NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अरविंद केजरीवाल, प्रताप भानु मेहता दोनों अपनी विचारधारा के भोगी हैं
जिस तरह हिंदू कार्ड हिंदुत्व को ख़त्म करने का हथियार नहीं हो सकता, उसी तरह उदार मक़सदों को हासिल करने की लड़ाई को वित्तीय पूंजी के सहारे नहीं लड़ा जा सकता।
एजाज़ अशरफ़
27 Mar 2021
अरविंद केजरीवाल, प्रताप भानु मेहता दोनों अपनी विचारधारा के भोगी हैं

सत्तावाद के बढ़ते उफ़ान ने दो नए शिकार बनाए,भले ही इन दोनों को दोनों फ़र्ज़ी मामलों में उस तरह जेल नहीं भेजा गया, जिस तरह कुछ असहमति रखने वाले लोगों को भेजा गया है। संसद के उस अधिनियम ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की बहुत सारी शक्तियां छीन ली हैं, जिसने दिल्ली के शासन में उनकी संवैधानिक प्रधानता को उस उपराज्यपाल के अधीन कर दिया है, जिसे केंद्र सरकार की तरफ़ से नियुक्त किया जाता है। दूसरा शिकार लोगों के बीच बुद्धिजीवी के तौर पर मशहूर प्रताप भानु मेहता हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की आलोचना के अपने अधिकार पर अंकुश लगाये जाने के प्रयासों के कारण उच्च शिक्षा के एक निजी उपक्रम, अशोका यूनिवर्सिटी से इस्तीफ़ा दे दिया है।

लेकिन, इन दोनों के शिकार होने पर शोक तो व्यक्त किया ही जाना चाहिए, साथ ही यह भी कहा जाना चाहिए कि केजरीवाल और मेहता, दोनों ही उस शिकारी की प्रकृति को समझ पाने में नाकाम रहे, जिसकी ये सवारी कर रहे थे। इन दोनों के हुए हस्र हमें बताते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कौन से तरीक़े कामायाब नहीं होंगे – और उन्हें बनाए रखने रखने के लिए कौन खड़ा नहीं होगा।

मोदी और भारतीय जनता पार्टी का मुक़ाबला करने के लिए केजरीवाल ने अपना रुख़ दक्षिणपंथ की तरफ़ कर लिया है। उनका मानना है कि उनकी लोकप्रियता हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्रवाद की उस अपील से पैदा हुई है, जिसके पीछे हिंदू हैं, और जिनकी भावनाओं को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। इसी रणनीति का अनुसरण करते हुए उनकी पार्टी ने धारा 370 और उस जम्मू-कश्मीर के एक राज्य से एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिये जाने के सिलसिले में समर्थन दिया था, जहां की सत्ता की कमान उपराज्यपाल के ही हाथ में होती है। केजरीवाल का संसद से उनकी शक्तियों के छीने जाने को लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन बताना सही मायने में उनका पाखंड है, ऐसा इसलिए क्योंकि उनके साथ जो कुछ हुआ है, वह तो वास्तव में कश्मीर पर अख़्तियार किये गये उनके ही रुख का एक तरह से समर्थन जैसा है।

केजरीवाल ने हिंदू भावना को ठेस नहीं पहुंचाने से लेकर सहायक होने तक का सहारा लिया है। उन्होंने दिल्ली के शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में बात नहीं की थी। उनकी कोशिश थी कि बीजेपी को मतदाताओं का ध्रुवीकरण न करने दिया जाये। इसके बाद उन्होंने 2020 के विधानसभा चुनावों में हनुमान का आह्वान किया था, लेकिन पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान और बाद में ज़्यादातर वह पूरे परिदृश्य से अदृश्य रहे।

राम मंदिर का निर्माण होने के बाद अयोध्या की तीर्थयात्रा करने के इच्छुक वरिष्ठ नागरिकों को वित्तीय सहायता करने का वादा करते हुए केजरीवाल ख़ुद को दक्षिणपंथ की ओर स्थानांतरित करना जारी रखा। उनकी सरकार ने 500 मीटर ऊंचे मस्तूल से राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के लिए 45 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं। इस क़दम की आलोचना करने वालों पर चुटकी लेते हुए केजरीवाल ने विधानसभा में कहा, "भारत में नहीं, तो क्या पाकिस्तान में तिरंगा फहराया जायेगा?"

हिंदू कार्ड खेलना भाजपा के लिए महज़ चुनावी रणनीति नहीं है, जैसा कि केजरीवाल के लिए है। भाजपा तो भारत के एक वैचारिक बदलाव लाने में लगी हुई है। अन्य बातों के अलावा हिंदुत्व का मतलब संघीय सिद्धांत को ख़त्म करना, क्षेत्रीय और भाषाई पहचान को कम करना, ऊंची जाति के आधिपत्य को फिर से स्थापित करना,लोगों को असुरक्षित महसूस कराने के लिए नये-नये दुश्मनों को सामने लाते रहना और शासन को केंद्रीकृत करने और असहमति और विरोध की आवाज़ को ख़ामोश करने के सिलसिले में एक बेहद मज़बूत राष्ट्र का समर्थन करना है।

अपनी धार्मिक पहचान के आधार पर हिंदुओं को केजरीवाल की तरफ़ से लुभाये जाने की इन्हीं प्रवृत्तियों पर लगाम लगायी गयी है। यह सवाल बिल्कुल ठीक है कि लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाले इस नए क़ानून के विरोध में आख़िर वे सड़कों पर क्यों नहीं उतरे हैं।

प्रताप भानु मेहता देश में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले उन स्तंभकारों में से एक हैं, जो अपने पांडित्य और लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के ख़त्म किये जाने के सिलसिले में मोदी की तीखी और स्पष्ट आलोचना के कारण जाने जाते हैं। उन्होंने इसकी क़ीमत भी चुकायी है, इस बात का सुबूत उनकी उस चिट्ठी से मिलता है, जिसे उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी से इस्तीफ़ा दिये जाने के सिलसिले में लिखी है, “(अशोका यूनिवर्सिटी) के संस्थापकों के साथ हुई एक बैठक के बाद मेरे सामने यह बात एकदम साफ़ हो गयी है कि विश्वविद्यालय के साथ मेरा जुड़ाव एक राजनीतिक बोझ हो सकता है।” उन्होंने ख़ुद को ख़ामोश रखने के बजाय खुलकर बोलने के अपने अधिकार के इस्तेमाल को अहमियत दी, क्योंकि संस्थापकों ने शायद उनसे ख़ामोश रहने की उम्मीद की थी।

कोई शक नहीं कि मेहता अशोका यूनिवर्सिटी के उन संस्थापकों और यूनिवर्सिटी में पैसे लगाने वालों की इस विमुखता से हैरान थे, जिन्होंने विश्व स्तर के इस शैक्षणिक संस्थान की स्थापना उदारवादी मूल्यों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए की थी और जिन्होंने इन मूल्यों के लिए अपने संसाधन तक झोंक दिये थे।

मेहता उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने इस अशोका यूनिवर्सिटी के "विज़न" को रूप-रेखा दी थी। लेकिन, शायद वह इस बात को भूल गये थे कि जिस शिकारी की पीठ पर उन्होंने सवारी की थी, संस्थापक और पैसे लगाने वाले ये लोग वित्तीय बाज़ार के बड़े खिलाड़ी हैं। वे कम से कम भारत में उदार उद्देश्यों के लिए लड़ने को लेकर अपनी संपत्ति को ख़तरे में नहीं डालने के लिए कुख्यात हैं, वे मौद्रिक फ़ायदा उठाने का कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ते और सही बात तो यह है कि इसे बनाये रखना मुश्किल हो सकता है। अशोका यूनिवर्सिटी के इन संस्थापकों और पैसे लागने वालों की कुल संपत्ति अरबों रुपये में है।

अगर सीधे-सीधे शब्दों में कहा जाये, तो इन वित्तीय पूंजीपतियों के पास राज्य से टकराहट मोल लेने की हिम्मत नहीं है।

ऐसा लगता है कि उदार शिक्षा देने वाली अशोका यूनिवार्सिटी की प्रतिष्ठा को बचाने की इच्छा ने ही इस्तीफ़े देने वाले एक दूसरे प्रोफ़ेसर,अरविंद सुब्रमण्यन के साथ मेहता को प्रबंधन के साथ एक संयुक्त बयान जारी करने के लिए प्रेरित किया। अब इस बात का कोई संदर्भ नहीं था कि वह आख़िर इस यूनिवर्सिटी के लिए एक राजनीतिक बोझ क्यों बन गये थे,इसकी वजह इस विश्वविद्यालय में उनका पढ़ाना नहीं,बल्कि उनका लेखन था। जो संयुक्त बयान जारी किया गया है,उसमें कहा गया है कि दोनों पूर्व प्रोफ़ेसरों का इस बात में अब भी "मज़बूत विश्वास है कि अशोका यूनिवर्सिटी को एक उदार दृष्टि और शैक्षणिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता को मूर्त रूप देते रहना चाहिए।" कई लोग हैरान और चकित थे कि मेहता ने अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे को शैक्षणिक स्वतंत्रता के मुद्दे में क्यों बदल दिया।

यह बात ख़ास तौर पर अजीब थी,क्योंकि जैसा कि अशोका यूनिवर्सिटी के कुलपति,रूद्रांश मुखर्जी ने ज़ोर देते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय की उदार दृष्टि पर शायद  ही कभी कोई संकट आया हो। अपने हितधारकों को लिखे पत्र में मुखर्जी ने कहा, “आज,जब संस्थापकों पर अकादमिक स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से समझौता करने और उन्हें कम करने की कोशिश को लेकर हमला किया जा रहा है, ऐसे में मुझे चांसलर के रूप में यह साफ़-साफ़ बताना ज़रूरी लगता है ...कि संस्थापकों ने अकादमिक स्वतंत्रता में कभी हस्तक्षेप नहीं किया है…”

फिर तो सवाल उठता है कि क्या मेहता का इस्तीफ़ा किसे लेकर था, अभिव्यक्ति की आज़ादी या अकादमिक स्वायत्तता या दोनों को लेकर? संस्थापकों में से एक,गुरुचरण दास ने हाल ही में लिखा था कि मेहता के लेखन को लेकर यूनिवर्सिटी पर सरकार की तरफ़ से कोई दबाव नहीं था। दास ने कहा था, “हालांकि,अशोका में पैसे लगाने वाले 150 लोगों में से कई लोग, साप्ताहिक कॉलम के ज़रिये मेहता की तरफ़ से पीएम मोदी और राज्य को कोसे जाने से नाराज़ थे। इसमें कोई हैरानी नहीं कि पैसे लगाने वाले ये तमाम लोग रूढ़िवादी हैं।”

दास ने इस "रूढ़िवादी" शब्द को परिभाषित तो नहीं किया है, लेकिन ऐसा लगता है कि पैसे लगाने वाले भी संवैधानिक मूल्यों के प्रति मेहता की निष्ठा के साथ नहीं हैं- और विश्वविद्यालय इस बात को लेकर चिंतित था कि विश्वविद्यालय के लिए मिलने वाले पैसे कहीं बंद न जाये। दास ने ज़ोर देकर कहा, “फिर भी किसी ने मेहता को इस्तीफ़े देने या लिखने से रोकने के लिए नहीं कहा।”

मेहता के इस्तीफ़े वाली चिट्ठी से पता चलता है कि संस्थापकों और पैसे लगाने वालों ने विश्वविद्यालय की इन चिंताओं के सिलसिले में उनसे बात की थी। असल में यह स्वेच्छा से उन्हें लिखने से रोकने की कोशिश थी इसीलिए शायद उन्हें इशारा किया गया था। विश्वविद्यालय को मालूम है कि इस बात को स्वीकार करने से उसकी साख पर चोट लगेगी कि वह अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ खड़ा नहीं है।

विश्वविद्यालय के उस विज़न को बनाने और बचाने के लिए जिसे गढ़ने में मेहता की अहम भूमिका रही है, ऐसा लगता है की उसकी साख बचाने के लिए मेहता ने यह कदम उठाया है। उन्हें अब तक समझ में आ गया होगा कि अगर कहीं अशोका यूनिवर्सियी की अकादमिक आज़ादी को ख़तरा है, तो संभवत: उन्हें हटना होगा। इसके पीछे का कारण यही है कि जिस तरह हिंदू कार्ड हिंदुत्व को ख़त्म करने का हथियार नहीं हो सकता, उसी तरह उदार मक़सदों की हासिल करने की लड़ाई को वित्तीय पूंजी के सहारे नहीं लड़ा जा सकता।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, इनके विचार निजी हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Arvind Kejriwal, Pratap Bhanu Mehta Do Not Know the Beast they are Riding

Narendra modi
pratap bhanu mehta
Arvind Kejriwal
Arvind Subramanian. Hindutva
Ashoka University
freedom of speech
Academic Freedom
International Finance Capital
Hanuman
DELHI ASSEMBLY
Kashmir

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • Ashish mishra
    न्यूजक्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर हत्याकांड: 12 घंटे की लंबी (नाटकीय) पूछताछ के बाद आशीष मिश्रा की गिरफ़्तारी, कोर्ट ने जेल भेजा
    10 Oct 2021
    पुलिस का कहना है कि आशीष मिश्रा जांच में सहयोग नहीं कर रहा था, इसलिए उसे अरेस्ट कर लिया गया है। इसके बाद हत्यारोपी आशीष मिश्रा को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। कोर्ट ने आशीष मिश्रा को 14 दिन की…
  • Mental Health
    वर्षा सिंह
    गैर-बराबरी वाले समाज में ट्रांसजेंडर समुदाय का मानसिक स्वास्थ्य
    10 Oct 2021
    “12-13-14 की उम्र में अपने शरीर और मन के बदलावों से गुज़र रहे ट्रांसजेंडर बच्चे को काउसिंलिंग की जरूरत होती है। परिवार सपोर्ट नहीं करता। हमारा स्वभाव, व्यवहार, अभिव्यक्ति अलग होते हैं। परिवारवाले…
  • BOOKS
    अजय सिंह
    समीक्षा: तीन किताबों पर संक्षेप में
    10 Oct 2021
    ‘गूंगी रुलाई का कोरस’, ‘पत्रकारिता का अंधा युग’ और ‘हवेली’ इन तीन किताबों पर वरिष्ठ कवि और लेखक अजय सिंह की संक्षिप्त टिप्पणी।
  • Squid Game
    मुकुल सरल
    Squid Game : पूंजीवाद का क्रूर खेल
    10 Oct 2021
    कुछ लोगों के पास इतना ज़्यादा है कि वे बोर होकर एक विद्रूप रचते हैं। दूसरे वो आम लोग हैं जो अपनी ज़िंदगी जीने के लिए क़र्ज़ के जाल में फंस गए हैं और उससे बाहर निकलने के लिए पूंजीवाद के हाथ के खिलौने…
  • beggars
    विजय विनीत
    पड़तालः स्मार्ट शहर बनारस में टूरिस्टों पर टूट पड़ते हैं भिखारी, दुनिया भर में बदनाम हो रहा ‘मोदी का क्योटो’ 
    10 Oct 2021
    भीख मांगना यूं तो क़ानूनन जुर्म है, लेकिन भीख अगर मजबूरी में मांगी जा रही है तो ऐसे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति पूर्वक सोचने और उसके पुनर्वास के लिए काम करने की ज़रूरत है, लेकिन अगर भीख मांगना धंधा बन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License