NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
बांग्लादेशियों का कहना है कि अमित शाह जिन्ना जैसा खेल खेल रहे हैं
शाह द्वारा एनआरसी मुद्दे को शह देने का मतलब जमात-ए-इस्लामी और उसके प्रमुख इस्लामी राजनीति के बहुलतावादी ब्रांड को बढ़ावा देने जैसा है।
एजाज़ अशरफ़
09 Oct 2019
Translated by महेश कुमार
AMIT SHAH NRC

3 अक्टूबर की रात को जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना दिल्ली की आधिकारिक दौरे पर आईं तो उनके देश का एक लोकप्रिय टीवी टॉक शो डेमोक्रेसी नाउ नामक चैनल पर बांग्लादेश-भारत संबंधों पर चर्चा कर रहा था। इस शो में चार मेहमान शामिल थे। एक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर जनरल, सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक-एक नेता और एक शिक्षाविद थे। वे अपनी विदेश नीति पर चर्चा कर रहे थे लेकिन अचानक उनका ध्यान भारत के नागरिक रजिस्टर परियोजना के संबंध में हुए उल्लेख ने अपनी तरफ खींच लिया। उन्होंने एनआरसी पर गृह मंत्री अमित शाह के बयानों को बांग्लादेश के संबंध में होने वाले नतीजों की ओर आगाह किया।

"शाह ने 1947 के कुख्यात सांप्रदायिक विभाजन के मुद्दे को फिर से उछाल दिया है।" डेमोक्रेसी नाउ पर चर्चा करने वाले चार प्रतिभागियों में से एक मेस्बाह कमाल ने मुझे ढाका से फोन पर बताया। कमाल ढाका विश्वविद्यालय में इतिहास के एक प्रोफेसर हैं और वे खास तौर पर गृह मंत्री द्वारा 1 अक्टूबर को कोलकाता में दिए भाषण का उल्लेख कर रहे थे।

उस भाषण में, शाह ने घोषणा की कि एनआरसी को पश्चिम बंगाल में लागू किया जाएगा लेकिन जो लोग बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं उन्हें इससे डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उन्हें नागरिकता (संशोधन) विधेयक के तहत हिरासत में लेने से या निर्वासन से सुरक्षित रखा जाएगा। इस क़ानून को इस वर्ष के अंत में लागू किया जाएगा।

2015 से असम में एनआरसी के अद्यतन का काम शुरू होने के बाद से बांग्लादेशी लोग इस देश से बाहर होने को लेकर चिंतित हैं। उनकी चिंता असम और भारत की सामान्य चेतना से है जिसके मुताबिक जो भी एनआरसी से बाहर हुए हैं वे सभी लोग मुख्य रूप से बांग्लादेशी हैं। क्या भारत उन्हें बांग्लादेश वापस भेज देगा?

यह सवाल बांग्लादेश के लिए बड़ा चिंता का कारण बन गया है क्योंकि वह पहले से ही म्यांमार से निकाले गए लगभग 11 लाख रोहिंग्या शरणार्थियों के बोझ से दबा हुआ है। बांग्लादेश में प्रति वर्ग किमी में 1115.62 लोग रहते हैं इसलिए उसके पास इससे अधिक लोगों को समायोजित करने के लिए जगह नहीं है। (भारत का जनसंख्या घनत्व 416 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।)

हालांकि बांग्लादेशी सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया को बताया कि हसीना ने अपनी भारत यात्रा के दौरान एनआरसी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान को आश्वासत करने वाला पाया जिसमें भारत से निर्वासित लोगों को बांग्लादेश में खिलाने-पिलाने और बसाने की मुख्य चिंता थी।

कमाल ने कहा कि, "शाह के भारत में मुस्लिमों को बार-बार निशाना बनाने से बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के मामले में गंभीर परिणाम होंगे।" ऐसा इसलिए है क्योंकि ये उप-महाद्वीप जो 1947 में स्थापित हुआ था वह क्रिया-प्रतिक्रिया के दुखद ज़ाल में फंसा हुआ है। उदाहरण के लिए, जब 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था तब बांग्लादेश में सैंकड़ों मंदिरों को तोड़ दिया गया था।

इस बाबत पहले से ही चौंकाने वाले संकेत मिल रहे हैं कि शाह के बयान मुस्लिम मौलाना और कट्टरपंथी समूहों के काम आ रहे हैं। कमाल ने कहा कि कुछ मौलाना एनआरसी और कश्मीर का ज़िक्र करना शुरु कर चुके हैं। "उन्होंने खुले तौर पर कहा है कि अगर मुसलमानों को भारत में निशाना बनाया जाता है तो वे बांग्लादेश में हिंदुओं को नहीं छोड़ेंगे।"

शाह और भारत ने मौलवियों को हज़ारों वाज़़ (सभा) या धार्मिक सभा के आयोजन के दौरान बोलने के लिए मुद्दा दे दिया है जो देश भर में अक्टूबर और मार्च महीने के बीच आयोजित किया जाता है।

एनआरसी मुद्दे पर शाह की शह केवल जमात-ए-इस्लामी, दक्षिणपंथी इस्लामी पार्टी के एजेंडे को बढ़ावा देगी जो सत्ताधारी अवामी लीग सरकार द्वारा उस पर बनाए गए दबाव के कारण देश की राजनीति में काफी पिछड़ी हुई है। जमात न केवल वैचारिक रूप से भारत के विरोध में है बल्कि वह परंपरागत रूप से बांग्लादेश में हिंदू विरोधी भावनाओं को बढ़ाने में सबसे आगे भी रही है। एनआरसी का मुद्दा जमात की प्रमुख राजनीति के ब्रांड को अच्छी तरह से शह दे सकता है।

“आम बांग्लादेशी सांप्रदायिक विभाजन को पाटने की कोशिश कर रहे हैं ताकि सांप्रदायिक विभाजन को पीछे छोड़ा जा सके। उदास होते हुए कमाल ने यह भी कहा कि शाह के बयान हमारे प्रयासों को मिट्टी में मिला देंगे।

विडंबना यह है कि एनआरसी मुद्दे पर शाह की बयानबाजी के ख़िलाफ़ बांग्लादेशी हिंदू भी आवाज़़ उठा रहे हैं। बांग्लादेश बौद्ध हिंदू ईसाई एकता परिषद के महासचिव राणा दासगुप्ता को लगता है कि बांग्लादेशी हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को शाह की नागरिकता की पेशकश केवल "भारत में जाने का लालच" भर है।

भारत में बांग्लादेश से हिंदुओं को आमंत्रित करना कट्टरपंथियों को बांग्लादेश में रहने की इच्छा रखने वालों को हिंदुओं को भी बाहर निकालने के लिए प्रेरित करेगा। दासगुप्ता ने कहा कि यह भारत के लिए बुरी ख़बर होनी चाहिए। “अल्पसंख्यकों के बिना बांग्लादेश सीरिया या अफगानिस्तान बन जाएगा। धार्मिक अल्पसंख्यक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के गठन का आधार होता है जिसे तबाह कर दिया जाएगा।”

भारत और बांग्लादेश दोनों को ही उल्टी प्रक्रिया से जूझना होगा क्योंकि शाह की नागरिकता धार्मिक अल्पसंख्यकों को बाहर करने के मुद्दे को बढ़ावा देगा। दासगुप्ता कहते हैं कि, "भरत से मुस्लिमों को बांग्लादेश में वापस भेजने से वे भारत विरोधी बन जाएंगे और जमात इसका फायदा उठाना चाहेगी।" क्या शाह ऐसा पड़ोसी चाहते हैं जो धार्मिक रूप से कट्टरपंथी हो और भारत का विरोध करता हो?”

दासगुप्ता एक सभ्य नागरिक समाज के नेताओं में से हैं जो अपने देश से हिंदुओं के पलायन को रोकने के लिए बांग्लादेश के सामाजिक ढांचे को बेहतर करने का काम कर रहे हैं। उनके इस अभियान के केंद्र में उन हिंदुओं की संख्या का अनुमान लगाना है जो वर्षों से भारत का रुख करते रहे हैं ताकि उनके देश छोड़ने के कारणों का पता लगाया जा सके।

इस खास उद्देश्य के लिए नागरिक समाज के लगभग सभी नेता ढाका विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अबुल बरकत के शानदार काम पर भरोसा करते हैं। इनके कार्य में इनेमी प्रोपर्टी एक्ट (ईपीए) और इसके उत्तरवर्ती कानून वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट (वीपीए) के तहत हिंदुओं को उनकी संपत्ति से बेदखल करने की बात का पता चलता है। इसे 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अध्यादेश के रूप में पारित किया गया था, ईपीए ने भारत को एक दुश्मन घोषित कर दिया था और पाकिस्तानी सरकार को भारतीय नागरिक की संपत्ति जब्त करने का अधिकार दे दिया था। (ऐसा ही कानून भारत में लागू किया गया था जो अभी भी मौजूद है)।

लेकिन उस समय पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाला कोई भी हिंदू भारतीय नहीं था। "हालांकि," जैसा कि बरकत ने मुझसे कहा, "इस अधिनियम के तहत, हिंदुस्तान दुश्मनों का स्थान बन गया और अपने निवास स्थान के बावजूद हिंदू को दुश्मन समझा जाने लगा था।" इस अधिनियम में हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की संपत्तियों को ज़ब्त करने की बात कही गई थी।

1971 में बांग्लादेश की स्थापना के बाद नई गठित हुई आज़़ाद बांग्लादेश सरकार ने 23 मार्च, 1974 को ईपीए को निरस्त कर दिया। उसी समय, वीपीए को सरकार के पास मौजूद संपत्तियों के साथ-साथ प्रशासन को उन संपत्तियों को भी संभालने की ज़िम्मेदारी दी गई जो लोग बांग्लादेश की मुक्ति के लिए, पाकिस्तान, भारत या अन्य जगहों पर चले गए थे।

लेकिन अपनी संपत्ति की सुरक्षा का आनंद उठा रहे हिंदुओं की उम्मीदें तब धराशायी हो गईं जब बांग्लादेश के संस्थापक और प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान की 15 अगस्त, 1975 को हत्या कर दी गई थी। सफल सैन्य तानाशाही और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात गठबंधन से बनी सरकारों द्वारा हिंदुओं के स्वामित्व वाली संपत्तियों को ज़ब्त करना जारी रखा गया था।

2001 में अवामी लीग सरकार ने वीपीए को निरस्त कर दिया लेकिन 2002 में हसीना चुनाव हार गयी। एक बार फिर बांग्लादेश की सरकार ने हिंदुओं को उनकी संपत्तियों से वंचित करने की नीति को जारी रखना शुरु कर दिया। अंत में 2013 में, सरकार द्वारा निहित संपत्तियों को उनके मूल मालिकों को वापस करने के लिए एक ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था। यह प्रक्रिया निस्संदेह उबाऊ थी। दासगुप्ता के अनुसार, अब तक इन संपत्ति की बहाली के लिए 1.60 लाख आवेदनों में से केवल 8 या 10 प्रतिशत का ही निपटान किया गया है।

उठाए गए इन दो कदमों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए बरकत ने व्यापक सर्वेक्षण किए और सरकारी रिकॉर्ड का उपयोग किया। उनका निष्कर्ष या खोज़ के मुताबिक: लगभग 12 लाख हिंदू परिवार ईपीए और ईवीए से प्रभावित हुए थे। यह बांग्लादेश से हिंदुओं के पलायन का प्रमुख कारण बन गया था।

“1964 और 2013 के बीच कुल लापता हुई हिंदू आबादी लगभग 1 करोड़ 10 लाख थी। बरकत के अनुसार 2013 में हिंदुओं की आबादी 1 करोड़ 22 लाख के बजाय 2 करोड़ 80 लाख 70,000 होनी चाहिए थी। या इसे दूसरे तरीके से कहें तो हिंदुओं को बांग्लादेश की आबादी का 16-18 प्रतिशत होना चाहिए, न कि 9.7 प्रतिशत जो कि वे वर्तमान में हैं।

हालांकि, विडंबना यह है कि वे हिंदू नहीं हैं जिन्हें शाह बांग्लादेश भेजना चाहते हैं जो उनके लिए कम से कम हिंदुओं की संख्या के आधार पर नकारना कठिन हो सकता था। शाह तो केवल मुसलमानों को भेजना चाहते हैं। नागरिक समाज के नेताओं के बीच आम धारणा यह है कि भारत खुद के लिए बांग्लादेशी मुसलमान को भारत में "घुसपैठियों" के मुख्य हिस्से के तौर पर देखना चाहता है। ऐसा इसलिए है कि भारत में मुसलमानों के आने का अनुमान लगाने के लिए कोई व्यापक बांग्लादेशी अध्ययन नहीं है?

बरकत जवाब देते हैं कि, “बाहर करना सांख्यिकीय रूप से नगण्य होना चाहिए। पिछले तीन दशकों में मेरे द्वारा किए गए सभी अध्ययनों में, मुझे इस बात की कहीं भी पुष्टि नहीं होती है और न ही कोई सबूत मिलता है जिसमें इस बात की तसदीक़ होती हो कि मुस्लिम बड़ी संख्या में भारत के लिए रवाना हो रहे हैं।” इसी तरह, कमाल ने कहा,“ बांग्लादेश की अप्रवासी आबादी लगभग एक करोड़ है। उन्हें जाने के लिए भारत की तुलना में अधिक आर्थिक रूप से आकर्षक देश मौजूद हैं।”

निश्चित रूप से, जो भारतीय हर बंगाली मुस्लिम में एक बांग्लादेशी को देखते हैं, वे बरकत और कमाल के हिसाब से बांग्लादेशी राज्य के लिए जो एक लाभकारी बात है उसे ही बढ़ा रहे होंगे। लेकिन तब भी, बरकत और कमाल बीएनपी-जमात गठबंधन सरकारों के दौरान भी हिंदुओं के हक़ के लिए बोलने से नहीं कतराते थे। ये सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते थे। क्या बरकत और कमाल राज्य का खेल खेलेंगे? वे भारत से बांग्लादेश में मुस्लिमों को भगाने के विचार के खिलाफ हैं क्योंकि भारत में मुस्लिम की घुसपैठ नगण्य है।

हिंदू-मुस्लिम बहस को एक तरफ करते हैं। यहां तक कि शाह द्वारा ईसाइयों को नागरिकता देने की पेशकश भी बांग्लादेश क्रिश्चियन एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्मल रोज़ारियो को एक झांसा जैसा लगता है। रोज़ारियो ने मुझसे कहा, “बांग्लादेशी ईसाई अच्छी तरह से शिक्षित हैं क्योंकि वे मिशनरी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ते हैं। वे संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और पश्चिम यूरोप में प्रवास करना पसंद करते हैं। उदाहरण के लिए, मेरी बहन के परिवार के तीस सदस्य अमेरिका में बस गए हैं। वास्तव में, वे भारत क्यों जाएंगे? हालांकि कुछ लोगों ने 1947 में भारत में वापसी की थी।

रोज़ारियो को लगता है कि शाह की मुसलमानों के बदले ईसाइयों पर नेक नज़र न केवल अतार्किक है, बल्कि उनके समुदाय के लिए मुसीबत भी बन जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि "पश्चिम एशिया और भारत में उनके साथ जो हो रहा है उसकी मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में भी गूंज सुनाई देती है"। उदाहरण के लिए जब 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया तो ईसाई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए। बारिसल जिले के ईसाई बहुल गांवों में जहां रोजारियो का घर भी है वहां चर्च को जलाने की कोशिश की गई थी। रोज़ारियो ने कहा कि "जब लोग लंबे समय से किसी देश में रह रहे होते हैं तो उन्हें नागरिकता से वंचित करना या उन्हें निर्वासित करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।"

चटगांव विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. जिनबोधी भिक्खु ने कहा कि बांग्लादेश के बौद्ध जिनकी कुल आबादी लगभग 15 लाख है और जिन्हे शाह के सुरक्षात्मक घेरे के अधीन लाया जा रहा है उनके पास "एनआरसी मामले पर कहने या करने के लिए कुछ भी नहीं है।" उन्होंने कहा कि एनआरसी बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक संबंध का सवाल नही है। बल्कि इसका वैश्विक शांति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। निस्संदेह इससे अराजकता, तनाव, असहमति, असंतोष और हथियारों का दौर शुरू होगा।”

यह सही है कि बांग्लादेश के कट्टरपंथियों और राज्य ने वास्तव में बौद्ध चकमाओं को निशाना बनाया जिनमें से कई भारत भाग गए थे। एक ईमेल के जरिए सवालों के जवाब में कहा कि जिनबोधी ने एक श्रेष्ठ दार्शनिक दृष्टिकोण को अपनाया और अतीत के बारे में संयम बरतने की सलाह दी: "चकमाओं के खिलाफ उत्पीड़न और भेदभाव, लोगों की उचित धार्मिक, नैतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक समझ की कमी के कारण संभव हुआ था [या था]। जो अज्ञानता के अंधकार में डूबे हुए हैं। "उन्होंने बुद्ध का हवाला देते हुए कहा, "हमारे दुख अज्ञानता के कारण हैं।"

वास्तव में, किसी भी उद्देश्य और उसके प्रभाव की अज्ञानता के कारण प्रतिशोध का दुष्चक्र पैदा होता है। आज जो स्पष्ट राजनीति दिखाई देती है वह समाज को अस्थिर कर सकती है और सभ्यतामूलक मूल्यों को नष्ट कर सकती है। बरकत ने इस अतार्किकता की ओर इशारा किया: “अंग्रेजों के विरोध में हिंदू और मुस्लिम एकजुट हुए थें, जिन्होंने उन्हें विभाजित करने की कोशिश की थी। एक या दो साल के भीतर, [मुहम्मद अली] जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत ने इस एकता को बर्बाद कर दिया। पूर्वी पाकिस्तान में उर्दू को आधिकारिक भाषा बनाने की कोशिश के ख़िलाफ़ मुस्लिम-हिंदू एकता फिर से मज़़बूत हुई। लेकिन 1965 के युद्ध और बांग्लादेश के सैन्य तानाशाहों के कारण यह एकता टूट गई थी। यदि भारत ने शाह के एनआरसी के प्रस्ताव को लागू किया तो इस उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम एकता नाम की चीज़ नहीं बचेगी।

बरकत की टिप्पणी से ऐसा लगता है कि शाह जिन्ना की राजनीति का 21वीं शताब्दी वाला खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि "वे निश्चित रूप से ऐसा कर रहे है"। यही कारण है कि बांग्लादेशियों ने अपनी धार्मिक पहचान की परवाह किए बिना शाह के एनआरसी पर बयानों को आदिम युग का एक हिस्सा बताया है।

एजाज अशरफ दिल्ली से एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

 

 

 

 

Sheikh Hasina
Bangladesh Minorities
Refugees and infiltrators in South Asia
Communalism in India
Communalism in Bangladesh
Partition of India
NRC reaction in Bangladesh
NRC Assam
Amit Shah
1947 Partition

बाकी खबरें

  • Sitaram Yechury
    संदीप चक्रवर्ती
    स्वतंत्रता दिवस को कमज़ोर करने एवं हिंदू राष्ट्र को नए सिरे से आगे बढ़ाने की संघ परिवार की योजना को विफल करें: येचुरी 
    25 Feb 2022
    माकपा महासचिव ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का “फोकस 5 अगस्त को देश की वास्तविक स्वतंत्रता की तारीख के रूप में बढ़ावा देने पर है।"  
  • russia ukrain
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन पर रूस के हमले से जुड़ा अहम घटनाक्रम
    25 Feb 2022
    यूरोपीय संघ रूस पर और आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाने को सहमत। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र ने यूक्रेन में मानवीय सहायता के लिए दो करोड़ डॉलर देने की घोषणा की।
  • ASHA Workers
    अनिल अंशुमन
    बिहार : आशा वर्कर्स 11 मार्च को विधानसभा के बाहर करेंगी प्रदर्शन
    25 Feb 2022
    आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहार सरकार हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने में भी टाल मटोल कर रही है। कार्यकर्ताओं ने ‘भूखे रहकर अब और नहीं करेंगी बेगारी’ का ऐलान किया है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 13 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 302 मरीज़ों की मौत
    25 Feb 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 94 हज़ार 345 हो गयी है।
  • up elections
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : अयोध्या के प्रस्तावित  सौंदर्यीकरण में छोटे व्यापारियों की नहीं है कोई जगह
    25 Feb 2022
    अयोध्या के व्यापारियों ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित लेआउट के परिणामस्वरूप दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त या उन दुकानों का ज़्यादातर हिस्सा तोड़ दिया जाएगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License