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भारत
राजनीति
बंगाल: केंद्र की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ वाम-कांग्रेस ने दिखाया दम, ममता अब भी अतीत की कैदी
बंगाल में इधर जब से भाजपा का कद बढ़ा है, ममता खुद को भाजपा विरोधी राजनीति का चैंपियन साबित करने में जुटी रहती हैं। लेकिन भाजपा के खिलाफ किसी भी राष्ट्रीय मोर्चाबंदी से दूर रहती हैं।
सरोजिनी बिष्ट
28 Nov 2020
वाम-कांग्रेस
Image courtesy: Facebook/CPIM West Bengal

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ को छोड़कर, सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 26 नवंबर को देशभर में बंद बुलाया था। बंद यूं तो केंद्र सरकार द्वारा श्रम व कृषि कानूनों में किये गये जनविरोधी बदलावों के खिलाफ था, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक पश्चिम बंगाल में वाम और कांग्रेस की ताकत के आकलन के लिए भी इस पर नजर बनाये हुए थे।

इस बात पर भी नजर थी कि क्या ममता बनर्जी राज्य में बदले राजनीतिक हालात में, भाजपा की ओर से दरपेश चुनौती के मद्देनजर, केंद्र सरकार के खिलाफ इस आंदोलन के साथ नरमी बरतेंगी? लेकिन 26 को जो हुआ, उससे लगता है कि ममता अब भी अतीत में ही जी रही हैं और सामने जो संकट सभी को दिख रहा है, उसे शुतुरमुर्ग की तरह आंखें मूंदकर टालना चाह रही हैं।

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के पास भी मजदूरों और किसानों के संगठन हैं। एक ऐसे समय में, जब भाजपा को छोड़ सभी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े मजूदर व किसान संगठन 26 नवंबर के आंदोलन के जरिये केंद्र सरकार के खिलाफ एकजुट होते दिखे, तृणमूल के संगठनों का इससे अगल-थलग रहना सवाल खड़े करता है। ममता के वाम और कांग्रेस के साथ मतभेद हैं, लेकिन उस दिन उनके किसान व मजदूर संगठन अलग से धरना-प्रदर्शन तो कर ही सकते थे!

बंगाल में इधर जब से भाजपा का कद बढ़ा है, ममता खुद को भाजपा विरोधी राजनीति का चैंपियन साबित करने में जुटी रहती हैं। लेकिन भाजपा के खिलाफ किसी भी राष्ट्रीय मोर्चाबंदी से दूर रहती हैं। वजह है सीपीएम से उनकी एलर्जी। ममता चाहें तो हाल के बिहार चुनाव से सीख सकती हैं, जहां कभी एक-दूसरे की धुर विरोधी रह चुकी पार्टियों राजद और माले ने गठबंधन करके भाजपा को कड़ी टक्कर दी। भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने इस संबंध में सही ही सीख दी है कि मौजूदा और भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए हम अतीत के कैदी बने नहीं रह सकते।

खैर, ममता सरकार बंद को लेकर अपने पुराने रुख पर ही कायम रही। आम हड़ताल को विफल बनाने के लिए उसने पूरी ताकत झोंक दी। सड़कों को पुलिस से पाट दिया गया था। कोलकाता के पास बारासात समेत कुछ जगहों पर जुलूसों को रोकने के लिए पुलिस ने लाठी भी चलायी। कहीं-कहीं तृणमूल कार्यकर्ता ही सरकार की भूमिका मे आ गये और बंद समर्थकों को हटाने की कोशिश करते दिखे। सरकार ने इस दिन अपने कर्मचारियों के छुट्टी लेने पर सख्त रोक लगायी हुई थी।

मगर, जनता को यह एहसास था कि ममता सरकार चाहे जितना जोर लगा ले, इस बार बंद असरदार रहने वाला है। इसे देखते हुए सुबह से ही काफी कम लोग सड़कों पर थे। बस, टैक्सी संचालकों ने भी कम गाड़ियां सड़कों पर उतारी थीं। कोलकाता व हावड़ा में महानगरीय और उपनगरीय रेल सेवा को कई जगह रोका गया। जूट कारखानों में हड़ताल जोरदार रही। कारखाने खुले, लेकिन इतने कम मजदूर आये कि काम बंद रखना पड़ा।

कूचबिहार में टकराव बढ़ने पर बंद समर्थकों ने दोसरकारी बसों में तोड़फोड़ की, जिसके बाद कुछ की गिरफ्तारी भी हुई। सिलीगुड़ी में वाम मोर्चा का विशाल जुलूस देखने को मिला। जलपाईगुड़ी में जिला अदालत के सामने किये गये सड़क जाम में जज भी फंसे रहे। हुगली के पांडुआ में बैंक हड़ताल का उल्लंघन करनेवाले एक प्राइवेट बैंक में तोड़फोड़ की गयी। दुर्गापुर में वाम-कांग्रेस द्वारा किये गये नेशनल हाइवे जाम को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। हावड़ा-खड़गपुर और हावड़ा-मेदिनीपुर रूट पर लोकल ट्रेनें चलायी गयीं, लेकिन यात्री नदारद थे। औद्योगिक अंचल होने के नाते पूरे बर्दमान जिले में बंद का जबरदस्त असर रहा। बर्दमान शहर में तृणमूल के लोगों ने बाद में जुलूस निकाल कर जबरन कुछ दुकानें खुलवायीं।

ममता बनर्जी ने बंद को लेकर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा, ‘जिन कारणों से बंद बुलाया गया, हम उसका नीतिगत समर्थन करते हैं। लेकिन बंद को हम समर्थन नहीं करते।’ बंद पर जनता की ओर से मिली प्रतिक्रिया से सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम संतुष्ट दिखे। उन्होंने कहा, ‘पूरे देश के साथ ही इस राज्य की जनता ने बंद को स्वत:स्फूर्त समर्थन दिखाया। तृणमल और भाजपा ने कुछ ड्रामेबाजी जरूर की, लेकिन देश और राज्य के लोगों के मिजाज को सहज ही समझा जा सकता है। जनता केंद्र की मोदी सरकार की किसान और मजदूर विरोधी नीतियों से क्षुब्ध है।’

पश्चिम बंगाल में ध्रुवीकरण की हिंदुत्ववादी राजनीति राज्य को बड़ी तबाही की ओर ले जा सकती है। ऐसे में ममता बनर्जी की प्राथमिकता भाजपा को रोकना होना चाहिए, न कि वाम और कांग्रेस के हर आंदोलन को कुचलना। भाजपा राज्य की जनता को हिंदू-मुसलमान में बांटने के लिए दिन-रात एक किये हुए है। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के बाद अब राम मंदिर का इस्तेमाल इसके लिए किया जाना है। हिंदुत्ववादी हवा तैयार करने के लिए संघ परिवार के संगठन विश्व हिंदू परिषद को उतार दिया गया है। राम मंदिर निर्माण के चंदा इकट्ठा करने के बहाने राज्य का राजनीतिक पारा बढ़ाने की तैयारी है। आगामी जनवरी-फरवरी में यह अभियान चलाया जायेगा। हर हिंदू घर तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है, चाहे उसका जुड़ाव भाजपा विरोधी पार्टी से ही क्यों न हो।

जानकारी के मुताबिक, विहिप मंदिर के लिए अर्थ संग्रह अभियान देशभर में मकर संक्रांति के दिन 15 जनवरी से 27 फरवरी को माघ पूर्णिमा तक चलायेगा। लेकिन बंगाल में इसे और पहले ही 16 फरवरी को सरस्वती पूजा तक खत्म कर लिया जायेगा। इस अभियान को बंगाल में कैसे चलाना है, कैसे ज्यादा से ज्यादा वोटों को धर्म के नाम पर ध्रुवीकृत करना है, इस पर विचार-विमर्श के लिए विहिप के राष्ट्रीय सचिव विनायक राव देशपांडे 28 नवंबर को कोलकाता पहुंच रहे हैं।

खैर जो भी हो, 26 नवंबर को पश्चिम बंगाल में बड़ी तादाद में सीपीएम और कांग्रेस के कार्यकर्ता सड़क पर उतर कर यह एहसास कराने में सफल रहे कि आगामी विधानसभा चुनाव में वे एक मजबूत कोण होंगे। मुख्यधारा का मीडिया लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश में जुटा है कि बंगाल में असल मुकाबला तृणमूल और भाजपा के बीच है और वाम-कांग्रेस ‘वोटकटवा’ भर हैं। ऐसे नैरेटिव को ध्वस्त करने के लिए वाम मोर्चा को अपनी पहलकदमियां अभी और बढ़ानी होंगी। जहां तक बात है ममता बनर्जी की, तो वह भाजपा विरोधी राष्ट्रीय मोर्चे में शामिल न होकर अंतत: अपने लिए ही कुआं तैयार कर रही हैं।

सरोजिनी बिष्ट स्वतंत्र पत्रकार हैं।) 

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