NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की: ‘किल द बिल’ के नारे के साथ ब्रिटेन में तेज़ हुआ पुलिस की निरंकुशता के ख़िलाफ़ विरोध
क्या यह महज़ संयोग है, या फिर दुनिया में कई जगहों पर राजनीतिक या सैन्य शासक अपनी सत्ता को चुनौती मिलते देख ज़्यादा निरंकुश अधिकारों को अपनाने पर ज़ोर दे रहे हैं।
उपेंद्र स्वामी
06 Apr 2021
ब्रिटेन में ‘पुलिस, क्राइम, सेंटेंसिंग एंड कोर्ट्स’ बिल का विरोध। फोटो साभार : रायटर्स 
ब्रिटेन में ‘पुलिस, क्राइम, सेंटेंसिंग एंड कोर्ट्स’ बिल का विरोध। फोटो साभार : रायटर्स 

एक साल से तमाम तरह की परेशानियां—जिनमें कोरोना का कहर, ब्रेक्सिट का बवाल और अस्थिर राजनीतिक नेतृत्व शामिल हैं—झेल रहे ब्रिटेन में इन दिनों एक अलग किस्म का असंतोष फैला हुआ है, और वह है पुलिस के लिए प्रस्तावित एक नए अधिकार के ख़िलाफ़। पूरे ब्रिटेन में रैलियां निकल रही हैं, और शनिवार को तो लंदन में प्रदर्शनकारियों व पुलिस में झड़प भी हुई।

आंदोलनकारियों व आम लोगों का कहना है कि इस प्रस्तावित नए अधिकार का इस्तेमाल विरोध व प्रदर्शनों को कुचलने के लिए किया जा सकता है। ऐसा लगता है कि हमें भारत में पिछले कुछ सालों में आए कानूनों में बदलावों की प्रतिध्वनि सी यहां सुनाई दे रही है। क्या यह महज़ संयोग है, या फिर दुनिया में कई जगहों पर राजनीतिक या सैन्य शासक अपनी सत्ता को चुनौती मिलते देख ज़्यादा निरंकुश अधिकारों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। ऐसा देखने में तो कई जगह आया है। हमारे यहां तो हम बिल लाए बिना ही किसी भी प्रदर्शन को (जो प्रदर्शनकारियों का संवैधानिक अधिकार है) कीलों, दीवारों व खंदकों से बींध देते हैं।

ब्रिटेन में लाए गए ‘पुलिस, क्राइम, सेंटेंसिंग (सज़ा) एंड कोर्ट्स’ बिल का मकसद पुलिस अधिकारियों को प्रदर्शनों को तितर-बितर करने के लिए ज्यादा अधिकार देना है। वे प्रदर्शनों पर समय की सीमा भी लगा सकते हैं और इस बात की भी कि वे कितनी आवाज़ कर सकते हैं। एक्टिविस्टों को डर है कि इस बिल का इस्तेमाल विरोध को कुचलने के लिए किया जा सकता है।

पूरा विधेयक तकरीबन 300 पन्नों का है और इसमें कई तरह की बातें शामिल हैं, लेकिन मुख्य बात है पुलिस को इस बात को तय करने का ज्यादा अधिकार दे देना कि कौन सा प्रदर्शन सार्वजनिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ है। विधेयक में अपराधों की सज़ा, जेल से रिहाई आदि मसलों पर कई प्रावधान हैं। लेकिन मुख्य विरोध प्रदर्शनों से निबटने वाले प्रावधानों को लेकर है।

लिहाजा ब्रिटेन के कई शहरों व कस्बों में ‘किल द बिल’ (बिल को खत्म करो) के नारे के साथ मार्च आयोजित किए गए। कई रैलियों में तो हजारों की तादाद में लोग शामिल थे। इन प्रदर्शनों को कई बड़े अभियान दलों का समर्थन हासिल था जिनमें जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए अभियान चलाने वाले समूह, एक्सटिंक्शन रेबेलियन और ब्लैक लाइव्ज मैटर आंदोलन भी शामिल हैं। (हमारे यहां के विपरीत फिलहाल किसी ने वहां आंदोलन में विदेशी दखलंदाजी का आरोप नहीं लगाया है।) ब्रिटेन में पुलिस से जुड़े कई लोग यह भी मानते हैं कि आंदोलन को ‘किल द बिल’ नाम देना जानबूझकर भड़काने वाली करतूत है क्योंकि ब्रिटेन में पुलिस के लिए पुकार का एक नाम ‘द बिल’ भी चलता है।

लोगों का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि यह बिल दरअसल एक्सटिंक्शन रेबेलियन द्वारा 2019 की शुरुआत में किए गए आंदोलन की परिणति है। उस समय आंदोलन के चलते लंदन के कई इलाके बंद व जाम से पड़ गए थे, ट्रेनें रोक दी गई थीं। तब कई नेताओं ने यह आवाज उठाई थी कि पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए जाने चाहिए। दरअसल दुनिया की तमाम सत्ताएं इस समय यह चाह रही हैं कि प्रदर्शन इस तरह के होने चाहिए जिससे किसी के कानों पर जूं तक न रेंगे। फिर भला कोई प्रदर्शन किस काम का! कौन उसकी परवाह करेगा?

ब्रिटेन की गृह मंत्री प्रीति पटेल का कहना है कि आखिरकार विरोध प्रदर्शन करने वाले के अधिकार और रोजमर्रा की जिंदगी जीने के व्यक्तियों के अधिकार के बीच कोई तो संतुलन होना चाहिए। याद करेंगे तो ध्यान आएगा कि सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ में और देश में कई जगहों पर हुए प्रदर्शनों को खत्म करने के लिए यही दलील अक्सर दी गई थी।

पिछले महीने ही यह बिल ब्रिटिश संसद में ले आया गया था। तभी से उसके खिलाफ आवाज उठनी और प्रदर्शन होने तो शुरू हो गए थे। बीते शनिवार को विरोध का राष्ट्रव्यापी सप्ताहंत मनाया गया था। देशभर में इस तरह के 50 प्रदर्शन हुए, जो ब्रिटेन के आकार को देखते हुए कम नहीं हैं। ब्रिटेन का दक्षिण-पश्चिमी शहर ब्रिस्टल इन प्रदर्शनों में अग्रणी है। ब्रिस्टल वही शहर है जहां पिछले साल ब्लैक लाइव्ज मैटर प्रदर्शनों का खासा जोर था और ब्रिस्टल हार्बर पर लगी 17वीं सदी के गुलामों के कारोबारी एडवर्ड कॉल्स्टन की प्रतिमा को गिराकर उसे जलमग्न कर दिया गया था।

फोटो साभार : रायटर्स 

बताया जाता है कि हालिया प्रदर्शनों में अचानक तेजी तब आई जब मार्च के शुरू में पुलिस ने लंदन में एक महिला की हत्या के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को निरंकुश तरीके से खत्म करने की कोशिश की। पुलिस की उस हरकत ने इस विधेयक को लेकर लोगों को सचेत करके सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया।

ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेता भी शनिवार के विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए। उसके पूर्व प्रमुख जेरेमी कोर्बिन ने कहा कि मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रदर्शन करने की आज़ादी के अधिकार की हिफ़ाजत करने के लिए इसमें शिरकत कर रहा हूं। लेबर पार्टी पहले इस बिल पर वोटिंग के दौरान बायकॉट करने की योजना बना रही थी, लेकिन अब उसने समझदारी दिखाते हुए इसके खिलाफ वोट देने का फैसला किया है। ब्रिटेन में गवर्नेंस पर निगरानी करने वाली संस्था ‘द गुड लॉ प्रोजेक्ट’ ने भी कहा है कि यह बिल विरोध के अधिकार के लिए गंभीर खतरा है और इस बिल में विरोध प्रदर्शनों से संबंधित प्रावधानों को हटा दिया जाना चाहिए।

यह कोई हैरानी की बात नहीं। यूरोप के कई देशों ने पिछले एक साल में कई प्रदर्शनों का दौर देखा है। कोरोना के संकट से जिस तरह से निबटा गया, उसको लेकर कई देशों में प्रदर्शन हुए। ब्लैक लाइव्ज मैटर के प्रदर्शनों का भी यहां काफी जोर रहा। फिर फ्रांस में सुरक्षा बिल को लेकर जबर्दस्त प्रदर्शनों का दौर रहा। ऐसा लगता है कि सत्ताएं प्रदर्शनों से घबरा रही हैं। 

ब्रिटिश बिल फिलहाल कानून बनने से कुछ दूरी पर है क्योंकि उसमें थोड़ा वक्त लगेगा। अभी एक (प्रवर समिति की तर्ज पर) कमेटी इस पर विचार करेगी, आपत्तियां सुनेगी, संशोधन सुझाएगी और फिर दुबारा इसे हाउस ऑफ कॉमंस में वोटिंग के लिए रखा जाएगा। लेकिन इससे सत्ता की नीयत का अंदाज़ा तो साफ़ हो ही जाता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

britain
UK Protest
Kill the bill
Priti Patel
United kingdom

Related Stories

ब्रिटिश गैस के कर्मचारियों की अनुबंधों में अनिश्चितता के ख़िलाफ़ हड़ताल

एसओएएस के शोधकर्ताओं ने छुट्टियों और अस्थायी कार्य अनुबंधों को रद्द करने का विरोध किया


बाकी खबरें

  • bharat ek mauj
    न्यूज़क्लिक टीम
    भारत एक मौज: क्यों नहीं हैं भारत के लोग Happy?
    28 Mar 2022
    'भारत एक मौज' के आज के एपिसोड में संजय Happiness Report पर चर्चा करेंगे के आखिर क्यों भारत का नंबर खुश रहने वाले देशों में आखिरी 10 देशों में आता है। उसके साथ ही वह फिल्म 'The Kashmir Files ' पर भी…
  • विजय विनीत
    पूर्वांचल में ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल के बीच सड़कों पर उतरे मज़दूर
    28 Mar 2022
    मोदी सरकार लगातार मेहनतकश तबके पर हमला कर रही है। ईपीएफ की ब्याज दरों में कटौती इसका ताजा उदाहरण है। इस कटौती से असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सर्वाधिक नुकसान होगा। इससे पहले सरकार ने 44 श्रम कानूनों…
  • एपी
    रूस-यूक्रेन अपडेट:जेलेंस्की के तेवर नरम, बातचीत में ‘विलंब किए बिना’ शांति की बात
    28 Mar 2022
    रूस लंबे समय से मांग कर रहा है कि यूक्रेन पश्चिम के नाटो गठबंधन में शामिल होने की उम्मीद छोड़ दे क्योंकि मॉस्को इसे अपने लिए खतरा मानता है।
  • मुकुंद झा
    देशव्यापी हड़ताल के पहले दिन दिल्ली-एनसीआर में दिखा व्यापक असर
    28 Mar 2022
    सुबह से ही मज़दूर नेताओं और यूनियनों ने औद्योगिक क्षेत्र में जाकर मज़दूरों से काम का बहिष्कार करने की अपील की और उसके बाद मज़दूरों ने एकत्रित होकर औद्योगिक क्षेत्रों में रैली भी की। 
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    माले का 11वां राज्य सम्मेलन संपन्न, महिलाओं-नौजवानों और अल्पसंख्यकों को तरजीह
    28 Mar 2022
    "इस सम्मेलन में महिला प्रतिनिधियों ने जिस बेबाक तरीक़े से अपनी बातें रखीं, वह सम्मेलन के लिए अच्छा संकेत है।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License