NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आत्मसमर्पण से पहले गौतम नवलखा ने लिखा, “यूएपीए के तहत चलने वाली प्रक्रिया ही अपने आप में एक सज़ा है”
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में अपनी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज होने के बाद, नवलखा ने आज, मंगलवार को दिल्ली में एनआईए के समक्ष समर्पण कर दिया।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
14 Apr 2020
 गौतम नवलखा

जहां एक तरफ़ डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती के अवसर पर आज पूरा देश उन्हें याद कर रहा है।  वहीं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बडे, जिन्हें 2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में ग़ैरक़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी बनाया गया था, पुलिस के सामने आज आत्मसमर्पण कर रहे हैं। देश की लोकतांत्रिक परंपराओं की सबसे मज़बूत विरासत में से एक रहे डॉ. अम्बेडकर की जयंती पर इस विडंबना को कई लोगों ने उजागर किया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इन नागरिक कार्यकर्ताओं की अग्रिम ज़मानत की याचिका 16 मार्च को ही खारिज कर दी थी और उन्हें 6 अप्रैल तक आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था, जिसे 8 अप्रैल को एक सप्ताह के लिए इसलिए बढ़ा दिया गया था, क्योंकि देश को COVID-19 महामारी के कारण एक अभूतपूर्व लॉकडाउन का सामना करना पड़ रहा है।

दिल्ली में एनआईए मुख्यालय के सामने आत्मसमर्पण करने जाने से पहले नवलखा लिखते हैं, '' इस दोहरे झटके (यूएपीए के तहत प्रावधानों) के तहत, जेल मानक बन जाती है, और ज़मानत अपवाद बन जाती है। काफ़्का की अवास्तविक दुनिया की तरह, इसकी प्रक्रिया ही सज़ा बन जाती है।”

गौतम नवलखा का पत्र इस प्रकार है :

जबकि मैं दिल्ली स्थित एनआईए मुख्यालय के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए चलने की तैयारी में हूं, मुझे इस बात की ख़ुशी है कि न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी ने मुझे 8 अप्रैल, 2020 को आदेश जारी करके एक और सप्ताह की आज़ादी दी थी। आज़ादी के उस एक हफ़्ते का मतलब इस लॉकडाउन के दौर में मेरे लिए बहुत कुछ है। उनके इस आदेश ने शीर्ष अदालत के 16 मार्च के आदेश के अनुपालन में पेश आयी विकट परिस्थितियों को हल कर दिया था, जिसके मुताबिक़ मुझे एनआईए, मुंबई के समक्ष 6 अप्रैल तक आत्मसमर्पण करना था। इसके बाद लागू हुए लॉकडाउन ने मुझे यात्रा करने से रोक दिया। इसके अलावा एनआईए (मुंबई) की ओर से कोई निर्देश नहीं था कि मुझे इन हालात में क्या करना चाहिए। मुझे पता है कि अब मुझे दिल्ली स्थित एनआईए हेड क्वार्टर में आत्मसमर्पण करना है।

भारत के प्रधानमंत्री ने Covid-19 महामारी से पैदा हुई इस चुनौती की तुलना "राष्ट्रीय आपातकाल" की स्थिति से की है। इसी बीच शीर्ष अदालत ने हाल ही में जेल की बदहाली के मामले में हस्तक्षेप किया है, और जेल के क़ैदियों की भीड़भाड़ और और नज़रबंद लोगों के ख़तरे को लेकर अधिकारियों को दिशानिर्देश जारी किये थे, जेल कर्मचारियों और अन्य कर्मियों को जेल की ड्यूटी पर तैनात किया गया था। हालांकि Covid-19 संक्रमण का कोई मामला अभी तक किसी भी जेल से नहीं आया है, ये हालात मेरे लिए कुछ हद तक आश्वस्त करने वाला है,लेकिन यह चिंता तब भी बनी हुई है। हालांकि, मेरे ऊपर इस डर का असर ज़रूर है कि Covid-19 के बीच मेरे निकट और प्रिय लोग मेरे क़ैद को लेकर परेशान हैं। मैं मदद करने की हालत में तो नहीं हूं, लेकिन इस बात से ज़रूर निराश हूं कि सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के आदेश में उस Covid-19 महामारी को लेकर किसी भी तरह का कोई संदर्भ नहीं था, जिसने भारत में हम सभी लोगों के साथ-साथ पूरी दुनिया को भी अपने आगोश में ले लिया है।

हालांकि, मैं अब उन वास्तविक क़ानूनी प्रक्रिया का सामना करना शुरू कर सकता हूं, जिन मामलों में ग़ैरक़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधान शामिल हैं। ऐसे अधिनियम सामान्य न्यायशास्त्र के मोड़ को उलट-पुलट कर रख देते हैं। अब यह स्वयंसिद्ध नहीं रह गया है कि “कोई व्यक्ति तबतक निर्दोष होता है,जबतक कि वह दोषी न साबित हो जाये”। सच्चाई तो यही है कि ऐसे अधिनियमों के तहत, “कोई आरोपी तबतक दोषी होता है, जब तक कि वह निर्दोष साबित न हो जाय”।

यूएपीए के कठोर प्रावधान अधिनियम के तहत दी जाने वाली कड़ी सज़ा को देखते हुए साक्ष्य, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को लेकर सख़्त प्रक्रियायें नहीं अपनाया जाती हैं: उन प्रक्रियाओं को, जो अन्यथा साक्ष्य के सिलसिले में सख़्त नियम प्रदान करती हैं, इसके बजाय इस मामले में लोचदार बनाया जाता है। इस दोहरे झटके के तहत, जेल आदर्श बन जाती है, और ज़मानत एक अपवाद बन जाती है। काफ़्का की अवास्तविक दुनिया की तरह इसकी प्रक्रिया ही सज़ा बन जाती है।

 इसे भी देखे : "हम लड़ेंगे साथी": गौतम नवलखा

मेरे अपने और मेरे सभी सह-आरोपियों को लेकर मेरी उम्मीद एक त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई पर टिकी हुई है। यही मुझे अपना नाम पाक-साफ़ करने और आज़ाद चलने में सक्षम बनायेगा, साथ ही साथ ख़ुद की अर्जित आदतों से छुटकारा पाने के लिए जेल में समय का सदुपयोग करवायेगा। तब तक, "क्या आप स्वतंत्रता के इन गीतों को गाने में मेरी मदद नहीं करेंगे I कॉज ऑल आई एवर हैव ए रिडेंप्शन सॉंग---स्वतंत्रता के ये गीत......”(बॉब मार्ले)

गौतम नवलखा, 14 अप्रैल, 2020, नई दिल्ली।

अंग्रेजी में लिखे गए मूल पत्र को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं -

Under UAPA, Process Itself Becomes Punishment, Writes Activist Gautam Navlakha Before Surrendering

गौतम नवलखा की तरह आनंद तेलतुम्बडे ने भी अपनी गिरफ़्तारी से पहले एक खुला पत्र लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं :

‘राष्ट्र’ के नाम पर क्रूर क़ानूनों को मान्यता हासिल है: गिरफ़्तारी से पहले आनंद तेलतुम्बडे का खुला पत्र

Draconian Legislations Are Validated in Name of ‘Nation’: Anand Teltumbde Writes Open Letter Before Arrest

Bhima Koregaon
BJP
Anand Teltumbde
gautam navlakha
UAPA
Supreme Court

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • Women Hold Up More Than Half the Sky
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    महिलाएँ आधे से ज़्यादा आसमान की मालिक हैं
    19 Oct 2021
    हाल ही में जारी हुए श्रम बल सर्वेक्षण पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 73.2% महिला श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करती हैं; वे किसान हैं, खेत मज़दूर हैं और कारीगर हैं।
  • Vinayak Damodar Savarkar
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बहस: क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?
    19 Oct 2021
    बार-बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफ़ीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।
  • Pulses
    शंभूनाथ शुक्ल
    ‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
    19 Oct 2021
    बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही…
  • migrant worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन
    19 Oct 2021
    "अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद घाटी की स्थिति और खराब हुई है। इससे अविश्वास का माहौल कायम हुआ है, इसलिए इन हत्याओं की जिम्मेवारी सीधे केंद्र सरकार की बनती है।”
  • Non local laborers waiting for train inside railwaysation Nowgam
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर में हुई हत्याओं की वजह से दहशत का माहौल, प्रवासी श्रमिक कर रहे हैं पलायन
    19 Oct 2021
    30 से अधिक हत्याओं की रिपोर्ट के चलते अक्टूबर का महीना सबसे ख़राब गुज़रा है, जिसमें 12 नागरिकों की हत्या शामिल हैं, जिनमें से कम से कम 11 को आतंकवादियों ने क़रीबी टारगेट के तौर पर मारा है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License