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बीएसएनएल- कपट में लिप्त पुनरुत्थान योजना
सबसे पहले तो मोदी सरकार ने कर्मचारियों के मन में भय पैदा करने की कार्यनीति अपनाई-कि आज नहीं तो कल बीएसएनएल को या तो बन्द होना है या उसका निजीकरण होगा और फिर...
कुमुदिनी पति, बी सिवरामन
28 Oct 2019
BSNL
फोटो साभार : livemint

यह अत्यन्त खेदजनक है कि जब एक मेगा-पीएसयू की डूबती नय्या के पुनरुत्थान की बारी आई, तो सरकार और बीएसएनएल जैसे प्रमुख पीएसयू का शीर्ष प्रबन्धन दोमुंहेपन का परिचय दे रहा है।

कितनी ईमानदारी और सत्यता है बीएसएनएल की पुनरुत्थान योजना में? सबसे पहले तो मोदी सरकार ने कर्मचारियों के मन में भय पैदा करने की कार्यनीति अपनाई-कि आज नहीं तो कल बीएसएनएल को या तो बन्द होना है या उसका निजीकरण होगा। 12 फरवरी 2019 को तत्कालीन बीएसएनएल चेयरमैन अनुपम श्रीवास्तव व शीर्षस्थ बीएसएनएल अधिकारियों की एक टीम टेलकाॅम सचिव अरुणा सुन्दराजन से भेंट करने गई, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि सभी विकल्पों पर विचार करना होगा-विनिवेश/निजीकरण, पुनरुत्थान और यहां तक की बन्दी भी। यह एक सुनियोजित संयोग ही है कि सरकार ने जानबूझकर कर्मचारियों के फरवरी का वेतन रोक लिया, जिससे भ्रम पैदा हुआ कि बीएसएनएल की बन्दी अवयम्भावी है।

अब उसने एक फूहड़ ‘‘रिवाइवल प्लान’’ घोषित किया है, जो मूल रूप से वीआरएस योजना ही है। दरअसल, बीएसएनएल के संकट में सबसे बड़ी भूमिका है रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफान जैसी बड़ी काॅरपोरेट टेलकाॅम कंपनियों की, जो उसे कड़ी टक्कर दे रही हैं। पर सरकार ऐसा प्रतीत कराती है कि संकट का कारण कर्मचारियों के वेतन भुगतान के बिल हैं। अब यह जानना जरूरी है कि रिलायंस जियो व अन्य टेलकाॅम कम्पनियों को बीएसएनएल से प्रतिस्पर्धा में जो अतिरिक्त लाभ मिल रहा है वह इसलिए नहीं कि उनमें कोई अंतरनिहित श्रेष्ठता है, बल्कि इसलिए कि सरकार ने जानबूझ कर बीएसएनएल को (मांगने पर भी) 4-जी स्पेकट्रम से वंचित किया और अन्य निजी टेलकाॅम कम्पनियों को बिन-मांगे भेंट किया।

मोदी का डिजिटल इण्डिया स्मार्टफोन्स के भरोसे नहीं चल सकता क्योंकि इंटरनेट का अधिकतर प्रयोग डेस्कटाॅप और लैपटाॅप कम्प्यूटरों के माध्यम से होता है, जो लैंडलाइन से काम करते हैं; यहां स्पीड और खर्च के लिहाज से बीएसएनएल की सेवा सबसे अव्वल है। बीएसएनएल की इस मूलभूत ताकत की वजह से ही वह टिक सका है। निजी कम्पनियों के डाॅंन्गल से डाटा डाउनलोड करना कई गुना महंगा पड़ता है।
एयरटेल ने अपनी 4-जी सीरीज़ भारत में सबसे पहले 2012 में ही शुरू की थी। उधर 2016 में, प्रतिस्पर्धा को मारने के लिए रिलायंस जियो ने व्यापक पैमाने पर उपभेक्ताओं को खासी बड़ी सब्सिडी वाले कृत्रिम परभक्षी कीमतों पर 4-जी सेवा उपलब्ध करा दी। फिर वोडाफोन की बारी आई। 

दरअसल, 4-जी के बगैर भी बीएसएनएल 2015, 2016 और यहां तक कि 2017 तक भी मुनाफा दर्शा रहा था। इतना ही नहीं, मोदी ने स्वयं 15 अगस्त 2016 को लाल किले पर अपने भाषण में दावा किया था कि जबसे बीएसएनएल उनके हाथों में है, परिचालन के लिहाज से मुनाफा कमाने लगा है। पर, रिलायंस जियो के परभक्षी कीमतों ने केवल बीएसएनएल ही नहीं, तमाम अन्य निजी टेलकाॅम कम्पनियों को पीछे धकेल दिया और उन्हें या तो घाटे लगने लगे या उनके मुनाफे में भारी गिरावट आई।

अब, जब तकनीकी विकास तेज़ी पकड़ रहा है, जब सभी अन्य निजी टेलकाॅम कम्पनियां 5-जी की ओर बढ़ रहे हैं, सरकार बीएसएनएल को 4-जी का ऑफर दे रही है, और इसे ‘रिवाइवल पैकेज’ कहा जा रहा है। यह भी तब किया गया जब 4-जी  की मांग करती बीएसएनएल एम्प्लाॅईज़ यूनियन ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल की। पर 4-जी तकनीक को अपनाने में बीएसएनएल को कम-से-कम तीन साल लग जाएंगे, और तबतक प्रमुख निजी टेलकाॅम कम्पनियां 5-जी सेवाओं में भलीभांति घुस चुकी होंगी। रिवाइवल पैकेज को देखें तो पता चलेगा कि 5-जी सेवाएं भी शुरू करने के लिए बीएसएनएल को जरूरी सरकारी फंड देने के मामले में पैकेज चुप है।

2017-18 के अंत तक बीएसएनएल का संचित घाटा 31,287 करोड़ रु हो चला था। पहले तो सरकार ने कोशिश की कि कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति की उम्र को 60 से घटाकर 58 कर दे ताकि उनके वेतन भुगतान बिल में (मात्र) 3000 करोड़ रु की बचत हो सके! कर्मचारियों के तगड़े विरोध के पश्चात इस योजना को रद्द कर दिया गया। 23 अक्टूबर 2019 को जो अन्तिम पुनरुत्थान पैकेज घोषित की गई, सरकार की मंशा है कि उससे 50 वर्ष पूरा कर चुके समस्त बीएसएनएल कर्मचारी वीआरएस लेकर बाहर हो जाएं। उन्होंने केवल यह कह दिया है कि वीआरएस का खर्च सरकार बजट सहायता के ज़रिये वहन कर लेगी, जिसमें 17,169 करोड़ की अनुग्रह राशि भी सम्मिलित होगी। इस स्कीम का संपूर्ण विवरण अभी सामने नहीं आया, और शायद बीएसएनएल-एम टी एनएल की नई संयुक्त संस्था द्वारा रेखांकित की जाएगी।

बीएसएनएल के नए एमडी, प्रवीन कुमार पुरवार कथित रूप से कर्मचारियों को धमका रहे हैं कि वीआरएस लेने में ही उनकी भलाई है, अन्यथा उन्हें रोज़ाना 12 घंटे काम करना पड़ेगा। दूसरी ओर, कुछ शीर्ष अधिकारी कर्मचारियों के बीच गुपचुप अभियान चला रहे हैं कि अभी वीआरएस पैकेज स्वीकार न किया तो भविष्य में इससे भी हाथ धोना पड़ेगा। वीआरएस ऑफर पर कर्मचारियों के बीच कोई उत्साह नहीं था, इसलिए सरकारी आतंक बनाए रखने के लिए सितम्बर का वेतन अब तक नहीं दिया गया। बीएसएनएल एम्प्लाॅईज़ यूनियन के चेन्नई सर्किल के सर्किल सचिव श्री एम कन्नीअपन ने न्यूज़क्लिक को बताया कि यह योजना वीआरएस (वाॅलेंटरी रिटायरमेंट स्कीम) न होकर सीआरएस, (कम्पलसरी रिटायरमेंट स्कीम) है! उन्होंने यह दावा किया कि यूनियन कर्मचारियों पर धमकी के सहारे जबरन वीआरएस थोपने के प्रबंधन के प्रयास का मुंहतोड़ जवाब देगी।

और, रिवाइवल पैकेज के बाकी वित्तीय अंश का क्या होगा? पैकेज के अनुसार, सरकार बीएसएनएल के लिए 4-जी स्पेक्ट्रम सेवा उपलब्ध कराने की कीमत-20,814 करोड़ रुपये स्वयं वहन करेगी। बाकी खर्च बीएसएनएल को ऐसे बाॅन्ड्स के माध्यम से अनुदान संचित करना होगा, जिनमें 15,000 करोड़ तक की साॅवरेन गारंटी सरकार की होगी; यह राशि वर्तमान कर्ज की पुनर्संरचना के साथ पूंजीगत व्यय और संचालन व्यय, सब का योग होगा।

बीएसएनएल एम्प्लाॅईज़ यूनियन, कर्नाटक के सूत्रों की मानें तो निजी कम्पनियों की प्रतिस्पर्धा का मुकाबला करने हेतु जिन अधिसंरचनात्मक ज़रूरतों को पूरा करना होगा, जैसे टावर लगाना और ट्रांसमिशन नेटवर्क स्थापित करना आदि, इसके मद्देनज़र तो यह राशि ऊंट के मुंह में जीरा होगा। सूत्रों ने कहा ‘‘यह सच्चा रिवाइवल पैकेज न होकर काम-चलाऊ ‘संकट टालो’ पैकेज है।’’

एक बार तो मुकेश अंबानी ने खुलेआम कहा था कि दीर्घावधि में उनके समक्ष प्रमुख चुनौती बीएसएनएल से होगी। आने वाले दिन ही बताएंगे कि मोदी का रिवाइवल पैकेज किस हद तक बीएसएनएल को रिलायंस जियो द्वारा दी जा रही कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करने में मददगार होगा। या हम मानें कि यह केवल दिखवटी पुनर्सज्जित पैकेज है, जो अनततः बीएसएनएल को बड़े पैमाने पर विनिवेश के लिए मजबूर करेगा, और भविष्य में उसे रणनीतिक तौर पर सरेआम उन्हीं अंबानी या टाटा के हाथों बिकने पर बाध्य करेगा!


(लेखक कुमुदिनी पति एक महिला एक्टिविस्ट और राजनीतिक विश्लेषक हैं, और बी सिवरामन लेबर-संबंधी मुद्दों के स्तम्भकार हैं।)

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