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आयुर्वेद हो या एलोपैथी; सवालों से बचना नहीं, सवालों का सामना ही है सही इलाज  
अच्छा तरीका यही है कि जमकर सवाल उठाए जाएं, हर दवा और हर दावे पर विज्ञान सम्मत पद्धिति से गहन शोध हो और लोगों में उपलब्ध दवा और इलाज के बारे में भरोसा जगे।
अजय कुमार
26 May 2021
ayur

अगर हमारी सरकार लोकतांत्रिक और कल्याणकारी और मीडिया जनवादी होती, जनता की परेशानियों से जूझने और उन्हें कम करने के लिहाज से काम कर रही होती तो स्वास्थ्य क्षेत्र के सबसे जरूरी सवाल बहुत पहले से उठ रहे होते और जनता के हित में नीतियां बन रही होतीं।

 यह सरकार का काम था कि वह विज्ञान सम्मत शोध और सोच को बढ़ावा देती और यह मीडिया का काम था कि वह सरकार और एलोपैथी की दुनिया से वैसे सवाल पूछे जो एलोपैथी के मुनाफे के लिए गढ़े गए उनके मनमानेपन को रोक सके। यह मीडिया का काम था कि वह आयुर्वेद की उस कसौटी की जांच परख करे जिसके जरिए वह एलोपैथी से महान होने का दावा करता है। अगर यह ढंग से किया गया होता तो एलोपैथी और आयुर्वेद के बीच ऐसा पुल बना होता जिसमें जनता की भलाई होती, बाबा रामदेव और मुनाफा कमाने वाली कंपनियों पर अंकुश लगा होता।

 बाबा रामदेव ने ट्वीट किया कि 'एलोपैथी बकवास विज्ञान है' इस पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने नाराजगी जताई। ट्वीट वापस लेने की मांग कर दी। स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन बीच में आए। बाबा रामदेव ने ट्वीट हटा दिया। लेकिन उसके बाद शाम होते होते बाबा रामदेव का हठ योग फिर जाग गया। उन्होंने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और फार्मा कंपनियों से 25 सवाल पूछ डाले। इन सवालों के क्या जवाब होंगे? यह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य और विद्वान जन ही बताएंगे। अगर चाहे तो इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी बाबा रामदेव से आयुर्वेद के बारे में कई सवाल पूछ सकता है।

 इस पूरे प्रकरण में सबसे जरूरी बात यह है कि यह समझा जाए कि क्यों एलोपैथी से भी सवाल पूछना जरूरी है और क्यों आयुर्वेद से भी सवाल पूछना जरूरी है? 

 डॉ. विपिन गुप्ता ड्रग डिस्कवरी साइंटिस्ट है। करीब दो दशक तक नई दवाइयां खोजने के बाद अब शरीर की ऑटो रिपेयर क्षमताओं पर प्रयोग कर रहे हैं ताकि लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों को हमेशा के लिए खत्म किया जा सके। डॉ. विपिन गुप्ता अपने वीडियो में कहते हैं कि साल 2003 में ह्यूमन जिनोम प्रोजेक्ट पूरा हुआ। आसान भाषा में कहा जाए तो इसका मतलब यह हुआ कि वैज्ञानिकों ने उस फार्मूले को सिद्धांत के तौर पर जान लिया जो इंसानी शरीर बनने के काम में आती है। मतलब यह कि अगर विज्ञान चाहे तो प्रयोगशाला में इंसानी शरीर तैयार कर सकता है। लेकिन इस पर बहुत सारी पाबंदियां लगाई गई है क्योंकि इसका नुकसान बहुत ज्यादा है। 

 ह्यूमन जिनोम प्रोजेक्ट का मकसद था कि यह जाना जाए कि इंसान बीमार क्यों होता है? बीमारी और इंसान के बीच संबंध क्या है? साल 2003 से लेकर अब तक इस पर बहुत अधिक काम किया जा चुका है। डॉ. विपिन गुप्ता कहते हैं कि 18,000 से अधिक ऐसी जीन का पता लगाया जा चुका है, जिनका संबंध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कई तरह की बीमारियों से जोड़ा जा सकता है।

 इसमें सबसे दिलचस्प बात जो निकल कर आ रही है वह है कि ज्यादातर बीमारियों में गड़बड़ी जीन में नहीं है बल्कि उसकी स्विचिंग में हैं। आसान भाषा में समझिए तो यह कि डीएनए के अंदर मौजूद मॉलिक्यूल में जीन होते है। यह किसी भी जीवित प्राणी की संरचनात्मक और कार्यात्मक भूमिका को निर्धारित करते है। इसका एक स्विचिंग सिस्टम होता है। जो यह निर्धारित करता है कि कब किस जीन को एक्टिव होना है कब डिएक्टिव होना है। कब काम करना है कब आराम करना है। कहां एक्टिव होना है, कहां एक्टिव नहीं होना है। जैसे कि इंसुलिन का जीन केवल अमाशय में सक्रिय होता है, कहीं और नहीं।

 जीन के स्विचिंग सिस्टम की यह प्रणाली बहुत जटिल होती है। इसका विकास भी बहुत लंबे समय से हुआ है। बंदर से लेकर अब तक की पूरी इंसानी शरीर की लंबी यात्रा में इसका विकास हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके विकास में प्रकृति और शरीर के बीच की आपसी क्रिया प्रतिक्रिया ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि यह तारतम्य टूट गया है। कई लोग और कई इलाके ऐसे है जिनका प्रकृति और शारीरिक श्रम से नाता पूरी तरह से टूट गया है। इसलिए जीन का स्विचिंग सिस्टम भी गड़बड़ हो गया है। इससे कई सारी परेशानियां उभर रही हैं।

 इसमें कोई दो राय नहीं कि मेडिकल साइंस बहुत अधिक उन्नत हुआ है। लेकिन जितना उन्नत हुआ है उतना ही अधिक जटिल हुआ है। दवाई और अस्पताल लोगों को ठीक करने में भूमिका निभाते हैं लेकिन कई लोग इनसे बीमार भी हो जाते हैं। दवा कंपनियों का कॉरपोरेटाइजेशन बढ़ा है। मुनाफा इनके लिए लोगों की जान बचाने और बीमारी दूर करने से ज्यादा बड़ा मकसद है। ड्रग इंडस्ट्री के भीतर काम करने से तो ऐसा लगता है कि दवाइयां बीमारी दूर करने के लिए नहीं बल्कि बीमारी को मैनेज करने के लिए दी जा रही हैं। ताकि मरीज लंबे समय तक मरीज बना रहे और पैसा कमाते रहा जाए। दवा के इफेक्ट के साथ - साथ साथ-साथ उसका साइड इफेक्ट भी शरीर में बनता है।

 एक अनुमान के मुताबिक हर पांचवा डॉक्टर एंटी डिप्रेशन की दवा लेता है। यह आम लोगों से 10 गुना ज्यादा है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के एक सर्वे के मुताबिक डॉक्टर मोटापा हाइपरटेंशन डायबिटीज जैसी बीमारियों से अधिक जूझ रहे हैं। इनकी मौत भी आम लोगों से पहले हो जा रही है। कम उम्र में इन्हें हार्टअटैक भी आ जाता है। यह उन डॉक्टरों की हालत है जो एलोपैथी की दवा देते हैं और सारी जानकारी अपने पास रखते हैं।

 ब्रिटिश जनरल ऑफ साइंस में प्रकाशित एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में मेडिकल एरर की वजह से मरने वाले लोगों की संख्या तीसरे नंबर पर है। तकरीबन ढाई लाख से अधिक लोग मेडिकल एरर की वजह से मर जाते हैं। लेकिन इस पर कोई हो हल्ला नहीं होता। यह उस देश की बात है जो दुनिया में उन्नति के नाम पर मानक के तौर पर माना जाता है तो दूसरे देश के बारे में सोचा जा सकता है।

 इन सारी बातों का कहीं से भी यह मतलब नहीं है कि मेडिकल साइंस कारगर नहीं है। बल्कि इनका यही मतलब है कि मौजूदा मेडिकल साइंस का भी एक स्याह पक्ष है। जिस पर बहुत कम बातचीत है। इस पर बातचीत होनी चाहिए। जरूरी सवाल इनसे भी पूछना चाहिए। इतना सब कहने के बाद भी यह जोर देकर कहना होगा कि इमरजेंसी की हालात में जीवन बचाने के लिए एलोपैथी हॉस्पिटल और दवा बहुत कारगर है। कोरोना के इस भीषण तबाही के दौर में वैक्सीन लगवाना बहुत जरूरी है। यह तो हुई एलोपैथी की बात।

 अब बात करते हैं आयुर्वेद की तो सबसे पहले यह जान लीजिए कि दवा बनाने पर किसी एक व्यक्ति संस्था विचार या विचारधारा का अधिकार नहीं होता है। दवा बनाने की आजादी सबको है। लेकिन दवा किसे कहा जाएगा? जिसे दवा कह कहकर प्रचारित किया जा रहा है वह दवा है या नहीं। यह बात दवा बनने से जुड़े कुछ जांच-परख के तौर तरीकों पर निर्भर करता है।

 आयुर्वेद पर सबसे बड़ा आरोप यही लगाया जाता है कि बहुत सारी औषधियां बिना जांच-परख के औषधियां या दवाइयां कहकर बेची जा रही हैं।

 लेकिन आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? मोदी सरकार के आने के बाद साल 2014 में आयुष मंत्रालय बनाया गया था। जब बाकायदा आयुर्वेद यूनानी सिद्ध होम्योपैथी पर काम करने के लिए एक मंत्रालय है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आयुर्वेद की बहुत सारी औषधियां बिना किसी जांच परख के बाज़ार में बिक रही हों?

 ऑल इंडिया पीपुल साइंस नेटवर्क के सदस्य डॉक्टर एस कृष्णस्वामी न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहते हैं कि 2014 के बाद बने आयुष मंत्रालय में पैसा तो खूब डाला गया, इसका बजट बढ़ाकर दोगुना कर दिया गया और इसका प्रचार भी खूब हुआ लेकिन हकीकत यह है कि तब से लेकर अब तक आयुष मंत्रालय ने किसी भी दवा के फॉर्मूलेशन को सत्यापित करने के लिए किसी भी तरह का क्लिनिकल ट्रायल नहीं किया है। आसान भाषा में कहा जाए तो आयुष मंत्रालय के तरफ से पिछले छह सालों में एक भी दवा का क्लिनिकल ट्रायल के आधार पर सत्यापन नहीं हुआ है। इसी कमी का फायदा उठाकर आयुर्वेद के अंदर धांधली करने वाले बड़े-बड़े दावे करते हैं। कोई प्रमाणित क्लीनिकल ट्रायल होता नहीं, उन खुद का कुछ लोगों पर परीक्षण करने का प्रमाण होता है। इसलिए आयुर्वेद पर भरोसा नहीं पनप पाता।

 बाबा रामदेव ने परंपरागत दवाओं की दुनिया में मौजूद इसी खामी का फायदा उठाकर एलान कर दिया कि उन्होंने कोरोना की दवाई कोरोनिल बना ली है। जबकि हकीकत यह थी कि दवाई बनाने का रजिस्ट्रेशन ही सर्दी खांसी की दवाई बनाने के नाम पर किया गया था। इस कदम से कोरोना की बीमारी पर तो कोई असर नहीं पड़ा लेकिन आयुर्वेद की दुनिया पर फिर से लांछन लग गया। वही लांछन जो आयुर्वेद को लेकर आधुनिक दुनिया में किसी पूर्वाग्रह की तरह फैला हुआ है। पूर्वाग्रह यह कि आयुर्वेद वाले बिना किसी साइंटिफिक प्रोटोकॉल और रेगुलेटरी मेकैनिज्म को अपनाए हुए दवाइयां बाजार में बेचने चले जाते हैं।

 आयुर्वेद के पास पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों के बारे में मजबूत ज्ञान तो है लेकिन इस ज्ञान का कोई एविडेंस नहीं है। यह ज्ञान बिना किसी साक्ष्य पर आधारित है। इसलिए आयुर्वेद की दुनिया एक ऐसी दुनिया बन कर रह जाती है जिस पर भरोसा करने से लोग कतराते हैं।

 इसी मसले पर डॉक्टर इला पटनायक और शुभ रॉय का लेख द प्रिंट में छपा है। इनका कहना है कि आयुर्वेद दवाएं स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भी साबित होती हैं। इसके पीछे तीन वजहें होती हैं।

 पहला सभी जड़ी बूटी उपयोगी नहीं होती, दूसरा भस्म और पौधों से अलग चीजों का इस्तेमाल दवाइयों में किया जाता है और तीसरा जो सबसे खतरनाक साबित होता है, वह यह है कि आयुर्वेद की दवाओं के साथ एलोपैथी दवाओं का गैर कानूनी मिश्रण किया जाता है। आयुर्वेदिक दवाओं में स्टेरॉयड मिलाने की खबरें बार-बार आती है। यह स्टेरॉयड शरीर में खून का सरकुलेशन बढ़ाकर शरीर को बेहतर होने का झूठा एहसास दिलाते हैं। मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल एक अध्ययन में पाया गया कि 40 फ़ीसदी आयुर्वेदिक दवाओं में स्टेरॉयड मिलाए गए थे। इनका शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि आयुर्वेद का सही ढंग से रेगुलेशन है। सरकार ने जो गाइडलाइन जारी की है उसका इस्तेमाल हो। कंपनियों को पैसा कमाने के लिए छूट न दी जाए।  

 रेगुलेशन में लापरवाही और तमाम तरह के भ्रष्ट हरकतों की वजह से भारत में आयुर्वेद की साख बहुत अधिक कमजोर हुई है। पूरी दुनिया में आधुनिक दवाओं का साइड इफेक्ट गहराता जा रहा है। शरीर में मौजूद रोगाणुओं ने दवाइयों के प्रति रेसिस्टेन्स करना सीख लिया है। इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों का रुझान वैकल्पिक दवाओं की तरफ भी हुआ है। लेकिन अगर वैकल्पिक दवाओं यानी कि परंपरागत दवाओं में धांधली का ऐसा हाल दिखा तो भारत की परंपरागत दवाएं अपना साख बनाने में पिछड़ती चली जाएंगी।

 डॉ. मधुलिका बनर्जी पावर पॉलिटिक्स एंड मेडिसिन नामक किताब की लेखिका है और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हैं। डॉक्टर बनर्जी इंडियन एक्सप्रेस में लिखती हैं कि “यह बात सही है कि आयुर्वेद की दुनिया में बहुत अधिक खामियां हैं और यह साफ तौर पर दिखाई भी देती हैं। लेकिन आयुर्वेद की दुनिया बहुत बड़ी और बहुत गहरी है। इसके तह तक पहुंचना आसान नहीं है। मैंने अपने 30 साल के रिसर्च के दौरान पाया है कि आयुर्वेद की दुनिया केवल हिमालया, पतंजलि और डाबर जैसे ब्रांड के तले आने वाले उत्पादों तक सीमित नहीं है।”

 उन्होंने कहना है कि परंपरागत दवाएं जैसी कैटगरी इन्हें सही तरीके से परिभाषित नहीं कर सकती है। परंपरागत दवाई कहने से ऐसा लगता है, जैसे किसी प्राचीन समय की किताब में कोई रोगों से इलाज का कोई तरीका लिखा था, उसे हूबहू उसी तरीके से अपना लिया गया। लेकिन ऐसा नहीं है। प्राचीन समय से लेकर अंग्रेजों के आने से पहले तक आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथ से जुड़े चिकित्सकों ने प्राचीन किताबों में मौजूद बहुत सारी औषधियों की छानबीन की। जो अधूरा था उसे पूरा करने का काम किया। नई औषधियां विकसित कीं। एक-दूसरे के क्षेत्रो से औषधि से जुड़े तत्व का लेनदेन किया। यानी परंपरागत दवाएं केवल परंपरा की नहीं थी बल्कि इनका एक सिलसिला चलता रहा।

 डॉ. मधुलिका का मानना है कि अंग्रेजों के आने के बाद ये सिलसिला अचानक से थम गया। इसके बाद दवाओं की दुनिया में मॉडर्न बायोमेडिसिन का दबदबा हो गया। अंग्रेजों की हुकूमत ने आजादी से पहले और अंग्रेजों की हुकूमत से बनी भारतीय मन: स्थिति ने परंपरागत दवा प्रणाली के वैज्ञानिक तौर-तरीकों से जुड़े सारे दरवाजे और खिड़कियों को बंद कर दिया। इसके बाद हमने कहना शुरू किया कि हमारी परंपरागत दवा प्रणाली वैज्ञानिक आधार की मेथाडोलॉजी को नहीं अपनाती है।

 परंपरागत दवाओं से जुड़ी मौजूदा समय में प्रचलित मान्यता के विपरीत बहुत सारे आयुर्वेदिक चिकित्सा ऐसे हैं जो केवल आयुर्वेदिक दवाओं की ही सलाह देते हैं। इन्हें अपने प्रशिक्षण पर इतना भरोसा है कि यह एलोपैथी के दवाओं को गैर कानूनी तरीके से आयुर्वेद के दवाइयों साथ नहीं मिलाते हैं। बिना किसी प्रसिद्धि के लालच में यह अपने काम में लगे हुए हैं।

 उनका मानना है कि परंपरागत दवाओं के मामले में प्रशिक्षण देने वाले शिक्षकों में ऐसे शिक्षक शामिल हैं, जो मॉडर्न बायोमेडिसिन और परंपरागत दुनिया के बीच एक जरूरी पुल बनाने का काम करते हैं। चिकित्सा की आधुनिक और जरूरी शैलियों से जरूरी पहलू सीखकर परंपरागत दवा प्रणाली को निखारने का काम करते हैं। इन सब का मकसद यही है कि अगर सही जानकारी कुछ कोशिशों के बाद उपलब्ध हो सकती है और उससे आम जनों की तकलीफ है दूर हो सकती हैं तो क्यों न इस क्षेत्र में ईमानदार कोशिश करते रहा जाए।

 डॉ. मधुलिका कहती हैं कि आयुर्वेद की दुनिया में केवल आयुर्वेद की दवाएं बनाने वाली मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को कामयाबी हासिल हुई है। इन कंपनियों ने आयुर्वेद से जुड़े जरूरी शोध पर कभी ध्यान नहीं दिया। उन प्रक्रियाओं पर कभी ध्यान नहीं दिया जो दवाइयों से जुड़े दावों को पुख्ता बनाते हैं। इनका मानना है कि बढ़िया सी पैकेजिंग, भारत की पुरातन संस्कृति में लिपटा हुआ प्रचार दिखाकर यह कंपनियां बाजार में अपना माल बेचने में हमेशा कामयाब रहेंगी। ऐसा होता भी है। कारोबारी तौर पर यह कंपनियां मुनाफे में ही रहती हैं। बाजार में आयुर्वेद के उत्पाद के बिक जाते हैं। लेकिन एक लंबे समय का अध्ययन किया जाए तो यह साफ दिखता है की आयुर्वेद के उत्पादों से लोगों का भरोसा टूटता जा रहा है।

 डॉ. मधुलिका कहती हैं कि आयुर्वेद और आधुनिक बायोमेडिसिन के बीच प्रतियोगिता की बेईमान भावना मौजूद है। दोनों को एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में नहीं रहना चाहिए। दोनों ज्ञान की परंपराएं एक दूसरे से अलग हैं। शरीर, बीमारी और इलाज के प्रति इनका एक-दूसरे से बिलकुल अलग नजरिया है। इसलिए इन दोनों में दवा बनाने की जांच परख से जुडी प्रक्रिया भी अलग-अलग होगी। जिस तरह का क्लिनिकल ट्रायल बायोमेडिसिन करता है, ठीक वैसे ही क्लिनिकल ट्रायल की अपेक्षा आयुर्वेद की दवाओं के साथ नहीं करनी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है की आयुर्वेद की दवाओं का क्लिनिकल ट्रायल ही नहीं होना चाहिए। कहने का मतलब है कि दवाओं की जांच परीक्षण की पद्धतियां अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन इनका होना बहुत जरूरी है। बाबा रामदेव के कोरोनिल के मामले में दवा बनाने की कोई पद्धति ही नहीं थी। इसलिए बाबा रामदेव पर आरोप लगाना बिल्कुल सही है। लेकिन इसके जरिए आयुर्वेद पर गलत धारणा अपना लेना गलत है।

 इस तरह का पैमाना बायोमेडिसिन में नहीं अपनाया जाता है। जैसे कि लांसेट जैसी पत्रिका के एडिटर ने बार-बार कहा कि रेमडेसिवीर दवा से जुड़े गैर भरोसेमंद डाटा को पब्लिश करने के लिए फार्मा कंपनियों ने उन पर बहुत बहुत अधिक दबाव डाला था। यह खबर आने के बाद भी पूरे बायोमेडिसिन पर लांछन नहीं लगा केवल रेमडेसिवीर दवा पर लांछन लगा। इसे अपवाद मान कर छोड़ दिया गया तो वैसा ही सलूक आयुर्वेद के साथ क्यों नहीं होना चाहिए। कहने का मतलब है कि आर्युवेद हो या एलोपैथी, कोई भी सवालों से बाहर नहीं है, और अच्छा तरीका यही है कि जमकर सवाल उठाए जाएं, हर दवा और हर दावे पर गहन शोध हो और लोगों में उपलब्ध दवा और इलाज के बारे में भरोसा जगे। न बाबा रामदेव अपनी दवा या कारोबार का आयुर्वेद के नाम पर बचाव कर पाएं न बिग फार्मा और अस्पताल एलोपैथी के नाम पर अपनी मुनाफ़ाख़ोरी और लूट-खसोट को जस्टीफाई कर पाएं।

इसे भी पढ़ें: पक्ष-विपक्ष: झगड़ा आयुर्वेद और एलोपैथी का है ही नहीं

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