NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अगले चुनावी साल से पहले भाजपा को सता रही हैं पिछली गलतियां
भाजपा अगले साल एक के बाद एक होने वाले चुनावों की एक श्रृंखला को लेकर परेशान और हताश दिख रही है।
सुहित के सेन
22 Jun 2021
अगले चुनावी साल से पहले भाजपा को सता रही हैं पिछली गलतियां

कोविड-19 महामारी से सक्षम तरीक़े से नहीं निपट पाने के बावजूद इस साल की शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसका शासन अपने पूरे शबाब पर दिख रहे थे। संक्रमण की दर बहुत धीमी हो गयी थी और इस धीमी दर ने प्रधान मंत्री की अगुवाई में इस पार्टी को वायरस पर "जीत" का दावा करने के लिए प्रेरित कर दिया था। भारत को वैश्विक स्तर पर किसी मिसाल की तरह पेश किया जाने लगा था। इस स्थिति ने उस समय महामारी और शासन की नाकामी से पैदा हुए प्रवासी संकट के बीच भी जनता दल (यूनाइटेड) या जद-यू और अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन में भाजपा को नवंबर 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में जीत दिलाकर मदद की थी।

हालांकि, वह एक मामूली जीत थी। भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 243 सदस्यों वाले विधानसभा में 125 सीटें हासिल की थीं। ग़ौरतलब है कि अपने सहयोगी दल जद-यू को पीछे छोड़ते हुए उसे मिली 43 सीटों के मुक़ाबले भाजपा ने 74 सीटों पर जीत हासिल की थी,हालांकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को सबसे ज़्यादा 75 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन,यह देखते हुए कि 2019 के आम चुनावों के बाद से यह भाजपा/एनडीए की पहली स्पष्ट विधानसभा जीत थी, इससे केंद्र के  सत्तारूढ़ दल में आत्मविश्वास पैदा हुआ था।

इस घिसी पिटी कहावत को बल मिलता दिख रहा है कि थोड़े समय में ही राजनीति में बहुत कुछ बदल सकता है। ऐसा हो भी रहा है। कुछ ही महीनों में भाजपा परेशान और हताश होती दिख रही है। क्योंकि उसके सामने अगले साल एक के बाद एक होने वाले चुनावों की एक श्रृंखला है। फ़रवरी-मार्च में उत्तरप्रदेश,और दिसंबर में होने वाले गुजरात चुनाव पार्टी की सूची में सबसे ऊपर है। उत्तर प्रदेश के आस-पास गोवा,मणिपुर और उत्तराखंड जैसे उन राज्यों में चुनाव होंगे,जो इस समय एनडीए के कब्ज़े में हैं; पंजाब पर इस समय कांग्रेस की हुक़ूमत है। अक्टूबर में उस हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव होने हैं, जहां सत्ता में एनडीए काबिज है। जम्मू-कश्मीर की क़िस्मत का फ़ैसला होना अभी बाक़ी है।

इन हालात को देखते हुए जो कुछ इस समय हो रहा है,उससे भाजपा के ख़ुश होने की संभावना नहीं है। इसका व्यापक संदर्भ महामारी से है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी इसे चाहे जिस भी तरह का रंग देने की कोशिश करें और गोल-गोल बातें करने वाली उनकी टीम इन घटनाओं पर चाहे जितना भी "सकारात्मक" रंग चढ़ाने का प्रयास करें, सच्चाई तो यही है कि बड़ी संख्या में लोगों के बीच यह बात एकदम से साफ़ हो गयी है कि यह सरकार की उदासीनता और अक्षमता ही थी, जिसकी वजह से देश में महामारी की दूसरी लहर को तबाही मचाने में मदद मिली।

मोदी के पास कोई इसका जवाब नहीं था,पहले तो उन्होंने एक ऐसी चुप्पी साधे रखी,जिसे समझ पाना मुश्किल था और इसके बाद उन्होंने उसे ढकने की कोशिश की और फिर शीशे से बाहर आये। इससे बहुत कम लोग बेवकूफ़ बन पाये हैं। इसके साथ ही टीकों के उत्पादन,मूल्य निर्धारण और वितरण के सिलसिले में सरकार की तरफ़ से लगातार बदलता रुख़ और तैयारियों की कमी की वजह से टीकाकरण कार्यक्रम पूरी तरह विफल हो गया है। टीकाकरण को लेकर अभी भी भ्रम पैदा किया जा रहा है।

इसमें थोड़ी भी हैरत नहीं होनी चाहिए कि राजनीतिक रूप से भाजपा इस समय जिन चुनौतियों का सामना कर रही है,उससे वह घबरा गयी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में अपने दम पर तीन-चौथाई से ज़्यादा का प्रचंड बहुमत पाने और 2019 के आम चुनावों में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 62 पर जीत हासिल करने वाली,यह पार्टी गंभीर समस्याओं से घिरी हुई है। .

इस महामारी से ठीक तरह से नहीं निपट पाने को लेकर मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के बीच गंभीर टकराव की स्थिति पैदा हो गयी है। झूठ फ़ैक्ट्री से चाहे जितने भी झूठ निकल रहे हों, मगर लोगों को यह समझाना मुश्किल हो रहा है कि राज्य में हुई तबाही उतनी बड़ी नहीं है, जितनी कि दिखती है। गंगा में बहती बेशुमार लाशें संक्रमण और मौतों को कम दिखाने के प्रयासों को झूठ क़रार दे रही हैं।

महामारी के चरम के दौरान मई में उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में भाजपा के ख़राब प्रदर्शन ने पार्टी को इस हक़ीक़त से रू-ब-रू करा दिया होगा कि उसका समर्थन घट रहा है। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) कहीं आगे निकल गयी है। पंचायती राज ढांचे के तीन स्तरों में सबसे ऊपरी स्तर, ज़िला स्तर पर 3,050 वार्डों / सीटों में समाजवादी पार्टी ने भाजपा की 900 के मुक़ाबले 1,000 से ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल की है।

चूंकि ये चुनाव आधिकारिक तौर पर पार्टी के प्रतीकों पर नहीं लड़े जाते हैं, इसलिए क्षेत्र पंचायत (ब्लॉक) स्तर (75,852 वार्ड/सीट) या ग्राम पंचायत स्तर (732,000 वार्ड/सीट) पर पार्टी-वार जीत की संख्या को सुनिश्चित कर पाना मुश्किल है। इसके अलावा, हर स्तर पर 1,000 से ज़्यादा ज़िला स्तर पर बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों के जीतने वाले वार्डों को देखते हुए  कार्यकारी निकायों के गठन में समय लगता है।

लेकिन, इसमें संदेह नहीं कि ये नतीजे भाजपा के लिए एक बहुत ही सुखद चुनावी स्थिति की ओर इशारा तो नहीं ही करते हैं। छह महीने से चल रहे किसान आंदोलन ने इसे ख़ासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और कमज़ोर कर दिया है। हक़ीक़त यही है कि केंद्र ने बातचीत की कम से कम कोशिश की है, और अगर कुल मिलाकर देखा जाये,तो इससे किसानों का रुख़ और सख़्त हुआ है।

इसी पृष्ठभूमि में भी आदित्यनाथ और मोदी सत्ता संघर्ष में शामिल रहे हैं। केंद्र ने मुख्यमंत्री को दोष देने की परोक्ष कोशिश की है, हालांकि इसके लिए राज्य और केंद्र,दोनों ही सरकार ज़िम्मेदार हैं। मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने खासमखास एके शर्मा को राज्य मंत्रिमंडल में लाने को लेकर एड़ी-चोटी की कोशिश की है। लेकिन,आदित्यनाथ ने उन तमाम कोशिशों को विफल कर दिया है। 19 जून को शर्मा को पार्टी की राज्य इकाई के उपाध्यक्ष के तौर पर चुना गया, जबकि दो अन्य लोगों को मंत्रालय में शामिल किया गया।

ज़ाहिर है, मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की कद्दावर जोड़ी को आदित्यनाथ पर लगाम लगाने के अपने तमाम प्रयासों में कामयाबी इसलिए नहीं मिली है क्योंकि उन्हें पता है कि योगी के पास एक शक्तिशाली जनाधार है और उन्हें आसानी से इधर-उधर नहीं किया जा सकता है।

इन परेशानियों के बीच भाजपा के एनडीए के एक सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के भीतर भी खींचतान शुरू हो गयी है। नेतृत्व को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा से इसके टूटने का ख़तरा पैदा हो गया है। पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान का बिहार चुनाव से ठीक पहले 8 अक्टूबर 2020 को निधन हो गया था। चिराग़ पासवान की अगुवाई में लोजपा एक भी सीट जीत पाने में नाकाम रही थी,लेकिन हर सीट पर चुनाव लड़कर कई निर्वाचन क्षेत्रों में इसने जद-यू की हार को सुनिश्चित कर दिया था। ज़ाहिर है,चिराग़ को भाजपा का समर्थन इसलिए हासिल था,ताकि बिहार गठबंधन में बढ़त बनाने में भाजपा को मदद मिल सके।

अब चिराग़ की जगह रामविलास के भाई पशुपति पारस लोकसभा में लोजपा के नेता चुन लिये गये हैं। हालांकि, यह तय दिखता है कि नये गुट के लिए पार्टी को संभाल पाने की कोशिश आसान नहीं होगी। ऐसा लगता है कि बिहार में पार्टी के ज़्यादातर लोग और पार्टी को भारी समर्थन देने वाले दलित पासवान जाति के ज़्यादातर लोग भी चिराग़ के ही साथ हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भंग की जा चुकी और पुनर्गठित कार्यकारिणी भी चिराग़ के समर्थन में दिखती है।

सवाल है कि इस तरह के भीतरघात से भाजपा को क्यों परेशान होना चाहिए ? इसका जवाब यह है कि आख़िरकार चिराग समेत लोजपा के सभी सांसद लोकसभा में बीजेपी का समर्थन करते हैं। बिहार विधानसभा में इस पार्टी के पास कोई सीट नहीं है। यह समस्या दरअस्ल विधायी निकायों के बाहर की है। चिराग़ में स्थिरता की कमी है और अगर उन्हें अपनी पार्टी का समर्थन हासिल है,तो उन्हें ऐसा मुश्किल विकल्प का चुनाव भी करना पड़ सकता है, जिससे बिहार में शक्तियों का पुनर्गठन हो। इससे राज्य में एनडीए की सरकार भले ही जल्द नहीं गिरे, लेकिन इससे इस अहम राज्य में एक नया मंथन ज़रूर होगा।

उत्तराखंड में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं दिख रहा है क्योंकि यहां मुख्यमंत्री के बदलाव से जितनी समस्याओं का समाधान हुआ है, उससे कहीं ज़्यादा समस्यायें पैदा हुई हैं। बीजेपी के इस राजनीतिक गढ़ से बाहर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी गंभीर असंतोष का सामना कर रहे हैं और राज्य भाजपा इकाई तीन गुटों में विभाजित होती दिख रही है। कुल मिलाकर, बीजेपी के लिए राजनीतिक आसार इस साल के दूसरे हिस्से में भी अनुकूल नहीं दिख रहे हैं।

इसके बावजूद,अनगिनत कारणों से भाजपा पश्चिम बंगाल में मिली चोट को लेकर लगातार शांत है, जिससे इसकी चोट और गहरी होती जा रही है। ऊपर से अन्य मामलों से निपटने को लेकर उसके पास सीमित गुंज़ाइश है। बीजेपी और इसके दोनों दिग्गज जोड़ी साफ़ तौर पर हड़बड़ाये हुए हैं। फिलहाल,ऐसा लगता नहीं कि मामले जल्द से  जल्द बेहतर होने वाले हैं।

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार और शोधकर्ता हैं। इनके विचार निजी हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

As Another Hectic Election Year Approaches, Past Follies Dog BJP

BJP Promises
Modi government
Uttar Pradesh election 2022
Chirag Paswan
Covid-19 second wave
Farmer protest
BJP Bengal
Adityanath
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़


बाकी खबरें

  • yogi
    एम.ओबैद
    सीएम योगी अपने कार्यकाल में हुई हिंसा की घटनाओं को भूल गए!
    05 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज गोरखपुर में एक बार फिर कहा कि पिछली सरकारों ने राज्य में दंगा और पलायन कराया है। लेकिन वे अपने कार्यकाल में हुए हिंसा को भूल जाते हैं।
  • Goa election
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोवा चुनाव: राज्य में क्या है खनन का मुद्दा और ये क्यों महत्वपूर्ण है?
    05 Feb 2022
    गोवा में खनन एक प्रमुख मुद्दा है। सभी पार्टियां कह रही हैं कि अगर वो सत्ता में आती हैं तो माइनिंग शुरु कराएंगे। लेकिन कैसे कराएंगे, इसका ब्लू प्रिंट किसी के पास नहीं है। क्योंकि, खनन सुप्रीम कोर्ट के…
  • ajay mishra teni
    भाषा
    लखीमपुर घटना में मारे गए किसान के बेटे ने टेनी के ख़िलाफ़ लोकसभा चुनाव लड़ने का इरादा जताया
    05 Feb 2022
    जगदीप सिंह ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने उन्हें लखीमपुर खीरी की धौरहरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे 2024 के लोकसभा…
  • up elections
    भाषा
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पहला चरण: 15 निरक्षर, 125 उम्मीदवार आठवीं तक पढ़े
    05 Feb 2022
    239 उम्मीदवारों (39 प्रतिशत) ने अपनी शैक्षणिक योग्यता कक्षा पांच और 12वीं के बीच घोषित की है, जबकि 304 उम्मीदवारों (49 प्रतिशत) ने स्नातक या उससे ऊपर की शैक्षणिक योग्यता घोषित की है।
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    "चुनाव से पहले की अंदरूनी लड़ाई से कांग्रेस को नुकसान" - राजनीतिक विशेषज्ञ जगरूप सिंह
    05 Feb 2022
    पंजाब में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के दावेदार की घोषणा करना राहुल गाँधी का गलत राजनीतिक निर्णय था। न्यूज़क्लिक के साथ एक खास बातचीत में राजनीतिक विशेषज्ञ जगरूप सिंह ने कहा कि अब तक जो मुकाबला…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License