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राजनीति
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ईरान पर प्रतिबंधों को लेकर बिडेन को निर्णायक समाधान का सामना करना पड़ रहा है
ट्रम्प ने ईरान पर प्रतिबंधों के मामले में ‘भूतिया टोपी’ लाद दी है।
एवलिन लियोपोल्ड
23 Nov 2020
बिडेन

राष्ट्रपति ट्रम्प ने ओबामा की ओर से शुरू किये गए ईरान के साथ परमाणु समझौते को एक “भयानक एकतरफा सौदा” करार दिया था और 2018 में इससे हाथ खींच लिए थे। इसके अलावा उन्होंने वास्तव में कुछ नहीं किया।

पिछली गर्मियों में विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समक्ष अपीलों की श्रृंखलाबद्ध कतार खड़ी करनी शुरू कर दी थी, जिसमें कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र में पूर्व अमेरिकी राजदूत समन्था पॉवर द्वारा परिषद की 2015 की बैठक में इसके पक्ष में किये गए वोट को देखते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका अभी भी इस सौदे का एक सदस्य था। इसलिये वाशिंगटन के पास “स्नैपबैक” की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार था – एक ऐसी प्रक्रिया जो सौदे में शामिल प्रतिभागियों को संधि द्वारा स्थापित किसी भी प्रतिबंधों को आसान बनाने या हटाने की अनुमति प्रदान करता है।

इसके चलते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की कई बैठकें हुईं, जिसमें अधिकांश सदस्य देशों ने पोम्पिओ के तर्कों को ख़ारिज कर दिया था। लेकिन सितम्बर के अंत में जाकर पोम्पिओ ने “अधिकांश अन्य देशों की आपत्तियों के बावजूद” स्नैपबैक का आह्वान कर दिया था।

एक वरिष्ठ यूरोपीय राजनयिक ने कहा था “हम खुद को ही मूर्ख नहीं बनायेंगे।”

भूतिया टोपी

निश्चित तौर पर फैंटम स्नैपबैक का अपना एक निश्चित उद्येश्य था- ताकि ईरान पर और अधिक प्रतिबंधों के ढेर लगाने को न्यायोचित ठहराया जा सके और उम्मीद की जाए कि शेष विश्व इसे सम्मानित करे। चूँकि ज्यादातर देशों ने इस स्थिति को ठुकरा दिया था तो ऐसे में संयुक्त राज्य अमेरिका ने किसी भी देश के ईरान के साथ सौदे में जाने की स्थिति में उस पर माध्यमिक प्रतिबंधों की धमकी दे डाली थी। डॉलर चूँकि दुनिया की मानक मौद्रिक ईकाई के तौर पर मान्य है, ऐसे में वाशिंगटन उन देशों के खिलाफ एकतरफा प्रतिबंध लगा सकता है जो इसका उल्लंघन करते पाए जाते। इसलिए यूरोपीय कम्पनियों को ईरान के साथ व्यापार में दिक्कत थी।

इस मुद्दे पर 2015 में अपनाए गए सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 में ईरान को परमाणु बम विकसित करने से रोकने के लिए जॉइंट कॉम्प्रेहेन्सिव प्लान ऑफ़ एक्शन (जेसीपीओए) के तौर पर मशहूर परमाणु समझौते पर समर्थन की मुहर लगाई गई थी। इस संधि को अमली जामा पहनाने के लिए ओबामा प्रशासन के तहत दो साल तक गहन वार्ताओं का दौर चला। इस समझौते के पक्षकारों में रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, यूरोपीय संघ सहित संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश शामिल थे।

ट्रम्प के सत्ता में आने से पहले तक ईरान ने इस समझौते का पालन किया और अपने परमाणु कार्यक्रम के विस्तार में कटौती करने का काम किया। बदले में इसे कुछ मुआवजे भी हासिल हुए, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका में इसके फण्ड को अनफ्रीज करना शामिल था।

लेकिन ट्रम्प के पदभार ग्रहण के साथ ही सब कुछ बदल गया, इसने खुद को जेसीपीओए से अलग कर लिया और ईरान के पर प्रतिबन्ध थोप दिए।

ट्रम्प प्रशासन का घोषित लक्ष्य रहा है कि ईरान को परमाणु कार्यक्रम के इतर भी समझौते के लिए मजबूर किया जाए, जैसे कि बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास के कार्यक्रम को रोकना और क्षेत्रीय छद्म ताकतों को अपना समर्थन देना। यह रणनीति इनमें से किसी भी लक्ष्य को हासिल कर पाने में असफल साबित रही है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार “जब श्रीमान ट्रम्प ने पदभार ग्रहण किया तो ईरान के पास उस समय लगभग 102 किलोग्राम या कहें 225 पौंड का संवर्धित यूरेनियम था।” संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की एक प्रतिबंधित रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान के पास अब 2,440 किलोग्राम से अधिक का निम्न स्तरीय-समृद्ध यूरेनियम भण्डार मौजूद है, जोकि 2015 के परमाणु समझौते द्वारा निर्धारित सीमा से आठ गुने से भी अधिक है। ईरान का कहना है कि वह यूरेनियम की तय सीमा पर वापस आ सकता है यदि बिडेन ईरान पर थोपे गए अमेरिकी प्रतिबंधों को हटा लेते हैं।

अब क्या?

राष्ट्रपति के तौर पर चुने गए जोसफ आर. बिडेन ने परमाणु समझौते में एक बार फिर से शामिल होने के इरादे को जाहिर किया है।

अपने सितम्बर के सीएनएन के लिए ऑप-एड में उन्होंने कहा था “मैं तेहरान को राजनयिक राह पर वापस आने का एक विश्वसनीय रास्ता मुहैया कराऊंगा।” “यदि ईरान परमाणु समझौते पर कड़ाई से पालन करता है तो संयुक्त राज्य अमेरिका बातचीत के अनुवर्ती राह के प्रारंभिक बिंदु के तौर पर इस समझौते में पुनः शामिल होगा।”

लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। बिडेन के पदभार सँभालने से पहले ही ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के उपर प्रतिबंधों का ढेर लगाना शुरू कर दिया है- और यहाँ तक कि वह सैन्य कार्रवाई पर भी विचार कर रहा है।

विदेश नीति एवं अन्य समाचार संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक नवीनतम एवं कईयों के लिए अचंभित कदम के रूप में “यमन की ईरान समर्थित हौथी विद्रोहियों को आतंकवादी संगठन” के तौर पर चिह्नित किया गया है। कांग्रेस में मौजूद डेमोक्रेट्स और कई सहायता समूहों को इस बात का भय है कि यह कदम सऊदी अरब समर्थित ढुलमुल सरकार के खिलाफ जारी युद्ध और अकाल के पिछले छह वर्षों के बाद देश में अस्थिर शांति वार्ताओं के दौर को कमजोर करने का काम कर सकता है।

निस्संदेह ईरान चाहेगा कि इसके परमाणु जखीरे को खत्म करने से पहले इसके उपर लगे अधिकाधिक अमेरिकी प्रतिबंधों को हटा लिया जाए। राजदूत वेंडी शर्मन द्वारा लॉस एंजिल्स टाइम्स में एक ऑप-एड के अनुसार, जिन्होंने विदेश विभाग की राजनीतिक मामलों की अंडरसेक्रेटरी के तौर पर परमाणु वार्ता में अमेरिकी टीम की अगुआई का काम किया है, के अनुसार “जहाँ तक ईरान का संबंध है, दोनों शिविरों में... कट्टर-नीतियों और कट्टर-नीतियों पर चलने वाले भरे पड़े हैं।” विश्लेषकों का कहना है कि ईरान में जून में होने जा रहे चुनावों को देखते हुए कुछ प्रतिबंधों में ढील दे दी जानी चाहिए, क्योंकि इसके बाद तेहरान का रुख और भी सख्त हो सकता है।

प्रतिबंधों के हटाए जाने तक ईरान को कोविड-19 संकट जैसी विशिष्ट चुनौती का सामना करना होगा, जिसमें प्रतिबंधों के चलते इसे वित्तीय एवं चिकत्सकीय संसाधन जुटा पाने में बेहद कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मार्च में ईरान ने अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कोविड-19 की चुनौती का मुकाबला करने के लिए 5 बिलियन डॉलर की आपतकालीन ऋण के लिए आवेदन किया था, लेकिन अमेरिका ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। भले ही बिडेन के राष्ट्रपतित्व काल के दौरान राहत प्रदान करने को लेकर वित्तीय प्रतिबंधों में कुछ ढील दे दी जाती है तो भी मानवाधिकारों के उल्लंघन, बैलिस्टिक मिसाइल के निर्माण एवं आतंकी गुटों को समर्थन देने जैसे मद्दों पर प्रतिबन्ध लागू रहेंगे, जिन्हें पलट पाना कहीं ज्यादा दुष्कर कार्य है।

कुछ प्रतिबंधों को तो लगता है कि जानबूझकर थोप दिया गया है। इस प्रकार की एक रोक, अमेरिकी शिक्षित ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़, जो कि एक पसंदीदा अमेरिकी टॉक शो है, पर लगाये गए पाबंदी के तौर पर है।

यूरोपियन लोगों का मानना है कि जो मुद्दे परमाणु समझौते से संबंधित नहीं हैं उन्हें अलग से निपटाए जाने की जरूरत है। अटलांटिक काउंसिल ने इस बात की सिफारिश की है कि ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी को इस संक्रमण काल में “जेसीपीओए की सीमा का जो परमाणु गितिविधियाँ अतिक्रमण करती हैं उन्हें ईरान के लिए फ्रीज किये जाने की आवश्यकता है, उसकी रुपरेखा तैयार करनी चाहिए। बिडेन प्रशासन को इसे प्रतिबंधों के राहत पैकेज के साथ अच्छी तरह से नत्थी करने की जरूरत है।”

हालाँकि इससे पहले कि बिडेन पदभार ग्रहण करें, राष्ट्रपति ट्रम्प और विदेश मंत्री पोम्पिओ ईरान पर एक अंतिम वार के लिए उत्सुक दिख रहे हैं। ऐसा लगता है कि इस संक्रमण चरण में वे न जाने कितने खूंखार उपायों को अपना सकते हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं है।

इस लेख को ग्लोबट्राटर द्वारा निर्मित किया गया था। एवलिन लियोपोल्ड ग्लोबट्राटर के लिए एक राइटिंग फेलो एवं संवावदाता के तौर पर कार्यरत हैं। आप एक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर संयुक्त राष्ट्र में रेजिडेंट संवावदाता के तौर पर हैं। आप यूएन में 17 वर्षों तक रायटर्स के लिए ब्यूरो चीफ के तौर पर काम कर चुकी हैं और डेग हम्मरस्कॉल्ड फण्ड फॉर जर्नलिस्ट्स की अध्यक्षा हैं। सन् 2000 में इन्हें यूएन की रिपोर्टिंग के लिए संयुक्त राष्ट्र संवावदाता संघ की ओर से स्वर्ण पदक से नवाजा गया था एवं आप काउंसिल आन फॉरेन रिलेशनस की सदस्या हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Biden Is Facing a Showdown on Iran Sanctions

Joe Biden
Donald Trump
USA Election
Iran Sanctions

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