NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
उत्पीड़न
शिक्षा
संस्कृति
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
भोपाल के एक मिशनरी स्कूल ने छात्रों के पढ़ने की इच्छा के बावजूद उर्दू को सिलेबस से हटाया
पिछले पांच-छह सालों में स्कूल की तरफ़ से उर्दू को हटाने की यह चौथी कोशिश है और इस बार अपने फ़ैसले को लेकर अधिकारियों का रुख़ कड़ा दिख रहा है।
काशिफ काकवी
14 Apr 2021
Convent School

भोपाल: सालों की कड़ी मेहनत के बूते नौवीं कक्षा के छात्र समीर कुमार (बदला हुआ नाम) ने उर्दू ज़बान में महारत हासिल कर ली थी। जो लड़का दो साल पहले उर्दू ज़बान के मुश्किल उच्चारण वाले शब्दों और घुमावदार अक्षर को पढ़ने को लेकर संघर्ष कर रहा था, अब वह मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तकी मीर और इसी तरह के उर्दू अदब के जाने-माने शायरों की पंक्तियों के साथ अच्छी तरह से वाकिफ़ है।

समीर इस नयी ज़बान से इतना प्रभावित रहा है कि उसने अपनी सभी किताबों, कॉपियों पर अपना नाम उर्दू में ही लिखा है और यूट्यूब पर अक्सर उर्दू लेखकों और शायरों को सर्च करता रहता है। इस ज़बान में उसकी गहरी दिलचस्पी को देखते हुए राज्य सरकार में एक अधिकारी पद पर कार्यरत उसके पिता ने उसके लिए उर्दू का एक होम ट्यूटर रख लिया था। लेकिन, समीर के मंसूबों पर उस समय पानी फिर गया, जब भोपाल के अरेरा स्थिति सहशिक्षा वाले उसके स्कूल-सेंट जोसेफ़ स्कूल ने इस बात का ऐलान कर दिया कि उर्दू को नौवीं कक्षा  के सिलेबस से हटा दिया जायेगा और भाषा के नाम पर सिर्फ़ हिंदी और संस्कृत ही पढ़ायी जायेंगी।

अरेरा स्थित इस सेंट जोसेफ़ को-एड स्कूल को 1986 में स्थापित किया गया था और यह भोपाल के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक है। इस शहर पर सदियों तक नवाबों का शासन रहा था। कभी उर्दू इस शहर की आधिकारिक भाषा हुआ करती थी, जिसे यहां के ज़्यादतर लोग बोलते थे।

समीर के पिता ने बताया कि जब बिना किसी वजह के उर्दू को हटाने का ऐलान किया गया, तो समीर परेशान हो गया था। वह आगे बताते हैं, “उसने इस ज़बान पर बहुत अच्छी पकड़ बना ली थी और इसमें उसे अच्छे अंक भी मिलते रहे हैं। मुझे अपनी भारतीय भाषाओं से प्यार है और उर्दू तो अब तक सुनी गयी तमाम भाषाओं में नफ़ासत वाली ज़बान है।”

केंद्रीय विद्यालय शिक्षा बोर्ड (CBSE) के दिशानिर्देशों से संचालित यह मिशनरी स्कूल नौवीं कक्षा के छात्रों को चार भाषायें-हिंदी, संस्कृत, उर्दू और जर्मन पढ़ने का विकल्प देता है। लेकिन, उस समय जर्मन भाषा को सिलेबस हटा दिया गया था, जब इसे पढ़ने वाले सिर्फ़ आठ छात्र थे। हालांकि, इस स्कूल के तक़रीबन 50 छात्रों (समाज के सभी वर्गों से) ने उर्दू को चुना था, फिर भी स्कूल ने बिना किसी विशेष कारण के इसे हटाने का फ़ैसला कर लिया।

समीर के पिता ने बताया कि उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा था इसलिए समीर को हिंदी को चुनना पड़ा।

मिशनरी स्कूल के इस फ़ैसले से समीर न सिर्फ़ परेशान हुआ बल्कि हुनेज़ा ख़ान (बदला हुआ नाम) जैसे कई ऐसे दूसरे छात्र भी परेशान हुए हैं जो उर्दू ज़बान के साथ सिविल सेवा परीक्षाओं में शामिल होना चाहते थे।

हुनेज़ा की 42 वर्षीय मां ने बताया, "स्कूल के इस फ़ैसले से हुनेज़ा इतनी परेशान हो गयी कि वह कई दिनों तक तब तक रोती रही और खाना-पीना तक छोड़ दिया था जब तक कि हमने उसे स्कूल के अधिकारियों से मिलने और उनसे इस विषय को फिर से सिलेबस में शामिल करने का आग्रह करने का वादा नहीं किया।"

जब अभिभावकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने सेंट जोसेफ़ को-एड स्कूल के प्रिंसिपल मेल्विन सीजे से मिलकर उर्दू को फिर से शुरू करने का आग्रह किया, तो इन अभिभावकों में से एक अभिभावक के मुताबिक़ उन्होंने एकदम दो टूक जवाब दिया, "अगर आप अपने बच्चों को उर्दू सिखाना चाहते हैं, तो मदरसा जाइये।"

प्रिंसिपल के इस जवाब से कई अभिभावक अवाक रह गये। हुनेज़ा की मां दुख जताते हुए कहती हैं, "वह केजी 2 से ही वहां उर्दू पढ़ रही थी और अब प्रिंसिपल उसे उर्दू पढ़ने के लिए मदरसा ले जाने के लिए कह रहे हैं। क्या यह धार्मिक भाषा है?"  

पिछले पांच-छह सालों में उर्दू को हटाने की यह स्कूल की तरफ़ से की गयी चौथी कोशिश है। लेकिन, उन्होंने हर बार इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ होने वाली ज़बरदस्त प्रतिक्रिया के बाद इस ज़बान को फिर से शामिल कर लिया था। हालांकि, इस बार, स्कूल के अधिकारियों का इरादा इस आदेश को वापस लेने का नहीं है। एक चिंतित अभिभावक ने बताया कि छात्रों को संस्कृत या हिंदी लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

एक अन्य अभिभावक ने कहा, “संविधान की आठवीं अनुसूची में उर्दू देश की आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है और एक मिशनरी स्कूल इसको सिखाने से इनकार कर रहा है। यह न सिर्फ़ शर्मनाक, बल्कि सीबीएसई दिशानिर्देशों का सरासर उल्लंघन भी है। वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

उन्होंने आगे बताया कि कि सीबीएसई के दिशानिर्देशों के मुताबिक़ स्कूल किसी भी भाषा को पढ़ाने से इनकार नहीं कर सकता भले ही पढ़ने वाला एक मात्र छात्र ही क्यों न हो।

इस बाबत राज्य उर्दू अकादमी, गैर सरकारी संगठनों ने स्कूल को लिखे पत्र

इस हो-हल्ला के बाद मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी और कई ग़ैर सरकारी संगठनों ने स्कूल के साथ-साथ भोपाल के आर्कबिशप, डॉ. लियो कार्नेलियो से उर्दू को शामिल करने के लिए संपर्क साधा। स्कूल के इस फ़ैसले से छात्रों को हुए मानसिक उत्पीड़न का ज़िक़्र करते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग से भी शिकायत की गयी है।

मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के निदेशक-नुसरत मेहदी ने स्कूल अधिकारियों को लिखे एक चिट्ठी में उर्दू को फिर से पढ़ाये जाने की मांग का समर्थन करते हुए लिखा, “उर्दू भारत में ही पैदा हुई है, उसका विकास हुआ है और फली-फूली भी है। यह न सिर्फ़ बातचीत की भाषा है, बल्कि राष्ट्रीय एकता का भी प्रतीक है। कई राज्यों ने एमपी की उर्दू अकादमी की तरह उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए एक अलग विभाग का गठन किया गया है।”

इस चिट्ठी में आगे लिखा गया है, "इसलिए, हम विनम्रता के साथ आपसे उर्दू को एक विषय के रूप में जारी रखने का अनुरोध करते हैं क्योंकि यह सिर्फ़ साहित्य और कविता की भाषा नहीं है, बल्कि प्रेम और स्नेह की भी ज़बान है।"

जबकि मुस्लिम समन्वय समिति के मसूद ख़ान ने सवाल किया कि एक ऐसे शहर में जहां सदियों तक उर्दू राज-काज की भाषा रही थी और भोपाल की ज़्यादतर आबादी आज भी उर्दू बोलती है, ऐसे में सीबीएसई के तहत चलने वाला एक स्कूल इस विषय को कैसे हटा सकता है, जबकि छात्र इसे पढ़ने के लिए तैयार हैं।

मसूद ने कहा कि यह कोई मामूली मुद्दा या महज़ किसी ज़बान को लेकर कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों छात्रों के साथ नाइंसाफ़ी भी है जिन्हें इस विषय को चुनने के विकल्प करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। उन्हें इस भाषा को सीखने से रोकने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा, "भोपाल में चल रहे दर्जनों मिशनरी स्कूल एक वैकल्पिक विषय के रूप में उर्दू पढ़ने का मौक़ा देते हैं, लेकिन कुछ स्कूल जानबूझकर इसे सिलेबस से हटने की कोशिश कर रहे हैं।"

लेकिन, महीनों बाद भी सेंट जोसेफ़ को-एड स्कूल के अधिकारी व्यापक आक्रोश के बावजूद अपने फ़ैसले पर अड़े हुए हैं।

भोपाल के मिशनरी स्कूलों के अध्यक्ष-लियो कॉर्नेलियो से जब संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा, “मुझसे उर्दू को फिर से शुरू करने को लेकर कुछ लोगों ने अनुरोध किया है और उन्होंने स्कूल को भी इस बारे में अवगत करा दिया है। लेकिन, मैं स्कूल के दिन-ब-दिन के मामलों का हिस्सा नहीं हूं और स्कूल के प्रिंसिपल से इस बाबत ज़रूर सवाल किया जाना चाहिए।”

हफ़्ते भर की कोशिश के बाद भी स्कूल के प्रिंसिपल मेल्विन सीजे ने न्यूज़क्लिक के फ़ोन या मैसेज का जवाब नहीं दिया। स्कूल के जनसंपर्क अधिकारी वसुंधरा शर्मा ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/Bhopal-Missionary-School-Drops-Urdu-Despite-Students-Wanting-Learn

Bhopal
Madhya Pradesh
urdu
Language
CBSE
Discrimination

Related Stories

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

सिवनी : 2 आदिवासियों के हत्या में 9 गिरफ़्तार, विपक्ष ने कहा—राजनीतिक दबाव में मुख्य आरोपी अभी तक हैं बाहर

मध्य प्रदेश : मर्दों के झुंड ने खुलेआम आदिवासी लड़कियों के साथ की बदतमीज़ी, क़ानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

बाल विवाह विधेयक: ग़ैर-बराबरी जब एक आदर्श बन जाती है, क़ानून तब निरर्थक हो जाते हैं!

मध्य प्रदेश में वीएचपी, बजरंग दल के निशाने पर अब ईसाई समुदाय

सामूहिक वन अधिकार देने पर MP सरकार ने की वादाख़िलाफ़ी, तो आदिवासियों ने ख़ुद तय की गांव की सीमा


बाकी खबरें

  • indian economy
    अजय कुमार
    क्या 2014 के बाद चंद लोगों के इशारे पर नाचने लगी है भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति?
    18 Nov 2021
    क्या आपको नहीं लगता कि चंद लोगों के पास मौजूद बेतहाशा पैसे की वजह से भारत की पूरी राजनीति चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    निर्माण कार्य बंद होने पर मज़दूरों ने की मुआवज़े की मांग, श्रीनगर एनकाउंटर और अन्य ख़बरें
    17 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी मज़ार रहेगी निर्माण कार्य बंद होने पर मज़दूर संकट में, श्रीनगर एनकाउंटर और अन्य ख़बरों पर।
  •  कॉप-26 के इरादे अच्छे, पर गरीब देशों की आर्थिक मदद पर कुछ नहीं
    न्यूज़क्लिक टीम
    कॉप-26 के इरादे अच्छे, पर ग़रीब देशों की आर्थिक मदद पर कुछ नहीं
    17 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक की इस ख़ास पेशकश में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह और न्यूज़क्लिक के मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ ने कॉप-26 में जलवायु परिवर्तन पर किए गए एग्रीमेंट पर चर्चा की है।
  • congress
    सुहित के सेन
    राहुल जहां हिंदुत्व को धर-दबोचने में सफल, लेकिन कांग्रेस सांगठनिक तौर पर अभी भी कमज़ोर
    17 Nov 2021
    जहाँ एक तरफ विचारधारा चुनावों में सफलता पाने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है, वहीं इसके लिए एक सांगठनिक नींव अपनेआप में अपरिहार्य है।
  • judge
    भाषा
    लखीमपुर हिंसा: एसआईटी जांच की निगरानी पूर्व न्यायाधीश राकेश कुमार जैन करेंगे
    17 Nov 2021
    पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए आईपीएस अधिकारियों के नामों पर भी गौर किया और जांच के लिए गठित एसआईटी में तीन आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License