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अयोध्या विवाद : आइए जानते हैं तीनों पक्षकारों ने कोर्ट में क्या-क्या दलीलें दी?
अयोध्या विवाद नाम आते ही हमारे दिमाग में हिन्दू- मुस्लिम विवाद झूलने लगता है। इसलिए हम असली मसले से बहुत दूर हो जाते हैं। असली मसला ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़ा है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
16 Oct 2019
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी
Image courtesy: haribhoomi

आम जनता के लिए सवाल यही है कि अयोध्या में राम मंदिर बनेगा या बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण होगा। इसका जवाब तलाशने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है। इसी मसले पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय संविधान पीठ छह अगस्त से लगातार सुनवाई कर रही थी। आज 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर ली गई है और अब 17 नवम्बर से पहले फ़ैसला आने की संभावना है।

साल 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2.77 एकड़ विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही आखड़ा और रामलला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था।

इस फैसले पर एतराज़ जताकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा था कि इलाहाबद कोर्ट ने ऐसा फैसला दिया है जिसका निवेदन किसी ने नहीं किया था। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से 67.03 एकड़ भूमि को सरकार को सौंप दिया। इससे पहले भी भूमि विवाद के चलते भूमि सरकार के अधिकार में ही थी।

तीनों पक्षकारों की दलील

इस मसले पर फ़ैसला आने से पहले मोटे तौर पर यह समझने की कोशिश करते हैं कि इससे जुड़े तीनों पक्षकारों की दलील क्या हैं?

अयोध्या विवाद नाम आते ही हमारे दिमाग में हिन्दू- मुस्लिम विवाद झूलने लगता है। इसलिए हम असली मसले से बहुत दूर हो जाते हैं। असली मसला ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़ा है।

आइए जानते हैं कि ज़मीन के लिए लड़ रहे तीनों पक्ष सुन्नी वक्फ़ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही आखड़ा ने 39 दिनों तक चली बहस में क्या दलीलें रखी हैं?

रामलला विराजमान की दलील

वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने रामलला विराजमान की तरफ से दलील पेश की। रामलला विराजमान की तरफ से दलील दी गई कि कानून की तय स्थिति में भगवान हमेशा नाबालिग होते हैं और नाबालिग की संपत्ति न तो छीनी जा सकती है, न ही उस पर विरोधी कब्‍जे का दावा किया जा सकता है।

दलील दी गई कि विवादित जगह पर मुस्लिमों ने 1934 से पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ना बंद कर दिया था। 16 दिसंबर 1949 के बाद वहां जुमे की नमाज पढ़ना भी बंद हो गई। इसके बाद 22-23 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे के अंदर मूर्तियां रखी गईं। हिंदू धर्म में किसी जगह की पूजा के लिए वहां मूर्ति होना जरूरी नहीं। हिंदू तो नदियों और सूर्य की भी पूजा करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जब पूछा कि अयोध्या में राम मंदिर बाबर ने तुड़वाया था या औरंगजेब ने? रामलला पक्ष ने कहा कि इस बारे में लिखित तथ्यों में भ्रम है। इस पक्ष के अनुसार इसमें कोई भ्रम नहीं कि राम अयोध्या के राजा थे और वहीं जन्मे थे।

कोर्ट ने पूछा- क्या सबूत है कि मंदिर तुड़वाने के बाद बाबर ने ही मस्जिद बनाने का आदेश दिया था? रामलला पक्ष ने जवाब दिया कि इसका सबूत इतिहास में दर्ज शिलालेख है।

रामलला पक्ष ने दावा किया कि विवादित जगह पर ईसा पूर्व बना विशाल मंदिर था। इसके खंडहर को बदनीयती से मस्जिद में बदल दिया गया था। राम जन्मस्थान पर नमाज़ इसलिए पढ़ी जाती रही, ताकि जमीन का कब्जा मिल जाए।

रामलला विराजमान की ओर से दलील दी गई कि दस्तावेजों के जरिए साबित करना मुश्किल है कि भगवान राम कहां पैदा हुए थे। लाखों श्रद्धालुओं की अडिग आस्था और विश्वास ही इसका सबूत है कि विवादित स्थल राम जन्मभूमि है।

रामलला विराजमान की तरफ से यह भी दलील दी गई- विवादित स्थल की खुदाई में निकले पत्थरों पर मगरमच्छ और कछुओं के चित्र भी बने थे। मगरमच्छ और कछुओं का मुस्लिम संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। राम जन्मभूमि के दर्शन के लिए श्रद्धालु सदियों से अयोध्या जाते रहे हैं। कोर्ट में पेश पुराने सभी तथ्य और रिकॉर्ड से साबित होता है कि यह भगवान राम का जन्मस्थान है।

कहा गया कि हिंदू एक रूप में देवताओं को नहीं पूजते। उन्हें ईश्वरीय अवतार मानते हैं। इनका कोई रूप और आकार नहीं है। महत्वपूर्ण देवता हैं, उसकी छवि या रूप नहीं। भगवान राम का अस्तित्व और उनकी पूजा जन्मस्थान पर मूर्ति स्थापना और मंदिर निर्माण से भी पहले से है। केदारनाथ में मूर्ति नहीं, शिला पूजा होती है। मूर्ति न्यायिक व्यक्ति मानी जाती है। वह प्रापर्टी रखने में सक्षम है। देवता जीवित प्राणी की तरह माने जाते हैं। विवादित संपत्ति खुद में एक देवता है और भगवान राम का जन्मस्थान है। इसका कोई सवाल नहीं उठता कि कोई वहां मस्जिद बनाए और उस जगह पर जबरन कब्जे का दावा करे। विवादित भूमि पर मंदिर रहा हो या न हो, मूर्ति हो या न हो, यह साबित करने के लिए लोगों की आस्था होना काफी है कि वहीं रामजन्म स्थान है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड की दलील

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन दलील रख रहे थे। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दलील दी कि हिंदू पक्ष सिर्फ अपने विश्वास के आधार पर विवादित जगह के मालिकाना हक़ की बात कर रहे हैं। धवन ने रामलला विराजमान के वकील द्वारा पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल द्वारा अयोध्या पर लिखित एक पुस्तक का हवाला दिये जाने के प्रयास पर आपत्ति की और कहा कि इस तरह के प्रयासों की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। राम पूजनीय हैं, लेकिन उनके नाम पर किसी स्थान पर मालिकाना हक़ का दावा नहीं किया जा सकता। हिंदू सूर्य की भी पूजा करते हैं, लेकिन उस पर मालिकाना हक़ नहीं जता सकते। अखाड़े का दावा बनता ही नहीं। 22-23 दिसंबर 1949 को विवादित जमीन पर रामलला की मूर्ति रखे जाने के करीब दस साल बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने सिविल सूट दायर किया था, जबकि सिविल सूट दायर करने की समय सीमा 6 साल थी। निर्मोही अखाड़ा सिर्फ सेवादार है, ज़मीन का मालिक नहीं। निर्मोही को सम्पति से लगाव नहीं होता फिर भी निर्मोही सम्पति पर अपना दावा जता रहे हैं।

हिंदू पक्षकारों की उस दलील का खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि 1934 के बाद विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी गई। यह भी कहा कि हिंदू पक्षकारों ने अयोध्या में लोगों द्वारा परिक्रमा करने की दलील दी है। परिक्रमा पूजा का एक रूप है, लेकिन यह सबूत नहीं कि वह स्थान राम जन्मभूमि ही है। परिक्रमा भी बाद में शुरू हुई। इसका कोई सबूत नहीं है कि पहले वहां लोग रेलिंग के पास जाते थे और गुंबद की पूजा करते थे। पहले गर्भगृह में मूर्ति की पूजा का भी कोई सबूत नहीं है।

दलील दी गई कि मस्जिद के केंद्रीय गुंबद को भगवान राम का जन्मस्थान बताने की कहानी 1980 के बाद गढ़ी गई। अगर वहां मंदिर था तो वह किस तरह का मंदिर था। गवाहों द्वारा मंदिर को लेकर दिए गए बयान अविश्वसनीय हैं। गर्भगृह में 1939 में मूर्ति नहीं थी। वहां पर बस एक फोटो था। बाहरी चबूतरे पर हमेशा मूर्तियों को पूजा जाता था और 1949 में मूर्तियों को भीतर आंगन में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद ये पूरी जमीन पर अपने कब्जे की बात करने लगे।

दलील दी गई कि बाबरनामा के अनुसार मस्जिद को बाबर के आदेश पर उसके कमांडर मीर बाकी ने बनवाया था। तीन शिलालेखों में भी इसका जिक्र है। इन शिलालेखों पर हिंदुओं ने आपत्तियां जरूर उठाई हैं। लेकिन यह सही नहीं, क्योंकि इनका जिक्र विदेशी यात्रियों के वर्णन और गजेटियरों में है। इतिहासकार विलियम फॉस्टर ने विवादित जगह पर मस्जिद की बात कही है। प्राचीन कथाओं में भी कहा गया है कि भगवान राम की मां कौशल्या अपने मायके गईं थीं और वहीं पर उन्होंने राम को जन्म दिया था। ऐसे में अयोध्या राम का जन्मस्थान हो यह भी जरूरी नहीं।

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा कि विवादित स्थल पर मंदिर का कोई सबूत नहीं है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग भी यह साबित नहीं कर पाया है। राम चबूतरे का भी कहीं कोई साक्ष्य नहीं है कि ये कब अस्तित्व में आया। मस्जिद के संबंध में ऐसे साक्ष्य हैं। राम चबूतरा हिंदुओं के कब्जे में 1721 से है।

जन्मस्थान न्यायिक व्यक्ति नहीं हो सकता। ये याचिका जानबूझकर लगाई गई हैं ताकि इसपर लॉ ऑफ लिमिटेशन और एडवर्स पोजिशन के सिद्धांत लागू न हो सकें। एक बार तो धवन ने भगवान राम के सही जन्मस्थल को दर्शाने वाले सचित्र नक्शे का हवाला देने पर आपत्ति की। धवन ने पीठ से जानना चाहा कि वह इसका क्या करें। पीठ ने कहा कि वह इसके टुकड़े कर सकते हैं। इसके बाद धवन ने अखिल भारतीय हिन्दू महासभा द्वारा उपलब्ध कराये गये इस नक्शे को न्यायालय कक्ष में ही फाड़ दिया।

निर्मोही अखाड़े की दलील

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन निर्मोही आखड़े की तरफ से दलील पेश कर रहे थे। निर्मोही और निर्वाणी अखाड़ा ने भी अयोध्या में विवादित भूमि के प्रबंधन और अनुयायी के अधिकार को लेकर अपना दावा किया है और कहा कि 1885 से ही इस संपत्ति पर उनका कब्जा है। सुन्नी वक्फ के बोर्ड को पूरी तरह खारिज किया है।

निर्मोही आखड़ा ने रामलला विराजमान द्वारा जन्मस्थान न्यायिक व्यक्ति बना देने पर उसकी आलोचना की। निर्मोही अखाड़ा ने दलील दी कि विवादित जमीन हमारे पास 100 साल से भी ज्यादा समय से है। भले ही अखाड़ा 19 मार्च 1949 से रजिस्टर्ड है, लेकिन इसका इतिहास पुराना है। मुस्लिम लॉ के तहत कोई भी व्यक्ति ज़मीन पर कब्जे की वैध अनुमति के बिना दूसरे की ज़मीन पर मस्जिद का निर्माण नहीं कर सकता। इस तरह ज़मीन पर जबरन कब्जा करके बनाई गई मस्जिद गैर-इस्लामिक है और वहां पर अदा की गई नमाज कबूल नहीं होती है।

निर्मोही आखड़े की मुख्य तौर पर तीन दलीलें रही हैं। पहला कि वही भगवान राम के सच्चे पूजने वाले हैं। दूसरा विवादित ढांचे में उन्हीं के पुजारी पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। और तीसरा साल 1934 से इस ढांचे को वही संभालते आ रहे हैं। इसलिए इस पवित्र भूमि पर उन्हीं का अधिकार बनता है।

अंतिम दिन क्या हुआ कोर्ट में पढ़ें : राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में फ़ैसला सुरक्षित

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Ayodhya Case
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