NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कला
भारत
भारतीय लोक जीवन में कला और कलाकार: अतीत और वर्तमान
आधुनिक विज्ञान के नये अविष्कारों द्वारा  जहाँ मानव जाति ने नये प्रतिमान स्थापित किये हैं, लेकिन उनकी कला और सौंदर्य के प्रति अभिरुचि को विरूपित ही किया है। अब देश और  समाज में कलाकारों को वैसा सम्मान और संरक्षण प्राप्त नहीं है।
डॉ. मंजु प्रसाद
30 Aug 2020
बुद्ध और अंगुलीमाल
बुद्ध और अंगुलीमाल, चित्रकार: मंजु प्रसाद

आधुनिक भारत  में भारतीय कला की पाश्चात्य देशों की कला से प्रमुदित और प्रभावित भारतीय अभिजात द्वारा घोर उपेक्षा की गयी। फलस्वरूप भारत की शास्त्रीय और परम्परागत कला और कलाकारों  की स्थिति दयनीय और सम्मान रहित हो गयी। ऐसे में  स्वतंत्रता पूर्व ही हिन्दी भाषा के कई विद्वान हुए  जिन्होंने  अपने लेखन से भारतीय कला की गरिमा से विश्व और भारतीय जनों को रूबरू कराया।

रायकृष्ण दास ने अपनी पुस्तक भारत की  चित्रकला  में भारतीय समाज में  कला की उपयोगिता के बारे में लिखा- "ऐतिहासिक दृश्यों का संरक्षण, जीवन की घटनाओं का संरक्षण, कुल के पूर्वजों , देश के महापुरुषों का समृति चित्रण, ,प्रेम की अभिव्यक्ति, रस का चित्रण, वर-वधु चयन एवं सगाई रस्म, तथा विवाह संस्कार के लिए, धार्मिक कार्यों  के लिए अलंकरण। इन चित्रों में प्रतीकों से  भी सम्बद्ध विषयों की अभिव्यक्ति की जाती थी।"

प्राचीन  भारत में  मूर्ति और स्थापत्य कला की महान परंपरा रही है। कला राजा और सामंतो के साथ-साथ जनता के भी जीवन का अंग थी। चाणक्य के अर्थशास्त्र के अनुसार,  'शिल्पियों की अपनी  पंचायतें होती थीं। वे मिल कर कर काम करते थे'। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, 'शिल्पकारों, चित्रकारों, बढ़ई, कर्मकार, चर्मकार आदि के अलग-अलग गांव होते  थे और बड़े नगरों में एक एक मुहल्ला होता था।' जिनका अपना महत्व होता  था। राज्यों में इन्हे सम्मान और संरक्षण प्राप्त था। तभी तो उन्होंने कठोर परिश्रम से पत्थरों को काट कर सुन्दर और अद्भुत मूर्ति शिल्पों और स्थापत्य -निर्माण किया जो आज भी विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित है।

मथुरा के परखम नाम के गांव विशाल यक्ष  मूर्ति, मथुरा से प्राप्त मनसा की मूर्ति और पटना के दीदारगंज से चांवरधारिणी (चंवर डुलाने  वाली) मूर्तियां ई. पू. छठी शती  इतनी मानवीय और मांसल है  कि सादृश्य मूर्तण  सदृश मानी जा सकती हैं। ये मूर्तियां चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल की मानी  जा सकती हैं।

मूर्तिकला और स्थापत्य कला  एक दूसरे पर निर्भर  रहने वाली कलाएं हैं। भारत में मूर्तिकला का वास्तु (इमारत) से विशेष संबंध रहा है, क्योकि सभी भवनों पर मूर्तियां और नक्काशी अवश्य  रहती थी; दूसरी ओर मूर्तियों की स्थापना के लिए विशाल व उच्च कोटि के भवनों का निर्माण किया जाता था (रायकृष्ण दास ,भारतीय मूर्ति कला)।

चंद्रगुप्त ने विशाल और कलात्मक भवनों का निर्माण कराया था। जिनका वर्णन  दरबार  में रह  रहे  ग्रीक राजदूत  मेगास्थनीज ने  किया है। जिसके लेखन के कुछ अंश प्राप्त हैं। उसके अनुसार  'वे काष्ठ निर्मित भवन और प्रस्तर मूर्ति शिल्प का प्रयोग, स्थापत्य कला   में  उत्कृष्ट और श्रेष्ठ  उदाहरण हैं।

सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के प्रबल अनुयायी थे उनके राज्य काल भारतीय स्थापत्य और मूर्ति कला का स्वर्णिम युग था। अशोक के कलिंग विजय का इतिहास सबको ज्ञात है। इस युद्ध के दौरान लाखों मनुष्य मारे गए और घायल हुए। यह विजय अशोक के लिए मानसिक यंत्रणा  एवं पश्चाताप  का कारण बन गये। दोनों पक्षों के अंग-भंग हुए  घायल शरीर और क्षत-विक्षत सैनिकों के शव देख अशोक घोर दुःख तथा गहन विषाद से घिर गये। युद्ध की विभीषिका में वे वितृष्णा से भर गये। प्रायश्चित बोध से उद्वेलित हो एक महा हृदय परिवर्तन के फलस्वरूप सम्राट अशोक  भगवान  बुद्ध के दिखाए मार्ग के अनुगामी बन गये। उन्होंने बुद्ध के उपदेशों को अपने कुशल शिल्पियों और मूर्तिकारों द्वारा पहाड़ों, विशालकाय चट्टानों और प्रस्तर स्तंभों पर मूर्तियों और अर्ध मूर्तियों (रिलिफ वर्क) के साथ सुन्दर लिपि में खुदवाया। जिन्हे वे धम्मलिपि कहते थे। इन धम्म लिपियों में संदेश है कि अब रक्तपात वाली लड़ाई नहीं होगी,सभी जीवों के प्रति  प्रेम व दया भाव  हो। अशोक ने अपने संतानों और भावी पीढ़ी को शिक्षा दी कि वे रक्तपात वाले विजय न प्राप्त करें, धर्म द्वारा विजय ही वास्तविक विजय है। उन्होंने  लोकहित  को जीवन का ध्येय बना लिया। अशोक स्वयं बौद्ध धर्मावलंबी होते हुए, वे सभी पंथों को एक दृष्टि से देखते थे और उनका प्रयत्न रहता था कि विभिन्न पंथ वाले परस्पर प्रेम ,आदर और सहिष्णु ढंग से रहे।

अशोक कालीन विशालकाय शिला स्तंभों पर बुद्ध के उपदेश कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण हैं, जो भारतीय अक्षरांकण कला (कैलीग्राफ़ी) के बेहतरीन  उदाहरण हैं। इन लाठों (पीलर)  पर बनी मूर्तियां संसार भर में अपनी उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध हैं। ये सभी स्तंभ  चुनार के पत्थरों  से बने हैं। इनकी चमक अनोखी है, ऐसा माना जाता है कि इन पर वज्रलेप लगाया गया है। ज्यादातर स्तंभों पर पशु आकृतियाँ जैसे सिंह, हाथी, बैल या घोड़ा  धम्म चक्र के साथ बनी हैं। सारनाथ में पाया गया  सिंह की मूर्तियों वाला स्तंभ श्रेष्ठ माना गया है।

IMG-20200830-WA0013.jpg

सांची स्तूप का प्रवेश द्वार। साभार : ‘क’ पत्रिका

सम्राट अशोक को बहुत बड़ा वास्तु निर्माता माना जाता है। उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के लिये बहुत सारे  स्तूप बनवाये। जिसके बारे में  प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान (पांचवी शती ) ने भी लिखा है। सांची का बौद्ध स्तूप (120 फुट -54 फुट ) अभी भी मौजूद है। इस स्तूप के चारों  तरफ प्रदक्षिणाएं बनी हैं। जिन पर  प्रवीण शिल्पियों ने बुद्ध  के जीवन से संबंधित और बोधिसत्व के जीवन  से संबंधित, और मानव जीवन में प्रेम, वात्सल्य, रौद्र, आध्यात्मिक, युद्ध  आदि  आठ रसों को कठोर प्रस्तर के अर्द्ध मूर्ति शिल्पों में अत्यंत सजीव ढंग से उत्कीर्ण किया है।  जिसमें से कई स्थापत्य मूर्ति कला के उदाहरण भारत की भूमि पर मौजूद हैं। जो  आज भी विश्व भर के बौद्ध धर्मावलंबियों के उपासना स्थल तो हैं ही साथ ही विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। जहाँ उन्हें स्थानीय कलाकारों द्वारा बनाए गए  परंपरागत शैली के चित्र, मूर्तियां, और शिल्प कला के नमूने मिल जाते हैं।

परन्तु अब देश और  समाज में कलाकारों को वैसा सम्मान और संरक्षण प्राप्त नहीं है। कलाकारों और शिल्पकारों को उनकी कलाकृतियों के सही मूल्य भी नहीं प्राप्त होते हैं। बस बिचौलियों को ही फायदा पहुंच रहा है। तो ऐसे में स्तरीय कला, सृजन की संभावनायें क्षीण होती हैं।

आधुनिक विज्ञान के नये अविष्कारों द्वारा  जहाँ मानव जाति ने नये प्रतिमान स्थापित किये हैं, लेकिन उनकी कला और सौंदर्य के प्रति अभिरुचि को विरूपित ही किया है। खासकर प्लास्टिक के प्रचलन के कारण चित्र, मूर्तियां उनके पसंद की चीज नहीं रह गयीं। फलस्वरूप भारतीय भी अपने घरों की साज सज्जा में प्लास्टिक की मूर्तियां या अन्य डेकोरेशन  करते हैं। यहाँ तक कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक  महंगे प्लास्टिक रंगों से अपने घरों के दीवारों तक को रंग कर गौरान्वित होते हैं।

(लेखक डॉ. मंजु प्रसाद एक चित्रकार हैं। आप इन दिनों लखनऊ में रहकर पेटिंग के अलावा ‘हिन्दी में कला लेखन’ क्षेत्र में सक्रिय हैं।) 

Indian Folk Life
Art and Artists
art
Folk Art
Folk Artist
Indian art
Modern Art
Traditional Art

Related Stories

'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला

राम कथा से ईद मुबारक तक : मिथिला कला ने फैलाए पंख

सार्थक चित्रण : सार्थक कला अभिव्यक्ति 

आर्ट गैलरी: प्रगतिशील कला समूह (पैग) के अभूतपूर्व कलासृजक

आर्ट गैलरी : देश की प्रमुख महिला छापा चित्रकार अनुपम सूद

छापा चित्रों में मणिपुर की स्मृतियां: चित्रकार आरके सरोज कुमार सिंह

जया अप्पा स्वामी : अग्रणी भारतीय कला समीक्षक और संवेदनशील चित्रकार

कला गुरु उमानाथ झा : परंपरागत चित्र शैली के प्रणेता और आचार्य विज्ञ

चित्रकार सैयद हैदर रज़ा : चित्रों में रची-बसी जन्मभूमि

कला विशेष: भारतीय कला में ग्रामीण परिवेश का चित्रण


बाकी खबरें

  • Merkel Scholz
    उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: जर्मनी में ‘ट्रैफिक लाइट गठबंधन’ के हाथों में शासन की कमान
    25 Nov 2021
    मर्केल दौर की समाप्ति, मध्य-वाम मार्गी ओलफ़ शुल्ज़ होंगे नए चांसलर। उम्मीद की जा रही है कि तकरीबन अगले एक माह के भीतर 177 पन्नों वाले गठबंधन समझौते का अनुमोदन करने के बाद नई सरकार सत्ता संभाल लेगी।
  • Russo-Uzbek
    एम. के. भद्रकुमार
    रुस-उज़बेक संबंध क्षेत्रीय स्थिरता का एक महत्वपूर्ण कारक
    25 Nov 2021
    रुसी-उज्बेक संबंधों की वर्तमान sतिथि का मध्य एशिया में अंतर-क्षेत्रीय समीकरणों पर निश्चित्त तौर पर एक लाभकारी व शांतिदायक प्रभाव पड़ेगा।
  • violence against women
    राज वाल्मीकि
    महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस 2021 का महत्व
    25 Nov 2021
    अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष 25 नवम्बर से 10 दिसम्बर तक महिलाओं और बालिकाओं पर हिंसा बंद हो, इसके लिए 16 दिन तक जागरूकता कार्यक्रम किए जाते हैं।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखण्ड : शहीद स्मारक धरोहर स्थल पर स्कूल निर्माण के ख़िलाफ़ आदिवासी संगठनों का विरोध
    25 Nov 2021
    आदिवासी संगठन ने प्रशासन से कहा कि स्मारक स्थल वर्षों से उनकी आस्था उपासना का भी केंद्र रहा है. इससे उनकी धार्मिक आस्थाएं जुडी हुई हैं. विद्यालय निर्माण होने से यह स्थल हमेशा के लिए नष्ट हो जायेगा।…
  •  Fidel Castro
    अनीश अंकुर
    फिदेल कास्त्रो: लैटिन अमेरिका सहित समूची दुनिया में क्रांतिकारी शक्तियों के प्रतीक पुरुष
    25 Nov 2021
    25 नवंबर फिदेल कास्त्रो की पुण्यतिथि है। पांच साल पहले क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो का निधन हो गया था। साम्राज्यवाद के खिलाफ फिदेल कास्त्रो का संघर्ष पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा स्त्रोत…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License