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अमेरिका की चीन नीतियों को दोबारा गढ़ेंगे बाइडेन
रूस और चीन पर जो बाइडेन का दृष्टिकोण पूरी तरह किसिंगर की अमेरिका-रूस-चीन त्रिभुज की डॉक्ट्रीन से बना है।
एम. के. भद्रकुमार
21 Nov 2020
अमेरिका की चीन नीतियों को दोबारा गढ़ेंगे बाइडेन

भूराजनीति में गलत धारणाएं वक़्त के साथ पारंपरिक बुद्धिमत्ता बन जाती हैं। पिछले 2-3 साल में एक धारणा बनी है कि अमेरिका में चीन के प्रति नीतियों को लेकर "एकमत्ता" है।

इस धारणा के मुताबिक़, आने वाला जो बाइडेन का प्रशासन, चीन के प्रति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू की गईं "कट्टर" नीतियों को जारी रखेंगे। भारतीय विशेषज्ञों ने खुशी-खुशी इस धारणा को मान्यता दी है।

लेकिन सच्चाई यह है कि अमेरिका में डेमोक्रेट पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के बीच विमर्श चल रहा है, यहां तक कि दोनों पार्टियों के भीतर भी चर्चा चल रही है। हाल में मीडिया रिपोर्टों से हमें इनकी कुछ झलक मिलती है, जो बताती हैं कि ट्रंप प्रशासन, चीन नीतियों पर बाइडेन प्रशासन को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करेगा।

प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले से CNN की एक रिपोर्ट कहती है, "ट्रंप प्रशासन के चीनी दिग्गजों का मानना था कि वे कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं, जिससे चीन की नीतियों पर बाइडेन प्रशासन को एक तय दायरे में बांधा जा सकता है।"

द एक्सियोस ने पहली बार अपनी स्टोरी में कहा था कि ट्रंप "अपनी चीन की विरासत को पक्का करने के लिए अपने अंतिम 10 हफ़्तों में कड़ी नीतियों की श्रंख्ला ला सकते हैं। वह बाइडेन प्रशासन द्वारा इनमें आगे राजनीतिक बदलाव करने की संभावना को खत्म करने की कोशिश करेंगे।"

मतलब रिपोर्ट में इशारा है कि ट्रंप प्रशासन को लगता है कि बाइडेन की चीन को लेकर अपनी नीतियां हैं।

बीजिंग ने इसका अनुमान पहले ही लगा लिया था। एक पूर्व वरिष्ठ चीनी व्यापारिक अधिकारी और "चाइना सोसायटी फॉर वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाज़ेशन स्टडीज़" की कार्यकारी परिषद के सदस्य ‘ही वेवेन’ इसे कुछ इस तरह बयां करते हैं, "बाइडेन इसकी परवाह नहीं करेंगे कि ट्रंप ने उनके लिए कितनी बाधाएं पैदा की हैं। वह उन सभी को तोड़ सकते हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे ट्रंप प्रशासन ने बराक ओबामा की विरासत को तोड़ा था।"

चीनी रिपोर्टों ने माना है कि उनके बाइडेन से जुड़े लोगों के साथ छुपे तौर पर संपर्क जारी है। बाइडेन को जीत की बधाई देने के चीनी फ़ैसले से पता चलता है कि वह मौजूदा झटकों के बावजूद प्रेसिडेंट-इलेक्ट को आपसी ठंडक को पिघलाने का इशारा देना चाहता है।

बल्कि अमेरिका में चीन की चुनौती को लेकर कई तरह के विमर्श चल रहे हैं। मसलन किस तरह की व्यापारिक नीति उत्पादक रहेगी, “तकनीक युद्ध” पर कितनी दूर तक जाया जाए। यह धारणा कि अमेरिका और चीन के बीच अपरिहार्य तनाव और मुश्किले हैं, वह एक सच्चाई है। लेकिन दोनों देशों के बीच आपस में संघर्ष हो, यह जरूरी नहीं है।

चीन-अमेरिका संबंधों में सकारात्मकता का दौर अब इतिहास बन चुका है। लेकिन अब हमें ज्यादा सकारात्मक नीति देखने को मिलेगी। अब अहम बात यह है कि अमेरिका, चीन को अपने मनमुताबिक कितना ढाल सकता है। चाहे आर्थिक नीतियों की बात हो या फिर राजनीतिक मुद्दों की।

दूसरे तरीके से देखें तो अमेरिका में इस बात पर चर्चा है कि बाइडेन प्रशासन किस तरह ज़्यादा प्रभावोत्पादकता के साथ अपनी चीन नीति पर काम करता है। लेकिन ट्रंप प्रशासन में ऐसा नहीं था। हाल का इतिहास दोनों देशों के बीच संघर्ष और आलोचना का था।

लेकिन सफलता का कोई पैमाना नहीं होता। बाइडेन के सालाहकार इस बात की खोज में लगे हैं कि क्या ट्रंप के तरीकों ने वाकई में चीन की नीतियों में बदलाव किया है।

अब चुनौती व्यापारिक, पर्यावरणीय आदि नीतियों के ज़्यादा प्रभावी गणित को बैठाने की है, ताकि चीन को अपनी मनमाफ़िक दिशा में मोड़ा जा सके।

अब यह एक “रणनीतिक प्रतिस्पर्धा” है। लेकिन अब यह अच्छे तरीके से समझ आ चुका है कि चीन को अलग-थलग करने की ट्रंप प्रशासन की रणनीति कुछ भी हासिल करने में असफल हो चुकी है। यह रणनीति तीन स्तंभों- व्यापारिक युद्ध, तकनीकी ब्लॉकेड और वैचारिक हमलों पर आधारित थी।

अब अमेरिका के लिए चीन पर आर्थिक युद्ध या किसी तरह की समग्र सैन्य संघर्ष छेड़ना व्यवहारिक नहीं है। यह चीज पूरे मुद्दे के केंद्र में है। क्योंकि दोनों देशों के बीच शक्ति का अंतर लगातार कम होता जा रहा है।

इस बीच महामारी ने अमेरिका को भारी नुकसान पहुंचाया है। चीन को उत्पीड़ित करने वाली नई नीतियों की श्रंखला लाना, कम से कम कुछ वक़्त के लिए तो संभव नहीं है। बाइडेन पर अपनी चीन नीतियों में ढांचागत बदलाव लाने का दबाव है, ताकि कोरोना के बाद अमेरिका की मरम्मत की जा सके।

आने वाले वक़्त में, बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में केवल चीन में ही सकारात्मक विकास दर देखने को मिलेगी। चीन अब वैश्विक विकास के इंजन के तौर पर उभर रहा है। इसके बावजूद अमेरिका और चीन के बीच संघर्ष जारी रहने का मतलब होगा कि अमेरिका को चीन के इस विस्तार का लाभ नहीं मिलेगा। जबकि 2007-08 के वित्तीय संकट के बाद चीन द्वारा बड़े स्तर पर मौद्रिक और आर्थिक निवेश बाज़ार में किया गया था, जिसका लाभ अमेरिका को मिला था।

ठीक इसी दौरान बीजिंग अपने वित्तीय बाज़ारों का जबरदस्त उदारीकरण कर रहा है, अमेरिकी बैंक पहले ही चीन में मौजूदा साझेदारियों में नियंत्रण देने वाली हिस्सेदारी खरीदने में लगे हैं। फिर बड़े स्तर का दबाव सहन कर रहे अमेरिकी और वैश्विक पेंशन निधियों को आय दिलवा रहा है, जो उन्हें उनके पेंशन संबंधी कर्तव्यों को पूरा करने में मदद करेंगे।

स्पष्ट है कि बाइडेन इस बात को समझेंगे कि अमेरिका-चीन की आक्रामक “रणनीतिक प्रतिस्पर्धा” की ऊंची कीमत होगी।

कुलमिलाकर 2021 में अमेरिका और चीन के संबंधों में कुछ सुधार की अपेक्षा रखी जा सकती है। बाइडेन की चीन नीति ज़्यादा तार्किक और व्यवहारिक होगी। हालांकि अब भी दोनों देशों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा रहेगी, बल्कि उच्च तकनीक क्षेत्र में यह प्रतिस्पर्धा ज़्यादा तेज होगी, लेकिन दोनों देशों के संबंधों के माहौल में समग्र तौर पर सुधार तो होगा।

बाइडेन उन तरीकों को खोजने की कोशिश कर रहे हैं जिनसे पूरे एजेंडे, जैसे- बाज़ार पहुंच, बौद्धिक संपदा, चीन की औद्योगिक नीति आदि पर अमेरिकी साझेदारों और मित्रों के साथ ज़्यादा प्रभावी ढंग से काम किया जा सके। क्योंकि आज की दुनिया में पारस्परिक संबंध ज़्यादा हैं। लेकिन बाइडेन की फौरी प्राथमिकता अमेरिका-चीन संबंधों को स्थायित्व प्रदान करने की होगी।

हम बाइडेन से, खासकर स्वास्थ्य के मुद्दे पर, ज़्यादा सहयोगी तौर-तरीकों की अपेक्षा कर सकते हैं। इसका मतलब हुआ कि दोनों में हमेशा एक प्रतिस्पर्धा तो होगी, लेकिन मुख्य जोर आपसी संबंधों को स्थायी आधार देने पर होगा।

लंबे वक़्त के हिसाब से देखें तो चीन के रणनीतिक फ़ैसले सही जगह पर हैं। इनके केंद्र में यह बात है कि एक महाशक्ति के तौर पर अमेरिका अब अवसान पर है, अब केवल इस अवसान की गति को ही देखना बाकी है।

लेकिन चीन इसे अमेरिका के साथ अपने संबंधों को स्थिर करने के मौके की तरह देखता है, जो ट्रंप प्रशासन के दौरान तनाव भरे और मुश्किल थे। खासतौर पर अमेरिका और चीन के पास अब पर्यावरण परिवर्तन, हथियारों के नियोजन और महामारी जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग करने का मौका होगा।

इतना कहने के बाद हमें यह बात भी नहीं भूलना चाहिए कि चीन भी वैश्विक स्तर पर ज्यादा नेतृत्वकारी स्थिति के लिए दृढ़ है। 

चीन में इस बात की समझ है कि अमेरिका आगे ज्यादा प्रतिस्पर्धी रवैया अपनाएगा और “रणनीतिक प्रतिस्पर्धा” रखेगा। अब अमेरिका बराक ओबामा के पहले कार्यकाल वाले रवैये पर नहीं लौट सकता, जब मुद्दों पर आपस में बैठकर विमर्श किया जाता था। चीन को आगे कड़े विमर्श की आस है। इस तरह चीन अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए अपनी नीतियों को खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आगे बढ़ा रहा है।

फिर बाइडेन की चीनी रणनीति के बड़े भूराजनीतिक आयाम भी होंगे, इन्हें अब तक विशेषज्ञ नजरंदाज करते आए हैं। खासकर भारत के विशेषज्ञों ने ऐसा किया है। मतलब यह है कि बाइडेन बहुत अनुभवी कूटनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक दांवपेंच शीत युद्ध के दौरान सीखे थे। बाइडेन 1972 में अमेरिकी सीनेट में पहुंचे थे, वह लगातार तब तक सीनेटर रहे, जब तक वे बराक ओबामा के प्रशासन में उपराष्ट्रपति नहीं बन गए। उनका विदेश संबंध समिति में भी लंबा अनुभव है।

बाइडेन की रूस और चीन को लेकर नज़र पूरी तरह किसिंगर की अमेरिका, रूस और चीन की त्रिपक्षीय डॉक्ट्रीन से बनी है।

बाइडेन ने हाल में माना था कि चीन उनके लिए सिर्फ एक प्रतिस्पर्धी है, वहीं अमेरिकी की वैश्विक स्थिति में सबसे बड़ा ख़तरा रूस है।

किसिंगर का दावा था कि एक गतिज अमेरिका-रूस-चीन का त्रिभुज, अमेरिकी हितों के लिए सबसे बेहतर होता है। अगर हम रियलपॉलिटिक की बात करें, तो इस बात की बहुत संभावना है कि बिडेन चीन के साथ एक थोड़ी-बहुत शांति बनाए रखेंगे, ताकि अमेरिका वैश्विक कूटनीतिक संतुलन में पहले नंबर की चुनौती रूस को अलग-थलग करने पर अपना ध्यान लगा सके।

आदर्श तौर पर बाइडेन चीन और रूस का अर्द्ध-गठबंधन तोड़ने की कोशिश करेंगे। अगर ऐसा संभव नहीं हो पाता, तो वे कोशिश करेंगे कि जब अमेरिका, रूस को निशाना बनाए, तो चीन तटस्थ बना रहे। बाइडेन का एजेंडा रहेगा कि 2024 के रूस में “सत्ता परिवर्तन” हो जाए। बता दें 2024 में पुतिन को नए कार्यकाल को शुरू करना होगा या फिर पद से हटना होगा। 2024 में बाइडेन का मौजूदा कार्यकाल भी खत्म हो जाएगा।

चीन के बिना रूस ‘रणनीतिक गहराई’ खो देगा। फिलहाल कोई वारशॉ पैक्ट भी मौजूद नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या चीन, बाइडेन के हिसाब से खुद को ढालेगा। अभी इस बात पर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन बाइडेन चीन के सामने अमेरिका के साथ व्यवहार का जो भी प्रस्ताव रखें, वह चीन के लिए सबसे बेहतर ही होगा।

चीन, रूसी राजनीतिक तंत्र को बरकरार रखने का ठेकेदार नहीं है। बीजिंग के नज़रिए से देखें, तो आने वाले 10 साल अमेरिका और चीन के बीच की खाई को पाटने के लिए और चीन के पश्चिमी देशों की तरह के विकसित देश बनने के लिए बहुत अहम हैं।

मेरे हिसाब से ऊपर बताई गई गणना, चीन-अमेरिका संबंधों को दोबारा गढ़ने में बाइडेन के आने वाले कदमों को तय करेगी। बाइडेन के नज़रिए से देखें, तो वे चीन के साथ शांति कायम करना चाहेंगे। लेकिन इतिहास बताता है कि चीन के पास ऐसी स्थितियों में अपने मुख्य एजेंडे को आगे बढ़ाने की बौद्धिक तीक्ष्णता और राजनीतिक तंत्र मौजूद है। इस बार वह अपने मुख्य एजेंडे को आगे बढ़ाकर अमेरिका की टक्कर की सैन्य शक्ति बनना चाहेगा।

एक आखिरी बिंदु अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों के रवैये पर है। आज रूस के यूरोपीय देशों के साथ रिश्ते सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं। हाल तक जर्मनी ब्रूसेल्स में रूस का तरफदार हुआ करता था, लेकिन अब वो भी दूर हो गया है। अगले साल एंजिला मार्केल राजनीति से संन्यास ले लेंगी, इसके बाद जर्मनी की नीतियां ज़्यादा यूरो-अटलांटिक केंद्रित हो जाएंगी।

सबसे अहम बात यह है कि यूरोपीय संघ के ऐसे कोई सुरक्षा हित नहीं हैं, जिनमें चीन शामिल हो। वहीं संघ रूस को एक विरोधी या अपने दरवाजे पर मौजूद शत्रु की तरह ही देखता है। अगर बाइडेन चीन के साथ वैसा ही तात्कालिक शांति समझौता कायम करने और चीनी-रूसी गठबंधन को खत्म करने में कामयाब रहे, जैसा किसिंगर ने 1972 में किया था, तो वे रूस से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में होंगे। यूरोपीय संघ को भी ऐसे दृष्टिकोण से कोई दिक्कत नहीं होगी।

साभार: इंडियन पंचलाइन

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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