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भारत
राजनीति
तय जानिए, बंगाल चुनाव की घोषणा के साथ ही घटने लगेंगे पेट्रोल-डीज़ल के दाम!
देश में पेट्रोल-डीज़ल के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इसके पीछे सरकार जो तर्क दे रही है आइए ज़रा उनकी पड़ताल करते हैं कि उनमें कितना दम है।
मुकुल सरल
22 Feb 2021
बंगाल चुनाव की घोषणा के साथ ही घटने लगेंगे पेट्रोल-डीज़ल के दाम!

पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ने को लेकर सरकार चार तरह के तर्क दे रही है।

1. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ना

2. पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण न होना

3. पिछली सरकारों द्वारा देश में कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान न देना, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सकी

4. और टैक्स के माध्यम से कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद ग़रीबों के मुफ़्त भोजन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं में हुए ख़र्च की भरपाई

इन चारों तर्कों की पड़ताल करने से पहले कुछ ख़बरें मैं आपके सामने रखना चाहता हूं-

कर्नाटक चुनाव से पहले नहीं बढ़ रहे पेट्रोल-डीज़ल के दाम

1 मई, 2018, दैनिक जागरण

नई दिल्ली, प्रेट्र। कर्नाटक विधानसभा चुनाव से एक पखवाड़ा पहले से इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी सार्वजनिक ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल-डीज़ल के दाम में दैनिक संशोधन की प्रक्रिया बंद की हुई है। पिछले 24 अप्रैल से पेट्रोल-डीज़ल के दाम में कोई बदलाव नहीं किया गया है।पेट्रोल के दाम 55-महीनों के ऊंचे स्तर और डीज़ल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद वित्त मंत्रालय ने उत्पाद शुल्क घटाने से इन्कार कर दिया था। इसे देखते हुए सार्वजनिक तेल कंपनियों ने 24 अप्रैल से ईधन के दामों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है, जबकि उसके बाद से पेट्रोल की अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क दर दो डॉलर से ज्यादा बढ़कर 80.56 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है। वहीं, डीज़ल की अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क दर इस वक्त 86.35 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 12 मई को होना है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष गुजरात चुनाव से ठीक पहले दिसंबर के पहले पखवाड़े में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने तेल के दाम में तीन पैसा प्रतिदिन तक कटौती की थी। लेकिन 14 दिसंबर को चुनाव हो जाने के बाद कंपनियों ने दाम बढ़ाने शुरू कर दिए। इसी से इन संभावनाओं को बल मिला कि सरकार ने कर्नाटक चुनाव से पहले तेल कंपनियों को दाम नहीं बढ़ाने को कहा हो। वहीं, पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने इस मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि दाम बढ़ाने या नहीं बढ़ाने का फैसला ऑयल मार्केटिंग कंपनियां करती हैं, सरकार नहीं।

कर्नाटक चुनाव के बाद फिर बढ़े पेट्रोल-डीज़ल के दाम

नवभारतटाइम्स.कॉम

14 मई, 2018

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल की स्थिर कीमतों में फिर से इजाफा हो गया। ...पेट्रोल-डीज़ल में ताजा वृद्धि को कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो जाने से जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, कर्नाटक में जारी चुनाव प्रचार के दौरान ही खबर आई थी कि सरकार के इशारे पर पेट्रोलियम कंपनियों ने पेट्रोल-डीज़ल के दाम में मार्केट के मुताबिक बदलाव करने से कदम पीछे खींच लिया था। लेकिन, अब चुनाव संपन्न होने के बाद फिर से इसे मार्केट के हवाले कर दिया गया।

उसी समय के दैनिक भास्कर की सुर्खियां देख लीजिए

- कर्नाटक चुनाव के बाद लगातार 7वें दिन बढ़ी क़ीमत

- 7 दिन में 1.62 रुपए महंगा हो चुका है पेट्रोल

- कर्नाटक चुनाव से पहले लगातार 19 दिन भाव स्थिर रहे थे

अब ज़ी न्यूज़ की ख़बर भी पढ़ लीजिए। यह 16 अक्टूबर, 2017 की ख़बर है। ध्यान रहे कि दिसंबर 2017 में गुजरात विधानसभा के लिए चुनाव होने वाले थे।

गुजरात में पेट्रोल-डीज़ल के रेट हुए कम, सरकार ने घटाया VAT

“गुजरात में राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर लगने वाली वैट की दरों में कमी की है। जिसके चलते राज्य में अब पेट्रोल की कीमतें अन्य राज्यों की तुलना में कम हो गई है।”

उस समय केंद्र ने राज्यों से वैट घटाने का आग्रह किया था लेकिन 17 भाजपा शासित राज्यों में से सिर्फ़ गुजरात और महाराष्ट्र ने ही अपना टैक्स घटाया था।

Oneindia hindi की 14 दिसंबर 2017 की ख़बर देख लीजिए-

रहिए तैयार, गुजरात चुनाव के बाद पेट्रोल-डीज़ल के कीमतों में होगी बढ़ोतरी

और यही हुआ।

आजतक की भी ख़बर देख लीजिए

गुजरात चुनाव के ठीक पहले जो खेल हुआ वही हुआ कर्नाटक चुनाव में भी?

अब 2019 में आम चुनाव का भी दौर याद कर लीजिए।

अमर उजाला की ख़बर देखिए-

चुनाव ने नहीं बढ़ने दिया पेट्रोल-डीज़ल का दाम, चार माह में इतनी हुई बढ़ोतरी

यह 16 अप्रैल 2019 की ख़बर है और आपको पता ही है कि 2019 में देशभर में 11 अप्रैल से लेकर 19 मई तक सात चरण में लोकसभा के चुनाव हुए थे।

इन ख़बरों को पढ़ने देखने के बाद शायद आपको अब कुछ और बताने की ज़रूरत है। यह ख़बरें यानी उदाहरण भी मैंने काफ़ी “राष्ट्रवादी” कहे जाने वाले अख़बार और चैनलों से लिए हैं। ताकि आप यह न कहें कि यह तो सरकार विरोधी प्रोपेगैंडा है। आप इन लिंक पर क्लिक कर इन ख़बरों को विस्तार से पढ़ सकते हैं। और आपमें से बहुत लोग तो खुद इस सबके प्रत्यक्ष गवाह या भुक्तभोगी होंगे।

सरकार और सरकार समर्थकों को बताने के लिए यह सब याद दिलाना ज़रूरी था। इन ख़बरों को देखकर सरकार के उन तर्कों की हवा निकल जाती है जिसमें वह तेल के दाम बढ़ने के लिए रोज़ नए तर्क गढ़ रही है। इससे साफ़ है कि तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय कीमतों या मुक्त बाज़ार के अनुसार नहीं घटते-बढ़ते बल्कि चुनाव के अनुसार घटते-बढ़ते हैं।

जैसा मैंने सबसे पहले कहा कि सरकार कहती है कि पेट्रोलियम पदार्थों यानी पेट्रोल, डीज़ल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमतों से तय होते हैं तो उसे बताना चाहिए कि ये बात क्या उसे 2014 से पहले नहीं पता थी। और यही नहीं जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम नेगेटिव में पहुंच गए तब भी भारतीय उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं दी गई। और आज भी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों के अनुपात से बहुत ज़्यादा भारत में तेल के दाम हैं।

और अगर मसला अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का ही है तो फिर भारत के पड़ोसी देश नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश यहां तक की पाकिस्तान में भी तेल के दाम भारत से कम क्यों और कैसे हैं।

दूसरी बात :  सरकार की तरफ़ से तर्क दिया जा रहा है कि दाम बढ़ाने या नहीं बढ़ाने का फैसला ऑयल मार्केटिंग कंपनियां करती हैं, सरकार नहीं।

लेकिन इसमें भी यही पूछा जाना चाहिए कि फिर चुनाव के वक़्त दाम कैसे स्थिर या कम हो जाते हैं। और यह भी पूछा जाना चाहिए कि फिर 2014 से पहले भारतीय जनता पार्टी और उसके सब नेता जिसमें आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तमाम मंत्री शामिल हैं, कैसे तेल की क़ीमत बढ़ने पर हंगामा करते थे, सड़क रोकते थे, संसद रोकते थे। प्रधानमंत्री को दोषी ठहराते थे, इस्तीफ़ा मांगते थे। क्योंकि दाम तय करने अधिकार तो 2010 के बाद से तेल कंपनियों के पास चला गया था।

ध्यान रहे कि साल 2010 तक सरकार देश में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें तय करती थी। उसके बाद यह काम तेल कंपनियों पर छोड़ दिया गया और तेल कंपनियां हर पखवाड़े यानी हर 15 दिन में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बाज़ार क़ीमत के आधार पर तय करने लगीं। उसके बाद मोदी सरकार के दौरान 2017 से तेल कंपनियां पखवाड़े की जगह प्रति दिन तेल की कीमतों में बाजार आधारित बदलाव करने लगीं।

और क्या यह याद दिलाने की क्या ज़रूरत है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी ने 2014 का पूरा चुनाव ही महंगाई-भ्रष्टाचार दूर करने और ‘अच्छे दिन’ लाने के वादे के साथ लड़ा था। मोदी जी का एक प्रमुख नारा था- बहुत हुई पेट्रोल-डीज़ल की मार...अबकी बार...

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का एक विज्ञापन

तीसरा तर्क मोदी सरकार द्वारा यह दिया जा रहा है कि पिछली सरकारों ख़ासकर मनमोहन सरकार ने देश में कच्चे तेल का उत्पाद बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का भारत पर कम से कम असर हो सके। लेकिन इसकी पड़ताल करने पर भी पता चलता है कि मोदी सरकार में कच्चे तेल का उत्पादन तो मनमोहन सरकार के समय से भी कम हो गया है। यानी बढ़ने की बजाय और घट गया है।

इसे विस्तार से समझना हो तो अनिन्द्यो चक्रवर्ती के इस वीडियो को देखिए- पेट्रोल के दाम के लिए क्या पुरानी सरकारें ज़िम्मेदार?

चौथा तर्क जो दिया जा रहा है वो यह कि सरकार अपना टैक्स इसलिए नहीं घटा रही क्योंकि उसने कोरोना काल में ग़रीबों के कल्याण या भोजन पर बहुत अधिक खर्च किया, जिसकी भरपाई वह इन टैक्स से कर रही है। आपको मालूम है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर दो तरह के टैक्स लगते हैं एक केंद्र की और से एक्साइज़ ड्यूटी (Excise Duty) यानी उत्पादन शुल्क और दूसरा राज्यों की और से मूल्य वर्धित कर यानी वैट (VAT)। यह करीब 65 फीसदी तक है। यह हटा दें तो पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत, डीलर का कमीशन मिलाकर आज की डेट में भी 35 रुपये से ज़्यादा नहीं है। लेकिन कोई सरकार इसे नहीं हटाती, और हटाना भी नहीं चाहिए, क्योंकि ये किसी भी सरकार की आमदनी का प्रमुख स्रोत है। इस आमदनी से वह दूसरे ज़रूरी काम करती है, यही वजह है कि इसे हटाने को कोई कह भी नहीं रहा, घटाने को कह रहे हैं और वास्तव में घटाने को भी नहीं कह रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि इस क़दर बढ़ाया न जाए। इसमें केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका है। आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि इस समय काफ़ी राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। और ग़ैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें पहले ही जीएसटी में अपना पूरा हिस्सा न मिलने का आरोप लगाती हैं, ऐसे में केंद्र की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी थी कि वह अपना उत्पाद शुल्क कम करे और अपनी राज्य सरकारों को भी वैट कम करने की सलाह दे।

राजस्थान में भी पेट्रोल काफ़ी महंगा है। वहां कांग्रेस की सरकार है। इसलिए उसके वैट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी सफाई में कहते हैं कि मोदी सरकार पेट्रोल पर 32.90 रुपये व डीज़ल पर 31.80 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क लगाती है। जबकि 2014 में यूपीए सरकार के समय पेट्रोल पर सिर्फ 9.20 रुपये व डीज़ल पर महज 3.46 रुपये उत्पाद शुल्क था। मोदी सरकार को आमजन के हित में अविलंब उत्पाद शुल्क घटाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने लिखा है कि मोदी सरकार ने राज्यों के हिस्से वाले मूल उत्पाद शुल्क को लगातार घटाया है और अपना ख़जाना भरने के लिए केवल केन्द्र के हिस्से वाली अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी व विशेष एक्साइज ड्यूटी को लगातार बढ़ाया है। इससे अपने आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए राज्य सरकारों को वैट बढ़ाना पड़ रहा है।

मोदी सरकार पेट्रोल पर 32.90 रुपये एवं डीज़ल पर 31.80 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी लगाती है। जबकि 2014 में यूपीए सरकार के समय पेट्रोल पर सिर्फ 9.20 रुपये एवं डीज़ल पर महज 3.46 रुपये एक्साइज ड्यूटी थी। मोदी सरकार को आमजन के हित में अविलंब एक्साइज ड्यूटी घटानी चाहिए।
2/5

— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) February 20, 2021

इसके अलावा कोरोना के नाम पर जो राहत या आर्थिक पैकेज दिया गया है, तमाम विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री उसकी हक़ीक़त आपको पहले ही बता चुके हैं। इस आर्थिक पैकेज में हक़ीक़त से ज़्यादा फ़साना ही है। आपने देखा ही कैसे ग़रीबों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई, कैसे मज़दूर-कामगार पैदल सड़कों पर चलने को मजबूर हुए। अगर निजी संस्थाएं और व्यक्तिगत सहयोग न होता तो क्या होता इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। सरकार ने जो कोरोना आर्थिक पैकेज घोषित किया वो भी वास्तविकता में 2020 के बजट को ही दोहराना था। इस 20 लाख करोड़ के पैकेज में बहुत कम राशि अलग से थी। इसमें मनरेगा तक का पैसा जोड़ा गया और बहुत सारी ‘राहत’ क़र्ज़ की शक्ल में थी। यानी मदद और राहत के नाम पर लोन मेला लगाया गया था।

इसे पढ़ें : कोरोना आर्थिक पैकेज में राहत की तलाश   

इसे देखें : वित्तीय पैकेज: देर आये पर दुरुस्त नहीं आये

आप जानते हैं कि कोरोना के हिस्से 2020 का साल रहा, लेकिन सरकार तेल का खेल हर चुनाव से पहले और बाद में खेलती रही है। यानी अगर कोरोना की वजह से बढा ख़र्च वजह होता तो इससे पहले दाम जिस तरह बढ़ाए गए, उनके पीछे क्या लॉजिक था। और यही नहीं भाजपा के नेता खुद कहते थे कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ने से तो आम आदमी ही परेशान होता है और डीज़ल के दाम बढ़ने से आम आदमी पर सबसे ज़्यादा मार पड़ती है क्योंकि ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाने-पीने के सामान के दाम बढ़ते हैं जिससे आम ग़रीब आदमी की ही जेब कटती है और जीना दूभर हो जाता है। यानी अगर कोरोना काल में जनकल्याणकारी योजनाओं में खर्च बढ़ाने का तर्क भी मान लिया जाए तो ऐसे समय में जब लोगों की नौकरियां नहीं रहीं, काम-धंधा ठप हो गया। तनख्वाहें आधी हो गईं उस समय में पेट्रोल के साथ डीज़ल और साथ मैं रसोई गैस के भी दाम बढ़ाकर आप कौन सा जनहित कर रहे हैं।

इंतज़ार कीजिए अब पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में चुनाव का। सबसे पहले पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं तो इसकी घोषणा के साथ ही तेल के दाम में कमी या स्थिरता आनी शुरू हो जाएगी। और सौ का तेल नब्बे में करके आपको 10 रुपये का तोहफा भी दे दिया जाएगा। अब तो खुश रहिए...

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