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भारत
राजनीति
बंगाल : जूट मिल बंद होने से क़रीब एक लाख मज़दूर होंगे प्रभावित
नौ प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री पीयूष गोयल और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हस्तक्षेप की मांग की है।
रबीन्द्र नाथ सिन्हा
21 Jan 2022
Translated by महेश कुमार
jute mill

कोलकाता: मोहम्मद नसीम अहमद, मोहम्मद मुस्तफा, सुमंगल सिंह, भोला करमाकर और पंचानन चौधरी - सभी श्रमिक, जुट मिल में यूनियन के सदस्य हैं, जो यूनिट-स्तरीय यूनियन के पदाधिकारी भी हैं – ये सब उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब कार्य नोटिसों को वापस लेने का लंबा इंतज़ार समाप्त होगा और जुट मिल अपना नियमित उत्पादन फिर से शुरू कर पाएगी।

मिल मालिकों ने काम के निलंबन और मिल को बंद करने के अपने फैसले के लिए वित्तीय संकट का हवाला दिया है, लेकिन अचानक से वे कम अवधि का उत्पादन फिर से शुरू कर देते हैं और वे इसे करीब साल में तीन-चार बार दोहराते हैं। अक्सर ऊपर दिए गए काम को समय-समय पर रखरखाव और असुविधाजनक स्थितियों से बचने के लिए मंत्रियों के अनुरोधों को मानने की "राजनीतिक मजबूरियां" बताते हैं।

लेकिन, फिलहाल, काम बंद करने का नोटिस और मिल को बंद करने से श्रमिकों पर आए संकट का तात्कालिक कारण कच्चे जूट का निर्धारित (कोलकाता का मूल्य) मूल्य बताया गया है, यानि 6,500 रुपये प्रति क्विंटल की सीमा जिसे "उचित" मूल्य बताया गया है और जिसे केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहे आयुक्त कार्यालय (जेसीओ) ने तय किया है।

30 सितंबर, 2021 को अधिसूचित किया गया यह मूल्य वर्तमान जूट के वर्ष के अंत तक, यानी 30 जून, 2022 या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, तक लागू रहेगा। हालांकि, कीमत भारतीय जूट मिल्स एसोसिएशन (आईजेएमए) और जेसीओ के बीच विवाद का विषय बन गई है। पश्चिम बंगाल सरकार की भूमिका एक मध्यस्थ और प्रवर्तक की है।

आईजेएमए ने केंद्र सरकार और नबन्ना (राज्य सरकार) दोनों के अधिकारियों के सामने दलील दी है कि जेसीओ द्वारा "उचित मूल्य" अधिसूचित किए जाने के बाद से मिलों को जूट एक दिन के लिए भी 6,500 रुपये पर उपलब्ध नहीं हुआ है। आईजेएमए ने इस बारे में जो बात कही है उसके मुताबिक कच्चे जूट को मिलों तक ले जाने में हैंडलिंग और परिवहन की लागत शामिल है, जो कि जेसीओ द्वारा 6,500 रुपये की तय कीमत में शामिल नहीं है।

कच्चे जूट की कीमतें 7,200 रुपये प्रति क्विंटल और इससे भी अधिक रही हैं, जिस दर पर जूट बैग का निर्माण करना अव्यावहारिक है क्योंकि जेसीओ कच्चे जूट की कीमत 6,500 रुपये प्रति  क्विंटल के संदर्भ में बैग की कीमत तय करता है। यही कारण है कि बेलर्स को लगता है कि हैंडलिंग और परिवहन लागत के संबंध में स्पष्टता की जरूरत हैं जिससे कुछ भ्रम पैदा हो गया है।

जिन मिलों ने और जेसीओ की 30 सितंबर की अधिसूचना और कीमतों में उछाल आने से पहले कच्चे जूट का स्टॉक किया था (और उसके बाद भी उच्च कीमतों पर कुछ मात्रा खरीदने में कामयाब रहे थे) वे बैग निर्माण जारी रखने में सक्षम रहे थे। हालांकि, कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने मिल बंद का सहारा लिया।

आईजेएमए के अनुसार, “पांच से अधिक मिलों ने शटर गिरा दिए हैं, जिससे लगभग 12,000 कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। जनवरी के अंत तक 15 से अधिक मिलें और बंद हो सकती हैं, जिससे 50,000 कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं। आईजेएमए ने 29 दिसंबर को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लिखे एक पत्र में इस ओर इशारा किया था।

इस प्रकार, पीड़ित श्रमिकों की दो श्रेणियां हैं; एक वे जिन्हे मिल बंद होने या काम के स्थगन के कारण आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा और दूसरे वे, जो कच्चे जूट का मुद्दा उभरने के बाद पीड़ित हुए हैं। 

इन परिस्थितियों में, सीटू के नेतृत्व में नौ प्रमुख ट्रेड यूनियनों, जिनमें अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस और इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस शामिल हैं, ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री पीयूष गोयल और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है।

यह बताते हुए कि किस तरह से श्रमिकों की परेशानी बढ़ती जा रही है, ट्रेड यूनियनों ने कारणों को सूचीबद्ध किया है, जैसे कि लॉकडाउन अवधि की मजदूरी न मिलना, बार-बार काम का बंद होना, काम की पारियों में कमी, कार्यबल के दैनिक काम को कम करना और ठेका श्रमिकों को शामिल करना – यह सब ऐसे समय में किया जा रहा है जब आवश्यक वस्तुएं महंगी होती जा रही हैं। नए सिरे से मिल बंद होने और काम न मिलने की आशंका वाले जुट मिल कामगारों की संख्या करीब एक लाख तक पहुंच सकती है।

यूनियनों की मुख्य मांगें हैं: ले-ऑफ लिए गए श्रमिकों का भुगतान, लॉकडाउन अवधि की मजदूरी का भुगतान, सेवानिवृत्त श्रमिकों के वैधानिक बकाए का भुगतान, मुनाफ़ाखोरी के लिए गुप्त रूप से स्टॉक किए गए कच्चे जूट की वसूली करना, भारतीय निगम (जेसीआई) या उसकी एजेंसियां द्वारा पारिश्रमिक कीमतों पर कच्चे जूट की एकाधिकार खरीद करना और मिलों को नकद भुगतान के आधार पर इसकी आपूर्ति करना है। उन्होंने उस आरोप को भी खारिज कर दिया जिसमें किसानों पर तोहमत लगाई गई है कि वे 7,200 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक कीमत वसूलने की उम्मीद में कच्चे जूट की जमाखोरी कर रहे हैं क्योंकि किसान स्टॉक नहीं रख सकते हैं; यह उनकी क्षमता से परे की बात है।

पिछले 13 दिसंबर को उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ बैठक में गोयल ने कच्चे जूट के लिए 6,500 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत का बचाव किया और कीमतों के ऊपर की ओर संशोधन से इनकार किया। उन्होंने मिलों से यहां तक कह दिया कि अगर उन्हें जेसीओ द्वारा निर्धारित कीमतों पर खाद्यान्न की पैकेजिंग के लिए बैग (बी ट्विल) की आपूर्ति करना अव्यावहारिक लगता है, तो वे आपूर्ति कम कर सकते हैं।

केंद्रीय मंत्री की इस 'भारी' टिप्पणी की व्याख्या कई लोगों ने 'दबाव की रणनीति' और मौजूदा परिस्थितियों में श्रमिकों की पीड़ा के प्रति उदासीनता के रूप में की है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ बैठकें कीं जिनमें कानून मंत्री मोलोय घटक, श्रम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बेचाराम मन्ना, मुख्य सचिव हरि कृष्ण द्विवेदी और अन्य संबंधित अधिकारी मौजूद थे। नबन्ना किसी भी कृषि उत्पाद की बिक्री मूल्य सीमा तय करने के खिलाफ था।  उन्होने कहा कि जब जरूरत हो तब जेसीआई को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से आगे जाना चाहिए, और उसे बाजार को स्थिर करने के लिए वाणिज्यिक खरीदारी करनी चाहिए। जेसीआई ने तर्क दिया कि अगर उसने वाणिज्यिक खरीद का सहारा लिया, तो कीमतें नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं। जेसीआई ने जमा की गई मात्रा को एमएसपी पर खरीदने की पेशकश की है। हालाँकि, व्यावसायिक खरीद के खिलाफ उसका तर्क नबन्ना के उच्च अधिकारियों/मंत्रियों को पसंद नहीं आया है। 

आगामी 2022-23 जूट वर्ष के लिए, पश्चिम बंगाल सरकार चाहती है कि जेसीओ को जूट मिलों को खेती से लेकर जूट मिलों को आपूर्ति तक की पूरी जूट आपूर्ति श्रृंखला को ट्रैक करने के लिए एक गतिशील पोर्टल विकसित करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि खाद्यान्न पैकेजिंग के लिए बी ट्विल बैग का उत्पादन न रुके और कच्चे जूट जमाकर्ताओं और अनधिकृत खिलाड़ियों पर रोक लगाई जा सके। 

राज्य के महानिदेशक, प्रवर्तन शाखा ने भी जेसीओ से पंजीकृत कच्चे जूट स्टॉकिस्टों और व्यापारियों की अंतिम सूची प्रदान करने का आग्रह किया है ताकि जमाखोरी विरोधी कदमों को सुविधाजनक बनाया जा सके। गड़बड़ी करने वाले व्यापारियों के खिलाफ अब तक 13 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

जो भी हो, तथ्य यह है कि नसीम अहमद, मुस्तफा, सुमंगल (जोकि हुगली जिले के सेरामपुर क्षेत्र में नगर निकाय चुनाव के लिए सीपीएम के उम्मीदवार हैं), भोला और पंचानन जैसे श्रमिकों की परेशानी बन गई है और काम न मिलने से वे लाचार हो गए हैं। हजारों अन्य लोग उनके रैंक में शामिल हो गए हैं। फिलहाल, जो स्पष्ट है, वह यह है कि जूट मिल के कर्मचारी के सामने उनका भविष्य अनिश्चित है। 

लेखक कोलकाता के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।

अंग्रेजी में इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Close to Lakh Workers Bear Brunt of ‘Reasonable’ Raw Jute Price Leading to Mill Closures in Bengal

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