NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भाजपा की विभाजनकारी पहचान वाले एजेंडा के कारण उत्तर बंगाल एक खतरनाक रास्ते पर बढ़ सकता है
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लेफ्ट-कांग्रेस जहाँ क्षेत्र में शांति के लिए अभियान चला रहे हैं, वहीँ संघ परिवार की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ वाली मुहिम शत्रुता को बढ़ावा देने वाली है। ऐसा अभी तक पहाड़ी क्षेत्रों में देखने को मिलता था, जो कि अब मैदानी क्षेत्रों में भी फैलती जा रही है। 
संदीप चक्रवर्ती
17 Apr 2021
भाजपा की विभाजनकारी पहचान वाले एजेंडा के कारण उत्तर बंगाल एक खतरनाक रास्ते पर बढ़ सकता है
प्रतिनिधि चित्र। चित्र साभार: द प्रिंट

सिलीगुड़ी/कोलकाता: उत्तरी बंगाल में न जाने कितने समय से बंगाली, मारवाड़ी, राजबोंगशी, नेपाली और बिहारी एक ही मोहल्ले  (अड़ोस-पड़ोस) में शांति से रहते चले आ रहे हैं। यहाँ तक कि इस क्षेत्र में राजनीतिक उथल-पुथल के अपना सर उठाने के बाद भी, इसने शायद ही कभी पहचान के स्वरुप को ग्रहण किया हो।

उत्तर बंगाल में पहचान की राजनीति वाली गलत दिशा की पहली खतरे की घंटी 2000 के आरंभ में तब बजनी शुरू हो गई थी, जब ग्रेटर कामतापुर पीपुल्स पार्टी नामक एक राजनीतिक दल का गठन किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि अतुल रॉय और टॉम अधिकारी के नेतृत्व में इसका सशस्त्र धड़ा विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दे रहा था। हालाँकि दिसंबर 2013 में जलपाईगुड़ी में एक बम धमाके के सिलसिले में उनकी गिरफ्तारी (2014 में) के बाद से ये दोनों अपनी हथियारबंद स्थिति में कमी ले आये थे। राज्य के मुख्य विपक्षी दल, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को इन्होनें अपना समर्थन देना शुरू कर दिया था, जिसने उस दौरान एक अलग राज्य की उनकी मांग का समर्थन किया था। 

नेपाली कारक 

इस बार के विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिमल गुरुंग के समर्थन के आधार पर उत्तरी बंगाल में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिख रही हैं। गुरुंग, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के संस्थापकों में से एक रहे हैं, जो कि अब एक अलग धड़े के प्रमुख हैं।

बनर्जी, जिन्होंने गुरुंग के खिलाफ लगे 79 मामलों को वापस ले लिया है, उसे इस बात का भरोसा है कि तराई और दूआर्स क्षेत्रों में 25% नेपाली वोट बैंक और दूआर्स क्षेत्र में कालचीचिनी जैसे इलाकों और यहाँ तक कि सिलीगुड़ी में भी उनकी पार्टी, टीएमसी को नेपाली समुदाय का समर्थन मिलने जा रहा है।

हालाँकि कुछ विश्लेषकों के आकलन के अनुसार गुरुंग, जो एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर की हत्या के बाद यहाँ से भागने के लिए मजबूर हुए थे, वे क्षेत्रीय राजनीति में लंबे अंतराल के बाद लौटे हैं। वे अब दार्जीलिंग, कलिम्पोंग और कुर्सियांग इलाकों में एक इतिहास बनकर रह गये हैं। लेकिन यह कितना सच है, इसे देखा जाना अभी शेष है।

नेपाली मतों में विभाजन पर्वतीय क्षेत्रों के साथ-साथ मैदानी इलाकों में भी होना करीब-करीब तय लग रहा है, जहाँ कुर्सियांग से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के उम्मीदवार, उत्तम ब्राह्मण पहले के दशकों की तरह ही पहाड़ी-मैदानी भाईचारा  वापस लाने के लिए अभियान चलाकर कुछ प्रभाव डाल रहे हैं। इसके विपरीत टीएमसी और भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) की ओर से विभाजनकारी अभियान जारी है।

न्यूज़क्लिक के साथ अपनी बातचीत में सिलीगुड़ी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे अशोक भट्टाचार्य का कहना था कि ग्रेटर कूच बिहार कामतापुरी की अलग राज्य की मांग रही है, जैसा कि जीजेएम की थी। ऐसे में भाजपा और टीएमसी द्वारा तैयार किया गया गठबंधन ऐसी ताकतों को सिर्फ मजबूत करने का ही काम कर रहा है।

इस सबके बीच में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, उत्तर बंगाल में अपने पदचाप को विस्तार देने और भाजपा के लिए मतों को लुभाने के लिए ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर काम कर रहा है। 2012 के बाद से ही संघ परिवार इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिशों में लगा हुआ है जो कभी वर्ग और शांति के तौर पर वामपंथी राजनीति का मजबूत गढ़ माना जाता था।

राजबोंगशी समुदाय की भाषा, जिसे टीएमसी और भाजपा दोनों द्वारा लुभाया जा रहा है, क्योंकि यह उत्तर बंगाल के 27 निर्वाचन क्षेत्रों में प्रभाव रखता है,

राजबोंगशी 

भाषाई लिहाज से राजबोंगशी समुदाय, जिसे टीएमसी और भाजपा दोनों के ही द्वारा अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिशें चल रही हैं, क्योंकि उत्तरी बंगाल की 27 विधानसभा सीटों पर इनका प्रभाव है, का बंगाली भाषा के साथ प्रगाढ़ रिश्ता रहा है। कूच बिहार के राजबोंगशी नेता और सुधारक, स्वर्गीय पंचानन बर्मा ने एक बार कहा था कि बंगाली भाषा के साथ उनकी बोली का गहरा नाता है।

वाम मोर्चे की सरकार के दौरान राजबोंगशी लोगों के भवैया लोक गीतों को प्रोत्साहन देने के लिए एक भवैया अकादमी का गठन किया गया था और पुरस्कारों को पंचानन बर्मा के नाम पर रखा गया था। ममता बनर्जी ने भी सत्ता में आने के बाद कूच बिहार में बर्मा के नाम पर एक विश्वविद्यालय बनवाया। हालांकि उनके शासनकाल में राजकीय भवैया अकादमी का अस्तित्व लगभग ना के बराबर रह गया है, और बेहद न्यूनतम पैमाने पर वहां पर कार्य-संचालन हो रहा है।

वहीं दूसरी तरफ संघ परिवार सत्ता विरोधी कारकों से राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश में है, और मुख्य रूप से कृषक राजबोंगशी समुदाय को अपनी विभाजनकारी राजनीति के प्रति आकर्षित कर रहा है। विशेष तौर पर सिलीगुड़ी के आस-पास के इलाकों में, खासकर उन इलाकों में जहाँ बंगालियों की आबादी तकरीबन 50% है और राजबोंगशी 35% की संख्या में विद्यमान हैं। हालाँकि बहुत से राजबोंगशी अभी भी खुद को बंगाली समुदाय का ही हिस्सा मानते हैं, और संघ परिवार के उन पर अलग पहचान बनाने की कोशिशों का विरोध कर रहे हैं, और इस प्रकार उत्तर बंगाल में और बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

मैदानी क्षेत्रों में 25% नेपाली समुदाय पिछले 75 वर्षों से तराई, दूआर्स और सिलीगुड़ी और इसके उपनगरीय इलाकों में बिहारी, मारवाड़ी और यहाँ तक कि पंजाबियों की तरह मैदानी क्षेत्रों में बसे हुए हैं। सिलीगुड़ी विधानसभा क्षेत्र में गैर-बंगाली भाषी मतों की संख्या (बिहारी, मारवाड़ी और नेपाली) करीब 38% है। 

कूच बिहार, अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी में भाजपा का अभियान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर चल रहा है, जिसे वामपंथियों के अभियान से चुनौती मिल रही है। इसमें काफी हद तक कांग्रेस द्वारा मदद पहुंचाई जा रही है, जिसके पास नक्सलबाड़ी की माटीगोरा और जलपाईगुड़ी शहर की सीटें थीं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस बार काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि उत्तर बंगाल की इस बेहद नाजुक जनसांख्यकीय बनावट में संघ के षड्यंत्र को हराने के लिए वामपंथी अभियान का कुल कितना प्रभाव पड़ता है। 

वहीं कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों को इस बात का डर है कि इस विधानसभा चुनाव में संघ परिवार के विभाजनकारी एजेंडे में उभार देखने को मिल सकता है। भले ही पर्वतीय क्षेत्रों के सिवाय, उत्तर बंगाल में मतदान कभी भी सामुदायिक आधार पर न हुआ हो। लेकिन इस बार यह कम से कम दूसरा स्थान हासिल कर सकता है। भाजपा अपने इसी विभाजनकारी एजेंडे को मैदानी इलाकों में भी अपना रही है और इसके साथ ही यह चुनाव शायद उत्तरी बंगाल की राजनीति को एक खतरनाक मोड़ पर पहुंचा देने में मददगार साबित हो।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

BJP’s Divisive Identity Agenda May Lead North Bengal to a Dangerous Bend

Bengal Elections
North Bengal
Rajbongshis
GJM
Separatist Politics
Sangh Parivar
mamata banerjee
CPI(M)

Related Stories

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

केरल उप-चुनाव: एलडीएफ़ की नज़र 100वीं सीट पर, यूडीएफ़ के लिए चुनौती 

पश्चिम बंगालः वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चाय बागान के कर्मचारी-श्रमिक तीन दिन करेंगे हड़ताल

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

सिवनी : 2 आदिवासियों के हत्या में 9 गिरफ़्तार, विपक्ष ने कहा—राजनीतिक दबाव में मुख्य आरोपी अभी तक हैं बाहर

जोधपुर की घटना पर माकपा ने जताई चिंता, गहलोत सरकार से सख़्त कार्रवाई की मांग

बढ़ती हिंसा और सीबीआई के हस्तक्षेप के चलते मुश्किल में ममता और तृणमूल कांग्रेस

बलात्कार को लेकर राजनेताओं में संवेदनशीलता कब नज़र आएगी?

हिंदुत्व एजेंडे से उत्पन्न चुनौती का मुकाबला करने को तैयार है वाम: येचुरी


बाकी खबरें

  • RELIGIOUS DEATH
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
    27 Jan 2022
    कथित रूप से 'जबरन धर्मांतरण' के बाद एक किशोरी की हालिया खुदकुशी और इसके ख़िलाफ़ दक्षिणपंथी संगठनों की प्रतिक्रिया ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून की मांग को फिर से केंद्र में ला दिया है।
  • cb
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बीजेपी-कांग्रेस दोनों को पता है कि विकल्प तो हम दो ही हैं’
    27 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में 2000, 2007 और 2017 में भाजपा सत्ता में आई। जबकि 2002 और 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनाई। भाजपा और कांग्रेस ही बारी-बारी से यहां शासन करते आ रहे…
  •  नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    27 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • सोनिया यादव
    यूपी: महिला वोटरों की ज़िंदगी कितनी बदली और इस बार उनके लिए नया क्या है?
    27 Jan 2022
    प्रदेश में महिलाओं का उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने का औसत भले ही कम रहा हो, लेकिन आधी आबादी चुनाव जिताने का पूरा मददा जरूर रखती है। और शायद यही वजह है कि चुनाव से पहले सभी पार्टियां उन्हें लुभाने…
  • यूपी चुनाव:  उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    27 Jan 2022
    यूपी में महिला उम्मीदवारों के लिए प्रियंका गांधी की तलाश लगातार जारी है, प्रियंका गांधी ने पहले उन्नाव रेप पीड़िता की मां पर दांव लगाया था, और अब वो सोनभद्र नरसंहार में अपने भाई को खो चुकी महिला को…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License