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भारत
राजनीति
जनप्रतिनिधियों को आईना दिखा रही सीमांचल की आत्मनिर्भर जनता
बांस की चचरी से अस्थायी पुल बनाकर जनता उद्घाटन के लिए उन सांसद और विधायक को आमंत्रित कर रही है जिनसे वे लंबे समय तक अनुरोध करते रहे कि वे उनका पुल बनवा दें, मगर उन्होंने उनकी एक नहीं सुनी। वे चाहते हैं कि वे इस चचरी पुल का उद्धाटन कैंची से न करके दबिया या कुल्हाड़ी से करें।
पुष्यमित्र
01 Jun 2020
आत्मनिर्भर जनता

बिहार के अररिया जिला मुख्यालय से महज नौ किमी दूर स्थित झमटा पंचायत में ग्रामीणों ने एक अनूठा पुल उद्घाटन कार्यक्रम रखा है। यह कोई कंकरीट से बना पुल नहीं, बांस की चचरी से बना अस्थायी और कमजोर पुल है, जिसे वहां के लोगों ने खुद अपनी मेहनत और संसाधनों से तैयार किया है। इस उद्घाटन समारोह में लोगों ने अपने उन सांसद और विधायक को खास तौर पर आमंत्रित किया है, जिनसे वे लंबे समय तक अनुरोध करते रहे कि वे उनका पुल बनवा दें, मगर उन्होंने उनकी एक नहीं सुनी। वे इस पुल के जरिये अपने जन प्रतिनिधियों को आईना दिखाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि वे इस चचरी पुल का उद्धाटन कैंची से न करके कुल्हाड़ी से करें।

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इससे पहले बीते शुक्रवार 29 मई को पड़ोसी जिले किशनगंज के ठाकुरगंज में एक ऐसे ही चचरी पुल का उद्घाटन लोगों ने जदयू विधायक नौशाद आलम से करवाया। नूरी चौक और हाथीडूबा के बीच बने इस चचरी पुल के उद्घाटन के वक्त ग्रामीणों ने विधायक महोदय के हाथों में कैंची के बदले वह दाव या दबिया पकड़ा दिया, जिससे मजदूर बांस को छीलते और काटते हैं। इस रास्ते पर एक पुल था, जो दस साल पहले बाढ़ की वजह से क्षतिग्रस्त हो गया था। तब से लगातार ग्रामीण यहां पुल की मांग कर रहे थे, मगर प्रशासन और जन प्रतिनिधि बार-बार उन्हें आश्वासन देकर टाल रहे थे।

इस बार इस पुल को जाहिद आलम, इसराइल आलम, सफलू और काफिल आलम आदि ग्रामीणों ने मिलकर बनाया है। इस पुल को बनाने में 38 हजार रुपये की लागत आय़ी है। यह राशि आसपास के ग्रामीणों से मिले चंदे से जुटाई गयी है। अब इस पुल के सहारे वे ग्रामीण मुफ्त में नदी पार कर सकेंगे, जबकि बाहर के लोगों से कुछ सहयोग राशि ली जायेगी।

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वहां के स्थानीय सिटिजन जर्नलिस्ट प्रिंस खान सुरजापुरी ने इस पुल के उद्घाटन का एक वीडियो भी यूट्यूब पर पोस्ट किया है, जिसमें वे पुल के उद्घाटन के मौके पर विधायक महोदय से लगातार चुभने वाले सवाल पूछ रहे हैं। उनके इस सवाल पर कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि आपको चचरी पुल का उद्घाटन करना पड़ रहा है, विधायक नौशाद आलम कहते हैं कि हालांकि यह काम मुझे नहीं करना चाहिए। मगर पुल बन गया है तो इससे लोगों की मदद ही होगी तो मैं यहां उद्घाटन के लिए आ गया। इसके बाद वे बताने लगते हैं कि उन्होंने कई रास्तों और पुलों का निर्माण कराया है, इस पुल का नंबर भी आयेगा। पूरे सवाल जवाब के दौरान वे असहज नजर आते हैं।

आपको बताते हैं कि इस इलाके में चचरी पुल हमेशा से बनते रहे हैं, मगर इनके उद्घाटन की कोई पंरपरा नहीं रही। अगर कहीं कुछ ऐसा होता भी है तो गांव के किसी सम्मानित व्यक्ति को बुला लिया जाता है। इस बार लोगों ने सिर्फ अपना गुस्सा जताने के लिए विधायक महोदय को बुलाया और उनके हाथ में दबिया पकड़ा दिया। विधायक महोदय इस पुल के बारे में लंबे समये से झूठा आश्वासन देते रहे हैं। पिछले साल तो उन्होंने एक चार्ट भी दिखाया था कि देखिये इस पुल का नंबर आ गया है।

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इसी तरह अररिया के झमटा पंचायत में बने पुल के बारे में स्थानीय लोगों की मदद करने वाली संस्था पीपुल्स ऑफ होप के संचालक फैसल जावेद बताते हैं कि उद्घाटन का जो पोस्टर लोगों ने जारी किया है और कुल्हाड़ी से फीता काटने की बात कही है, वह भी लोगों की नाराजगी का ही नमूना है।

इस रूट पर पुल न होने के कारण अब तक कई लोगों की डूब कर मौत हो गयी है। हर साल यहां चचरी पुल बनता है, मगर वह पुल बहुत सुरक्षित नहीं होता। हर साल कोई न कोई उससे फिसल कर नदी में गिर जाता है। मगर सरकार या जन प्रतिनिधि लोगों की इन मुसीबतों को समझते नहीं।

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बिहार के पूर्वी सीमा पर स्थित ये दोनों जिले अररिया और किशनगंज में इस वक्त कम से कम चार से पांच दर्जन जगहों पर चचरी पुल हैं। यहां से बहने वाली नदी महानंदा, कनकई, बकरा, परमान आदि में कई जगहों पर लोगों को इसी तरह इन चचरी पुलों के सहारे नदी को पार करना पड़ता है। 

इस इलाके के पापुलर सोशल मीडिया ग्रुप खबर सीमांचल के मोडरेटर हसन जावेद इन चचरी पुलों के घाटों का नाम गिनाते हैं। ये हैं, पलसा घाट, मटियारी घाट,  होलिया घाट,  निशंद्रा घाट,  असुरा घाट,  हांडीभाषा घाट,  खरखरी घाट,  रतवा घाट,  मिरचान टोला घाट,  दल्ले गांव घाट,  लौचा घाट, कंचनबाड़ी घाट,  कुढ़ैली घाट,  गोरुमारा घाट और हारीभाषा घाट। वे कहते हैं, इनमें से लौचा घाट की तो खुशकिस्मती है कि यहां पुल बन चुका है। इन तमाम घाटों में से ज्यादातर ऐसे हैं, जिन पर पुल बनने की बात सोची भी नहीं गयी है। लिहाजा चचरी पुल ही इनका सहारा हैं।  

पीपुल्स ऑफ होप के फैसल कहते हैं, पहले के जमाने में जब लोग चचरी पुल बनाते थे और नदी को पार करने में इसका इस्तेमाल करते थे, तब इतना अखरता नहीं था। मगर अब जबकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है, फिर भी लोगों को नदी पार करने के लिए चचरी पुलों का सहारा लेना पड़े यह अच्छा नहीं लगता। खास तौर पर तब जब इसकी वजह से लगातार हादसे हो रहे हैं।

वे कहते हैं, झमटा घाट पर पुल नहीं बनने के कारण पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों ने वोट बहिष्कार भी करने का फैसला किया था। मगर बाद में प्रशासन के अनुरोध पर लोग वोट डालने के लिए तैयार हो गये। उसके बाद महज एक साल में इस चचरी पुल से फिसल कर तीन बच्चों की नदी में डूबने से मौत हो गयी। ऐसे में लोगों का गुस्सा जायज लगता है।

इस पूरे प्रसंग पर टिप्पणी करते हुए खबर सीमांचल के मॉडरेट हसन जावेद कहते हैं, सीमांचल के इलाके का दुर्भाग्य ही यही है कि जहां सरकारी विकास खत्म हो जाते हैं, वहां चचरी पुल दिखने लगते हैं। पहले तो लोग पुल-पुलियों के लिए सरकार और प्रतिनिधियों से मांग किया करते थे, अब जबकि सरकार ने खुद ही लोगों को आत्मनिर्भर बनने कह दिया है, तो लोग खुद चचरी पुल बनाकर सत्ता को आईना दिखा रहे हैं।    

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