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बाइडेन और सऊदी अरब की पहेली
CIA की रिपोर्ट के अनुसार राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान के जमाल खाशोगी की हत्या में हाथ होने की संभावना है। इस रणनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अमेरिकी राजनीति और सऊदी से सबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा।
एम. के. भद्रकुमार
27 Feb 2021
बाइडेन और सऊदी अरब की पहेली

प्रख्यात पत्रकार जमाल खाशोगी की 2018 के अक्टूबर में इस्तांबुल में स्थित सऊदी अरब के दूतावास में नृशंस तरीके से हत्या कर दी गई थी। संभावना है कि CIA द्वारा की गई जांच को अमेरिका अब सार्वजनिक कर सकता है।

राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान (क्रॉउन प्रिंस) को खाशोगी की भयावह हत्या में दोषी साबित करने वाले बेहद गुप्त दस्तावेज़ अमेरिकी मीडिया के हाथ लग चुके हैं। मीडिया को लीक हुई जानकारी से CIA द्वारा की गई जांच का प्रकाशन निश्चित होने के बारे में पता चलता है।

राजकुमार सलमान की खाशोगी की हत्या के अहम भूमिका हो सकती है। अरब के लिए यह सब कुछ उथल-पुथल कर देनी वाली खबर है। इस कूटनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अमेरिकी राजनीति और सऊदी अरब के साथ संबंधों पर बड़ा गहरा प्रभाव होगा।  

एक ओर बाइडेन यहां घरेलू स्तर पर प्रबल हो रहे विचार की लहर पर सवार हैं जहाँ पहले से ही अमेरिकी कुलीनों में सऊदी अरब की एक अनुचित और अत्याचारी की छवि है। यहां तक कि सऊदी के हाथों से खाने वाले और मालामाल हुए लोगों ने भी सऊदी अरब की तरफदारी करते हुए अमेरिका के सख्त रवैया का विरोध नहीं किया।

राजनीतिक तौर पर यहां बाइडेन उच्च आत्मविश्वास वाले योद्धा दिख रहे हैं, जिनके पास मूल्यों पर आधारित राजनीति के प्रदर्शन और डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन में मौजूद अवसरवादिता को नकारने का मौका है। विदेश नीति पर अपने पहले भाषण में इस महीने की शुरूआत में बाइडेन ने कहा था:

“आज़ादी की रक्षा। मौकों को बढ़ावा। सार्वभौमिक अधिकारों को मान्यता। कानून के शासन का सम्मान। और हर व्यक्ति से सम्मान के साथ व्यवहार। यह हमारी विदेश नीति का आधार होगा। यह हमारी वैश्विक शक्ति होगी। यह हमारी मजबूती का कभी ना खत्म होने वाला स्त्रोत होगा।”

अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध बादशाह अब्दुल अजीज और फ्रैंक्लिन डी रूज़वेल्ट के बीच हुए समझौते से आज तक एक ही जैसे हैं। यह समझौता 14 फरवरी, 1945 को इजिप्ट की ग्रेट बिटर लेक में USS क्विंसी पर हुआ था। इसी समझौते के ज़रिए दोनों देशों के बीच "तेल के लिए सुरक्षा और हथियार" संबंधों का आधार बना था।

शायद पर्यावरण को लेकर बेहद संवेदनशील बाइडेन, रूज़वेल्ट के उस विचार से इत्तेफ़ाक नहीं रखते, जिसमें वे कहते हैं, "हमेशा से तेल की कमी सामने रही है। इसका समाधान सिर्फ़ सऊदी अरब के रेगिस्तानों में मौजूद बड़े उत्खनन से मिलने वाले सस्ते तेल से संभव है।" रूज़वेल्ट का यह कथन अमेरिकी भूविज्ञानी और ऊर्जा मामलों के जानकार, लेखक स्कॉट मांटगेमरी ने दर्ज किया था।

अमेरिकी वैश्विक रणनीति में सऊदी अरब की उच्च पायदान से गिरावट का सीधा संबंध इस बात पर निर्भर करता है कि बाइडेन सऊदी-अमेरिका के संबंधों में पुनर्गठन के लिए किस स्तर तक जाने की इच्छा रखते हैं। क्या वे दोनों देशों के संबंधों का पुनर्गठन कर रहे हैं या फिर यह सिर्फ़ राजकुमार सलमान के लिए ही हैं?

अमेरिकी गृह विभाग के एक प्रवक्ता ने द गार्डियन से कहा, "अमेरिकी लोगों की मंशा है कि अमेरिका सऊदी अरब के साथ संबंधों में कानून के शासन और मानवाधिकारों के लिए सम्मान को प्राथमिकता दे। जहां हमारी यह प्राथमिकताएं मेल खाएंगी, वहां अमेरिका सऊदी अरब के साथ समन्वय करेगा और जहां यह मेल नहीं खाएंगी, वहां अमेरिका अपने हितों और मूल्यों की रक्षा करने से नहीं चूकेगा।"

अब यह ज़्यादा ऊंची बात हो गई। बल्कि इसके उलट हो सकता है कि बाइडेन यहां संबंधों को व्यक्तिगत से वापस संस्थागत स्तर पर लाने की कोशिश कर रहे हों। ट्रंप और उनके दामाद जेर्ड खुशनेर ने इन संबंधों को व्यक्तिगत स्तर पर ढकेल दिया था। इसमें कोई शक नहीं है कि बाइडेन सलमान के ऊपर हावी होना चाहते हैं और उनकी मंशा सलमान के शक्ति प्रदर्शन और सऊदी अरब की विदेश नीति को अपने हिसाब से ढालने की राजकुमार सलमान की क्षमता पर लगाम लगाना है।

सऊदी अरब में भी एक तरह गुस्सा है। इस बीच सऊदी, बाइडेन द्वारा उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाएगा, इसका इंतज़ार कर रहे हैं। सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ संबंधों में आई दूरी को कमतर दिखाने की कोशिश की है और बाइडेन प्रशासन के साथ निकटता से काम करने की इच्छा जताई है।

ऊपर से सऊदी अरब ने बाइडेन को शांत करने के लिए कई तरीके अपनाए हैं। जैसे यमन में युद्ध ख़त्म करने की बाइडेन की मांग को तुरंत समर्थन दे दिया; फिर कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी छोड़ दिया; JCPOA पर अपने विरोध को फिलहाल ठंडा कर दिया; कतर के साथ दोबारा संपर्क की घोषणा की; और सोमवार को बड़े स्तर के कानूनी और न्यायिक सुधारों की घोषणा की, जिनके ज़रिए देश में पहली बार इस्लामिक शासन के साथ-साथ नागरिक शासन भी स्थापित किया जाएगा।

लेकिन फिर भी बाइडेन शांत होते नज़र नहीं आ रहे हैं। सऊदी अरब जिस तरह से अपने घरेलू राजनीतिक विरोधियों से बर्ताव करता है, उसके खिलाफ़ बाइडेन ज़्यादा दृढ़ता वाली सार्वजनिक मुद्रा अपना रहे हैं। क्या वह (बाइडेन) इस स्तर तक जाएंगे कि अमेरिका के साथ सऊदी अरब को अच्छे संबंधों को बनाए रखने के लिए बाइडेन वहां के राज्य और राजा से खुद के लिए नया उत्तराधिकारी चुनने को कह देंगे?

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि बाइडेन द्वारा राजकुमार से बात न करना एक प्रोटोकॉल है। क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति सिर्फ राष्ट्राध्यक्षों से ही बात करता है। लेकिन जैसा हारेट्ज अख़बार के ज़्वी बारएल ने इस हफ़्ते लिखा है,

"यह देखना दिलचस्प होगा कि जब बाइडेन यूएई के शासक से बात करते हैं तब इस नियम का पालन होता है या नहीं। क्या तब बाइडेन का फोन क्रॉउन प्रिंस बिन जाएद के पास जाएगा या उनके बीमार पिता के पास? यह तब देखना और भी ज़्यादा दिलचस्प होगा, जब क्राउन प्रिंस मोहम्मद यह घोषणा कर दें कि वे इज़रायल के साथ कूटनीतिक संबंधों को स्थापित कर रहे हैं और उस समझौते पर बाइडेन की उपस्थिति में व्हॉइट हॉउस में हस्ताक्षर करने की पेशकश करें।"

राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब के रक्षा मंत्री हैं और वास्तविक तौर पर वे ही सरकार के सभी बड़े और छोटे क्रियाकलापों पर नियंत्रण रखते हैं। वाशिंगटन के पास उनसे बात करने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। हो सकता है कि यह वार्तालाप फिलहाल मंत्री स्तर या पेशेवर तक सीमित कर दिए जाएं। लेकिन जब बादशाह सलमान बीमारी या मृत्यु की वज़ह से पूरी तरह से तस्वीर से गायब हो जाएंगे, तब मामला पूरी तरह अलग होगा। यहां बता दें कि 35 साल के राजकुमार सलमान अपने समर्थकों, खासकर युवाओं में बहुत लोकप्रिय हैं। यह लोग उनके सामाजिक सुधारों का स्वागत करते हैं।

यहां यह भी दिलचस्प है कि बाइडेन का ट्रांस-अटलांटिसिज़्म का राग यहां काम नहीं पड़ा। बाइडेन द्वारा रियाध और अबू धाबी को हथियारों के समझौते पर विराम लगाने की घोषणा की गई, तब ब्रिटेन ने इन्हें मानने से इंकार कर दिया। ब्रिटेन सऊदी अरब के लिए दूसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश है।  2010 से 2019 के बीच ब्रिटेन के कुल हथियार निर्यात में सऊदी अरब की हिस्सेदारी 40 फ़ीसदी थी। फ्रांस ने भी यहां अमेरिका के प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया और सऊदी अरब के सैनिकों को प्रशिक्षण देना जारी रखा।

खाशोगी की हत्या के बाद कनाडा ने कुछ वक़्त के लिए रियाध को नए हथियारों का निर्यात रोक दिया था। लेकिन यह निलंबन पिछले साल अप्रैल में खत्म कर दिया गया। यमन में लड़ रहे सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए स्पेन सबसे बड़े निर्यातक देशों में से एक है। वहीं ऑस्ट्रेलिया ने खुले तौर पर सऊदी अरब और यूएई को हथियार आपूर्ति रोकने से इंकार कर दिया था।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सऊदी अरब ने अब तक बाइडेन के कदमों की सार्वजनिक तौर पर आलोचना नहीं की है, बल्कि नई वास्तविकता में आगे बढ़ने के लिए गुप्त बातचीत का रास्ता अपनाया है। भले ही सऊदी अरब बाइडेन के तौर-तरीकों से बहुत मुश्किलों का सामना कर रहा हो, लेकिन वे अभी अमेरिका के बजाए किसी और साझेदार के साथ जाना पसंद नहीं करेंगे।

रविवार को सऊदी अरब की सैन्य उद्योगों ने लॉकहीड मार्टिन के साथ सऊदी रक्षा और निर्माण क्षमताओं को मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर सैन्य आवश्यकताओं की वस्तुओं के निर्माण के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के ज़रिए एक साझा उपक्रम बनाया जाएगा। यहां स्थानीय स्तर पर सैन्य वस्तुओं और उपकरणों के निर्माण का समझौता क्रॉउन प्रिंस के "विजन 2030" को ध्यान में रखकर किया गया है, जिसके तहत "राज्य में एक सतत और आत्मनिर्भर सैन्य उद्योग क्षेत्र का निर्माण किया जाना है।"

उसी दिन रियाध ने हथियारों के स्थानीय निर्माण में अगले एक दशक में 20 बिलियन डॉलर खर्च करने की घोषणा की, साथ में 20 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश शोध और विकास में भी करने का ऐलान किया। सऊदी अरब का लक्ष्य वर्ष 2030 तक कुल रक्षा बजट का 4 फीसदी हिस्सा सैन्य शोध औऱ विकास पर खर्च करने का है। फिलहाल यह आंकड़ा सिर्फ 3.2 फ़ीसदी है।

शायद लॉकही़ड मार्टिन कुछ ऐसा जानती हैं, जो हम नहीं जानते। शायद बाइडेन भी यह बात जानते हैं कि क्राउन प्रिंस के पास सारे अधिकार मौजूद हैं और उन्होंने दूरदृष्टि रखते हुए उन सभी लोगों को रास्ते से हटा दिया है जो सऊदी अरब का अगला राजकुमार बनने के लिए अमेरिका की पसंद हो सकते थे।

2005 में कोंडोलिज़ा राइस ने अपील करते हुए कहा था कि सऊदी अरब को लोकतंत्र अपना लेना चाहिए और स्वतंत्र चुनाव करवाने चाहिए। इसके बाद रियाध ने नगर निगमों के सीमित चुनाव करवाना शुरू किए थे। इन चुनावों में रूढ़िवादियों की जबरदस्त जीत हुई थी, जिनमें से ज़्यादातर पश्चिम विरोधी, इस्लामिक प्रत्याशी थे। बाइडेन जो चाह रहे हैं, उसके बारे में उन्हें सावधान रहना चाहिए।

साभार: इंडियन पंचलाइन

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Biden and the Saudi Conundrum

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