NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
अटेंशन प्लीज़!, वह सिर्फ़ देखा जाना नहीं, सुना जाना चाहती है
आधी आबादी : जिस तरह से सोशल मीडिया पर स्त्रियों की तस्वीरें हिट पाती हैं और उनके विद्वत्तापूर्ण लेख खुले दिल से नज़रअंदाज़ होते हैं, यह बताता है कि स्त्रियों को ‘न सुना जाना’ एक सहज सामान्य बात है और उन्हें सुना जाना कितना ग़ैर-ज़रूरी।
सुजाता
10 Nov 2019
sujata
फोटो : सुजाता की फेसबुक वॉल से साभार

अच्छी-खासी कवि गोष्ठी चल रही थी। बीस कवि अपना कविता-पाठ कर चुके थे। अब शाम के छह बज रहे थे और हॉल खाली होने लगा था। चाय के बाद वाला सत्र वैसे भी स्त्री-केंद्रित था। विषय स्त्री-कविता और सभी स्त्री-वक्ता। शाम का वक़्त था तो स्त्रियों का कम होना समझ आता था।

लेकिन अब तक जो हॉल खचाखच भरा हुआ था पुरुष-श्रोताओं से वहाँ गिने-चुने कुछ पुरुष ही रह गए। मंच पर केवल औरतें हों तो उन्हें ‘देखा’ जा सकता है। उन्हें ‘सुनने’ के लिए कौन रुकना चाहेगा ! किसी-किसी चेहरे पर ऐसा भाव था कि चलो भाई, आख़िर ये क्या बोलेंगी? वही रोना-गाना !

ऐसा नहीं कि पहले कभी ऐसे भेद-भाव से सामना नहीं हुआ। लेकिन अब लोगों ने ऐसी बातें सीधे-सीधे मुँह पर कहना बहुत कम कर दिया है ताकि निरापद रह सकें। लेकिन अगर मुखर होकर कह ही दी जाती यह बात तो मैं जवाब देती‌ - अगर यह रोना-धोना है और सदियों से चला आ रहा है और समाज इसकी उपेक्षा कर रहा है तो ऐसे समाज को शर्म आनी चाहिए कि उसकी अनुदार पुरुष-सत्ता सदियों से अपरिवर्तनीय रही है और अपने अस्तित्व को लेकर निश्चिंत भी ! औरतों की मौजूदगी तो चाहिए लेकिन ऐसे जैसे बगिया में गुलाब हो या खेत में गेहूँ।

शायद शहरी,शिक्षित, सम्भ्रांत परिवारों में लड़कियाँ ऐसा न सुनती हों लेकिन गाँवों, क़स्बों में बड़ी होती बच्चियाँ जब घर में , सड़क पर, छत पर हँसी ठिठोली करती हैं तो माँएँ कहती हैं, जैसे हमें कहा जाता था, कि इतनी ज़ोर से मत हँसो, शरीफ लड़कियाँ ऐसे दाँत फाड़कर नहीं हँसतीं, वे ऐसे रहती हैं कि पड़ोस में पता भी नहीं लगे कि यहाँ लड़कियाँ रहती हैं।

माँएँ इन्हीं शिक्षाओं के साथ बड़ी होती हैं और फिर यही बेटियों को सिखा रही होती हैं और इसमें कुछ भी तो असहज नहीं होता। उधर घरों में बड़े बेटे का रोल बाप की तरह होता है जो एकबार चिल्लाएगा तो सब चुप हो जाएँगें, मक्खी की तरह भिन भिन करती लड़कियाँ चुपा जाएँगी और अपने-अपने काम को जा लगेंगीं।

हम समझ नहीं पाए कि हमारी हँसी इतनी बुरी क्यों समझी जाती है ! हम हँस हँस कर अपनी ओर ध्यान खींचते हैं। कभी कोई मोहल्ले की अम्मा ऐसा कहते हुए चली जाती थी- नासपीटी हँसती हैं सरे आम, कल को कुछ हो गया तो उम्र भर को रोना होगा । ब्याह हो कोई तो माँएँ लड़कियों को सजा धजा के ले जातीं कि कोई बिरादरी का ही अच्छा परिवार पसंद कर ले तो एक लम्बे, देखा-दिखाई के पचड़े से पिण्ड छूटे। बचपन में चुटकुला सुना-सुना के लोटपोट होते थे कि तीन तोतली बहनों को देखने लड़के वाले आए। पिता ने सीख दी थी कि कोई भी बोलेगी नहीं।

लेकिन लड़कियाँ चींटे को देख घबरा गईं और बोल पड़ी। औरतों का मज़ाक उड़ाना हमें भी सहज ही लगता था बचपन में। सहज- बोध से अलग अपनी कोई राय रखना स्त्री के लिए अच्छा नहीं माना गया। बल्कि उसका संस्कार हुआ ऐसे कि कहती कुछ और समझा कुछ और जाता रहा। जो कहती हूँ डंके की चोट पर कहती हूँ , सही कहती हूँ वाला रौब तो उसमें आया ही नहीं।

तोतली बेटियों की पोल तो खुल गई लेकिन चुटकुले का स्त्री-विरोधी, स्त्री-द्वेषी पाठ नहीं खुल सका तब। लड़कियाँ न बोलतीं तो पसंद कर ली जाती। आखिर ‘दिखना’ ज़रूरी है स्त्री का, बोलना उससे भी कम , और उसका सुना जाना तो बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है। उसपर से तोतलेपन का यह ‘डिफेक्ट’ भी? तौबा, तौबा !
पर्दे के रंग और सोफे के डिज़ाइन या फलाँ रिश्तेदार की शादी में शगुन कितना देना है हम इन मुद्दों पर स्त्रियों के बोलने की बात नहीं कर रहे।

प्रेम और रसोई के बारे में भी नहीं। देश के बारे में, राजनीति के बारे में, समाज के बारे में, अपनी गुप्त-सुप्त इच्छाओं के बारे में। लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया पर स्त्रियों की तस्वीरें हिट पाती हैं और उनके विद्वत्तापूर्ण लेख खुले दिल से नज़रअंदाज़ होते हैं यह बताता है कि स्त्रियों को ‘न सुना जाना’ एक सहज सामान्य बात है और उन्हें सुना जाना कितना गैर-ज़रूरी।

औरतों की बातों में कौन पड़े। जब मुँह खोलेंगी शिकायत करेंगी या मूर्खता प्रदर्शित करेंगीं। खूबसूरती और बुद्धि एकसाथ नहीं देता ईश्वर जैसे खयाल इतने आम हैं कि पुरुषों को विशिष्ट महिलाओं के लिए ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ जैसे विशेषण लगाने की ज़रूरत पड़ती है।बॉलीवुड ने भी ‘आँखे सेंकना’ ही सिखाया। वहाँ आज बोलती हुई स्त्रियाँ तो हैं फिल्मों में लेकिन बहुत कम फिल्में ऐसी हैं जहाँ उनका बोलना समाज से सुने जाने की मांग रखता है।

हम उन्हें सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। वे बोल रही हैं और सजग हो रही हैं लेकिन सुनी नहीं जा रही। उसे वैसे ही ध्यान देकर सुना जाए जैसे कि पुरुष को, इसके लिए उसे कभी उन्हीं औजारों का सहारा लेना पड़ रहा है जिसका पुरुष लेते आए हैं। जैसे कि पुरुष भाषा! साहित्य में, मीडिया में, फिल्मों में ! मुख्यधारा सिनेमा की हीरोईन स्त्री खुद को बेवकूफ कहे, एण्टरटेनमेण्ट कहे या तंदूरी मुर्गी उसे न स्त्री की भाषा कह सकते हैं न एक स्त्री का मन उसमें से झांकता है।

एक महिला पुलिस कॉन्स्टेबल की बात को गम्भीरता से लिया जाए क्या इसके लिए वह स्त्री बनी रहकर ही उतनी प्रभावी होती है? एक मीडिया एंकर महिला अगर अपनी स्क्रिप्ट अपने आप लिखने लगे तो क्या उस खबर या चैनल की टी आर पी वही रह जाएगी जो एक पुरुष भाषा मे लिखी गई स्क्रिप्ट और एक खूबसूरत चेहरा दिखाकर एक चैनल को अकसर मिलती है। पुरुष को पुरुष की ही शब्दावली में जवाब देकर स्त्री मानो अपने ही पाले में गोल करती है।

अपने ही पाले में गोल करने की बात से मुझे याद आता है पिछले दिनों भारत-भवन का अपना वह कविता-पाठ सत्र जिसमें केवल स्त्री-कवि थे और अध्यक्षता निर्मला जैन कर रहीं थी। हाशिए की कविता को बेहद हल्का कहने वाली, नब्बे के दशक में अटकी, आलोचना में मर्द-भाषा का अनुशीलन करने वाली और कोई नया सिद्धांत न दे सकने वाली इन आलोचक ने मंच से यह नाराज़गी ज़ाहिर की कि उन्हें जनाना डब्बे में डाल दिया गया।

पढ़ी गई किसी कविता पर उन्होंने बात नहीं की। मैं सुमन राजे का बेहद महत्वपूर्ण काम ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ और ‘इतिहास में स्त्री’ याद कर रही थी। वे खुद ऐसे आलोचकों, इतिहासकारों की पीढी से नाराज़ हुई थीं जिन्होंने न स्त्री को इतिहास में तलाशना चाहा न सुनना। ऐसी बुज़ुर्ग पीढी से हमें भी अपने ‘ सुने जाने’ की मांग अब करनी नहीं चाहिए। उनका प्रशिक्षण किसी और ही रीति से हुआ है। बल्कि इन्हें भुलाकर यह बार-बार याद करना चाहिए कि लोक जीवन में सराबोर,अपने बिम्ब ,अपनी अभिव्यक्तियाँ और अपनी शैली जो स्त्री की भाषा को एक चमक देती है वह पुरुष की मुच्छड़ भाषा के सेक्सिट बिम्बों और प्रयोगों से एकदम अलग है।

कभी इस मुच्छड़ भाषा के इस्तेमाल से खुद वह अथॉरिटी पाना चाहती है जो खुद का सुना जाना सम्भव होने देने के लिए अनिवार्य मान बैठी है। उसके भीतर एक पुरुष है और वह लिखती जाती है तो उसकी वाहवाही पर इतराती जाती है। घर के बड़का बाबू चिल्लाएंगे तो सब चुप हो जाएंगे वाली अकड़ कभी-कभी स्त्री लेखक को सम्मोहित करती है तो वह अथॉरिटी के साथ एक ऐसी फतवा –फैसला वाली भाषा की शरण में जाती है जहाँ सबसे ज़्यादा स्वीकृति है। पुरुष कविता के,उसी की पत्रकारिता के,सिनेमा के दुर्ग तोड़ने के लिए वह उसी के औजारों, उसी की भाषा का इस्तेमाल करती हुई आगे बढ़ती है।

घरों, परिवारों, सड़कों, सोशल साइट्स , साहित्य में अपने बोलने के मौके वह पा रही है धीरे-धीरे लेकिन वह कितना सुनी जा रही है हम उसे सुनने का कितना धैर्य रखते हैं हम उन्हें सुनने को कितना तैयार हैं इन सवालों के पार जाकर भी वह अभिव्यक्त हो रही है। वह सिर्फ देखा जाना नहीं, सुना जाना चाहती है-अटेंशन प्लीज़ !

(सुजाता एक सशक्त कवि हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। आपकी किताब 'स्त्री निर्मिति' काफी चर्चित रही है। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Social Media
Women
Discrimination
gender discrimination
patriarchal society
male dominant society

Related Stories

मदर्स डे: प्यार का इज़हार भी ज़रूरी है

विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!

'मैं भी ब्राह्मण हूं' का एलान ख़ुद को जातियों की ज़ंजीरों में मज़बूती से क़ैद करना है

उत्तर प्रदेश जनसंख्या नियंत्रण विधेयक महिलाओं की जिंदगी पर सबसे ज्यादा असर डालेगा!

सीएए : एक और केंद्रीय अधिसूचना द्वारा संविधान का फिर से उल्लंघन

हिंदी पत्रकारिता दिवस: अपनी बिरादरी के नाम...

विशेष: प्रेम ही तो किया, क्या गुनाह कर दिया

माघ मेला: संगम में मेला बसाने वाले जादूगर हाथों का पुरसाहाल कोई नहीं

क्या समाज और मीडिया में स्त्री-पुरुष की उम्र को लेकर दोहरी मानसिकता न्याय संगत है?

जिउतिया व्रत: बेटियों के मनुष्य होने के पक्ष में परंपरा की इस कड़ी का टूटना बहुत ज़रूरी है


बाकी खबरें

  • Stan Swamy
    पार्थ एमएन
    स्टेन स्वामी की मौत एक संस्थानिक हत्या थी’: सह-कैदियों ने उद्धव ठाकरे को अपने पत्र में लिखा था
    07 Oct 2021
    पत्र में तलोजा जेल के अधीक्षक कौस्तुभ कुर्लेकर को स्वामी की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया है और उन पर जान-बूझकर स्वामी के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति को अशक्त बनाने का आरोप लगाया गया है।
  • covid
    संदीपन तालुकदार
    डेल्टा वेरिएंट के ट्रांसमिशन को टीके कब तक रोक सकते हैं? नए अध्ययन मिले-जुले परिणाम दिखाते हैं
    07 Oct 2021
    इस अध्ययन में कहा गया है कि टीका ले चुके लोग यदि डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित होते हैं तो उनके करीबी संपर्कों में वायरस फैलने की संभावना कम है। हालांकि, यह सुरक्षात्मक प्रभाव दूसरी खुराक लेने के तीन…
  • Lakhimpur Kheri
    अनिल अंशुमन
    लखीमपुर खीरी में किसानों के नरसंहार के ख़िलाफ़ झारखंड में भी प्रदर्शन 
    07 Oct 2021
    झारखंड की राजधानी रांची तथा राज्य के कई इलाकों में सड़कों पर प्रतिवाद मार्च निकालकर किसानों की मौत के जिम्मेवार केंद्रीय राज्य मंत्री, उनके बेटे व मोदी सरकार के पुतले जलाए गए। प्रतिवाद का यह सिलसिला…
  • SKM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एसकेएम का सरकार को अल्टीमेटम: मांगें पूरी नहीं की तो शहीदों के 'अंतिम अरदास' दिवस पर बड़े कार्यक्रम का किया जाएगा एलान
    07 Oct 2021
    रिपोर्टों से मालूम होता है कि केंद्रीय राज्य ग्रह मंत्री अजय मिश्रा और उनके बेटे आशीष मिश्रा पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और मंत्री वास्तव में जमानत पर बाहर हैं। एसकेएम ने मोदी सरकार को मंत्री के…
  • ‘An Ugly Truth’ Lays Bare Facebook’s Murky Business Practices
    सौरभ शर्मा
    'एक घिनौने सच' ने फ़ेसबुक के संदिग्ध व्यावसाय का किया पर्दाफ़ाश 
    07 Oct 2021
    दो खोजी पत्रकार अपने द्वार लिखी एक किताब में फ़ेसबुक की व्यावसायिक प्रथाओं पर सवाल उठा रहे हैं। हाल ही में फ़ेसबुक की एक पूर्व-कर्मचारी व्हिसल-ब्लोअर ने भी कंपनी द्वारा 'जनता के हितों के ख़िलाफ़ काम करने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License