NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कला
भारत
अंतरराष्ट्रीय
चित्रकार निकोलाय रेरिख:  जिनकी आत्मा बसती थी भारत में
'कला ही समस्त जाति को एकीकृत करेगी। कला एक है और वह अविभाज्य है, वह आगे आने वाले मानवीय संश्लेषण का अभिव्यक्तिरण है। कला सबके लिए है...’
डॉ. मंजु प्रसाद
13 Sep 2020
चित्रकार निकोलाय रेरिख
चित्रकार निकोलाय रेरिख, साभारः हिमालय की आत्मा का चितेरा निकोलाय रेरिख, लेखक-डॉ जगदीश चंद्रिकेश

निकोलाय रेरिख (जन्म 9 अक्तूबर 1874 -मृत्यु 13 दिसम्बर 19 74) का विश्वास था कि 'कला ही समस्त जाति को एकीकृत करेगी। कला एक है और वह अविभाज्य है, वह आगे आने वाले मानवीय संश्लेषण का अभिव्यक्तिरण है। कला सबके लिए है। प्रत्येक व्यक्ति सच्ची कला का आनंद प्राप्त करेगा और कला का प्रकाश असंख्य लोगों के हृदय को एक नूतन प्रेम से प्रदीप्त करेगा। पहले-पहल तो यह भावना अवचेतन में होगी, लेकिन बाद में वह मानव चेतना को शुद्ध करेगी।'

निकोलाई मानवता के प्रति इतने संवेदनशील हो गये थे कि उन्होंने कहा 'हमें केवल म्यूजियमों, थियेटरों, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक स्थलों, पुस्तकालयों और अस्तपतालों को ही नहीं सजाना है, बल्कि बंदीगृहों को भी सजाना और उन्हें सुन्दर बनाना है, कि वे बंदीगृह ही न रहें।' (हिमालय की आत्मा का चितेरा निकोलाई रेरिख, ले. डॉ. जगदीश चंद्रिकेश)।

रवीन्द्रनाथ टैगोर उनसे काफी प्रभावित थे उन्होंने रेरिख के बारे में लिखा ' ललित कलाओं के इतिहास में समय-समय पर ऐसे अनेक व्यक्ति पैदा हुए हैं, जिनका कृतित्व अपनी गुणात्मक विशिष्टता के कारण उन्हें उनके समकालीनों से अलग, एक विशेष स्थान दिलाता रहा है।

उस विशिष्टता के कारण उन्हें किसी ज्ञात श्रेणी में रखना या किसी धारा विशेष से जोड़ना संभव नहीं है, क्योंकि वे अपने-आप में अकेले व अद्वितीय होते हैं। रेरिख अपने चरित्र और कला की दृष्टि से उन्हीं गिने-चुने कलाकारों में से एक रहे हैं।'

अपने भारत प्रेम को रेरिख ने यूँ जाहिर किया

 'ओ भारत

हे अत्यंत सौंदर्यमय देश

मुझे अनुमति दो

अपने हृदयोल्लास को

तुम्हें अर्पित करने की

मेरा हृदय

तुम्हारे प्राचीन नगरों, मंदिरों

तुम्हारी वादियों,पवित्र नदियों

और हिमालय की भव्यता

के वैभव से अभिभूत है

अनुप्रेरित है...’

निकोलाय रेरिख रूसी चित्रकार, लेखक, पुरातत्वविद् और दार्शनिक थे। बौद्ध धर्म से तो वे प्रभावित थे ही इसके अलावा वे थियोसोफिस्ट थे। उनके पिता कांस्तनतिनोविच फ्योदरविच रेरिखस्कैंडिनेवियाई (योद्धा) मूल के थे और माँ  मरिया वसिलियेव्ना का संबंध रूस के प्रख्यात प्स्कोव परिवार से था। कांस्तनतिनोविच पेशे से वकील (सेंट पीटर्सबर्ग सर्किट कोर्ट) थे। और उन्होंने अपने पैसे से सेंट पीटर्सबर्ग के पास ही एक स्टेट खरीदा। जिसके भवन में उन्हें एक डच चित्रकार द्वारा बनाया गया हिमालय पर्वत श्रृंखला का चित्र मिला जिसमें सूर्यास्त के सुन्दर रंगों से प्रकाशमय कंचनजंघा पर्वत माला की बर्फ से ढकी चोटियां चित्रित थीं। इस चित्र ने निकोलाय रोरिख के बाल मन को बहुत प्रभावित किया और वे भारत के प्रति आकर्षित हुए। उस भवन में एक पुस्तकालय भी था जिसने उनमें इतिहास के प्रति प्रेम पैदा किया ।

बचपन से ही निकोलाय रेरिख चित्रकला, अध्ययन और पुरातत्व में रूचि रखते थे।  उनके पिता के चित्रकार मित्र मिखाइल मीकेशीन ने उन्हें चित्रकला की प्रारंभिक शिक्षा दी। लेकिन उनके पिता की इच्छा थी कि रेरिखभी वकील बनें। अतः स्कूली शिक्षा के बाद निकोलाई ने इंपीरियल यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी में दाखिला लिया साथ ही पिता को सहमत कर, इंपीरियल अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स में भी दाखिला लिया। कला शिक्षा के दौरान ही कला शिक्षक आर्किप कुइनजी के प्रभाव में रेरिख ने अपनी मौलिक शैली विकसित की।

2nd image.jpgउनके चित्रों में ऐतिहासिक विषय और प्राकृतिक दृश्यों का समन्वय था। वे इतिहासकार स्तासोव की इस मान्यता से प्रभावित थे कि प्राचीन रूसी सभ्यता और पूर्वी एशियाई सभ्यता के बीच संबंध रहा है। स्तासोव ने सिद्ध किया था कि रूसी लोक काव्य, पर्शियन लोक काव्य- शाहनामा और भारतीय महाकाव्य महाभारत में समानताएं हैं। इससे प्रभावित होकर निकोलाय रोरिख ने ऐतिहासिक घटनाओं पर चित्र श्रृंखला बनाई जिसमें 'संदेश-वाहक शीर्षक चित्र को काफी प्रसिद्धि मिली। रेरिख तालस्ताय से भी मिले और उनसे बहुत प्रभावित हुए।

कला के बारे में और ज्यादा जानने के लिए रेरिख बर्लिन, ड्रेस्डेन, म्यूनिख होते हुए पेरिस पहुंचे। गोगा और देगा से काफी प्रभावित हुए। रूस वापस पहुंचने पर उनकी  1901 में हेलेना से शादी हो गई। हेलेना के पिता एक कुशल आर्किटेक्ट थे जिनकी मृत्यु हो चुकी थी। उनके बड़े बेटे यूरी (जार्ज) का सन् 1902 में और छोटे पुत्र  स्व्यातोस्लाव(स्वेतोस्लाव) का सन् 1904 में जन्म हुआ।

1904 में रेरिख ने लोक कथाओं पर आधारित एक चित्र बनाया 'आगत अतिथि ' जिसमें शांति के संदेश को चित्रित किया गया था।

विनष्ट होती प्रकृति के प्रति चिंता जतलाते हुए निकोलाय ने एक लेख लिखा जिसमें बताया कि पाषाणयुग मानवता का स्वर्णयुग था, क्योंकि उसमें मानव प्रकृति के साथ मिलकर सामंजस्य के साथ रहता था और उसके लिए कार्य तथा कला एक ही थी। रेरिख की दृष्टि में आधुनिक सभ्यता ने अतीत के सबसे सम्पन्न तत्व सौंदर्य को खो दिया है। उन्होंने लिखा-- 'हरेक सुन्दर वस्तु हमारी जिन्दगी से गायब हो गई है। हमारे समय में व्याप्त व्यापक नैराश्य एवं उदासीनता है उसमें सौंदर्य के लिए तो कोई स्थान नहीं रह गया है। '( निकोलाई रेरिख, लेखक डॉ. जगदीश चंद्रिकेश)

1903 में रेरिख अपनी पत्नी हेलेना के साथ रूस के भ्रमण के लिए निकल पड़े। जिसमें उनका उद्देश्य था रूस की प्राचीन इमारतों, स्मारकों और स्थापत्य के अध्धयन का। जिनको उन्होंने चित्रों में बड़े और गतिशील तूलिकाघात (ब्रश स्ट्रोक्स) से चित्रित किया। उन्होंने ये चित्र आम जनता को अपनी प्राचीन स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत का महत्व समझाने और संरक्षण के लिए चित्रित किया । इन चित्रों की सफल प्रदर्शनी रूस, प्राग, वियाना, वेनिस , म्यूनिख,बर्लिन आदि शहरों में हुए और विश्व प्रसिद्ध संग्रहालयों ने उनके चित्रों को खरीदा।

निकोलाय रेरिख ने 1917 के रूसी जन क्रांति का समर्थन किया। उन्होंने लोक कलाओं और हस्तकलाओं को भी बहुत महत्त्व दिया। उनके अनुसार कला केवल म्यूजियम और गैलरियों के लिए ही नहीं,बल्कि दैनिक जीवन के उपयोग का अभिन्न अंग होनी चाहिए ।उन्होंने ललित कला और हस्त कला को एक समान ही महत्व दिया ।

रेरिख बहुमुखी प्रतिभा वाले थे वे रंग मंच के प्रसिद्ध डिजाइनर थे। उन्होंने इब्सन के एक पांच अंकीय नाटक लिए तेरह सेट बनाए। जिन्होंने रूसी कला में अपने प्रतिमान स्थापित किये।

निकोलाय के लिए 1910 आवसादपूर्ण रहा। इसी साल तालस्ताय और उनके कला शिक्षक आर्किप कुइनजी की मृत्यु हो गई थी। यह समय रूस में युद्ध और अशांति का समय था।

रूसी जनक्रांति के दौरान ही अत्यधिक कठोर श्रम के कारण रेरिख निमोनिया ग्रस्त हो गये और स्वास्थ्य लाभ के लिए परिवार समेत फिनलैंड चले गये।

वहां वह स्वास्थ्य लाभ करते कला सृजन में पूरी तरह से डूब गये। हलांकि रूस के हालात से वे बेहद चिंतित और व्यथित थे। यद्यपि रोरिख की शिक्षा-दीक्षा पाश्चात्य पद्धति में हुई थी। लेकिन पूर्व के संस्कृति की ओर उनका झुकाव बचपन से था। भारतीय धर्म और दर्शन के संपर्क में वे पहले से ही थे। यह झुकाव उनका अपनी ऑ ऑ हेलेना के कारण भी हुआ। रबीन्द्रनाथ टैगोर कि कविताएं उन्हें पसंद थीं। प्राचीन स्लाव और भारतीय संस्कृति के गहन अध्ययन से उनका विश्वास गहरा होता गया कि दोनों संस्कृतियां किसी एक मूल से विकसित हुईं हैं। इस लगाव के कारण वे चिंतित थे कि अंग्रेज अपने अधीनस्थ भारतीय संस्कृति को नष्ट कर डालेंगे।

उनके एक मित्र दिघिलेव ने 'प्रिंस इगोर के नाटक के सेट बनाने के लिए ब्रिटेन आमंत्रित किया और 1919 में निकोलाय  सपरिवार ब्रिटेन पहुंचे। ब्रिटेन में रोरिख द्वारा  ओपेराओं के  बनाये गये लिए बनाए गए सेट इतने सराहे गए कि अन्य देशों से भी बुलाया जाने लगा। ब्रिटेन में ही वो पहली बार रबीन्द्रनाथ टैगोर से मिले। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया परंतु ब्रिटिश हुकूमत के असहयोग के कारण रेरिख भारत नहीं जाने पाये। शिकागो आर्ट इंस्टीट्यूट के निर्देशक रोबर्ट हार्शे के निमंत्रण पर 3 अक्तूबर 1920 को पानी के जहाज से न्यूयार्क पहुंचे। जहाँ उन्होंने ढेरों चित्र बनाए जिसकी प्रदर्शनी लगाई गई। उनके चित्र अमेरिकी दर्शकों के लिए बिल्कुल नये ढंग के थे।

निकोलाय रेरिख ने न्यूयार्क में मास्टर इंस्टीट्यूट ऑफ यूनाइटेड आर्ट्स खोला जहाँ सभी कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाता था। अमेरिका में रेरिख के सम्मान में रेरिख म्यूजियम की स्थापना की गई। जिसमें उनके एक हजार से ज्यादा चित्रों को संग्रहित किया गया।

बहुत कोशिश और तैयारी के बाद रेरिख 2 दिसंबर 1923 को जलयान से सपरिवार मुंबई पहुंचे।

वे भारत के कला संस्कृति का गहन अध्ययन करना चाहते थे। इसकी शुरूआत उन्होंने मुंबई के एलीफेंटा की गुफाओं से करते हुए जयपुर, बनारस, सारनाथ होते हुए कोलकाता पहुंच कर रविन्द्रनाथ टैगोर से मिले। कोलकता के दार्शनिक, विचारक और कलाकारों ने रेरिख और उनके अभियान का स्वागत किया। इसके बाद वे दार्जिलिंग पहुंच कर सिक्किम के पास एक सुन्दर स्थल पर ठहरे। पांचवें दलाई लामा जिस घर में रूके थे उसे रेरिख ने अपना निवास-स्थान बनाया। जहां से हिमालय पर्वत श्रृंखला के सुन्दर और मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता था। दार्जीलिंग के कुछ महीने के प्रवास के दौरान उन्होंने 'हिज कंट्री 'शीर्षक से चित्र श्रृंखला बनाई जिसमें हिमालय पर्वत श्रृंखला को उच्च आध्यात्मिक सौंदर्य के साथ चित्रित किया।

दरअसल रेरिख ने बहुत पहले से ही भारत और मध्य एशिया में हिमालय के मैदानी तथा अल्ताई व मंगोलिया में विकसित सभ्यता और संस्कृति के गहन वैज्ञानिक अध्ययन अभियान की योजना बना रखी थी। जिसके लिए उन्होंने कश्मीर,सिक्किम, लद्दाख, के दुर्गम  पहाड़ियों को लांघा और प्राकृतिक दृश्यों पर आधारित सुन्दर चित्रण किया। इस अभियान के दौरान उन्हें और उनके काफिले को अत्यंत कठिन स्थितियों से गुजरना पड़ा।

ब्रिटिश सरकार को रेरिख का अभियान पसंद नहीं था, क्योंकि रेरिख ने अपने कार्यो द्वारा पौरवात्व के ज्ञान-विज्ञान और उसकी महानता को उजागर किया था। रेरिख के इस कार्य ने साम्राज्यवादी अंग्रेजों को एक गंभीर चिंता में डाल दिया था।  इसी बीच रेरिख मास्को भी गए थे। इसलिए रेरिख पर भारत आगमन के साथ ही गुप्तचर निगरानी आरंभ हो गई थी। हिमालय अभियान के दौरान जब रेरिख तिब्बत की सीमा में प्रवेश कर रहे थे तो ब्रिटिश सरकार के इशारे पर तिब्बती सेना ने हिरासत में लेकर उन्हें और उनकी पत्नी को अमानवीय यंत्रणाएं पहुंचाई।

इन यंत्रणाओं की कहानी रेरिख द्वारा न्यूयार्क स्थित रेरिख म्यूजियम को भेजे गये तार से पता चलता है। 1947 में रूस के महान विजय और भारत की स्वतंत्रता का उत्सव मनाने के साथ ही हृदय रोग के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

उनके बड़े पुत्र यूरी रेरिख विश्व स्तर के प्राच्यविद्याविद एवं पुरावेत्ता थे। वहीं  स्वेतोस्लाव रेरिख अंतररार्ष्ट्रीय ख्याति के चित्रकार थे। भारतीय हिन्दी फिल्म अभिनेत्री देविका रानी उनकी पत्नी थीं।

एक प्रतिभावान, संवेदनशील और साहसिक चित्रकार निकोलाय ने जो भारतीय प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदा का सुन्दर वर्णन और अंकन किया है वे अद्भुत हैं। इसके लिए भारत उनका हमेशा आभारी रहेगा।

कला आशा और विश्वास का प्रतीक है। रेरिख के अनुसार, 'विश्व में शांति केवल कला और संस्कृति के माध्यम से ही स्थापित हो सकती है, क्योंकि, कला पीड़ित मानवता को स्नेहिल स्पर्श प्रदान करती है।' (  निकोलाई रोरिक, ले. डॉ. जगदीश चंद्रिकेश)

(लेखक डॉ. मंजु प्रसाद एक चित्रकार हैं। आप इन दिनों लखनऊ में रहकर पेंटिंग के अलावा ‘हिन्दी में कला लेखन’ क्षेत्र में सक्रिय हैं।) 

art artist
Environment
Indian painting
Indian Folk Life
Art and Artists
Folk Art
Folk Artist
Indian art
Modern Art
Traditional Art
Artist Nicholas Roerich

Related Stories

सार्थक चित्रण : सार्थक कला अभिव्यक्ति 

आर्ट गैलरी: प्रगतिशील कला समूह (पैग) के अभूतपूर्व कलासृजक

आर्ट गैलरी : देश की प्रमुख महिला छापा चित्रकार अनुपम सूद

छापा चित्रों में मणिपुर की स्मृतियां: चित्रकार आरके सरोज कुमार सिंह

जया अप्पा स्वामी : अग्रणी भारतीय कला समीक्षक और संवेदनशील चित्रकार

कला गुरु उमानाथ झा : परंपरागत चित्र शैली के प्रणेता और आचार्य विज्ञ

चित्रकार सैयद हैदर रज़ा : चित्रों में रची-बसी जन्मभूमि

कला विशेष: भारतीय कला में ग्रामीण परिवेश का चित्रण

कला विशेष: जैन चित्र शैली या अपभ्रंश कला शैली

कला विशेष : महिला कलाकार की स्वतंत्र चेतना और विषय निर्भीकता


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License