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ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक
हर हफ़्ते की ज़रूरी ख़बरों को लेकर एक बार फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन
अनिल जैन
08 May 2022
Aap
अरविंद केजरीवाल

राष्ट्रपति शासन से डरी विपक्षी सरकारें

महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, झारखंड आदि ऐसे राज्यों में, जहां भाजपा विरोधी प्रादेशिक पार्टियों की सरकार है और भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी है वहां पिछले कुछ दिनों से लगातार राष्ट्रपति शासन की चर्चा सुनाई दे रही है। भाजपा की राजनीति और केंद्रीय एजेंसियों, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की सक्रियता की वजह से भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकारें खतरे में हैं। सत्तारूढ़ पार्टियां खुद भी प्रचार कर रही हैं कि उनके यहां राष्ट्रपति शासन लग सकता है। जहां भाजपा मुख्य विपक्षी नहीं है जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यों में इस तरह की चर्चा नहीं है। महाराष्ट्र में मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर भाजपा खूब सक्रिय है और वहां उससे ज्यादा सक्रिय हैं केंद्रीय एजेसियां। सत्तारूढ़ महाविकास अघाड़ी में शामिल तीनों पार्टियों- शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं पर शिकंजा कसा है। एक दर्जन से ज्यादा नेता सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग के लपेटे में हैं। हनुमान चालीसा और लाउडस्पीकर का विवाद अलग चल रहा है। इसीलिए शिव सेना नेता संजय राउत बार-बार कह रहे हैं कि केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगाना चाहती है। इसी तरह झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने नाम से खदान आवंटित कराके लाभ के पद के मामले मे फंसे हैं तो उनका पूरा परिवार किसी न किसी घोटाले में आरोपी है। उनकी सदस्यता पर चुनाव आयोग की तलवार लटकी है। अगर मुख्यमंत्री का इस्तीफा होता है या किसी तरह की अस्थिरता होती है तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। ऐसे ही पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था का बड़ा मुद्दा बना है और हिंसा के मामले में केंद्रीय एजेंसियां एक के बाद एक तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर रही हैं। इसीलिए तृणमूल के नेता भी आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगाने की साजिश रच रही है।

तो दिल्ली से ऐसे चलेगी पंजाब सरकार 

पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पहले दिन से ही कहा जाता रहा है कि पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल दिल्ली में बैठ कर पंजाब सरकार सरकार चलाएंगे। यह बात अब धीरे-धीरे सही साबित हो रही है। पिछले दिनों पंजाब में मुफ्त बिजली का फैसला करने से पहले बिजली विभाग के अधिकारियों की एक बैठक दिल्ली में हुई थी, जिसे लेकर बहुत विवाद हुआ था। उस बैठक में न तो पंजाब के मुख्यमंत्री शामिल थे और न ही पंजाब के बिजली मंत्री को बुलाया गया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री और दिल्ली के बिजली मंत्री ने पंजाब के अधिकारियों के साथ बैठक करके फैसला किया था और उसके एक दिन बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान को बुला कर फैसला बता दिया गया था, जिसकी उन्होंने घोषणा कर दी। इसे लेकर विवाद हुआ और रिमोट से पंजाब सरकार चलाने की खबरें आईं तो अब उस तरह के विवाद से बचने का एक रास्ता निकाला गया है। पिछले महीने के आखिरी में मुख्यमंत्री भगवंत मान दो दिन की दिल्ली यात्रा पर आए थे तब बताया गया कि उन्होंने दिल्ली सरकार के कामकाज के मॉडल का अध्ययन किया। इस दौरान बताया गया कि दिल्ली और पंजाब सरकार के बीच नॉलेज शेयरिंग का एक करार हुआ। इसके तहत दिल्ली सरकार की योजनाओं को पंजाब की जरूरत के हिसाब से लागू किया जाएगा। माना जा रहा है कि इस करार से दिल्ली के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों को पंजाब सरकार के कामकाज को प्रभावित या नियंत्रित करने का अधिकार मिल जाएगा। नॉलेज शेयरिंग करार के तहत अगर दिल्ली के मंत्री या मुख्यमंत्री पंजाब के अधिकारियों को कुछ निर्देश देंगे तो माना जाएगा कि वह दिल्ली की अच्छी योजनाओं को पंजाब में लागू करने के समझौते के तहत हो रहा है।

सरकारों ने छीने राज्यपालों के अधिकार 

कई राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच पिछले लंबे समय टकराव अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है कि राज्य सरकारें राज्यपालों के अधिकारों में कटौती कर रही हैं। एक तरफ उनका आरोप है कि राज्यपाल भाजपा की राजनीति के लिहाज से विरोधी पार्टियों की सरकारों को परेशान कर रहे हैं और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहे हैं तो दूसरी ओर राज्य सरकारें राज्यपालों के संविधान प्रदत्त अधिकारों में कटौती कर रही हैं। इसमे घनघोर भाजपा विरोधी पार्टियों की सरकारें तो शामिल हैं ही, भाजपा के समर्थन वाली सरकार और भाजपा का परोक्ष समर्थन करने वाली सरकार भी शामिल है। भाजपा के समर्थन वाली बिहार सरकार ने राज्यों के विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलरों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से ले लिया है। कई नए बन रहे विश्वविद्यालयों के कानून में ऐसा प्रावधान किया गया कि उप कुलपतियों की नियुक्ति राज्य सरकार करेगी। पश्चिम बंगाल सरकार ने भी राज्य के विश्वविद्यालयों में उप कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से ले लिया है और राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के पदेन चांसलर पद से हटाने का भी प्रस्ताव किया है। तमिलनाडु में राज्य सरकार ने विधानसभा से बिल पास करके वाइस चांसलरों की नियुक्ति का राज्यपाल का अधिकार सीमित कर दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने भी इस तरह का बिल पास किया है। केरल और ओड़िशा में भी राज्य सरकारों ने इस मामले में राज्यपाल के अधिकार कम किए हैं। 

रिजर्व बैंक में इतनी हिम्मत कहां से आई? 

कहां तो भारतीय रिजर्व बैंक की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह ब्याज दरों में नीतिगत बदलाव करे और कहां उसने आपात बैठक बुला कर ब्याज दरें न सिर्फ बढ़ा दीं बल्कि यह संकेत भी दे दिया कि आने वाले समय में इन दरों में और भी बढ़ोतरी होगी। रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा समिति की हर दो महीने में एक बार होने वाली पिछली बैठक आठ अप्रैल को हुई थी, जिसमें ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया था। अगली मौद्रिक समीक्षा आठ जून को होनी थी लेकिन उससे पहले चार मई को ही रिजर्व बैंक ने समिति की आपात बैठक की और रेपो रेट में 0.40 अंक की बढ़ोतरी कर दी। इसके साथ ही नकद आरक्षित अनुपात यानी सीआरआर भी बढ़ा दिया। रेपो रेट बढ़ाने से कर्ज महंगा होगा और सीआरआर बढ़ाने से बैंकों के पास नकदी कम होगी, जिससे वे कम कर्ज दे पाएंगे। महंगाई काबू करने के लिए यह कदम उठाया गया है लेकिन सवाल है कि रिजर्व बैंक ने यह हिम्मत कहां से जुटा ली कि उसने न सिर्फ रेपो रेट बढ़ाया, बल्कि सीआरआर भी बढ़ा दिया? दरअसल रिजर्व बैंक को यह हिम्मत बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन से मिली। अप्रैल में हुई मौद्रिक समीक्षा में जब रिजर्व बैंक ने ब्याज दर नहीं बढ़ाई तब रघुराम राजन ने एक इंटरव्यू में ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं करने के लिए बैंक की आलोचना की थी। रघुराम राजन ने दो टूक अंदाज में कहा था कि महंगाई काबू में करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना कोई देशद्रोह नहीं है। उन्होंने 25 अप्रैल को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए एक न एक दिन रिजर्व बैंक को ब्याज दर बढ़ानी ही होगी। इसके पांच दिन बाद अप्रैल का महंगाई का आंकड़ा आया और खुदरा महंगाई सात फीसदी के करीब पहुंच गई। तब रिजर्व बैक ने हिम्मत जुटाई और जून में होने वाली नियमित समीक्षा बैठक का इंतजार किए बगैर आपात बैठक बुला कर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी।

दूसरों के गिरहबान में झांकते केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने विवादित बयानों के लिए मशहूर रहे हैं। एक जमाने में उन्होंने देश के तमाम नेताओं को भ्रष्ट बताया था और बाद में बारी-बारी सबसे माफी मांगी थी। कई नेताओं से तो उन्होंने लिखित में माफी मांगी। लेकिन वे जानते हैं कि बाद में मांगी गई माफी किसी को याद नहीं रहती है। लोग पहले कही गई बात को ही याद रखते हैं। अपनी इस सोच के तहत उन्होंने गुजरात भाजपा के अध्यक्ष सीआर पाटिल पर हमला बोला और कहा कि वे महाराष्ट्र के रहने वाले हैं। उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा को गुजरात चलाने के लिए एक गुजराती नहीं मिला। सवाल है कि केजरीवाल की इस बात का क्या मतलब है? यह सही है कि सीआर पाटिल का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था लेकिन वे अब गुजरात मे रहते हैं और नवसारी सीट से तीसरी बार लोकसभा का चुनाव जीते हैं। अगर महाराष्ट्र में जन्मे सीआर पाटिल का गुजरात का अध्यक्ष बनना गलत है तो हरियाणा में जन्मे और पले-बढ़े अरविंद केजरीवाल का दिल्ली का मुख्यमंत्री बनना कैसे सही हो सकता है? केजरीवाल का जन्म हरियाणा के भिवानी मे हुआ और पढ़ाई हिसार व सोनीपत में हुई। उनकी पार्टी बड़ी शान से उनको हरियाणा का बेटा बता कर हरियाणा में अपना प्रचार करती है। इसके बावजूद वे दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में जन्मे मनीष सिसोदिया दिल्ली के उप मुख्यमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश के ही सुल्तानपुर के रहने वाले संजय सिंह दिल्ली से आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य हैं और दिल्ली के रहने वाले और दिल्ली से ही विधायक रहे राघव चड्ढा को अभी केजरीवाल ने पंजाब से राज्यसभा में भेजा है। इसके बावजूद वे गुजरात में जाकर क्षेत्रवाद की बात कर रहे हैं।

गुजरात में हारने की इच्छा से ग्रस्त है कांग्रेस 

गुजरात में छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और आम आदमी पार्टी ने तैयारी शुरू कर दी है जबकि कांग्रेस में अभी तक तैयारी जैसा कुछ नहीं दिख रहा है और उलटे उसके नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला तेज हो गया है। प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल लगातार पार्टी छोड़ने के संकेत दे रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर अपने बायो से कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह हटा दिया है। पहले कहा जा रहा था कि वे आम आदमी पार्टी में जाएंगे लेकिन अब वे ज्यादा रुझान भाजपा की ओर दिखा रहे हैं। उम्मीद की जा रही थी कि नरेश पटेल कांग्रेस में शामिल होंगे लेकिन प्रशांत किशोर और कांग्रेस की बातचीत विफल होने के बाद नरेश पटेल का मामला भी अधर मे लटका है। इस बीच कांग्रेस के कई स्थानीय नेता और कुछ पूर्व विधायक पार्टी छोड़ कर भाजपा और आम आदमी पार्टी में चले गए हैं। आदिवासियों में लोकप्रिय नेता छोटूभाई वसावा की भारतीय ट्राइबल पार्टी का आम आदमी पार्टी से गठबंधन हो गया है। वे पहले शरद यादव के साथ जुड़े हुए थे। शरद यादव के साथ कांग्रेस के अच्छे संबंध हैं और पिछले दिनों राहुल गांधी उनसे मिलने गए थे और उनको अपना गुरू बताया था लेकिन पार्टी छोटूभाई वसावा के साथ उनके संबंधों का कोई फायदा नहीं उठा सकी।

गुजरात में मंत्रियों के बाद अब विधायकों की बारी

भाजपा ने पिछले साल गुजरात में पूरी सरकार बदल दी थी। मुख्यमंत्री विजय रूपानी को हटा कर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया था और मंत्री भी सारे बदल दिए थे। अब चर्चा है कि मंत्रियों के बाद विधायकों की बारी है। पार्टी इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में तीन या तीन से अधिक बार विधायक रहे नेताओं के टिकट काट सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि पिछली सरकार में मंत्री रहे जितने विधायकों को इस सरकार में मंत्री नही बनाया गया उनमें से भी ज्यादातर की छुट्टी हो सकती है। असल में भाजपा गुजरात में लगातार 27 साल से सरकार में है। उसे राज्य की 27 साल की और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की आठ साल की एंटी इन्कम्बैसी का सामना करना है। इसलिए पार्टी पुराने विधायकों के टिकट काट सकती है। इसी साल हिमाचल प्रदेश में भी विधानसभा का चुनाव होना है और कहा जा रहा है कि वहां भी भाजपा बड़ी संख्या में विधायकों के टिकट काटेगी। पार्टी ने वहां मुख्यमंत्री नहीं बदला है लेकिन बिना बदले ही इस बात की चर्चा करा दी है कि अगर फिर से भाजपा की सरकार बनी तो केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर राज्य के मुख्यमंत्री हो सकते हैं। इस तरह जयराम ठाकुर को बनाए रखते हुए भाजपा ने बदलाव का संकेत दे दिया है। जानकार सूत्रों के मुताबिक राज्य के 40 फीसदी विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं। पिछले साल राज्य में हुए उपचुनावों में मिली हार के बाद से ही पार्टी ऐसे विधायकों की पहचान कर रही है, जिनके खिलाफ एंटी इन्कम्बैसी ज्यादा है।

केजरीवाल की राजनीतिक पैंतरेबाजियां

पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाने के बाद महत्वाकांक्षा के घोड़े पर सवार अरविंद केजरीवाल का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। वे अपने राजनीतिक विरोधियों को छकाने के लिए कमाल की भविष्यवाणियां कर रहे हैं। हालांकि जरूरी नहीं है कि उनकी भविष्यवाणियां सही साबित हों। कई बार तो वे गलत होने के लिए भविष्यवाणी करते हैं। यानी वे चाहते हैं कि जो वे कह रहे हैं वह नहीं हो। लेकिन उनको यह भी पता होता है कि ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि वे उसके होने की भविष्यवाणी करें। वे पहले ही कुछ बातें ऐसी कह देते हैं कि उनके विरोधी बैकफुट पर आ जाते हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने गुजरात चुनाव की भविष्यवाणी की है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह गुजरात के नेताओं से मिले तो केजरीवाल ने कहा कि भाजपा और मोदी-शाह दोनों आम आदमी पार्टी से डर गए हैं और समय से पहले गुजरात विधानसभा भंग करके चुनाव कराने की तैयारी कर रहे हैं। हो सकता है कि ऐसी कोई योजना भाजपा की नहीं हो लेकिन इस तरह का बयान देकर केजरीवाल ने यह मैसेज देने का प्रयास किया है कि गुजरात में उनकी पार्टी मुकाबले में है, कांग्रेस नहीं और भाजपा को कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी से डर लग रहा है। इसी तरह का एक बयान केजरीवाल ने पंजाब चुनाव के समय दिया था। उन्होंने कहा था कि केंद्रीय एजेंसियां दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ्तार करने वाली हैं। उस बयान के तीन महीने बाद अभी तक जैन गिरफ्तार नहीं हुए। असल में वह बयान भी सत्येंद्र जैन को गिरफ्तारी से बचाने के लिए दिया गया था।

(लेखक अनिल जैन स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, विचार निजी हैं) 

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