NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विधानसभा चुनाव: लोग गुस्से में हैं, लेकिन क्या बीजेपी सुन पा रही है?
बढ़ती बेरोजगारी, किसानों की बदहाली और रोज़गार के सवाल पर मज़दूरों के बीच बढती असुरक्षा की भावना ने बीजेपी के ख़राब शासन के रिकार्ड को उजागर कर दिया है, नतीजतन इन चुनावों में पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ा है।
सुबोध वर्मा
27 Oct 2019
Assembly Elections
प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: flicker

हालाँकि भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना गठबंधन को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल हो चुका है, और हरियाणा के अंदर बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है, लेकिन संख्या- खासकर कुल वोटों में हिस्सेदारी- जनता के बीच पार्टी के लिए तेजी से बढ़ते संकुचन को प्रदर्शित करती है। सत्ता पाने के लिए सीटों की संख्या की गणना होती है, लेकिन चुनावों में किसके हिस्से में कितने वोट आये, उससे असली मायने में पता चलता है कि किस हद तक जनसमर्थन प्राप्त है।

चूँकि ये चुनाव विधान सभाओं के लिए हुए थे, इसलिये यह स्वाभाविक है कि इसकी तुलना 2014 के पिछले विधानसभा चुनावों के साथ की जायेगी। लेकिन यह इस बात को समझने के लिए सामयिक है कि वही लोग आज क्या सोच रहे हैं, जिन्होंने हाल ही में कुछ माह पूर्व हुए लोकसभा चुनावों में अपना मत दिया था।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में दोनों ही गठबंधन (बीजेपी+सेना और कांग्रेस+राष्ट्रवादी कांग्रेस दल) को 2014 में हुए विधानसभा में प्राप्त मतों की तुलना में इस चुनाव में अपने अपने हिस्से में प्राप्त वोटों में आई गिरावट देखने को मिली है। जहाँ एक ओर बीजेपी-सेना को 2014 के 47% की तुलना में 42% ही वोट प्राप्त हुए, वहीं कांग्रेस+एनसीपी की हिस्सेदारी 35% से गिरकर 33% पहुँच गई। अन्य पार्टियों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के हिस्से में 2014 के 18% की तुलना में इस बार 25% तक का उछाल देखने को मिला है। (नीचे तालिका में देखें)

table 1_3.PNGइसकी एक वजह यह भी है कि 2014 में बीजेपी और शिव सेना ने वह चुनाव कांग्रेस और एनसीपी की तरह अकेले ही लड़ा था। इसलिए उन्हें उन स्थानों से भी वोट मिले, जहाँ से उन्होंने इस बार गठबंधन के तहत चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन इसके बावजूद बीजेपी-सेना के वोटों में 5 प्रतिशत की गिरावट उल्लेखनीय है। साफ तौर पर यह उनके समर्थक आधार में आई गिरावट का प्रतीक है।

आइये अब इन गठबन्धनों की वर्तमान विधानसभा चुनाव परिणामों की तुलना लोकसभा चुनावों से करते हैं। बीजेपी-सेना के वोट शेयर में 51% से 42% तक भारी गिरावट देखने में को मिली है। यह बहुत बड़ी गिरावट है।

क्या लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तुलना आपस में की जानी चाहिए? आमतौर पर ऐसा करना कुछ ख़ास काम का नहीं होता, लेकिन इस चुनाव अभियान की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने राष्ट्रीय मुद्दों-अनुच्छेद 370, ‘विदेशियों’ का सवाल, राष्ट्रीय गौरव और तथाकथित राष्ट्रवाद जैसे ढेर सारे मुद्दों पर जबर्दस्त बयानबाजी की।

जिस चीज को बीजेपी ने लगातार नजरअंदाज किया वह है, महाराष्ट्र में जनता का भीषण आर्थिक संकट का सामना करना, जहाँ कर्ज-माफ़ी के बावजूद किसानों की आत्महत्या जारी हैं, लाखों औद्योगिक मजदूरों को छंटनी और नौकरी से बर्खास्तगी का सामना करना पड़ रहा है, आर्थिक मंदी के कारण वेतन और मजदूरी में कटौती हुई है, बेरोजगारी में निरंतर इजाफे और बीजेपी शासित राज्य राज्य सरकार को इन मामलों में अँधेरे में टटोलते हुए देखा जा सकता है कि किन मुद्दों पर संघर्ष किया जाए।

ये कड़वी सच्चाई सभी बयानबाजियों भारी पड़ीं। मजेदार तथ्य यह है कि (शासन में भागीदारी के बावजूद) शिव सेना ने खुले तौर पर मोदी सरकार की विनाशकारी निर्णयों पर उसकी जमकर आलोचना की, जैसे नोटबंदी और बेरोजगारी को न रोक पाने में  उसकी विफलता। अगर सीटों के रूप में देखें तो उसे उतना नुकसान नहीं झेलना पड़ा जितना बीजेपी को।

हरियाणा

इस राज्य में, बीजेपी का पतन कहीं अधिक नाटकीय रहा है। 2014 के विधानसभा चुनावों की तुलना में इसके कुल मतों की संख्या में 33% की तुलना में 36% के रूप में बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन अगर लोकसभा चुनावों से इसकी तुलना की जाए, तो इसके मतों में 22 प्रतिशत अंकों की चौंका देने वाली गिरावट दर्ज हुई है। (नीचे तालिका में देखें)

table 2_2.PNGसीएमआईई के अनुमानों के अनुसार देश के प्रमुख राज्यों में से एक हरियाणा में बेरोजगारी की दर लगभग 20% होने के साथ सबसे ऊँची थी। यह राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी अधिक है। यह देश के अन्न का कटोरा कहे जाने वाले हिस्से के रूप में जाना जाता है, लेकिन फसल का उचित दाम न मिलने की कारण यहाँ किसान नाखुश है।

इन गंभीर आर्थिक चिंताओं ने उस जाट किसान समुदय के अंदर भी अपने लिए आरक्षण की मांग के लिए आन्दोलन छेड़ने के लिए उकसा दिया जो आमतौर पर संपन्न हैं, और बीजेपी शासन में एक हिंसक आन्दोलन फूट पड़ा, जिसने इस समुदाय पर घाव के निशान छोड़ दिए, जिसने इस दल को अपना समर्थन दिया था।

लेकिन जैसा कि चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि केवल जाट समुदाय के ही बीच पार्टी का आधार नहीं खिसका बल्कि पंजाबी और अन्य समुदायों के बीच भी यह गिरावट दर्ज हुई है। मनोहर लाल खट्टर द्वारा संचालित राज्य सरकार के खराब शासन के साथ केंद्र में मोदी सरकार की विनाशकारी नीतियां भी बीजेपी से इस तेज खिसकाव के लिए जिम्मेदार हैं।

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि हरियाणा में, ओ पी चौटाला के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय लोक दल (INLD), जिसमें परिवार के दिग्गज भ्रष्टाचार के मामले में जेल की सींखचों के भीतर और पारिवारिक बिखराव के कारण पूरी तरह से धराशायी हो चुका है, इस बीच उनके पोते की अगुआई में परिवार के एक धड़े ने नए संगठन जननायक जनता पार्टी (JJP) का निर्माण किया है, जिसने 15% वोट हासिल कर कुछ हद तक इनेलो के आधार को अपने पक्ष में संगठित करने में सफलता पाई है। यह भी बीजेपी विरोधी वोट है क्योंकि जजपा और इसके नेता दुष्यंत चौटाला ने अपने चुनाव अभियान में बीजेपी की आलोचना की थी।

राष्ट्रीय बनाम राज्य चुनाव

जहाँ आमतौर पर यह रुझान देखने को मिलते थे कि जिस दल को लोकसभा चुनावों में बहुमत मिला हो, यदि कुछ समय बाद राज्यों में चुनाव हों, तो उसी दल को सफलता हासिल होती थी जिसने राष्ट्रीय चुनावों में जीत हासिल की थी, उस रुख में अब बदलाव देखे जा रहे हैं। जनता अब अधिक परिपक्व हो चुकी है और राष्ट्रीय और राज्य के चुनावों में फर्क करने लगी है।

यह हमें (उलटकर) मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के 2018 के विधान सभा चुनावों में देखने को मिला, जिसमें बीजेपी शासित तीनों राज्यों में उसे कांग्रेस ने अपदस्थ किया, लेकिन लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस को धूल चटा दी। वर्तमान चुनाव में, जहाँ बीजेपी+ को लोकसभा में थोक के भाव में वोट पड़े, लेकिन विधानसभा चुनावों में अपने हाथ खींच लिए। बीजेपी और संघ के दिग्गज अब अपने ख़राब प्रदर्शन के लिए इसे एक बहाने के तौर पर जिम्मेदार ठहराकर प्रचारित करने में जुटे हैं।

लेकिन ये भ्रमपूर्ण सोच के लक्षण हैं। जैसा कि पहले जिक्र किया गया है, बीजेपी ने अपना पूरा जोर राष्ट्रीय मुद्दों पर लगाया था और स्थानीय मुद्दों को दरकिनार कर दिया। लोगों ने उनकी इस ठग विद्या को नकार दिया है और उन्हें बेहतर गवर्नेंस प्रदान करने और नीतियों पर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत पर ध्यान दिलाया है। आज, यह संदेश कुछ राज्यों से आ रहा है। कल, यह पूरे देश से आयेगा।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आपने नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Assembly Elections: People Are Angry, But Is BJP Listening?

Assembly elections
Maharashtra Assembly
Haryana Polls
Economic distress
BJP Vote Share
BJP Poll Campaign
2019 Lok Sabha Polls
Farmer distress
unemployment
Job Losses

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

ज्ञानव्यापी- क़ुतुब में उलझा भारत कब राह पर आएगा ?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा


बाकी खबरें

  • itihas ke panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?
    22 May 2022
    न्यूज़क्लिक की इस ख़ास पेशकश में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने पत्रकार और मेरठ दंगो को करीब से देख चुके कुर्बान अली से बात की | 35 साल पहले उत्तर प्रदेश में मेरठ के पास हुए बर्बर मलियाना-…
  • Modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक
    22 May 2022
    हर बार की तरह इस हफ़्ते भी, इस सप्ताह की ज़रूरी ख़बरों को लेकर आए हैं लेखक अनिल जैन..
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'कल शब मौसम की पहली बारिश थी...'
    22 May 2022
    बदलते मौसम को उर्दू शायरी में कई तरीक़ों से ढाला गया है, ये मौसम कभी दोस्त है तो कभी दुश्मन। बदलते मौसम के बीच पढ़िये परवीन शाकिर की एक नज़्म और इदरीस बाबर की एक ग़ज़ल।
  • diwakar
    अनिल अंशुमन
    बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका
    22 May 2022
    बिहार के चर्चित क्रन्तिकारी किसान आन्दोलन की धरती कही जानेवाली भोजपुर की धरती से जुड़े आरा के युवा जन संस्कृतिकर्मी व आला दर्जे के प्रयोगधर्मी चित्रकार राकेश कुमार दिवाकर को एक जीवंत मिसाल माना जा…
  • उपेंद्र स्वामी
    ऑस्ट्रेलिया: नौ साल बाद लिबरल पार्टी सत्ता से बेदख़ल, लेबर नेता अल्बानीज होंगे नए प्रधानमंत्री
    22 May 2022
    ऑस्ट्रेलिया में नतीजों के गहरे निहितार्थ हैं। यह भी कि क्या अब पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन बन गए हैं चुनावी मुद्दे!
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License