों मे फर्क होता है। हालांकि यह देखने की भी जरूरत है कि आपराधिक मामलों का इस्तेमाल भी किसी पत्रकार को परेशान करने के लिए तो नहीं है?

अर्णब गोस्वामी के मामले में जिन लोगों को डबल सुसाइड केस में ऐसा लगता है कि उन्हें फंसाया जा रहा है उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इस मामले में बगैर मुकम्मल जांच के जब केस बंद किया गया था, तब क्या पीड़ितों की आवाज़ नहीं दबायी गयी थी? मृतक परिवार की मां-बेटी अक्षता नाइक और आज्ञा नाइक ने इंसाफ के लिए गुहार लगायी है तो क्या इससे आंखें मूंद ली जाएंगी?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

arnab goswami
BJP
journalist
freedom of speech
Maharastra
Amit Shah
Nirmala Sitharaman
rajnath singh
JP Nadda
BJP politics
Godi Media

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • ganguli and kohli
    लेस्ली ज़ेवियर
    कोहली बनाम गांगुली: दक्षिण अफ्रीका के जोख़िम भरे दौरे के पहले बीसीसीआई के लिए अनुकूल भटकाव
    19 Dec 2021
    दक्षिण अफ्रीका जाने के ठीक पहले सौरव गांगुली बनाम विराट कोहली की टसल हमारी टीवी पर तैर रही है। यह टसल जितनी वास्तविक है, यह इस तथ्य पर पर्दा डालने के लिए भी मुफ़ीद है कि भारतीय टीम ऐसे देश का दौरा कर…
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License