NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
Ask No Questions : कोई सवाल न पूछे
यहां कोशिश तो यही है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को कम से कम कर दिया जाये और संसद को सरकार के विधायी एजेंडे को जल्दी से आगे बढ़ाने वाले एक मंच तक सीमित कर दिया जाये।
अनीता कात्याल
08 Sep 2020
कोई सवाल न पूछे

संसद के दोनों सदनों के सचिवालय द्वारा यह अधिसूचित किये जाने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार पिछले कई दिनों से एक सार्वजनिक असहमति का ख़ास मुद्दा बनी हुई है कि 14 सितंबर से शुरू होने वाला आगामी मानसून सत्र कोरोनवायरस की महामारी के चलते प्रश्नकाल के बिना आयोजित किया जायेगा। जैसा कि अपेक्षा थी, इस फ़ैसले से विपक्षी दलों की नाराज़गी साफ़ तौर पर सतह पर आ गयी है। विपक्षी दलों ने सरकार पर कार्यपालिका पर सवाल उठाने और इससे जवाबदेही की मांग करने के अवसर से वंचित किये जाने का आरोप लगाया है।

विपक्ष के आरोप में कुछ हद तक दम है, क्योंकि यह क़दम संसद को कमज़ोर करने के मोदी सरकार के व्यवस्थित प्रयास के अनुरूप है। पिछले छह वर्षों में सत्तारूढ़ गठबंधन ने संसदीय समितियों द्वारा महत्वपूर्ण विधेयकों की समीक्षा को दरकिनार करने का प्रयास किया है, जबकि विपक्ष की अपनी पसंद के विषयों पर बहस के लिए मांगों को बड़ी ही अनिच्छा के साथ पूरा किया गया है।

जिस समय विपक्ष अपनी आवाज़ सुनाने के लिए संघर्ष कर रहा है, मोदी सरकार ने आगामी मानसून सत्र में प्रश्नकाल को स्थगित करके उसे एक ताज़ा झटका दे दिया है। इस साल की शुरुआत में सरकार ने महामारी के बहाने ही सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास (MPLAD) फ़ंड को निलंबित कर दिया था, और तय किया था कि प्रत्येक सदस्य को उनके सम्बन्धित निर्वाचन क्षेत्रों में विशिष्ट विकास परियोजनाओं को शुरू करने के लिए आवंटित 10 करोड़ रुपये संचित निधि में स्थानांतरित किये जायेंगे।

यहां कोशिश तो यही है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को कम से कम कर दिया जाये और संसद को सरकार के विधायी एजेंडे को जल्दी से आगे बढ़ाने वाले एक मंच तक सीमित कर दिया जाये।

संसदीय लोकतंत्र की यह विशिष्ट विशेषता सदस्यों को मंत्रियों से सवाल करने और सरकार को जवाबदेह बनाये रखने के लिए एक मंच मुहैया कराती है।

लेकिन, संसद तो सरकार और सांसदों दोनों के लिए ही मंच है। हर एक सत्र की दैनिक कार्यवाही सदस्यों की तरफ़ से मंत्रियों से सम्बन्धित मंत्रालयों से जुड़े नीतिगत फ़ैसलों पर उनसे किये गये सवालों का जवाब पाने को लेकर प्रश्नकाल को समर्पित होती है।

हस्तक्षेप के लिए एक ज़रूरी दस्तूर

प्रश्नकाल हमेशा से एक ज़रूरी दस्तूर रहा है कि सरकार सदस्यों की तरफ़ से उठाये गये सवालों का जवाब देने के फ़र्ज़ से बंधी हुई है। इसके लिए मंत्रियों को ज़रूरी तैयारी के साथ आना होता है,क्योंकि पूछे गये सवाल वाले मुद्दे पर गुमराह करने का कोई भी प्रयास अच्छा नहीं माना जाता है। इसके अलावा वे सदन को गुमराह करने का जोखिम भी नहीं उठा सकते,क्योंकि यह तुरंत विशेषाधिकार का मामला बना जाता है। अब जबकि कार्यवाही लाइव टेलीकास्ट हो रही है, तो मंत्रियों को ख़ास तौर पर प्रखर दिखना होता है,क्योंकि अगर कोई मंत्री पूछे गये सवालों का ईमानदारी से जवाब नहीं दे रहा है या कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा है या फिर सच कहने से बच रहा है,तो कैमरा मत्रियों के जवाब को दर्शकों के सामने ला रहा होता है और दर्शकों के लिए उसका फ़ैसला करना आसान हो जाता है।

बचने वाले मुद्दे

प्रश्नकाल की अहमियत पर शायद ही ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया जा सकता है। संसदीय लोकतंत्र की यह विशिष्ट विशेषता तो महज़ सदस्यों को मंत्रियों से सवाल करने और सरकार को जवाबदेह बनाये रखने के लिए एक मंच प्रदान करती है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के लेजिस्लेटिव एंड सिविक एंगेजमेंट के प्रमुख,चक्षु रॉय कहते हैं, "सवाल करने का यह सरल कार्य सरकार द्वारा किये गये कार्यों पर रौशनी डालता है।" वह आगे बताते हैं, "अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश लुई ब्रैंडिस ने एक बार टिप्पणी की थी कि सूर्य के प्रकाश को सबसे अच्छा कीटाणुनाशक कहा जाता है; इलेक्ट्रिक लाइट सबसे कुशल पुलिसकर्मी होती है। किसी विधायिका में प्रश्नकाल की भी यही भूमिका होती है।"

प्रश्नकाल को स्थगित करने से सदस्यों को सरकारी नीतियों की समीक्षा करने का मौक़ा नहीं मिल पाता है। और यह न सिर्फ़ विपक्ष,बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों के लिए भी एक नुकसान है, जो सरकार से जवाब मांगने के लिए इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हैं। पिछले साल भाजपा के सांसदों-राजीव प्रताप रूडी और हेमा मालिनी ने अपनी सरकार से अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को पर्यटन परियोजनाओं के लिए पैसे दिये जाने से इन्कार की शिकायत की थी। उन्होंने इस मुद्दे को प्रश्नकाल के दौरान ही लोकसभा में उठाया था। रूडी और हेमा मालिनी ने कहा था कि उनके एड़ी-चोटी एक करने के बावजूद केंद्र ने इनके निर्वाचन क्षेत्रों में पर्यटन सुविधाओं के विकास के लिए जो पैसे देने का वादे किये थे,वे पैसे नहीं दिये गये। इस पर पर्यटन मंत्री, प्रह्लाद सिंह पटेल को बहुत सारे स्पष्टीकरण देने पड़े थे। रॉय कहते हैं, "जैसा कि आप इन उदाहरणों से देख सकते हैं कि यह प्रश्नकाल न सिर्फ़ सरकार से जानकारी निकालने को लेकर है, बल्कि आपके अपने काम करवाने को लेकर भी है।"

लेकिन, संसद तो सरकार और सांसद दोनों को लिए है।

प्रश्नकाल की इस महत्वपूर्ण प्रकृति को देखते हुए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस परंपरा को रद्द करने के इस क़दम को विपक्ष की नाराज़गी भरे विरोधों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार पर संसद को "नोटिस बोर्ड" में बदल देने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर कहते हैं कि सरकार पर सवाल करना संसदीय लोकतंत्र की ऑक्सीज़न है। उन्होंने ट्वीट किया,"जवाबदेही को बढ़ावा देने वाले एक व्यवस्था को स्थगित कर दिया गया है।"

तृणमूल कांग्रेस के सांसद, डेरेक ओ ब्रायन भी प्रश्नकाल को रद्द करने के फ़ैसले को लेकर सरकार की तीखी आलोचना की है। ओ ब्रायन ने ट्वीट किया,“सांसदों को 15 दिन पहले संसद में प्रश्नकाल के लिए अपने प्रश्न प्रस्तुत करने होते हैं। सत्र 14 सितंबर से शुरू हो रहा है। तो प्रश्नकाल रद्द? विपक्षी सांसदो ने सरकार पर सवाल उठाने का अधिकार खो दिया है। 1950 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है? जब संसद के कामकाज के घंटे उतने ही हैं,तो फिर प्रश्नकाल को रद्द क्यों करना? लोकतंत्र की हत्या के लिए इस महामारी का बहाना बनाया जा रहा है। ”

अपने संवैधानिक दायित्व से भागने को लेकर विपक्ष की ओर से आक्रोश का सामना करते हुए सरकार ने अब अतारांकित प्रश्नों की अनुमति देने का फ़ैसला लिया है। लेकिन,यह बहुत कम देर का एक खानापूर्ति वाला मामला होता है। अतारांकित प्रश्नों के जवाब लिखित रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं,जबकि मंत्रियों को तारांकित प्रश्नों का मौखिक रूप से जवाब देना होता है और ये अब भी पटल से बाहर हैं।

और यह न सिर्फ़ विपक्ष, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी के उन सांसदों के लिए भी एक नुकसान है, जो सरकार से जवाब मांगने के लिए इस अवसर का फ़ायदा उठाते हैं।

कमज़ोर बचाव

अपना बचाव करते हुए भाजपा नेताओं ने इस आधार पर सरकार के इस क़दम को सही ठहराया है कि यह पहली बार नहीं है, जब प्रश्नकाल को छोड़ दिया गया हो और वे आगे कहते हैं कि विपक्ष के पास सरकार को दोषी ठहराने का कोई नैतिक अधिकार इसलिए भी नहीं है, क्योंकि प्रश्नकाल को बाधित किये जाने अनगिनत उदाहरण हैं। कोई शक नहीं कि अतीत में ऐसे मौक़े ज़रूर आये हैं, जब प्रश्नकाल के बिना भी सत्र आयोजित हुए हैं, लेकिन, ग़ौरतलब है कि ये सत्र, विशेष सत्र थे। एक बार 1962 में चीनी हमले के दौरान प्रश्नकाल को टाल दिया गया था। सरकार और विपक्ष, दोनों ने मिलकर पूर्वी सीमा पर स्थिति पर चर्चा के लिए प्रश्नकाल के बिना उस सत्र को आयोजित किये जाने पर सहमति व्यक्त की थी। जानकारों का मानना है कि "अतीत की सबसे बुरी परंपराओं" का अनुकरण करने के बजाय, सरकार को उच्च मानकता निर्धारित करना चाहिए और सर्वोत्तम परंपराओं को अपनाना चाहिए।

सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता लगातार उस तरीक़े की ओर भी इशारा करते हैं, जिसमें ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों की विधानसभायें प्रश्नकाल की अनुमति दिये बिना सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं। लेकिन,विधानसभाओं और संसद में कार्यवाही के संचालन की तुलना एक असंगत तुलना है। जहां विधानसभायें अपने सम्बन्धित राज्यों से जुड़े मुद्दों को उठाती हैं, वहीं राष्ट्रीय संसद का विस्तार क्षेत्र कहीं बड़ा होता है। इसके एजेंडे में डगमगाती अर्थव्यवस्था से लेकर चीन के साथ गतिरोध तक की एक विस्तृत श्रृंखला होती है। रॉय कहते हैं,"किसी भी स्थिति में राज्य की विधानसभायें संसद से मार्गदर्शन लेती है,न कि विधानसभाओं से संसद मार्गदर्शन लेती हैं।"

दूसरी ओर,प्रश्नकाल सदस्यों की तरफ़ से तीखे सवाल करने की अनुमति देता है और सवाल से जुड़े मंत्री को उनका जवाब देना होता है।

सरकार,विपक्ष को यह भरोसा देने की भी जहमत नहीं उठा पा रही है कि वह किसी बहस से भाग नहीं रही है और सरकार आगामी सत्र में अल्पकालिक चर्चा के दौरान अपने सभी सवालों के जवाब भी देगी। लेकिन,विपक्षी नेताओं का कहना भी ठीक ही है कि किसी लंबी बहस के दौरान उनके सवाल रफ़ा-दफ़ा हो जाते हैं।

यह एक सच्चाई भी है कि ये सामान्यीकृत बहस किसी भूल-भुलैया की तरह होती हैं और राजनीतिक विभाजन को लेकर दोनों ही ओर के सदस्यों के लिए एक-दूसरे पर बढ़त बनाने के मौक़े में बदल जाती हैं। दूसरी ओर, प्रश्नकाल सदस्यों को तीखे सवाल करने की अनुमति देता है और किसी मंत्री को इन  सवालों का जवाब देना होता है। किसी बहस के उलट, प्रश्नकाल के दौरान किये गये सवालों से जुड़े हुए सवाल करने की भी अनुमति होती है, जिससे किसी मंत्री के लिए किसी सदस्य की तरफ़ से उठाये गये बिन्दुओं  को छुपा पाना मुश्किल हो जाता है।

यह लेख मूल रूप से द लिफ़लेट में प्रकाशित हुआ है।

(अनीता कात्याल दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं। आपने चार दशकों से भी ज़्यादा समय से राजनीतिक परिदृश्य को कवर किया है।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Ask No Questions

loksabha
BJP
Question Hour
Narendra modi
Amit Shah

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • Sameer Wankhede illegally tapped phones: Nawab Malik
    भाषा
    समीर वानखेड़े ने गैरकानूनी तरीके से फोन टैप कराए: नवाब मलिक का आरोप
    26 Oct 2021
    मलिक ने कहा, ‘‘समीर वानखेड़े मुंबई और ठाणे के दो लोगों के जरिए कुछ लोगों के मोबाइल फोन पर गैरकानूनी तरीके से नजर रख रहे हैं।’’ मलिक अपने दामाद की गिरफ्तारी के बाद से लगातार वानखेड़े पर निशाना साध रहे…
  • SC
    भाषा
    लखीमपुर खीरी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट का यूपी सरकार को गवाहों के संरक्षण का निर्देश
    26 Oct 2021
    शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को पत्रकार की पीट-पीटकर हत्या करने के मामले से जुड़ी दो शिकायतों के संबंध में रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा, ‘‘ राज्य को इन मामलों में अलग-अलग जवाब…
  • Defence Unions
    रौनक छाबड़ा
    रक्षा कर्मचारी संघों का केंद्र सरकार पर वादे से मुकरने का आरोप, आंदोलन की चेतावनी 
    26 Oct 2021
    कर्मचारी महासंघों ने ने केंद्र को उनकी सेवा शर्तों के साथ हेराफेरी नहीं करने के अपने वादे से मुकरने का दोषी ठहराया है।जिसे देखते हुए श्रमिक संघों ने अपनी 11 मांगों को सूचीबद्ध करते हुए “आंदोलन का…
  • cricket
    भाषा
    आईसीसी आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में कुमारा और दास पर जुर्माना
    26 Oct 2021
    मैदान पर तीखी बहस के बाद दोनों क्रिकेटर एक दूसरे पर प्रहार करने की कोशिश में थे जिससे अंपायरों और बाकी खिलाड़ियों को दखल देना पड़ा ।
  • diwali
    भाषा
    दिल्ली सरकार का 27 अक्टूबर से ‘पटाखे नहीं दीया जलाओ’ अभियान
    26 Oct 2021
    मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 15 सितंबर को पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करते हुए कहा था कि यह ‘‘जीवन बचाने के लिए आवश्यक’’ है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License